शनिवार, मई 23, 2009

मनमोहनी 'शपथ' का पॉलिटिकल पैकेज

दूरदर्शन में भी बड़ा दम है, कई बार नहीं चाहते हुए भी ऐसा सच दिखा जाता है कि हैरानी होती है। अब तक आपने दूरदर्शन पर शपथ समारोह तो कई देखें होंगे, जिसका फल्सफा यही होता है- हार हो या जीत, सियासत का शिष्टाचार इतना हो कि अपनी दलगत-दूरियां समेटते हुए इसमें सब शामिल हो. दिल में शिकवे-शिकयतें चाहे जितनी हो, जुबां पर मुस्कराहट कम चौड़ी नहीं होनी चाहिए...

मनमोहन मंत्रिमंडल के शपथ-ग्रहण समारोह में आडवाणी इसी परंपरा निर्वाह के तहत आए थे थोड़ा लेट ही सही, हाथ जोड़े हंसते-मुस्कराते पहुंचे मंत्रिमंडल के सम्मान में...लेकिन उनके सम्मान में सियासी शिष्टाचार तक नहीं दिखा...ये देखकर वाकई हैरानी हुई

विपक्ष के सबसे बड़े नेता के लिए बैठने की जगह तक फिक्स नहीं थी, उम्र के लिहाज से भी कइयों से सीनियर हैं आडवाणी लेकिन किसी बैठने का इशारा करना भी मुनासिब नहीं समझा। आडवाणी चलते चलते अगली पंक्ति के करीब पहुंच चुके थे...रास्ते में दिग्विजय सिंह मिले, शीला दीक्षित मिलीं...सबने हाथ मिलाया लेकिन बैठने का इशारा नहीं किया। राहुल गांधी मिले तो उन्होंने गर्मजोशी जरूर दिखाई, मुस्कराहट के साथ उनका स्वागत किया लेकिन कुर्सी नहीं बताई...

सीट मिलने से पहले आडवाणी से चिदंबरम भी मिले, ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मिले...लेकिन ये भी राहुल के नक्शे कदम पर हाथ मिलाकर आगे बढ़ गए...ये पूरा नजारा बगल की कुर्सी पर बैठे श्रीप्रकाश जायसवाल देख रहे थे, लेकिन न खुद कुर्सी से उठे न अपने किसी जूनियर को उठने के लिए कहा
श्रीप्रकाश की अगली कतार में सीट खाली थी, लेकिन इशारा नहीं किया...आडवाणी को खड़े देखकर शरद पवार जरूर दौड़े आए...लेकिन इससे पहले कि उस खाली सीट पर आडवाणी को बिठाते- राम विलास पासवान लपक कर विराजमान हो गए...शरद पवार की पहल पर आडवाणी के लिए कुर्सी का इंतजाम तो हुआ...लेकिन सीट कहां मिली...भैरो सिंह शेखावत के बगल में, जो पार्टी में रहते हुए आडवाणी की पीएम पद की दावेदारी को चुनौती दे चुके थे, इसकी खुन्नस साफ दिखी। आडवाणी ने मुंह तक फेर कर नहीं देखा शेखावत की तरफ

बैठने की सीट तो अगली कतार में मिल गई, लेकिन आडवाणी से कोई मिलने तक नहीं आया...न सोनिया न मनमोहन...अगली कतार में अनदेखे से बैठे रहे विपक्ष के सबसे बड़े नेता...जैसे सोच में डूबे आडवाणी को याद आ रहा था वो जमाना, जब विपक्ष के नेता की अगुवानी सत्ता पक्ष के बड़े नेता किया करते थे, ज्यादा दूर नहीं, 2004 के शपथ समारोह में ही जब मनमोहन सिंह पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे- अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवानी में खुद आए थे...लेकिन इस बार वो शिष्टाचार कहीं नहीं था।

इस मामले में आडवाणी की कंजूसी भी साफ दिख रही थी, शपथ तो वही मनमोहन ले रहे थे, लेकिन 'जाने किस वजह से' इतने दुखी थे पीएम इन वेटिंग कि ताली पर भी हाथ नहीं हिले। यही हाल लालू मुलायम पासवान अमर के चौथे मोर्चे का दिखा. सीट तो हंसते हंसते ली थी, लेकिन ताली के नाम पर सिर झुकाने के सिवा और कुछ नहीं किया. समर्थन दिया बिना शर्त, लेकिन समारोह में गए तो किसी ने पूछा तक नहीं. खासकर रामविलास की हालत तो और भी मुश्किल दिखी, लालू के साथ यूपीए से अलग क्या हुए जीत के रिकार्डधारी दामन पर हार का दाग लगवा बैठे...पार्टी का सुपड़ा साफ हुआ सो अलग...अब दाग छिपाएं भी तो कैसे?

पासवान की तरह लालू जी भी यहीं सोचते दिखे कि - मुझसे तो मीरा कुमार ही भली हैं, पूरे साल कोई नहीं जानता-सुनता इनके बारे में लेकिन कांग्रेस मंत्रिमंडल में बर्थ हर बार पक्की होती है...मेरा तो मिनिस्टर स्टेटस गया ही, दुलारी रेल का खेल भी बिगड़ गया

अमर-मुलायम ने भी बड़ा दम लगाकर बनाया था यूपीए को अपना सियासी हमदम, लेकिन महफिल में आकर पता चला अब न कोई हमदम रहा न को दोस्त...एक पल तो ऐसा आया कि अजनबी सी महफिल में बड़े भैया मुलायम भी बिछड़ गए...तब देखते बन रही थी छोटे भैया की अमर बेचैनी- लेकिन हालत ऐसी कि बताना भी मुश्किल और छिपाना भी मुश्किल...बेचारे अकेले गए थे अकेले ही लौटे, अमर और मुलायम जब समारोह के बाद लौट रहे थे, तब बेहद दार्शनिक हो गया था दृश्य का अंदाज...दोनों को सियासत की सीढ़ियां नीचे उतार रही थीं...न कोई काफिला, न कोई हुजूम॥बस अकेले अकेले

ये सियासी शिष्टाचार पर मंथन है या किसी और बात का अफसोस- इसे हर कोई अपने-अपने नजरिए से देख रहा है. आप भी टिप्पणी करें, लेकिन हमारी तरफ से इतना तो साफ दिखता है सियासी शिष्टाचार के मामले में नेताओं की अभिनय क्षमता कम हुई है

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