Monday, July 13, 2009

'कपिल' के 'मतलबी चौके' का मीनिंग

कपिल नाम सुनकर असमंजस में मत पड़िए, इस चौके का का संदर्भ मीडिया से है, और जो बैट्समैन इनवॉटेड कॉमा में बंद है, वो अपने देश के एचआरडी मिनिस्टर है- मिस्टर कपिल सिब्बल। अब माना कि मंत्री जी अपने 'हरियाणा हरिकेन' की तरह चौका जड़ने में सिद्धहस्त हैं, सियासत में इतनी मौकापरस्ती तो है ही, कि मौका देखकर चौका उड़ा सकें। ढीली गेंद डालोगे भैया, तो नौसिखिया भी यही करेगा, वर्ना क्या ऐसे वैसों की क्या औकात।

आज धुली हुई चकाचक शर्ट के साथ साफ सुथरी इमेज लेकर चलते हैं, वो सिब्बल इसी मीडिया की देन हैं, चाहे एक कार्यकर्ता के रूप में वो पार्टी का काम हो, या मंत्री के रूप में सूझ बूझ दिखाते हैं, मीडिया न बताए, तो सिब्बल साहब 'एक बड़ी टोकरी का छोटा आइटम होते'. पिछले दिनों इसी मीडिया को आंख दिखा गए सिब्बल साहब, 'छापिए और दिखाईए, जो दिखाना है छापना है, हमे कोई फर्क नहीं पड़ता। ये बाते भीं उन्होंने वहां कही, जहां 'पत्रकारिता की फ्रंटलाइन मौजूद थी, बड़े बड़े नाम गिरामी चेहरे कोई जवाब नहीं दे पाए.

क्यों?कहीं न कहीं हमें अपने पेशे के ढीले पेच का पता है, एहसास है, कि हमने खुद को जोकर की तरह पेंट कर लिया है, और खबरों के सेलक्शन में व्यावहार भी जोकर की तरह करते हैं। हमने अपने आपको हास्यास्पद बना लिया है, सिब्बल के उसी बयान पर मैंने कहीं कुरबान अली को पढा था- आज मीडिया का हाल ये है कि जनता जूते उतार कर तैयार है, वो मीडिया वालों की गिरेबान पकड़ कर पूछने के लिए कमर कस चुकी है- ये शनि, मंगल का अंधविश्वास कब बढ़ाना बंद करोगे, 'आइटम गर्ल' जैसी भैंस का भाव बढ़ाना कब बंद करोगे, प्राइम टाइम में पेल देते हो, हमारी नस्ल खराब करनी है, भूत प्रेत और तीसरी दुनिया के चक्कर में तुम लालगढ़ और 'शराब की फैक्ट्री में काम करते सियासतदानों' को कब तक अनदेखा करते रहोगे.

कुरबान अली का इशारा साफ था, उन्हें रंज तो है कपिल के बयान का, लेकिन मीडिया की दशा से भी सुकून नहीं. अव्वल तो ये है कि साल दर साल हालत और गंभीर होती जा रही है. आपको मजाक लगेगा. मैं सबूत देता हूं. आज 13 जुलाई है. पिछले साल ठीक इसी दिन को एक पोस्ट लिखा था नाम था- पांच दिनों की प्यास, जिसमें ये बात जाहिर है कि कैसे एक लाइन को बढ़ाकर टीवी पर आधे घंटे का प्रोग्राम बनाया जाता है. किस तरह का बड़बोलापन, किस तरह का एग्जेजरेशन आ गया है मीडिया के नैरेशन में. सनसनी फैलानी की कोशिश इस तरह से हो रही है, कि सिब्बल तो सिब्बल, स्कूल कॉलेज के बच्चे, कॉलसेंटर और कारखानों में काम करने वाले 'मशीन मानव' भी भाषा का भाव हमसे बेहतर समझने लगे हैं, जरा देखिए कैसा शो-ओपेन बनाया है भाइयों ने...
पांच दिन
सिर्फ पांच दिन...
जी हां, सिर्फ पांच दिन बाकी हैं
सावन शुरू होने वाला है
उसने कसम खाई है
इस बार नहीं तोड़ेगा कसम
सावन में शराब पीने की कसम
वो कर रहा है रोज प्रैक्टिस
संयम रखने की प्रैक्टिस
हफ्ते भर से हाथ तक नहीं लगाया
न ग्लास को, न बोतल को
लेकिन,एक रात
जब वो अकेला था
मचल गया जब वो तन्हा था
पानी भर आया उसके मुंह में
उसने आव देखा न ताव
फ्रिज से निकाला पानी
फ्रीजर से बर्फ के कुछ टुकड़े
फिर उठाई ली उसने बोतल
और खोल दी ढक्कन
उड़ेल दी ग्लास में
और बुझा ली उसने
पांच दिनों की प्यास

हाल बिलकुल नहीं बदला, बल्कि इतना बिगड़ा कि सिब्बल जैसे लोग भी लतिया कर चल दे रहे हैं, बॉस लोगों कुछ सोचो...कुछ सोचो, ये काम आप ही लोगों का है।

Saturday, July 11, 2009

लो जनाब, हम तो फिर 'न्यूयॉर्क' हो आए!

मैसेज तो पहली 'विजिट' में ही क्लीयर था, लेकिन इस बार 'रिपीट' करने गया था. पहले 'दौरे' के बाद बड़ी खामोशी से 'रेसपॉन्स' को ऑबजॉर्ब कर रहा था, देख रहा था कि जो चीज मुझे कनविंसिंग लगी, वो कितने औरों को लगती है, लेकिन मैं कह सकता हूं तादाद अच्छी है, तीसरे हफ्ते में हाउस फुल...

जो शहरी युवा 'फॉरेन माल' को इनज्वाय करने थियेटर में जाता था, जो मेट्रो फेमिली 'डीडीएलजे' और 'आरएनबीडीजे' की 'पैकेज्ड लव स्टोरी' को देख देख कर सुपर डुपर हिट बना देती थी, वो न्यूयार्क के मैसेज पर माथापच्ची करती दिख रही है। कबीर जी, अपने जमाने को अच्छा सिला दिया है, आपने अपने हुनर का।

अब तो घर में भी 'हॉन्ट' कर रहे हैं फिल्म के प्रोमोज. शीशा चकनाचूर होने जैसे साउंड इफेक्ट के साथ शुरू होता है सीक्वेंस, जॉन अब्राहम की चंद सेकेंट चीख हिलाकर रख देती है, कैटरीना की बात- ही डज नॉट नो इंगलिश, नील नीति की उदास खामोशी खास हो जाती है 30 सेकेन्ड के प्रोमो में. ठिठकने पर मजबूर कर देता है इरफान खान का डायलॉग- 'मुसलमानों के दामन पर जो भी दाग लगे हैं, उसे दूर करने के लिए खुद मुसलमानों को आगे आना होगा.'

