गुरुवार, जुलाई 09, 2009

जाओ, जैक्सन जाओ!


जैक्सन, अच्छा किए,
तुम अलविदा कह गए
अब तुमसे दिल न बहलाती दहशत की मारी दुनिया
बे-दिमाग का जुनून कहती तुम्हारे ब्रेक डांस को
पागलपन कहती तुम्हारी अबाधित अदायगी को
नामुमकिन कहती तुम्हारी लय और ताल को
शहंशाही समझती अपने दम से दुनिया बसाने की हसरत को
बाहर बिठा देती तुम्हारे अंदर के जानवर को निकालकर

तुम अलविदा कह गए, बहुत अच्छा किए
एक ऐसे वक्त में...

जब हर जान, बेजान चीजों को दिखने लायक बनने की दरकार है
जब हर चेहरे पर आतंक, हर कदम पर खतरे का निशान है
इराक और अफगानिस्तान जैसे देश बरबादी के निशान हैं
मजहब और सरहदों के स्वार्थ में एक और जंग के आसार है
खतरा है परमाणु बम का, आसमान से ओजोन खत्म हो जाने का
गोरे-सफेद के बीच ओबामा जैसी शख्सियत का गुणगान है

एक ऐसे वक्त में जब
दुनिया में मंदी है, मंदी के मारे हैं
रामालिंगा जैसे भरोसे के हत्यारे हैं
कड़क जेब है, मगर दिल में ढेर सारे नरम अरमान हैं
गांव फिर भी गांव है, ग्लोबलाइजेशन में भी शहर से दरकिनार है
झोंपड़ी और अट्टालिका में फर्क का दीदार और भी साफ है
एक तरफ मोदी का गुजरात है, बगल में बुद्धदेव का नंदीग्राम है
मुंबई पर आतंकी हमला है, लालबाग में नक्सली मुठभेड़ है

ऐसे वक्त में जब
आधुनिकता की आन में तने हुए इंसानी रिश्ते हैं
मर्द से सटती मर्द की सांठ और औरत से बंधती औरत की गांठ है
तुम्हारे जैसी बुलंदी की कितनी दुखद दास्तान है
सब लौट पड़े हैं धर्म और अध्यात्म की तरफ
मगर देखो, बापुओं, और योगियों की कितनी बहार है...

अच्छा किए, तुम अलविदा कह गए
अच्छा है, अब हम तुम्हें याद किया करेंगे!

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

अलविदा!!

श्रद्धांजलि