बुधवार, फ़रवरी 17, 2010

रूह से रू-ब-रू एक हिंसक सवाल




हिंसा क्या है…
कई बार पूछ बैठता हूं
खून की दौड़ान से फड़कती नसों से


शब्दों से लेकर चित्रों तक
रक्तरंजित परिवेश में
एक निहायत ही हिंसक युग में
कई बार भूल जाता हूं
पिछली बार नसों ने क्या कहा था
अपने मौन बयान में

लेकिन बार बार जानना चाहता हूं

क्या हिंसा का मतलब सिर्फ ये है
कि देह की परिधि में
नसों, धमनियों के रास्ते
रूह की परिक्रमा करने वाला लहू
चमड़ी का दरवाजा तोड़ते हुए
सड़क पर बिखर जाए?


इसे क्या कहेंगे आप?
जब किसी चाहत पर
चुनी हुई चुप्पी का मुलम्मा चढ जाए
आपके सामने खून बहे
और आप आह तक न करें?


क्या कहना चाहेंगे आप?
जब देह की आयतों में
रूह के लिए कोई जगह न बचे
आप आत्मा को आसमान में छोड़ दें
और खुद साउंडप्रूफ बेडरुम में सो जाएं?


क्या आप इसे अहिंसा कहेंगे?
जब कोई अमन के ख्वाब को
चमड़ी के रंग से नापने लगे
कोई लाख फिकरे कसता रहे
आप ये मान के चलें,
अभी आवाज उठाने का वक्त नहीं!


क्या ये अहिंसा है?
जब आप अपनी डिमांड को राइट कहें
और दूसरे की मांग को
बूट से कुचल देने वाली क्रांति समझें?


मैं दिगभ्रमित,
आज जो खड़ा हुआ देह के दरवाजे पर
नसों ने मेरा स्वागत चीख से किया
खून भरी आंखों की कर्णभेदी चीखों से
दहशत से भरी मेरी आंखों में
आंख डाल कर चीखने लगी मेरी नसें-
हिंसा...
खून से सनी एक कुंठा है
छींटे तो इसके कुछ इसी तरह पड़ते हैं...
किसकी गरदन, किसकी देह, किसकी रूह
ये जाने बिना किसी के ऊपर पड़ जाते हैं
छींटे,
इंसानी शक्ल के जानवर के अंदर
लगातार लाल हो रहे शैतानी देह के


हिंसा...
बारूद के ढेर पर बलखाती कोई नचनिया है
लाल जोड़े में सजी एक खिलंदड़ी
रुपये लुटाने वालों के हर इशारे पर
अपनी मस्ती में चूर होती जुनूनजादी
हरामजादी,
पैरों तले माटी के मुलायम रोड़े रौंदती जाती है
लेकिन कभी गिनती नहीं करती
कितने रोड़ों को धूल में तब्दील कर दिया


हिंसा खून की दौड़ान का थम जाना है
हिंसा जीव के अंदर से रूह का रुखसत हो जाना
तुम्हारे पास कोई और परिभाषा है
तो बताओ?

3 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

क्या ये अहिंसा है?
जब आप अपनी डिमांड को राइट कहें
और दूसरे की मांग को
बूट से कुचल देने वाली क्रांति समझें?
बिलकुल सही सवाल हैं मगर जवाब कम से कम अभी शायद किसी के पास नही। कविता बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है 3 बार पढ गयी हूँ। धन्यवाद्

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

काफी अच्छे सवाल उठायें हैं. चिन्तनीय हैं.

कुमार विनोद ने कहा…

निर्मला जी, आपने शायद सही कहा, जवाब किसी के पास नहीं, तभी ये हिंसक सवाल रूह के इतने करीब आ खड़ा हुआ...
जिनके लिए ये कड़वा सच है, वो भी ये जानते हैं, लेकिन जवाब नहीं दे पाएंगे