कितना 'करेंट' है ये डायलॉग, जो उस डाइरेक्टर की कलम से निकला है जो खुद एक मुसलमान है, लेकिन फिल्म में साबित कितनी खूबी से साबित किया इस्लाम सिर्फ उसका मजहब है, ईमान है इंसानियत, और इंसानियत जब खतरे में घिर जाए, आत्महंता बनना पड़ना पता है। इस 'थॉट लाइन' के साथ अपनी बुराई को अपने अंदर ही खत्म करने की वकालत करते हैं कबीर खान। वो बुराई चाहे टेरोरिज्म की हो, या एफबीआई जैसी पुलिसिंग की.

जाने आपलोगों में से कितनों को पता होगा कि एफबीआई के जिस फेर में जॉन और नील नितिन मुकेश पड़े दिखाए जाते हैं, उसी तरह के फेर में खुद कबीर भी पड़े थे। फिल्म की तरह असल में भी सिर्फ मुसलमान होने के नाते. 9/11 के 15 दिन बाद न्यूयार्क से वाशिंग्टन जा रहे थे. विमान में अपने दोस्तों के साथ ये हिंदी में बात कर रहे थे, जिस पर किसी अंग्रेज मुसाफिर ने कंप्लेन कर दिया कि ये बंदे किसी 'सस्पेक्टेड लैंगवेज' में बात कर रह हैं. नाम पूछा तो टाइटिल भी खान निकला. पत्नी मिनी माथुर जरूर साथ थी, लेकिन जमाने का सवाल देखिए, 'माथुर' का पति 'खान' कैसे हो सकता है? फिर क्या था, एफबीआई ने डिटेन कर लिया. और 2 घंटे टेढे मेढ़े, चुभने वाले सवालों की बौछार, कड़ी पूछताछ और गहन जांच के बाद खुशनसीब थे कबीर की चंगुल से छुट गए. मौके की गंभीरता को उन्हें ये बात छुपानी पड़ी कि वो अफगानिस्तान जा चुके हैं. (एक बार डॉक्यूमेट्री के सिलसिले में, और दूसरी बार फिल्म काबुल एक्सप्रेस की शूटिंग के लिए) अगर ये बात बता देते तो शायद आप 'न्यूयार्क' नाम की फिल्म पर्दे पर नहीं देखते.

आप सोचिए, जिस शख्स का अनुभव इतना कड़वा रहा हो, उसने अगर इतने 'अबजेक्टिव ताने-बाने' में अपने जमाने की बात कहने की कोशिश करे, तो उसे दाद दो कदम आगे बढ़कर देनी चाहिए। जिस कंडीशन में कबीर फंसे थे, उसी कंडीशन में उन्होंने दो पात्रों को फंसाया है (क्योंकि किसी भी मसले के हमेशा दो पहलू होते हैं) जॉन जो प्रताड़ना से इतना बौखला जाता है कि मरने मारने पर उतारु हो जाता है, कैटरीना जो सब जानती है, लेकिन अपना मौन समर्थन देती है, और नील नितिन मुकेश जो प्रताड़ना से तंग आकर दोस्त की मुखबिरी करना मुनासिब समझता है, ताकि उसे गलत रास्ते से हटा पाए. ये दो विचार हैं, जो बेहद खूबसूरती से एक दूसरे भिड़ाए गए हैं. इस टकराव में जो मैसेज पैदा हुआ है, उसे कहीं न हीं दुनिया में 'मोस्ट पॉपुलर अमेरिकी' ओबामा भी मानने लगे हैं.

अच्छा मौका है, जब इस यूनिवर्सल मैसेज के साथ इस बार हम 'ऑस्कर्स' में दस्तक दें. बढ़िया विकल्प मिला है ऑस्कर का ख्वाब पूरा करने का. फिल्म में जहां इंडियन मिजाज के मुताबिक मेलोड्रामा है, तो तकनीकि लिहाज से भी फिल्म नीट एंड क्लीन, पेसी और परफेक्ट बनी है. कोई अंग्रेज ये नहीं कह सकता कोई सीन जबरन ठूंसा हुआ है, ऑस्कर की चाहत रखने वालों, आओ ईमानदारी से 'न्यूयार्क' के लिए मिशन ऑस्कर पर एक होते हैं.

Thursday, July 09, 2009

जाओ, जैक्सन जाओ!


जैक्सन, अच्छा किए,
तुम अलविदा कह गए
अब तुमसे दिल न बहलाती दहशत की मारी दुनिया
बे-दिमाग का जुनून कहती तुम्हारे ब्रेक डांस को
पागलपन कहती तुम्हारी अबाधित अदायगी को
नामुमकिन कहती तुम्हारी लय और ताल को
शहंशाही समझती अपने दम से दुनिया बसाने की हसरत को
बाहर बिठा देती तुम्हारे अंदर के जानवर को निकालकर

तुम अलविदा कह गए, बहुत अच्छा किए
एक ऐसे वक्त में...

जब हर जान, बेजान चीजों को दिखने लायक बनने की दरकार है
जब हर चेहरे पर आतंक, हर कदम पर खतरे का निशान है
इराक और अफगानिस्तान जैसे देश बरबादी के निशान हैं
मजहब और सरहदों के स्वार्थ में एक और जंग के आसार है
खतरा है परमाणु बम का, आसमान से ओजोन खत्म हो जाने का
गोरे-सफेद के बीच ओबामा जैसी शख्सियत का गुणगान है

एक ऐसे वक्त में जब
दुनिया में मंदी है, मंदी के मारे हैं
रामालिंगा जैसे भरोसे के हत्यारे हैं
कड़क जेब है, मगर दिल में ढेर सारे नरम अरमान हैं
गांव फिर भी गांव है, ग्लोबलाइजेशन में भी शहर से दरकिनार है
झोंपड़ी और अट्टालिका में फर्क का दीदार और भी साफ है
एक तरफ मोदी का गुजरात है, बगल में बुद्धदेव का नंदीग्राम है
मुंबई पर आतंकी हमला है, लालबाग में नक्सली मुठभेड़ है

ऐसे वक्त में जब
आधुनिकता की आन में तने हुए इंसानी रिश्ते हैं
मर्द से सटती मर्द की सांठ और औरत से बंधती औरत की गांठ है
तुम्हारे जैसी बुलंदी की कितनी दुखद दास्तान है
सब लौट पड़े हैं धर्म और अध्यात्म की तरफ
मगर देखो, बापुओं, और योगियों की कितनी बहार है...

अच्छा किए, तुम अलविदा कह गए
अच्छा है, अब हम तुम्हें याद किया करेंगे!

Monday, July 06, 2009

जब बेटा लाएगा 'दामाद' और बेटी लाएगी 'बहू' !

