Wednesday, February 15, 2012

Lamhon Ke Jharokhe Se...: मेरा कुछ सामान....!

Lamhon Ke Jharokhe Se...: मेरा कुछ सामान....!
टाइटिल से ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहूंगा आपकी रचना के बारे में....पहली बार है इसलिए, लेकिन ये जोड़ना जरूर चाहूंगा अंदाज-ए-बयां ऐसा है जो गुजरे लम्हों को जिंदा कर देता है- हू ब हू वैसे ही जैसे अभी अभी किचन में 'डांट' पड़ी हो...

Tuesday, September 06, 2011

ऐसे में काहे का पत्रकार!


कई महीने की खामोशी में मैंने यही पाया. मैं संभवतः पत्रकार नहीं रहा, एक राइटर भर रह गया हूं. खबरों की बदलती परिभाषा और सच की बदरंग हुई तस्वीर को अपने सीने में जज्ब करता हुआ एक लेखक मात्र. मेरी भाषा में कितनी आसानी से पैठ बना चुके हैं डराने वाले, दहलाने वाले, रुलाने वाले, हंसाने वाले, सावधान करने वाले, किसी का बखान करने वाले बहुत सारे अतिरंजित शब्द. ये खबरों की बिकाऊ चासनी के लिए जरुरी हैं. हाई-डेसिबल ड्रामा तैयार करने के लिए जरूरी इनग्रीडियंट्स...

मैं ये नहीं कहूंगा, कि आपलोगों से शेयर किए आखिरी पोस्ट के बाद से क्या मैं इसी बात पर आत्ममंथन कर रहा था. बल्कि अनिर्णयता के इस दौर मैं मैं खुद बखुद 'रेट्रो मोड' में चला गया. सोचने लगा कि आखिर सच की आवाज बुलंद करने पर भी कैसे आप पर पक्षपात का आरोप लगता है. देश की माननीय संसद में आपको 'डिब्बेवाला' बुलाया जाता है. अदालत से लेकर अपराधी और सरकार तक हमारी सक्रियता के लिए 'मीडिया ट्रायल' जैसा सब्जेक्टिव टर्म इस्तेमाल करती है. कोई बताएगा- ऐसे शब्दों के खिलाफ मीडिया वाले किस संस्था के पास अपना 'प्रीविलेज मोशन' लाएं?

ऐसी नियति के साथ पत्रकार कहलाना क्या शोभा देता हैं? जनता में पहले से ही ये संदेशा गया है कि हम टीवी न्यूज वाले जमीनी मुद्दों के मुकाबले आकाश-पाताल की सुर्खियां बनाने में ज्यादा सुख महसूस करने लगे हैं. गरीब-गुरबा से जुड़ी खबरों को 'लो-प्रोफाइल' कह कर डस्टबीन में डालने की आदत लत में बदल गई है. खैर, ये बात तो मैं भी कहूंगा कि अगर जनता हमारे बारे में ऐसा सोचती है तो ये पूरा सच नहीं. अपनी जमीन से जुड़ी खबरों से मुंह मोड़ना इतना आसान नहीं है. उन्हें दरकिनार करना आसान नहीं है. फिर भी ऐसा क्यों होता है, ये समझने के लिए हमारे पेशे का पूरा खाका खींचना होगा, उसे समझना होगा.

इस काम के लिए अभी तो फुरसत नहीं. आपसे दोबारा जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. आपसे कुछ बांटना चाहते हैं. अगर पिछली स्थिति को एक लाइन में समझे तो हमारी दुर्गति की 'टोटल वजह' है कि हमारी आवाज औरों के लिए तो हैं, लेकिन हमारे लिए नहीं. दूसरों के लिए तो हम फिर भी आवाज उठा लेते हैं, अपने लिए तो चूं तक नहीं कर पाते (या कर नहीं सकते?)

