माई नेम इज आरुषि!
'मम्मा, अरे इधर आओ जल्दी, अरुषि को उसके पापाने ही मारा है...देखो टीवी पर क्या आ रहा है...'बेटी की आवाज लगभग चीख रही थी. बहुत तेज नहीं थी, पर इतनी बेचैनी से भरी थी कि मेरी गहरी नींद भी खुल गई. 18 घंटे के बाद सोया था. रात भर जागने के बाद देर दफ्तर से लौटा था. नींद खुल गई थी, लेकिन बिस्तर से उठकर ड्राइंग रूम में जाने का मन नहीं किया, मैं बिस्तर पर पड़े पड़े बेटी की बेचैनी, उसके चेहरे के बदलते हाव भाव देखता रहा. 11 साल की है. अब वो हर बात समझती है. इस उम्र में स्थिरता कहां होती है.
कभी मेरी डायरी में लिखी एक कविता पढ़कर उसे चहकते देखा था, वो कविता क्या उसी से जुड़ी एक घटना थी, जिसे मैने डायरी पर कहीं दर्ज कर दिया था-
"पापा, वो देखो ना, कितना सुंदर है वो अमरूद
देखो, कितना पीला, कितना खुशबूदार
पापा, मेरे हाथ पहुंच नहीं रहे
अपने कंधे पर चढ़ा लो ना
कंधे पर खड़े होकर बेटी ने तोड़ लिया अमरूद
खुशी इतनी जैसे जमाना जीत लिया हो
बेटियां जो बाप के कंधे पर होती हैं
इसी तरह आसमान छूती हैं."
तब उसने गोद में चढ़ते हुए कहा था, पापा आपने गांव वाली उस घटना का कविता बना दिया है न...मैं समझ गई, मैने ही तो आपके कंधे पर चढकर अमरूद तोड़ा था.
मैं पिछले कई दिन से देख रहा था, अखबार, टीवी, हर जगह वो अरुषि से जुड़ी खबर को फॉलो कर रही थी, लेकिन एक बार भी सीधे पूछा नहीं, पापा, ऐसा क्या हुआ कि एक पिता ने बेटी को मौत के घाट उतार दिया. शायद उसे भी कोई असमंजस हो...
ये सबकुछ मैं बिस्तर पर लेटे ही सोच रहा था, करवट बदला तो उसका स्केच बुक हाथ लगा- जिसके एक पेज पर पेंसिल से एक लड़की की आकृति बनी हुई थी, उसके नीचे लिखा था- माइ नेम इस आरुषि...
देर तक मैं उस स्केच को देखता रहा, टीवी पर आ रही खबरों के शोर से अलग मुझे उसमें एक ऐसी छाया दिखाई थी, जो देह से अलग होने के बाद रूह बन जाती है, सबके दिलों में बस जाती है. मेरे शब्दों में कुछ इस तरह-
मैं आरूषि हूं
जाना पहचाना है मेरा नाम
आप लोग यही सोच रहे होंगे
किसी की परछाई हूं मै
मैं परछाई नहीं एक रूह हूं.
नाजुक सी, बड़ी पाक सी
एक छोटी सी मुस्कराहट
जो लग जाऊं दूधमुंहे बच्चे के मुंह
तो ममता के मुंह में पानी भर जाऊं
अन्नमुंहे के होंठों पर पसर जाऊं
तो शरारत बन जाऊं
आशिक के लब पर लग जाऊं
तो लाजवाब बन जाऊं.
मैं एक रूह हूं सिर्फ, मेरा नाम आरुषि है.
इस नाते मैं आपमें भी हूं, और उसमें भी.
उसकी शक्ल में मुझे अपनी रूह दिखाई देती है.
मैं किसी की परछाई नहीं, फिर भी.
उसकी कुछ कहती हुई आंखों के शोर में अनसुनी हुई जाती हूं.
याद तो आपको भी होगी वो तस्वीर.
आप ही ने तो दिखाई थी,
वरना, मैं कहा देख सकती थी बेसुध बंजारन.
उस खामोश तस्वीर ने जैसे मेरी पहचान तय कर दी हो.
बस, इतने भर की आरुषि हूं मैं.

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