(-अल्लाह-ईश्वर के कहर से ऐसे तबाह हुए शहर 'सोडोम और गोमरा')

ये जुमला मेरा नहीं, 'दो नंबर' के खबरिया चैनल का है। जिसमें और कुछ हो या न हो चौंकाने वाला तत्व तो है ही. आप समझ ही गए होंगे ये जुमला जुड़ा है समलैंगिकता पर तेज हुई बहस से. नजर पड़ते ही मुझे भी समझते देर न लगी, कि क्या कहना चाहता है जुमला. डर तो नहीं कहूंगा, हां, अजीब जरूर लगा इस जुमले का मतलब समझकर-

जिस तरह से बहस चल रही है-मर्द से मर्द और औरत से औरत का कनेक्शन जोड़ने की, कल को मान लीजिए आपका-हमारा (किसी का भी) बेटा जिद कर बैठे- मैं तो मोहल्ले के टिंगू-मिंगू-चिंगू के साथ शादी करूंगा। शादी करने का मतलब साथ रहूंगा, बेटी कहने लगे- मैं तो रिंकी-पिंकी-चिंकी के साथ हाथ पीले करूंगी- तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी. आप बोलेंगे नहीं, बेटा, शादी के लिए ये 'च्वाइस' ठीक नहीं, तो वो तपाक से 100 सेलिब्रिटियों का नाम गिना देगा- फिल्म स्टार्स, फैशन डिजाइनर्स, पेंटर्स, म्यूजिशियन्स, मॉड्सल इतने गुड लुकिंग लोग इसमें पक्ष में, तो आप जैसे जिंदगी भर पत्रकारिता की 'सड़ी-गली नौकरी' करने वाले, 'जब जैसा, तब जिधर' टाइप से हिचखोले खाने वाले इंसान की कौन सुने. पापा ये 21 वीं सदी है, आपके पास नए जमाने न अनुभव है, संस्कार।
आ कहेंगे आप, औरों के लिए कह देना कि- ठीक है, अगर किसी को 'पतली गली' पसंद है, तो आपको क्या ऐतराज है, भई, ह्यूमन राइट्स का जमाना है, जिसे जो पसंद हो, उसे पाने का अधिकार है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो 'कर्म' वैज्ञानिक मानदंडों पर खरा नहीं उतरता, प्राकृतिक रूप से सृष्टि की रचना की खिलाफत करता हो. संबंधों के समीकरण में एक नया उलझन पैदा करता हो, जिंदगी भर सेक्स की कामना को अतृप्त रखता हो (ये विश्लेषण डॉक्टरों का है- कि पेनिस और वजाइना का निर्माण ढांचागत स्तर पर एक दूसरे के पूरक के रूप हुआ है, 'पॉटी का दरवाजा' तो इंटरकौस के लिए है ही नहीं- न ढांचे के लिहाज से, न साफ सफाई यानी हाइजीन के लिहाज से, बिलकुल गंदा रास्ता है)

ऐसे में 'इन राहों पर अपने कायदे कानून से गुजरना सेक्सुअल असंतुष्टि के सिवा कुछ और नहीं देगा, जो आपको निश्चित तौर पर मानसिक रूप से बीमार कर सकता है। और तो और, मनोवैज्ञानिक रूप से भी "उल्टी नाव पर सवारी करना" सोसायटी और खुद आपके लिए घातक हो सकता है. कोई विरोध करे या न करे, भले ही कोई कोर्ट आपको संबंध बनाने की मजूरी दे दे, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता. जो धारा के खिलाफ है, उसका हश्र आप किसी भी नदी के किनारे बैठकर देख सकते हैं.

और तो और, बाइबिल और कुरान जैसे ग्रन्थों में दो शहरों का जिक्र है- सोडोम (जिससे सोडोमी शब्द बना है) और गोमरा, इनका हश्र पढ़ लीजिए. मृत सागर के किनारे बसे ये दोनों शहर अपने उल्टे सेक्सुअल प्रिफरेंसेज और व्याभिचारी संस्कृति के चलते अल्लाह-ईश्वर की नजरों में चढ़ गए. शहर का मुआयना करने जब आए तो अल्लाह-ईश्वर को एक बंदा नहीं मिला दोनों शहरों में जो सेक्स विकृति से परे हो. आखिर अल्लाह-ईश्वर को इन दोनों शहरों को बरबाद करना पड़ा. खुदा के इस कहर का हवाला देते हुए एक शख्स ने मेरे मेल पर समलैंगिकता के पक्ष में उदगार भेजे हैं, जरा देखिए, जनाब कितनी कुंठाओं से भरे हैं-
We are ‘gays’ and ‘lesbians’, People think we are worst of all; Look at the politicians of the country, Before them you will find us quite small। To deprecate our perversion, You are quoting culture and creed; Against these blood-sucking leaders, What silences the people of your breed। We may be morally wrong, Sometimes our heart also says; You address dirty legislators with respect, While call us with the impious word ‘gays’। If our opponents believe in God, Our actions will invoke His wrath and rage; Like the city of ‘ Sodom ’, our end will come, And you will be free from this filthy political cage।

भाई जी का नाम नहीं लूंगा, अभी 'हवा' इतनी नहीं चली कि बेचारे सीना ठोक कर कहेंगे- हम 'प्लस+Plus और माइनस+Minus' कनेक्शन वाले हैं, इन्हें बंदे के साथ रहने की आजादी इसलिए चाहिए कि जब इस देश में गंदे नेता सम्मान के रह सकते हैं तो इनके जैसे मोहतरम और मोहतरमा लुक छिप के 'गंदा काम' क्यों करें (ध्यान से पढिए, अपने कर्म को गंदा इन्होंने खुद कहा है) इन्हें भी नेताओं की तरह 'गंदा काम' करने की खुली छूट, वो भी ससम्मान चाहिए। जनाब ये भी कहते हैं- कि अगर हम गंदे हैं, तो अल्लाह-ईश्वर का क्रोध जागने तक आप भले इंसानों शांत रहिए- सोडोम और गोमरा की तरह हमें वो नष्ट कर देंगे.

लेकिन भाई जान, ये दुनिया इस नियम से नहीं चलती कि फ्लाने का काम लूट से भी चल जाता है, तो मैं भी डाका डालूं, फ्लानी देह बेचकर काम चला सकती है, तो मैं भी बाजार में बैठक पसार दूं। आपको अंदाजा नहीं, अगर ऐसी छूट मिल जाए, तो कैसी दशा बन जाएगी दुनिया की. बिन बुलाए कयामत आ जाएगी.
तो आईए, जो गंदा है, उसे मिल कर गंदा कहते हैं, वर्ना अगली पोस्ट और भी निर्लज्ज होगी. एक अदना पत्रकार इससे ज्यादा और क्या धमकी दे सकता है, सुधर जाइए, और अपनी प्राथमिकता प्रकृति के अनुरूप कीजिए. दुनिया खूबसूरत है, तरीके से मजा लीजिए- 'माऊंट एवरेस्ट' पर बैठकर 'मैरियाना ट्रैंच' का ख्वाब देखिए, और 'मैरियाना ट्रंच' वालियों के दिल में 'माउंट ऐवरेस्ट' की चाहत पैदा होने दीजिए, आदत मत बिगाड़िए.