इस पेशे में न जाने कितने ऐसे और लोग होंगे, जो मेरी तरह सोचते हैं, ठीक ठीक नहीं कह सकता. बहुत हद तक इसलिए भी कि ऐसे निष्कर्ष वाला सर्वे करने की हिम्मत नहीं किसी में. इसलिए मसले को इशारे में ही जिंदा रहने दें. बात निकलेगी तो वैसे भी दूर तलक जाएगी...

Thursday, December 23, 2010

लहसुन को भूल गए कार-ओ-बारी



बड़ी काबिले गौर बयान दी 'कारोबारी' बंधु ने. आगे का कोई मतलब समझने से पहले जरा कारोबार का कोट('') समझिए, ये प्याज का भंडारण करने वाले कारोबारी नहीं, कार में बार लगाने वाले हैं. अब भाई जान फिल्म सिटी के हों, या फिर किसी और 'मायानगरी' के बात बड़े पते की कह दी. दिल में चुभ कर अटक गई उनकी बात. अब निकाल रहा हूं, तो मीठी मीठी सी सिहरन हो रही है.

मौका बड़ा नहीं था, रोज की तरह रास्ते से सही सलामत ही जा रहे थे, टाइम तो 'दिव्य अवस्था' में जाने का हो ही गया था, अरे भाई, हफ्ते में एक दिन तो ये 'अवस्था' बनती ही है. तो बंधु जी उस शाम जरा जल्दी निपटा लिए 'प्रोग्राम'. फंडा साफ है, कार अपनी है तो 'बार' के लिए किसी और दुकान क्या फेरी लगाना. जब चाहो, जब गई महफिल. पेड़ के नीचे अंधेरे कोने में...वो एफएम से आ रही नीली पीली ससुरी किसी डिस्को की टिमटाम को हलकान करती है.

अब इससे ज्यादा महफिल की जिक्रा क्या करनी. समझदार के लिए आनंद का इशारा काफी होता है. कहानी में ट्विस्ट तो तब आया, जब कार में 'बार' समेत एक जेंटिल मैन मिल गए. बीच सड़क पर मैसेज देखते हुए, या कि एमएमएस देखते हुए. दीदार चाहे जिसका कर रहें हो, बीच सड़क पर सुध बुध खोए हुए हैं, कुछ ऐसे कि मोड़ पर कनफ्यूजन क्रियेट हो जाए, कि इनके दायें से पास करें, कि बाएं से. बंधु को गुस्सा तो इतना आया कि बीच में ही घुसेड़ दें...

लेकिन कार के बार में इतनी भी हिम्मत नहीं, कि इतना हिंसक बुला दे. जुबानी तीरबाज तो भाई साहब स्वभाव के है, कुछ दूर आगे तमाक से कार रोककर मुड़ गए पीछे और माथा पीट लिए-
कहने लगे-
भाई साहब,
इतनी अजूबी चीज, कितनी आसानी से समझा रहे हैं.
'समझदारों' की फिल्मसिटी जैसी जगह भी मुर्ख रहते हैं.
कहा तो हमें ज्याता है, कार में बार लगाए घूमते हैं.
यहां तो ये जनाब हमसे ज्यादा नशे में लगते हैं.

