मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

एक गुजरा हुआ, एक जूठा सा लम्हा...



उस दिन मुट्ठी में
जैसे आसमान भर लिया था

मारे रोमांच के उस फरवरी की
खुश्क ढंडक में ऐसे सिहर गया था देह
जैसे गोल घूमती दुनिया
मुझे भी अपने साथ नचा गई हो.

अल्लाह के करम जैसे वो होंठ
मुझ बंजारे पर रहमतों की बारिश कर रहे थे

मेरे कदम जमीं पर नहीं पड़ रहे थे
दो देह आंखों ही जुबान में एक हो रहे थे
गजब ये कि दोनों अपनी जगह से विस्तार ले रहे थे

सामने अपनी छवि की एक और देह पड़ी थी
जैसे एक छवि की दो काया बन गई हो

गजब था वो रोमांच-
होने और न बचने की निश्चितता के बीच
देह के उस दोहरापन का

दो देहों के बीच
सिमटती हुई-पिसती हुई
मोटी भैंस जितनी गोरी- वो काली मनहूस दूरी
और देह की हद तोड़कर
रूह तक समा जाने का वो जोश जोश

गजब की थी
वो 9 फरवरी,
जब एक लम्हे के लिए
आसमान मेरी मुट्ठी में सिमटने उतर आया था

वो आसमान
कई बार मेरे कमरे की छत से टपकता है
संगमरमर सी फर्श पर
गिर कर चकनाचूर हो जाता है
हर रोजृ कई बार

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

बड़ी गहन अभिव्यक्ति है..