Wednesday, July 01, 2009

नुक्ताचीनी 'न्यूयार्क' के बहाने


शरीफों के लिए इशारा काफी होता है. इस मुहावरे के मुताबिक आप शरीफ हैं, तो बस दिल थामकर इशारे समझते जाइए, हम आपको एक शरीफ-ए-अजीम की दास्तां सुनाने जा रहे हैं, जैसा कि ऊपर इशारा साफ है- एक फिल्म के बहाने
कबीर...
यही नाम है उनका। पूरा नाम कबीर खान

शक्ल सूरत के बारे में बताने की जरूरत नहीं, आने टीवी पर उन्हें इंटरव्यू देते देखा होगा। लंबे छरहरे, गोरे-चिट्टे, तीखे नाक-नक्श और फूले हुए गाल, मुंह के दोनों सिरों तक करीनेदार पतली काली मूंछ, माशाअल्लाह, क्या गजब ढाती है पर्सनालिटी.

उनके कॉलेजिया दोस्तों के मुंह से एक बार उनका बखान सुना था- कॉलेज में हर 'दिलवाली' लड़की के दिल का अरमान हुआ करते थे कबीर खान.
इंशाअल्लाह, आज भी होंगे,
लेकिन कभी इस बात का गुमां उनके चेहरे पर झलकता तक नहीं. उसी तरह जैसे उनके अंदर आतंकवाद को लेकर इतनी गहरी हलचल थी, इसकी आहट तक नहीं मिलती उनके चेहरे से. पूछो तो बस यूं ही बता देते हैं, मगर देखो, तो अंदर से हिला देते हैं- खूबी ये कि यहां भी उनकी वही शराफत दिखती है
तब भी जब सैम की पूरी कहानी बयां करने के बाद आखिर में उसके किरदार को मौत के घाट उतार देते हैं, ये जानते हुए कि वो बेगुनाह है। सिर्फ इसलिए कि उसका रास्ता गलत है, उसे एफबीआई को गोलियों से भुनवा देते हैं। ये कहते हुए कि टेरोरिज्म को किसी भी रूप में जस्टीफाई नहीं किया जा सकता. इस क्रम में वो सैम की माशूका पर भी तरस नहीं खाते, सैम के साथ माया को भी शहीद कर डालते हैं.

लेकिन इशारा समझिए, दोनों को बेरहमी से मौत के घाट उतारने के बाद कितनी शराफत से दुनिया वालों (अमेरिका) से पूछते हैं-
सैम को मारकर भी क्या हासिल कर लिया. क्या उखाड़ लिया आतंकवाद का, 12,00 को डिटेन किया, 9 महीने तक इन्हें जानवरो से भी बदतर हालत में रखा, एक समीर को मारा, जाने कितने जरार शाह, जाने कितने लखवी, जाने कितने फजलुल्लाह पैदा हुए, और हर शहर में जाने कितने 'कसाब' पैदा कर रहे हैं. पूरी दुनिया में फैल गई है इनकी पौध. 1200 की तादाद इतनी बढ़ जाएगी, काश सैम को मारने से पहले एक बार भी सोचा होता.

जो तुम्हारे तुम्हारे टॉर्चर की वजह से अपनी नजरों में डूब कर मर गया- उसे मौका मिलेगा तो कुछ भी कर गुजरेगा, किसी को भी मौत के घाट उतार सकता है। ये समीर से सीखिए, वो तो फिर भी इतना दिल रखता है कि अपनी माशूका के लिए अपना मिशन मुल्तवी कर देता है. वो जानता है- अगले पल मुझे मरना है, तो जैसे बाहें हवा में लहरा कर पूरा आसमान समेट लेता है. चुप रहकर भी कह जाता है- देख लो दुनिया वालो, हम तो हंसते खेलते, अमन के ख्वाब बुनते बुनते ही मारे गए.

इतना कहने की हिम्मत बहुतों ने नहीं बटोरी, लेकिन कबीर ने न सिर्फ हिम्मत दिखाई, बल्कि इसके लिए बेमिसाल तानाबाना भी तैयार किया।

उमर नाम का लड़का जाता है अमेरिका पढ़ने, वो डिटेन कर लिया जाता है. उमर का कसूर इतना है कि वो सैम नाम के सस्पेक्ट का साथी रह चुका है. एफबीआई ने धोखे से उसकी गाड़ी में हथियार और विस्फोटक रखा, और न्यूयार्क में बड़ी ड्रामेबाजी के साथ उसे सरेआम पकड़ा. हमला ऐसे जैसे चींटी पर एके-47 लेकर दौड़े हों एफबीआई वाले. मकसद, उमर के जरिए सैम तक पहुंच सके एफबीआई. उमर जिस हालत में पकड़ा गया, उससे मुसलमान ही नहीं, किसी भी कौम के रोंगटे खड़े हो जाएं. उमर के भी हुए, वो एफबीआई से बार बार कहता रहा- मैं सैम का दोस्त था, मगर सात साल से संपर्क में नहीं. लेकिन इंटरोगेटर इरफान मानने को तैयार नहीं. वो पूरी कहानी सुनता है- अमेरिका में एंट्री से लेकर आखिर तक. सैम न चाहते हुए भी बताते जाता है.
पहले दिन कितना नर्वस था जब न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी में दाखिल हुआ था. किस तरह उसे माया नाम की हसीना मिली थी. समीर नाम का दिलेर मिला था. वो दौड़ में गोरे को पछाड़कर अमेरिका का झंडा बुलंद करता है. वो माया की आंखों में अपनी दुनिया बसाने का ख्वाब बुन रहा था. माया से उमर को भी प्यार हो गया- धोखे से. वो नहीं जानता था माया सैम पर मर-मिट चुकी है. जब ये पता चलता है तो उमर का दिल टूट जाता है. इसी के साथ हवाई हमले में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर ढह जाता है.
फिर क्या था, जैसे कयामत आ गई, एक पल में दुनिया बदल गई।


उमर सैम-माया की दुनिया से चला गया। इधर सैम न्यूयॉर्क से वाशिंग्टन जाते हुए डिटेन कर लिया जाता है. आरोप ये कि हमले से कुछ दिन पहले उसने ट्रेड सेंटर की तस्वीरें ली थी, वो तस्वीरें किसके लिए खींची थी उसने? इस बात का जवाब न सैम के पास था, न एफबीआई के पास उसके लिए कोई सहानुभूति. सैम पर 9 महीने तक टॉर्चर कैंप में जुल्म होता रहा. वो बेकसूर था इसी बल पर 9 महीने तक नहीं टूटा. आखिर वो रिहा कर दिया गया, लेकिन अपने देश की सुरक्षा एजेंसी के खिलाफ नफरत से भर उठता है सैम.