बंधु ने पूरा जुमला काढ़ दिया.मुखातिब हो गए मुझसे अपनी चिर परिचित व्यंग्यवाणी में-
-भाई जान, आज का दिन ही खराब है. चैनल पर दिन भर प्याज प्याज हो रहा है. रहा है मैंने लहसुन की याद क्या दिला दी, मेरी तो लेने पर उतर आए लोग.
- अरे, मियां, आपने क्या बात करती, लहसून खाता कौन है. लहसुन के बिना तो सबका काम चल जाए, बिना प्याज के आजकल क्या बनता है,
-लेकिन महोदय जी, लहसुन भी तो चालीस पचास से तीन सौ रुपये के पार पहुंच गया है. जरा इसका इनफ्लेशन परसेंटेज देखिए. अगर, प्याज के दाम तीस पैंतिस से सत्तर अस्सी हुआ तो पूरी सरकार सिर पर उठा ली, लहसुन के प्रति भी तो फर्ज बनता है.
बंधु बड़े दुखित स्वर में सुना रहे थे मुझे प्याज लहसुन से भेदभाव की पीड़ा. कहने लगे, मैंने तो जैसे गुस्ताखी कर दी थी भाई जान.मेरे जवाब से महोदय जी को जैसे लहसुन लग गया.
-मियां, लेकिन ये भी तो देखिए, लहसुन खाता कौन है भाई जी, जैन, ब्राम्हण जैसे कई बड़े पंथ हैं, जो लहसुन के नाम से तौबा तौबा करते हैं. इस शहर में जो बड़े खरीददार हैं, वो तो अमूमन छूते ही नहीं. यानी मार्केट का मालदार हिस्सा तो लहसुन से अछूती है. तो खपत कहां होती है. कुछ बोलने से पहले जरा इकनॉमी का भी ख्याल किया कीजिए...है कि नहीं.
-लेकिन महोदय जी, मनाही तो लहसुन के साथ प्याज की भी है. इस पैमाने से तो 'मेन मार्केट' में प्याज की भी खपत नहीं होनी चाहिए, यहां तो मारामारी मची है. और आपको पता है, ये किल्लत भी 'मेन मार्केट' के खिलाड़ियों की देन है. एक दिन में किलो पर 50 रुपये का मुनाफा तो यही बटोर रहे हैं. लेकिन हम चिला रहे हैं महंगाई महंगाई, जैसे, प्याज की लागत मूल्य बढ़ गई हो, दूसरी चीजों की महंगाई से तंग आकर किसानों ने ठान ली हो,कि हम भी अब महंगे बेचेंगे. उन्हें तो आज भी 10 बार रुपए ही एक किलो के मिलते होंगे. ये तो सर महंगाई नहीं, ये तो लूट है न.
-तो आपके कहने का मतलब, हम खबर चलानी छोड़ दे, सरकार को न घेरें. क्या कर रही है सरकार. यहां पब्लिक की इतनी मुश्किल है, कि सारा पूरे लंच डिनर का जायका खराब हो रहा है. और वो पवार है कि कह रहा है- तीन हफ्ते में हालत समान्य होगी.
-महदोय जी, मैं भी यही कह रहा हूं, ऐसी लूट नहीं मचनी चाहिए, सरकार को सख्ती करनी चाहिए. गोदाम भरने के खिलाफ कड़ी सजा के प्रावधान करनी चाहिए. मैं तो ये कह रहा हूं, ये सिर्फ प्याज के लिए ही क्यों, लहसुन के लिए क्यों नहीं. ये तो पांच गुनी महंगी हो गई है पिछले 1 महीने में.
-तौबा तौबा, आप फिर से लहसुन के पीछे पड़ गए. अब छोड़िए भी ज्यादा मत छीलिए, हाथ से बदबू आने लगेगी.
बंधु का दर्द अपने चरम पर बयां हो रहा था. लहसुन छिलने की बात पर सबके ठहाके छूट पड़े, महोदय जी के एक बैचमेट ने थोड़ी सी चुटकी ले ली...
-अरे भाई जान आपने भी तो हद कर दी, बाबा मना कर रहे हैं, और आप लहसुन की बात किए जा रहे हैं. जैसे चिढ़ा रहे हैं. बाबा लहसुन खाते ही नहीं, खबर बनाए.

इस बात पर पूरा दफ्तर हंसने लगा. बाबा भी मंद मंद मुस्कर रहे थे. कार में बैठे मैं और बंधु जी भी इस चुटकी पर चुहचुहाने लगे. साला, बात कारोबार से निकली थी, और लहसुन पर खत्म हुई. दिव्यअवस्था का तो सत्यानाश होना ही था.

Friday, November 26, 2010

भला कोई देता है जूते से श्रद्धांजलि!


