रविवार, नवंबर 22, 2009

क्यों नहीं कर दिया जाए ठाकरे को बैन?



अगर लोकतांत्रिक सिद्धांतो की कसौटी पर देखा जाए बहुत ओछी बात है. लेकिन सवाल है, कि क्या उस शख्स को लोकतंत्र की परवाह है? जो खुद अपनी तर्जनी को तमाम कायदे कानूनों से ऊपर मानता हो, और जब चाहे, जिस पर चाहे, चाहे जो भी उसके 'हितो' के खिलाफ खड़ा हो, उस पर हमला कर दे, बयान छोड़ो, सामना का कोई अंक उठाकर देख लो- हर वाक्य में असंसदीय शब्द गुंथे पड़े है. ठाकरे की भाषा में गढ़ा गया हर मुहावरा एक गाली की तरह है. उस शख्स को इतना भाव क्यों?


ऐसी भावना ठाकरे के 'हमलों' से आहत हर दिल की होगी. लेकिन सुबह कैब में सच के जिस अंदाज से सामना हुआ, उसने मुझे आप लोगों से कुछ कहने को मजबूर कर दिया. वर्ना बात तो दो दिन पुरानी हो चुकी है.

कैब में बैठा वो शख्स ओबी वैन(जिसके जरिए खबरें लाइव दिखाई जाती है) का ड्राईवर है. पड़ोस में ही रहता है, और अक्सर मुझसे पहले कैब में बैठा हुआ होता है. कैब मेरे पिक अप प्वाइंट पर पहुंची, तो मैंने कार में कुछ शोर गुल सुना. बैठा तो देखा- वैन के ड्राइवर का चेहरा तमतमाया हुआ था. बात छिड़ी थी चैनल पर ठाकरे के गुंडों के हमले की. बाल ठाकरे के समर्थन वाले बयान की, 'सामना' में हमले को जायज ठहराने की. मेरे आने पर आवाज थोड़ी नीची हुई, लेकिन मैं महसूस कर सकता था उसका गुस्सा-

'ये क्या हो रहा है सर, बताइए, एक आदमी सरेआम हमला करवाता है, और अगले दिन उसे अखबार में लिखकर जायज ठहराता है, और हम उसे राष्ट्रीय खबर बनाते हैं, बकायदा उसके नफरत भरे शब्दों को ग्राफिक्स बनवा कर दिखाते हैं. आपको नहीं लगता ठाकरे हमारे हथियार से हमीं पर हमला करता है.'

मैने सुबह की सर्दी में हाथ मलते अनमने से जवाब दिया- क्या हो गया भाई, आज सुबह सुबह गरम हो रहो, आज क्या कर दिया ठाकरे ने?

'कुछ हुआ नहीं, मैं आप सब सीनियर्स से सवाल पूछ रहा हूं- हम तो ओवी वैन चलाने वाले ठहरे, जहां कहोगे वहीं गाड़ी लगा देंगे, वहां से चाहे तुम जो दिखाओ, लेकिन हमारा भी कुछ मन करता है. आप सच्ची बताइए, क्या ठाकरे को सिर चढ़ाने वाले हमीं नहीं? '

मैं उसके इस 'कनक्लूजन' से हिल गया- ऐसा कैसे कह सकते हो...

'अरे सर, चुनावों में कई बार साबित हो चुका है ठाकरे का सच, फिर भी हम उसे मराठा छत्रप की तरह पेश करते हैं. मराठी को लेकर जो भी बोल दे, जो भी कह दे- बिना सोचे समझे दिन भर ताने रहते हैं- ठाकरे ने ये बोल दिया, बड़ा संकट आ गया. अरे काहे का संकट- उसके बोलने से खुद महाराष्ट्र में फर्क पडता है क्या? अगर पड़ता तो महाराष्ट्र कब का देश से अलग हो गया होता...

'अच्छा ये राज ठाकरे को देखो ना, ये जो 13 सीटें मिली हैं उसी मीडिया वालों ने ही दिलवाई हैं. पुरबियों पर हमले कर कर पहले तो टीवी पर छा गया, नफरत के नये सरदार के रूप में ही सही, टीवी ने उसे हीरो बना दिया. क्या जरूरत थी ऐसे निगेटिव हीरो का एजेंडा दिखाने की? चैनल वाले किस मुंह से उसका इंटरव्यू दिखा रहे थे, क्या हिंदी, क्या अंग्रेजी सब चैनल वाले खास बातचीत और एक्सक्लूसिव का बैंड लगाकर राज ठाकरे का इंटरव्यू चला रहे थे- क्या मकसद था भैया? सर, आप मानो या न मानो, ठाकरों को सर हमीं चढ़ा रहे हैं...


सर जी, आप सर्वे कराकर देख लो- आज मेरे जैसा अनपढ़ भी कहेगा- मीडिया के इसी लोकतांत्रिक तरीके का तो फायदा उठा रहे हैं ये ठाकरे. जरा इनकी राजनीति देखिए- एक ठाकरे अमिताभ पर हमला करता है, तो दूसरा चुप रहता है, दूसरा सचिन पर हमला करता है, तो पहला चुप रहता है. एक बीएमसी को निशाना बनाता है, तो दूसरा बैंको को मराठी में वेबसाइट निकालने की धमकी देता है...ये अपना घर चलाने की राजनीति नहीं तो क्या है? दोनों का राग एक है, लेकिन कभी किसी मसले पर एकराग में बोलते हुए देखा है?

इतनी बात होते होते दफ्तर आ चुका था- लेकिन मेरे मन में सवाल बहुत गंभीरता से गूंज रहा था- क्यों नहीं इन ठाकरों को बैन कर दिया जाए- चैनल पर इनसे जुड़ी कोई खबर न दिखाई जाए, इनके किसी भी बयान को न उठाया जाय?

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