वो एफबीआई को सबक सिखाने के लिए गैंग और प्लान तैयार कर चुका होता है. इसी मोड़ पर उमर डिटेन किया जाता है। इंटरोगेटर इरफान उसे किसी तरह राजी कर लेता है सैम की दुनिया में दाखिल होने के लिए- उसका दोस्त बनकर उसके प्लान की जानकारी देने के लिए. उमर आता है और माया-सैम की जिंदगी में फिर से घुल मिल जाता है. वो आया था सैम को सही रास्ते पर लाने- अगर गलत रास्ते पर होगा तो, लेकिन सैम उसे अपने प्लान को अंदाजा तक नहीं होने देता. ये सारी सूचनाएं देने के बाद भी एफबीआई को यकीन नहीं होता. उमर को भी यकीन नहीं होता- जब पहली बार उसे सैम के प्लान के बारे में पता चलता है, लेकिन जब तक वो माया के साथ मिलकर एफबीआई से उसे न मारने की गारंटी लेता, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. सैम ने एफबीआई हेडक्वार्टर में बम लगा रखा है.
बेशक सैम का रास्ता गलत है, लेकिन एफबीआई ने जो किया वो भी कुछ सही नहीं था। ब्लास्ट का खतरा टल जाने के बाद भी उसे पकड़ा नही जाता, गोलियों से भून दिया जाता है।


कबीर सैम को उसके किये की सजा तो देते हैं, लेकिन एफबीआई के सामने बड़ी खामोशी से सवाल भी खड़ा करते हैं- मार कर क्या खाक किया?

इस ताने बाने का टेक्निकल साइड भी उतना ही टाइट है- रीयल लोकेशन, असली एंबियंस, झकझोर देने वला कैमरा वर्क, हर शॉट बोलता हुआ। हर सीन का दूसरे से इमोशनल अटैचमेंट लगता है। मसलन, जेल की प्रताड़ना और माशूका से मोहब्बत के बीच, वतनफरोशी और नफरत के बीच, दोस्ती और मुखबिरी के बीच गजब का 'टच' है। आप बंध जाते हैं. हर सीन में संवाद जैसे उबलते हैं, खामोशी भी है अगर तो वो सुलगती हुई दिखाई देती है.

बंधु, 100 रुपये में न्यूयार्क घूम आने का मौका है, 3 घंटे का टाइम निकालिए और सैर कर आईए न्यूयार्क का. जाइए देख आइए बॉलीवुड की पहली इंटरनेशनल हिंदी फिल्म. ऐसी कैटरीना कभी देखी न होगी, ऐसा नील कभी दिखा न होगा, जॉन तो खैर जॉन है ही.

Sunday, May 24, 2009

अब ठाकरे खोदेंगे उत्तर भारतीयों की कब्र!

खुद बाल ठाकरे की कब्र (सियासी) खुद चुकी है, लेकिन जुबान से जहर नहीं उतरा। चुनावी नतीजों के बाद निजी तौर पर मैं ये मानकर चल रहा था कि ठाकरे घराने को होश आ चुका होगा, कि मराठी लोग इतने भोले नहीं, जितना उन्होंने समझ रखा है ( या बार बार उत्तर भारतीयों के खिलाफ बयान देकर बना रखा है)। आम मराठी लोगों को उन्हें शौक नहीं इतना निर्लज्ज होने का...बिना किसी जनाधार के पूरे महाराष्ट्र को पूरे देश से अलग करने का. लेकिन ठाकरे ने फिर साबित किया कि उन्हें छोड़कर बाकी सब नफरत की राजनीति के कच्चे खिलाड़ी हैं.

हमें इस बात से नहीं मतलब कि उन्होंने उत्तर भारतीयों के कांग्रेसी नेताओं को उन्होंने सांप कहा कि नाग (जैसा कि 'सामना' में कृपाशंकर सिंह को सांप और संजय निरुपम को नाग कहा है) मतलब इस बात से है कि लोकतंत्र में जनाधार के पैमाने पर औकात पता चलने के बाद भी बाज नहीं आ रहे बाल ठाकरे। ठाकरे की मराठी राजनीति को महाराष्ट्र की जनता का समर्थन नहीं करती, ये बात साफ हो चुका है फिर भी बाल ठाकरे का बयान सुनिए- ''उत्तर भारतीय नेता कह रहे हैं हमे मुंबई में आने से कोई नहीं रोक सकता, लेकिन उन्हें पता होना चाहिए मराठियों ने औरंगजेब की कब्र खोदी थी, ज्यादा बोलेंगे तो मराठी उनकी भी कब्र खोद देंगे।

इस बयान में कुछ नया नहीं है, ऐसे ही बयानों पर सिंकती रही है ठाकरे परिवार की रोटी, पलता है ठाकरे परिवार का पेट, हार के बाद मराठी लोगों को नए तर्क के साथ जगाने में जुट गए हैं बाल ठाकरे, जब जय महाराष्ट्र के नारे से काम नहीं चला तो इसमें दिल्ली, पंजाब और राजस्थान जैसे पश्चिमी राज्यों को भी जोड़ लिया."दिल्ली वाले हमेशा डरते रहे हैं कि मराठी एक दिन शासक बनेंगे। महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान को छोड़ कर किसी भी राज्य ने योद्धा पैदा नहीं किया। पूरे उत्तर भारत में या तो गुलाम पैदा हुए या फिर मुगलों और अग्रेजों के चमचे. मराठी लोग 500 साल से लड़ रहे हैं, लड़ना इनके खून में है, हमेशा से मराठियों की शान तलवार रही है, और जब तक ये तलवार मजबूत है तब तक मराठियों की तरफ कोई आंख उठा कर नहीं देख सकता"

देखिए कैसे ललकार रहे हैं ठाकरे। अब बताइए भला, कौन आंख उठाकर देख रहा है मराठियों की तरफ? कौन उन्हें दोयम दर्जे का बता रहा है, यही कह रहा है न जैसे देश के बाकी शहर, वैसे बाकी देश के लिए मुंबई। यही बात तो मराठी जनता भी कह रही है, अगर नहीं कहती तो ठाकरे की पार्टिय(यों) के आगे महाराष्ट्र में कोई नहीं टिकता. लेकिन ठाकरे की ढीठई देखिए-''शिवसेना के बाजुओं में अब भी इतनी ताकत है कि उन लोगों के हाथ काट दे, जो मुबंई को महाराष्ट्र से अलग करना चाहते हैं। "

चलिए, किसी और को नहीं, तो कम से कम मराठी लोग समझ गए हैं ठाकरे परिवार को मालदार मुंबई से इतना प्यार क्यों है.

Saturday, May 23, 2009

मनमोहनी 'शपथ' का पॉलिटिकल पैकेज

दूरदर्शन में भी बड़ा दम है, कई बार नहीं चाहते हुए भी ऐसा सच दिखा जाता है कि हैरानी होती है। अब तक आपने दूरदर्शन पर शपथ समारोह तो कई देखें होंगे, जिसका फल्सफा यही होता है- हार हो या जीत, सियासत का शिष्टाचार इतना हो कि अपनी दलगत-दूरियां समेटते हुए इसमें सब शामिल हो. दिल में शिकवे-शिकयतें चाहे जितनी हो, जुबां पर मुस्कराहट कम चौड़ी नहीं होनी चाहिए...