जी नहीं, जूते से श्रद्धांजलि कोई नहीं देता, जो देता है वो दिल से देता है. ये हम सब जानते हैं, इसीलिए मेरा 9 साल का बच्चा भी समझता है, श्रद्धांजलि दिल से दो, तो कोई मैटर नहीं करता, पांव में जूता है या पांव गंदे हैं।

वाकया टीवी पर हो रहा था. मुंबई हमले के शहीदों को श्रद्धांजलि सभा में कुछ लोग जूता पहनकर दिख गए. भाई लोगों ने काट दिया गोला, लगा दिया ऐरो. हेडर दे दिया- ये कैसी श्रद्धांजलि। बेटा बोला- पापा, ये किस बात पर सर्किल लगा है, ये ऐरो क्या दिखा रहा है।

मैं कहने वाला था- बेटा, श्रेष्ठ सफाई पसंद लोगों को ये अच्छा नहीं लगता, कि कोई जूता पहन कर हाथ जोड़े चकाचक सफेद श्रद्धांजलि सभा में कोई काले कलूटे जूते पहनकर आए. इससे डिजाइन में फर्क पड़ता है. इससे पहले वो बोल पड़ा-

अच्छा, जूता पहनकर आए हैं इसलिए. लेकिन हम तो अपने स्कूल के प्रेयर में जूता पहनकर ही प्रार्थना करते हैं. इनमें क्या गलत है. और पूजा पर आप भी तो हमें कभी कभार गंदे पांव भी बिठा लेते हो, कई बार छोटू को तो आप जूता पहने ही गोद में बिठा लेते हो. 'माताजी'(मां सरस्वती) तो बुरा नहीं मानती

मैं तो भैया निरुत्तर था. मैंने कहा- बेटा कोई बात नहीं, तुम इस बहस में पड़ ही क्यों रहे हो, नहीं अच्छा लग रहा तो- CHANGE THE CHANNEL!

THATS IT

Monday, November 15, 2010

मियां, भलाई अब 'भज्जी' को भजने में है


ये विचार भज्जी के शतकों ने फोड़ा. आठवें नंबर आकर दो दो बार सेंचुरी मारना, आखिर दुनिया में पहली बार तो हो रहा है. वो भी तब जब टीम के सारे दिव्यपुरुषों को दिन में तारे नजर आ रहे थे.

कभी हम भी क्रिकेट के आशिक हुआ करते थे, अजहर कपिल और गावस्कर के हुनर में मीन मेख निकाला करते थे (जैसी कि अपने इंडिया में क्रिकेट फैन होने का मापदंड है)लेकिन उब गए. अब तो सिर्फ हारने जीतने के नतीजों से पता चल जाता है. बाकी गुणगान तो टीवी पर ही देख लेते हैं. हार गए तो पीछे से देते हैं हुरा (डंडा का भोजपुरी संस्करण) और जीतने पर सजा देते हैं मऊर(सेहरा का भोजपुरी संस्करण)

जाने क्यों भज्जी का खेल अपने आप में विद्रोह लग रहा था. एक एक गेंद पर किसी इच्छित क्रांति का आगाज. सिस्टम को तोड़ने की हुंकार. भज्जी में हाशिये पर खड़े उस आखिरी शख्स का चेहरा दिख रहा था, जो सिर्फ कहने भर के लिए लोक-तंत्र में है. उसका अपना योगदान है, लेकिन उसकी 'हीरोगीरी' किसी काम की नहीं मानी जाती.

