रविवार, मार्च 15, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 2

*'पुरानी सायकिल की स्मृति में' नाम से दर्ज है ये पन्ना। कविता तो भूल चुका था, लेकिन वो सायकिल अब भी याद है. भूले भी तो कैसे-

तुम्हे खरीदा ऐसा था जैसे पा लिया हो
अपनी तरह से लीक तोड़ रहा था तुम्हारा हरा रंग
मलमल की तरह चुभा करती थी तुम
अपनी ढेर साली काली बहनों की आंखों में
तुम इकलौती थी इतनी हरी भरी

तुम्हारे साथ मैंने पहली बार जाना
अपने कदमों की रफ्तार इतनी भी तेज हो सकती है
कि मोटरवालों को भी पीछे छोड़ सकूं
तुम्हे चाहिए होते थे बस सधे हुए हाथ
और थोड़ी सी पतली सी सड़क
मुझे अच्छी लगती थी
तुम्हारी इतनी कम अपेक्षाएं

मैं सीख चुका था हैंडिल संभालना
तुम्हारे आने से पहले ही
उस बनिये की सायकिल भगा-भगा कर
जो दलान पर थूक पीस रहा होता था
पिता से चावल गेहूं के मोल-भाव करते हुए

कितनी ललक से भरा हुआ था
उस दिन जब तुम आने वाली थी.
मुझे हालांकि अच्छा लगा था उस दूकानदार का मजाक
जिसने तुम्हारे पीछे करियर सेट करते हुए
उड़ेल दिया था मेरी अधीरता पर बाल्टी भर पानी
'रुक जाओ यार उतावले तो ऐसे हो रहे हो
जैसे सायकिल पर चढ़े ही नहीं आज तक.

तुम्हें शायद बुरा लगा था
तभी मेरी जल्दीबाजियों को ढोती रही
तुम बिना कुछ कहे
जो नए सिरे से पैदा होने लगी थी तुम्हारे आने के साथ
मेरी थकान को अपने पहियो में लपेटती रही तुम चुपचाप
मैं अब तुम्हारे साथ दौड़ने लगा था

तुम मारे खुशी के चमक उठती थी
जब मैं मल रहा होता था तुम्हारे बदन पर नारियल का तेल
तुम कभी कभार चिढ़ भी जाती थी
जब मुझे तकलीफ सी होती थी
तु्म्हें दूसरे के हाथों सौपने की कल्पना से भी

कुछ ही दिनों में तुम बड़ी हो गई थी
अपने रंग रुप को भूल चुकी दुल्हान की तरह समझदार
और मैं एक पति की तरह लाचार
मुझे याद आता है तु्म्हारा बेझिझक कीचड़ में कूद पड़ना
मेरा बोझ अपने उदर में थामे हुए
खेतो के लिए खाद,
घर के लिए सीमेंट
जानवरों के लिए चारा।

तुम लाख कहती हो चुप भी करो
पुराने दिन ऐसे ही होते हैं
मैं तुम्हारी रंगत से आंख नहीं मिला पाता
जो मेरे साथ रहते उतरी थी
मेरे हाथों में अब भी लिपटी हुई है तुम्हारी थकान
जो तुम्हारे बदन से कीचड़ हटाते हुए जम गई थी

औरों की तरह मैं कैसे कह दूं
तुम बुढ़ी हो चुकी हो
घर के एक कोने में पुरानी सी पड़ी हो.
तुमने जो भी दिया है मुझे
हमेशा नया ही दिया है.

2 टिप्‍पणियां:

पशुपति शर्मा ने कहा…

साइकिल के साथ जुड़ी हैं कई यादें, लेकिन क्या करूं कभी अपनी साइकिल भी नहीं खरीद पाया... हां घर में साइकिल को लेकर झगड़ा काफी होता था भाइयों के बीच...

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता। पढ़कर अपनी उस स‌ाइकिल की याद आ गई जो मेरे दादा जी ने खरीदी थी मेरे पिताजी के लिए। पिता जी के बाद उसे मेरे बड़े भाई ने चलाया। कभी कभार मुझे भी मौका मिल जाता था तो मैं खुश हो जाता था उस पर बैठकर। बहुत भारी थी। अंग्रेजों के जमाने की थी वह स‌ाइकिल। बहुत मजबूत। बाद में घर में एक नई स‌ाइकिल भी आ गई। पुरानी उपेक्षित स‌ी पड़ी रहने लगी। नई नवेली दुल्हन की तरह उस‌की पूछ ज्यादा होती थी। लेकिन पुरानी को जोड़ नहीं था। उसकी व्यक्तित्व में वजन था, जो नई में कहां। आपकी कविता ने अचानक मुझे उस‌ पुरानी स‌ाइकिल की याद दिला दी। बाद में शायद उसे किसी को दे दिया गया। दान के तौर पर। लेकिन जब भी स‌ाइकिल की बात आएगी वो पुरानी जंग लगी स‌ाइकिल मुझे हमेशा याद आएगी। क्योंकि मैंने उसी स‌े स‌ीखा है लड़खड़ाने के बाद दौड़ना...