मनमोहन मंत्रिमंडल के शपथ-ग्रहण समारोह में आडवाणी इसी परंपरा निर्वाह के तहत आए थे थोड़ा लेट ही सही, हाथ जोड़े हंसते-मुस्कराते पहुंचे मंत्रिमंडल के सम्मान में...लेकिन उनके सम्मान में सियासी शिष्टाचार तक नहीं दिखा...ये देखकर वाकई हैरानी हुई

विपक्ष के सबसे बड़े नेता के लिए बैठने की जगह तक फिक्स नहीं थी, उम्र के लिहाज से भी कइयों से सीनियर हैं आडवाणी लेकिन किसी बैठने का इशारा करना भी मुनासिब नहीं समझा। आडवाणी चलते चलते अगली पंक्ति के करीब पहुंच चुके थे...रास्ते में दिग्विजय सिंह मिले, शीला दीक्षित मिलीं...सबने हाथ मिलाया लेकिन बैठने का इशारा नहीं किया। राहुल गांधी मिले तो उन्होंने गर्मजोशी जरूर दिखाई, मुस्कराहट के साथ उनका स्वागत किया लेकिन कुर्सी नहीं बताई...

सीट मिलने से पहले आडवाणी से चिदंबरम भी मिले, ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मिले...लेकिन ये भी राहुल के नक्शे कदम पर हाथ मिलाकर आगे बढ़ गए...ये पूरा नजारा बगल की कुर्सी पर बैठे श्रीप्रकाश जायसवाल देख रहे थे, लेकिन न खुद कुर्सी से उठे न अपने किसी जूनियर को उठने के लिए कहा
श्रीप्रकाश की अगली कतार में सीट खाली थी, लेकिन इशारा नहीं किया...आडवाणी को खड़े देखकर शरद पवार जरूर दौड़े आए...लेकिन इससे पहले कि उस खाली सीट पर आडवाणी को बिठाते- राम विलास पासवान लपक कर विराजमान हो गए...शरद पवार की पहल पर आडवाणी के लिए कुर्सी का इंतजाम तो हुआ...लेकिन सीट कहां मिली...भैरो सिंह शेखावत के बगल में, जो पार्टी में रहते हुए आडवाणी की पीएम पद की दावेदारी को चुनौती दे चुके थे, इसकी खुन्नस साफ दिखी। आडवाणी ने मुंह तक फेर कर नहीं देखा शेखावत की तरफ

बैठने की सीट तो अगली कतार में मिल गई, लेकिन आडवाणी से कोई मिलने तक नहीं आया...न सोनिया न मनमोहन...अगली कतार में अनदेखे से बैठे रहे विपक्ष के सबसे बड़े नेता...जैसे सोच में डूबे आडवाणी को याद आ रहा था वो जमाना, जब विपक्ष के नेता की अगुवानी सत्ता पक्ष के बड़े नेता किया करते थे, ज्यादा दूर नहीं, 2004 के शपथ समारोह में ही जब मनमोहन सिंह पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे- अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवानी में खुद आए थे...लेकिन इस बार वो शिष्टाचार कहीं नहीं था।

इस मामले में आडवाणी की कंजूसी भी साफ दिख रही थी, शपथ तो वही मनमोहन ले रहे थे, लेकिन 'जाने किस वजह से' इतने दुखी थे पीएम इन वेटिंग कि ताली पर भी हाथ नहीं हिले। यही हाल लालू मुलायम पासवान अमर के चौथे मोर्चे का दिखा. सीट तो हंसते हंसते ली थी, लेकिन ताली के नाम पर सिर झुकाने के सिवा और कुछ नहीं किया. समर्थन दिया बिना शर्त, लेकिन समारोह में गए तो किसी ने पूछा तक नहीं. खासकर रामविलास की हालत तो और भी मुश्किल दिखी, लालू के साथ यूपीए से अलग क्या हुए जीत के रिकार्डधारी दामन पर हार का दाग लगवा बैठे...पार्टी का सुपड़ा साफ हुआ सो अलग...अब दाग छिपाएं भी तो कैसे?

पासवान की तरह लालू जी भी यहीं सोचते दिखे कि - मुझसे तो मीरा कुमार ही भली हैं, पूरे साल कोई नहीं जानता-सुनता इनके बारे में लेकिन कांग्रेस मंत्रिमंडल में बर्थ हर बार पक्की होती है...मेरा तो मिनिस्टर स्टेटस गया ही, दुलारी रेल का खेल भी बिगड़ गया

अमर-मुलायम ने भी बड़ा दम लगाकर बनाया था यूपीए को अपना सियासी हमदम, लेकिन महफिल में आकर पता चला अब न कोई हमदम रहा न को दोस्त...एक पल तो ऐसा आया कि अजनबी सी महफिल में बड़े भैया मुलायम भी बिछड़ गए...तब देखते बन रही थी छोटे भैया की अमर बेचैनी- लेकिन हालत ऐसी कि बताना भी मुश्किल और छिपाना भी मुश्किल...बेचारे अकेले गए थे अकेले ही लौटे, अमर और मुलायम जब समारोह के बाद लौट रहे थे, तब बेहद दार्शनिक हो गया था दृश्य का अंदाज...दोनों को सियासत की सीढ़ियां नीचे उतार रही थीं...न कोई काफिला, न कोई हुजूम॥बस अकेले अकेले

ये सियासी शिष्टाचार पर मंथन है या किसी और बात का अफसोस- इसे हर कोई अपने-अपने नजरिए से देख रहा है. आप भी टिप्पणी करें, लेकिन हमारी तरफ से इतना तो साफ दिखता है सियासी शिष्टाचार के मामले में नेताओं की अभिनय क्षमता कम हुई है

Thursday, May 21, 2009

बस एक घूंट












नीले थे तमाम कतरे खून के
कतई नीला था रगों में दौड़ता हुआ लहू


जैसे मारे खौफ के
स्याह साबित हो रहा हो खून का वजूद


जैसे तैयार हो गया हो तरल
किसी की छत पर गिरे आसमान का


जैसे हर नब्ज के साथ
सौ उम्मीदों को एक उदासी ने डंसा हो

जैसे तुम्हारी यादों की बनी स्याही
पीली पड़ी हथेलियों पर उतरी हो

जैसे अमावस की रात का अंधेरा
नीली जोश के सात रात पर मर मिट गया हो

वाकई,
चटख नीला था रगों में आवारा फिरता खून
तब तक,
जब तक तुम मुझे नहीं मिले थे

अब तक,
हमारी सफेद आंखों का नीला पानी
एक दूसरे की आंखों में मिल चुका है
रोष के मारे
लाल हो चुकी हैं हमारी आंखें
कि भला-
कोई ऐसा भी बे-वफा होता है
जैसी ये जिंदगी है?