इस सिस्टम में भ्रष्ट्र बने रहना कितना आसान है. राजू से लेकर रामालिंगा तक, गुटखा किंग्स से लेकर 'चाराबाजों' और चव्हाणों तक. सब अपने अपने काले कलूटे चेहरे और नापाक हाथों के साथ सिस्टम का हैंडल पकड़े हुए हैं (कहीं न कहीं) इन 'दिव्यपुरुषों' के आगे कितनी फीकी लगती है पब्लिक. इन्हीं की खबरे होती है, खबरों में कहने भर को ठुकाई होती है, ये लेकिन यहां तो पिछवाड़ा ही मोटा हो गया है इनका. घुम फिर कर वापस खबरों में आ जाते हैं.अगली बार पुराने आरोप दफ्न हो चुके होते हैं. बड़े आराम से दांत चिहारे बाइट दे रहे होते हैं

दादा जी एक जुमला कहते थे, सौ पापी मरते हैं तो एक चोर पैदा होता है, सौ चोर मरते हैं तो एक नेता पैदा होते हैं. (इसके आगे भी है, लेकिन संदर्भ से बाहर है)आज के दौर में ये जुमला भी महंगाई का मारा लगता है. सौ की जगह पता नहीं हजार भी कम पड़े शायद..

इनके जुल्म के मारे हाशिए पर खड़ा 'भज्जी' जब आक्रामक होता है, तो उसे 'उग्र' करार दे दिया जाता है. उसकी कतार ही अलग कर दी जाती है- कानून के निशाने पर खड़ी एक विद्रोही कतार. समझ में नहीं आता इन दिव्यपुरुषों के लिए कहां चला जाता है कानून. इनके घपले के पैसे वापस देश को मिल जाए,तो ससुरी देश की दशा 'उस जमाने के' अमरीका रूस से भी बेहतर हो जाए.

लेकिन नहीं, इन्हें तो चुराने और उड़ाने की आदत है. बगैर चोरी के तो कोई मालदार बना ही नहीं, आकड़े देखकर तो यही लगता है. दवाई में चोरी, दारू में चोरी, बिल्डिंग में दलाली,नीलामी में दलाली. गेम्स में घपलेबाजी, सिनेमा में लफ्फाजी. सुना है दिल्ली के किसी गुटका किंग फेमिली में होने वाली शादी में 25 करोड़ रुपये सिर्फ हीरो हीरोइनों को बुलाने पर खर्च किया जा रहा है. शाहरुख, सलमान, कैटरीना और 'मुन्नी' सब आ रहे हैं. बताते हैं, सिर्फ 6 करोड़ तो शाहरुख मियां नाच कर लूट ले जाएंगे (बख्शीस)

इनके आगे 'भज्जी' की क्या औकात. दो शतक से भला हीरो बन जाएगा? उनके लिए तो और भी नहीं, जिनकी 'कतार' ही अलग है. लेकिन सावधान, ये भज्जी अभी और रिकार्ड तोड़ सकता है. 'बदलाव का बल्ला' उसके हाथों को लग चुका है. वो खेल का 'दांवपेच' भी समझ चुका है और बारीकी भी.

मियां, आज भज्जी जाने क्यों 'पावर' का पर्याय लग रहा था, जिसकी कमी देश की 80 फीसदी पब्लिक में खलती है. सारे लोग अपनी अपनी जगह से ऐसी 'रिकार्डतोड़ बैटिंग' करने लगे, तो इन दिव्य पुरुषों से छुट्टी मिल जाएगी.
इसलिए, भेजे में ये टाइटिल खटका- मियां भलाई तो अब भज्जी को भजने में ही है.

Friday, November 05, 2010

संभालना अपने अपने दीये



माथे पर सजाकर
रौशनी की टोकरी
फिर से आया है दीया
अंधेरे से दो-दो हाथ करने
अपने दिल में जलाए
उम्मीदों का उजाला
हुंकार भरेगा अंधेरा
हाहाकार मचाएगा
दीये को डराएगा
बुझ जाने का डर दिखाएगा
देखिगा
कहीं कम न पड़ जाए
दीये का हौसला
गिर न जाए उसके माथे से
रौशनी की टोकरी
सुबह सूरज आएगा
तो सब संभाल लेगा

Sunday, October 24, 2010

दिन का दुखड़ा सुनो


किसने काट लिए दिन के पर
देखो, कितना लंगड़ा के चलता है ये दिन

कभी कितना मस्त था
नीले लिबास में सूरज का साफा बांधे
चमकता हुआ झकास सा वो दिन

भिनसार में आंखे खोलता
सूरज चढ़ते दौड़ उछलता कूदता
दो पहर तक पसीने में तर-ब-तऱ
घड़ी दो घड़ी सुस्ताता
आमियों की छाव में चैन की बांसुरी बजाता

दिन भर के लिए आना होता है
कितनी अच्छी तरह जानता था
शाम होते होते खुद को समेटने लगता
गोधुली से हर रोज शाम की शान बढ़ाता
चुपचाप गुम हो जाता रात की गोद में
सूरज को निगलकर चुपचाप सो जाता
सितारों के सपने देखता
नींद खुलती तो चांद से बतियाता

एक चक्र में कितना कुछ दे जाता था वो दिन
यहां तो अपना चक्र ही भूल गया है
न ठीक से सोता है न ठीक से जागता है

दिन भर उनींदा सा रहता है
अपने पांव का जख्म सहलाता हुआ!

Tuesday, September 21, 2010

और क्या करूं, तुम्हारे लिए अयोध्या भी बन गया!



अयोध्या के रूप में मैं, लीजिए जी मैं आ गया, चार महीने को हुए आपसे कुछ बात करते हुए. क्या करें जी, मन में कुछ मलाल सा हो रहा था लिखने पढ़ने के बार बार बेअसर रहने से. मई-जून में महीने भर गांव में रहा, घड़ी की सुइयां माजी की तरफ मुड़ गईं थी. शहर आया, तो फिर से निरर्थकता सताने लगी. 24 घंटे न्यूज चैनल कुनबे का हूं. कुनबे के मान अपमान में मैं भी शरीक था- जाहिर है. इस ख्याल ने मन का वो मलाल और भी बढ़ा दिया. मैं बेकलम सा हो गया. सोचने लगा कि लिखकर क्या फायदा, कोई सुनने सुधरने या विचारने वाला तो है नहीं. अगर है भी तो उसका हमे पता नहीं.

अयोध्या पर आने वाले फैसले ने मेरे अंदर के इंसान को डरा दिया. 20 साल के थे तब हम. सूझ-बूझ थी, कि मस्जिद टूटने के बाद क्या होगा. मैंने कलम उठा लिया. और अयोध्या जाने कब अयोध्या बन गया-


6 दिसम्बर, 1992
18 साल से ये तारीख मुझे चुभती रही है. ऐसी नासूर बन चुकी है ये तारीख जिसकी अब सिहरन भी नहीं सही जाती. उस दिन मेरी बेबसी की इम्तेहां हो गईं. मैं चुपचाप देखती रही. मेरी एक निशानी को हमेशा हमेशा के लिए मिटा दिया गया...

बाबरी नाम की वो मस्जिद मेरे लिए उतनी ही प्यारी थी, जितनी राम जन्मभूमि. अपनी दो औलादों की तरह. दुनिया की कौन मां होगी जो अपने ही बच्चों में फर्क करती हो. लेकिन मेरा दर्द कोई नहीं समझता. मेरे एक बच्चे को छीनकर मेरे सामने ही जमींदोज कर दिया गया...

मैंने वो दर्द भी झेल लिया था. मैं अपने दर्द के साथ खामोश हो गई थी, लेकिन मेरे जख्म को सूखने नहीं दिया गया। कभी मजहब के नाम पर, तो कभी सियासत के नाम पर. मेरे दामन को अखाड़ा बना दिया गया। किसी ने कभी मेरे दिल की बात नहीं सुननी चाही। किसी ने मेरी गोद में बसने वालों की राय नहीं जाननी चाही.