अब जबकि
दोनों की आंखों में
बह रहा है ये सुर्ख लाल पानी
रगों में उतरने लगा है
आंसू जैसी उमाड़ वाला बेकाबू पानी

आओ,
पी लेते हैं सिर्फ एक घूंट
अपना नीलापन बहा चुके इस लाल पानी की

Monday, May 18, 2009

सौ 'सोनार' की, एक 'लोहार' की

लोकतंत्र में ये बताने की जरूरत नहीं है सोनार कौन है लोहार कौन है- 15वीं लोक सभा के नतीजे सामने हैं तब तो और भी नहीं...
गजब का है मुहावरा- 100 सोनार की एक लोहार की- जो सामाजिक ढांचे के विपरीत लोहार को सोनार से ज्यादा असरदार साबित करता है, ये भी बताता है सोनार (चमकती दमकती देह और वजन से हल्का लेकिन से गद्दी से मालदार) की आदत होती है चोट करते रहने की, अपनी मर्जी (हित) के मुताबिक चीजों को आकार देने की। लेकिन लोहार (काला कलूटा, धीर गंभीर मगर स्थूल और लाचार) की स्थूल देह जब हरकत में आती है, चोट करने की उसकी बारी आती है चीजों को जड़ से हिलाकर रख देता है।

अब इस कहावत को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में फिट कर देखते हैं- सोनार मतलब नेता और लोहार मतलब जनता समझे तो तस्वीर कुछ तरह बनती है...

नतीजे बता रहे हैं देश के जिन 'सोनारों' ने पांच साल तक अपने फायदे के लिए राजनीति को आकार देना चाहा उन्हें 'लोहारों' ने तहस नहस कर दिया। 'मुसलमानों के हाथ काटने वाले' बयान को 'हवा देने वाले' या फिर 'खुल कर निंदा न करने वालों' को बता दिया की लोहार की चोट क्या होती है. दामन में दंगे का दाग छुपाकर चुनावी रैलियों में 'विकास बड़ी बड़ी बातें' कहने वालों को दिखा दिया कि बार बार चोट करने की अपनी आदत से बाज आओ.

लोहार इतने भी स्थूल नहीं होते जो झांसे में आ जाए। वो अपनी जगह पर स्थूल होते हुए भी समझते हैं- काले धन की वापसी की बात अब क्यों हो रही है, अपनी सरकार के दौरान तो आप भी औरों की तरह कुंडली मारकर बैठेगे- और लाओगे तो भी क्या करोगे- उसमें लोहारों का क्या फायदा- लूटेंगे तो सोनार ही. 'सबको साथ लेकर चलने' का सच इतना नंगा है कि डर गए लोहार. पता नहीं कब कौन सा फायरब्रांड बनने की कोशिश करेगा और कटुआ कह कर काटने लगेगा. और सारे दलील भी यही देंगे 15 वीं शताब्दी में हमारे साथ जो हुआ उसी का तो बदला ले रहे हैं. ये हमारा राष्ट्रधर्म है और इस धर्म का प्रचार पूरे देश में रथ यात्राएं कर होने लगेगा.

पता नहीं, इतना सीनियर होते हुए भी आडवाणी जी ये क्यों नहीं समझ पाए। पता नहीं, समझे भी हों तो साथियों ने अमल नहीं किया हो, और वो ताउम्र के लिए पीएम इन वेटिंग रह गए. लेकिन जिन्होंने समझी ये बात- उनका भला ही हुआ- उड़ीसा का उदाहरण पहले से ही था, इस बार बंगाल में ममता और बिहार में नीतिश कुमार ने साबित कर दिया कि 'सबको साथ लेकर चलने' का नारा देने से पहले जमीन किस तरह से तैयार करनी पड़ती है.

नेताओं को लोकतंत्र का सोनार कह देने से ऐसा नहीं है कि उनकी जाति सिर्फ एक होती है, इनकी एक उपजाति लालू-पासवान जैसी होती है। ये गजब के सोनार हैं- अपनी चोट पर इन्हें औरों से ज्यादा खुद घमंड होता है. चोट करते हैं तो माइक लगाकर ढिंढोरा पीटते हैं- देखो- मैंने क्या शॉट मारा. यूपीए की मलाई को चुपके चुपके खाई, लेकिन अलग हुए तो खूब ढिंढोरा पीटा. लेकिन लोहार समझ गए- चारा खाने वाले पांच साल तक मलाई खाकर अब कोई और 'आइटम' खाने की जुगाड़ में है, वर्ना जिस मुलायम से वर्षों तक कठोर तनातनी रही, वो अचानक दोस्त बन गए. लोहारों ने पंचतंत्र की गदहे और सियार की दोस्ती वाली कहानी पढ़ी है, सो समझ गए अमर के जुगाड़ पर अचानक हुई दोस्ती का मतलब. पासवान के पास तो खैर बोलने के लिए मुंह ही नहीं रहा, लालू और अमर की जुबान खुली भी तो लग गया 'मलाई' से पेट भरा नहीं है अभी, बिन बुलाए समर्थन की थाली लेकर फिर से हाजिर है.

लाल सोना पीटने वालों की तो पूछिए मत, 60 साल पहले ही हो चुके हैं- अपना एजेंडा नहीं समझा पाए- ये वर्ग हित की बात करते हैं, कि राष्ट्रहित की या फिर '...हित' की, लोहारों को इनकी न 'साथ आने की बात' समझ आई न 'दूर जाने की'। न्यूक्लियर डील को देशहित के खिलाफ कहकर हट तो गए शक्ल सूरत से समझदार दिखने वाले करात साहब, लेकिन जनआंदोलन नहीं बना पाए मुद्दे को- अगर ये राष्ट्रहित से जुड़ा इतना ही बड़ा मुद्दा था तो. बल्कि उल्टे लाल गुट ने कांग्रेस के साथ दोबारा आने पर भी कन्फ्यूजन बनाए रखा- न चुनाव के दौरान न चुनाव बाद. लोहार समझ गए- ये 'लाल लोग' सत्ता की सफेद मलाई फिर से खाने की तैयारी में हैं.

अब मिलिए सियासत के मोटे सोनारों से- बाहुबलियों से। हर पार्टी ने इनकी हकीकत जानते हुए भी जनता के सामने उतारा था अपनी 'साख' बढ़ाने के लिए, वो भी देश के कानून का हवाला देते हुए- मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी,अरुण कुमार शुक्ला 'अन्ना', अतीक अहमद, अक्षय प्रताप सिंह, मुन्ना शुक्ला, डी पी यादव। पप्पू यादव, आनंद मोहन और शहाबुद्दीन को तो कोर्ट ने पहले ही किनारा कर दिया था लेकिन इन्होंने अपनी बीवियों रंजीता रंजन, लवली आनंद और हेना साहिब को मैदान में उतारा था. इनकी पार्टियों को जिक्र इसलिए जरूरी नहीं, क्योंकि जिसने भी इन्हें उतारा बाहुबलियों पर इनकी नजर कहीं न कही एक है- एक घाट पर पानी पीने वाले. लेकिन लोहारों ने बता दिया- अगर घाट गंदा हो, तो आपको तय करना पड़ेगा, प्यासे मर जाएं, यहां पानी नहीं पीना है, वर्ना चोट ऐसी पड़ेगी कि बाहु का बल और बंदूक की नाल धरी की धरी रह जाएगी.