देश को आजादी मिलने के बाद तो जैसे मेरी अमन की जिंदगी को काली नजर लग गई. मेरे बाशिंदो को तो कभी ये मलाल नहीं रहा कि मंदिर कब बना और मस्जिद कब बनी. इनसे बगैर पूछे ही नारे बुलंद किए जाने लगे।
किसकी आस्था, किसकी धरोहर. इस पर तो सबसे पहले मेरा हक बनता है. लेकिन लोगों ने तो अपने अपने झंडे बुलंद कर रखे हैं. ये सब देख- सुनकर मुझे कितना दर्द होता है, ये कोई नहीं जानता. 18 साल से तारीख दर तारीख ऐसे ही दावे किए जाते है. मेरे दर्द की परवाह किए बगैर.

कोर्ट भी क्या फैसला करे. इसके हवाले करे, तो उसको दुख. उसको हवाले करे तो इसको कष्ट. 18 साल से कोर्ट भी पसोपेश में है. दोनों पक्ष चाहते, तो इस विवाद में बीच का रास्ता निकल सकता था, लेकिन लोग हैं कि पीछे हटने को तैयार नहीं. कह रहे हैं इस कोर्ट में दावा सही साबित नहीं होता, तो उपरी अदालत में जाएंगे।

किसी को राम मंदिर चाहिए, किसी को मस्जिद. मैं आपसे, पूरे देश से पूछना चाहूंगी. क्या मेरे आंगन में बने इतने मंदिर और मस्जिद कम हैं जो नई निशानी बनाने का जुनून है। क्या ऐसी जिद का कभी अंत हुआ है. एक कोर्ट का फैसला नहीं मानने वाले, क्या जरूरी है कि ऊपरी अदालत के फैसले को पचा लें? विवाद को सुलझाने के लिए कोर्ट तो व्यवस्था ही देगा. लेकिन यहां तो लोग मजहब की आड़ में सत्ता को हिलाने के लिए तैयार हैं. मेरी मानिए- मेरे बाशिंदों को मंदिर-मस्जिद से ज्यादा बस सुकून चाहिए। हिंदू हो या मुसलमान अपने शहर को कोई अखाड़ा नहीं बनने देना चाहता.


सुना आपने, मेरे बाशिंदों को वक्त की सुई पीछे घुमाने की आदत नहीं. वो आज में जीते हैं, कल के सुंदर से सपने में खुश रहना चाहते हैं। ये तो अमन से ज्यादा मांग भी क्या रहे हैं. मेरे आंगन में मंदिर-मस्जिद के विवाद पर साठ साल से चल रहा है मुकदमा।

सुनवाई होती रही, गवाहियां होती रहीं। इतिहासकारों के बयान दर्ज हुए, एएसआई की रिपोर्ट लिखते लिखते 15 हजार पन्नों से ज्यादा भर गए। लेकिन वक्त की सुइयों ने आगे का रुख नहीं किया. इस तनातनी में मेरी हालत क्या होगी. इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। मेरी हर गली, हर कूचे में सख्त पहरा बिठा दिया गया है. मेरे अपने बाशिंदे जैसे मेरी गोद में ही अजनबी हो गए हैं।

अब इससे ज्यादा क्या करें- पत्रकार हैं तो हवाला ही तो दे सकते हैं, कि भैये संभल के, दुनिया सिर्फ एक बार ही मिल सकती है. इंसान बनकर फैसला करो, और इंसान बनकर अमल करो.

अब आप ही बताइए, बात नहीं मानिएगा, तो मेरे मन का मलाल बढ़ाईएगा ही न. इसमें मेरा कुछ स्वार्थ लगता हो, तो ये भी बताईएगा

Monday, May 24, 2010

तपिश में बारिशों के अरमान

इतनी शिद्दत भरी है तपिश कि कहीं चैन नहीं. सूरज चाचू इतने तपे तपे हैं, कि सुलगते अरमान दहकने से लगे हैं. कई बार तपिश तो सिर्फ एक बहाना लगती है. पसीने के पीछे परेशानी कोई और लगती है. बार बार नजर जाती है मटमैले आसमान से, बड़ा बीमार सा लगता है आसमान. ऊपर से 'ऊपरवाले' का, नीचे से 'नीचेवालों' का उत्सर्जित ताप झेलते हुए.

एक दोस्त ने पूछ दिया (फेसबुक पर) पहले तो दादा-परदादा बारिशों के टोटके करते थे. 'ऊपरवाले' का ध्यान खीचने के लिए कीचड़ में मेंढकों के जोड़ों को निकाल कर शादी कराते थे (ताकि वो बेदिल बच्चों की तरस का तो ख्याल करेगा)आज के दौर में कौन से टोटका करे...

अब इस सवाल के जवाब में तपते, सुलगते तमाम अरमान छलक पड़े, गनीमत है, कंप्यूटर पर बैठा था, अंजुरी में समेट कर उस दोस्त के साथ आपको भी परोस रहा हूं. गले से नहीं उतरे तो कहिएगा, जी न चुराइएगा...


बारिश के लिय़े टोटके के
रूप में मेरी सलाह तो यही है कि-

एक बार 'उनकी' जुल्फों को उड़ाकर देखिए
तपती हथेलियों पर बूंदों की रिमझिम तय है

फसाना लगे तो माफ कीजिएगा.
दिल बहलाने के अफसाने ऐसे ही हसीन होते हैं

जाने क्यों ख्वाब में सजे
कांटे भी फूलों से गुलजार लगते हैं

अफसानों में आपने कालीदास के
मेघों को महबूब मैसेज पहुंचाते देख रखा है

तो उनके जुल्फों के कहने पर
ऊपर वाला इतना भी नहीं पिघलेगा?

आसार तो ऐसे कतई नहीं दिखते
आप उनकी जुल्फों से जरा खिलवाड़ करके तो देखिए

लबों पे अपने एक बार
सजा तो लीजिए बारिशों के अरमान

इतनी भी संगदिल नहीं उनकी जुल्फें

* बारिश के लिए टोटके के रूप में तो मेरी सलाह जरा रोमांटिक है-

Friday, April 23, 2010

नई-पुरानी के बीच 'सेकेंडहैंड' सोच



किसको नई कहूं
किसको पुरानी

कई बार बेमानी लगती हैं
नई भी
पुरानी भी
बिकने को बेकरार
बाजारु उसूलों के बीच

नए पुराने का
क्या घनचक्कर बन जाता है

कभी सवाल
पहली आंखो देखी का होता है

जो पहले आई
पुरानी तो वही होती है
जो बाद में आए
नई तो वही कही जाती है

कभी सवाल होता है
पहले अंतःप्रवेश का

पहली का बंधन
पहली पहली बार बंधा था
उसके लिए मैं पहला
मेरे लिए वो पहली

भौतिक लिहाज से
तो पहली को पुरानी नहीं
नई कहा जाना चाहिए

लेकिन
नई पर बादवाली का
दावा भी कुछ कम नहीं


बार बार बाजार का
हवाला देती है बाद वाली
वो जानती है
अपनी जिंदगी में वो भी दूसरी है
अपनी जिंदगी में मैं भी दूसरा
फिर भी कहती है
नई तो मैं हूं
मेरा रंग नया
मेरा रोगन नया
मेरी पूरी रंगत नई
मेरा हौसला नया
मेरी मंशा नई
मेरा सफर नया
मेरी मंजिल नई
मेरा यार नया
मेरा प्यार नया

चेहरा पुराना है तो क्या हुआ
मत देखो तन मेरा
मन से मैं ‘सेकेंड हैंड’ नहीं
बाजार में सौदा नया होता है
सामग्री कोई जरूर नहीं

नई पुरानी के बीच-बहस में
उलझा हुआ मैं सोचता हूं
इसमें न नई की खता है
न पुरानी का कसूर
ये सब आदमी के
असीम अरमानों का अंजाम है

‘एडगुरू’ ठीक ही कहते हैं
एक से मेरा क्या होता है