हारने वाली पार्टियों के समर्थकों, अगर आपने यहां तक पढ़ने की जहमत उठाई है तो मेरी बात का बुरा न मानना, अब तक मैने जो कहने की कोशिश की है, उसका अंडरकरंट लब्बोलुआब ये है कि लोकतंत्र में लोहार से सीधे जुड़े मुद्दे के बिना बात नहीं बनती. समझ लीजिए इस मामले में पूरे देश के लोहार एक होते हैं, वर्ना महाराष्ट्र के लोहारों को लुभाने के लिए राज ठाकरे और शिवसेना ने कुछ कम किया था- नतीजा क्या हुआ, याद नहीं तो इलेक्शन कमीशन की साइट पर जाकर देख लीजिए।
अब समझ लीजिए- लौहपुरुष कहलाने और कमजोर प्रधानमंत्री करार दिए जाने में क्या फर्क है. राहुल और वरुण गांधी में क्या फर्क है. ये भी जान लीजिए, लोहारों को वंशवाद और विदेशी मूल की बातें 21 वीं सदी में नहीं सुहाती. घटिया मुद्दों के बहाने लोहारों के पेट की अनदेखी होगी, तो वो लात मारेगा ही. दिल की बात कीजिए, लोहार आपके भी होंगे।

Sunday, May 10, 2009

मां नहीं हूं फिर भी...

मां नहीं हूं फिर भी, एक बेटी का पिता हूं इसलिए भी, समझ सकता हूं कि मां का मतलब औलाद के लिए क्या होता है। किसी की जिंदगी में मां के होने का मतलब क्या होता है. तपते बदन पर मां के हाथ फेरने का असर क्या होता है. मां औरत होती है, लेकिन मैं मर्द होते हुए भी इस औरत को समझना चाहता हूं, उसके दिए हुए शरीर में उसकी भावनाएं उड़ेलना चाहता हूं.

मेरे अंदर इस भावना के बीज पापा ने बोए थे। पापा कहा करते थे हर मर्द में कुछ हिस्सा औरत का होता है, क्योंकि औरत किसी देह का नाम नहीं, बल्कि कुछ गुणों का नाम है, पांच गुण गिनाते थे पापा जो स्त्री की संरचना में होती है- प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति, और समर्पण। इन्हीं भावनाओं की प्रबलता से बनती है औरत, जितनी मजबूत होती है ये भावनाएं उतनी ही मजबूत और बेमिसाल होती है औरत.

पापा अक्सर सीता का उदाहरण दिया करते थे- धर्म के लिहाज से नहीं, व्यावहार के लिहाज से, कि अपनी जगह पर सीता कितनी कट्टर औरत थी। मर्द के इशारे पर हर तरह का इम्तहान दिया, लेकिन हर इम्तहान को अपना कर्तब्य समझा। राजा की बेटी झाड़-फूस में रही लेकिन मर्द से शिकायत के नाम पर अपनी ममता को कमजोर नहीं पड़ने दिया. ये सीता के अंदर मौजूद इन पांच भावनाओं की प्रबलता का नतीजा था.

सीता तो औरत थीं, लेकिन इस औरत को समझने के लिए पापा राम का उदाहरण भी देते थे। कहते थे- कि जो पांच भावनाएं औरत को पूजनीय बनाती हैं, उनका अनुपात अगर मर्द में औसत से ज्यादा हो जाए तो वो पुरुषोत्तम बन जाता है। वो प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति और समर्पण की साक्षात मूर्ति बन जाता है.

मदर्स डे पर मुझे एक ऐसी ही कहानी से रूबरू हुआ- मिस इंडिया वर्ल्ड-2009 पूजा चोपड़ा की कहानी सुनकर मुझे उसकी मां पर गर्व हुआ। इंटरव्यू में जैसा पूजा चोपड़ा ने बताया- उसकी पैदाइश के साथ मां ने लगातार दूसरी बेटी को जन्म दिया। जबकि उसके पिता और घरवाले बेटा चाहते थे. उनकी ये ख्वाहिश इतनी मुखर थी कि पूजा की पैदाइश पर मातम पसर गया. उसकी मां को कोसा जाने लगा. विवाद इतना बढ़ा कि पूजा की मां को पति का घर छोड़ना पड़ा. कोई आसरा नहीं, जीने का कोई सहारा नहीं, लेकिन पूजा और उसकी बड़ी बहन शुभ्रा को लेकर उनकी मां निकल गई घर से. कुछ दिन बच्चों को ननिहाल छोड़ा और खुद नौकरी में जुट गई. अपने बुते पर न सिर्फ बेटियों को पाला-पोसा, पढ़ाया लिखाया, बल्कि उनके अंदर इतनी पॉजिटिव सोच भरी कि वो मिस इंडिया जैसे मॉडर्न कॉन्टेस्ट में हिस्सा ले सके...आज वो इस बात पर खुशनसीबी जाहिर कर रही है कि वो अपनी बेटी के नाम से जानी जा रही है...

ये शायद मेरे अंदर रचा बसा पापा का वो पाठ था कि पूजा की कहानी से मैं सिहर गया। मां के संधर्ष के आगे मेरा सिर श्रद्धा से झुक गया। शायद इसलिए भी इतने गहरे उतरी वो भावना कि मैं भी एक बेटी का पिता हूं- मुझे याद है जब वो पैदा हुई थी तो किस तरह मेरा लड़कपन एक झटके में मुरझा गया था. जब पहली बार गोद में आई थी तो किस तरह मेरे कंधे चौड़े हुए थे- एक लंबी सांस ने किस तरह सीने में कितने सपने भर दिए थे. गांव में बेटियों का हश्र मैने देखा था. आप चाहे बेटी से जितना प्यार करते हो- उस ढर्रे को ज्यादा नहीं बदल सकते. बेटी बड़ी होने के साथ मेरे अंदर ये एहसास भी बड़ा होता गया कि इस ढर्रे पर बिटिया को नहीं जाने दूंगा. कुछ करूंगा.

मैं आज समझ सकता हूं- कुछ करने की ये भावना पापा के उन्हीं पाठ की वजह से इतनी बलवती हुई, जो उन्होंने राम और सीता का उदाहरण देकर समझाया था. उन्हीं भावनाओं के साथ आज अपनी जमीन छोड़कर, शहर में बंजारा बनकर बेटी के सपने को आकार दे रहा हूं. कुछ कर जाए तो मेरे अंदर की औरत को सुकून मिले.