गुरुवार, अप्रैल 09, 2009

इतना 'गरम जूता',और सीबीआई का 'ढंडा बस्ता'


बेशक जूते को इतना गरम नहीं होना चाहिए, और अगर हो भी तो चिदंबरम जैसे तेज,ईमानदार और शरीफ मंत्री की तरफ नहीं उछलना चाहिए था, फिर भी अगर उछला तो इसकी जितनी निंदा की जाए उतनी कम है- गांधी के अहिंसा धर्म वाले देश में तो और भी। अब जबकि बापू के आदर्शों का इशारा करते हुए जब जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह ने माफी मांग ली हैं, और ये साफ कर दिया है, उनके विचारों में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं, वो बस एक क्षणिक बौखलाहट भर थी। वो बेचैनी जो सीबीआई के ढंडे बस्ते की वजह से पैदा हुई.

टीवी पर आप सब जरनैल सिंह को ये कहते हुए सुन चुके हैं- कि ठीक है, सीबीआई ने टाइटलर को क्लीन चीट दे दिया, लेकिन दोषी कौन है, ये कौन तय करेगा। या तो सरकार तय करे, या फिर सीबीआई बताए। अगर फ्लाने का दामन साफ है, तो 3000 सिखों को जिंदा जलाने के मामले में दोषी कौन है?

बैचैन कर देने वाला सवाल तो है ही, और ये संयोग था कि इस सवाल के सामने चिदंबरम जैसे 'नॉन-पॉलिटिशियन' मिनिस्टर थे, जो इतने डिप्लोमैटिक जरूर हैं कि वो कह सकें- कि मैं न तो जज हूं, कि दोषी और निर्दोष तय करूं, पार्टी इंचार्ज भी नहीं, जो ये तय करूं कि किसे टिकट दें या न दें, लेकिन इस सवाल का जवाव कौन देगा- 25 साल तक जांच किए, और किसी को दोषी ठहराए बिना चल दिए! और कितना साफ कहे जरनैल सिंह- उन्हें इस बात का मलाल नहीं कि टाइटलर को क्लीन चिट क्यों दी, मलाल ये है कि आप तो पल्ला झाड़कर ही चल दिए, और सरकार ने भी हिसाब किताब नहीं किया, भैया, चुनाव में जाना है, जनता पूछेगी तो क्या जवाब देंगे, 84 के दंगे की आग जमीन ने लगाई या आसमान ने?

उस वक्त राजीव गांधी ने बड़ी आसानी से कह दिया था- 'जब बड़ा पेड़ जमीन पर गिरता है, तो धरती पल भर के लिए कांप ही जाती है' अब इतने बड़े फैसले के बाद अगर एक जूता पांव से निकल गया तो इसे क्यों नहीं उसी फार्मूले के तहत देखा जाना चाहिए- जब हजारों लोगों की आस टूटी, तो एक बंदा बौखला गया, तो क्या बड़ी बात हो गई?

देश की सबसे बड़ी एजेंसी का अगर ये हाल है, ललित नारायण मिश्रा मर्डर केस से लेकर आरुषि हत्याकांड तक सीबीआई की विफल जांच की लंबी फेहरिस्त है, निठारी हत्याकांड में जिसे सीबीआई ने क्लीन चिट दिया उसे मौत की सजा हुई, आरुषि हत्याकांड में अब तक सीबीआई के हाथ खाली है, इनकी तो छोड़िए. ललित नारायण मिश्रा (1975) के हत्यारों का आज तक पता नहीं चला, केस अब भी अंडर ट्रायल है. सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री नरबहादुर भंडारी (1984-85) पर भ्रष्टाचार के दो मामलों का क्या हुआ. सेंट किट्स घोटाला (1990) अब भी अंडरट्रायल है. बाबरी मस्जिद ध्वंस (1992) का हाल तो सबको पता है. झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड (1996) में गुरू जी को क्लीन चिट मिल गई (दोषी कौन था नहीं पता चला)। दिल्ली हाउसिंग घोटाला (1996) में पूर्व मंत्री शीला कौल की क्या भूमिका थी नहीं पता चली। जयललिता बर्थ गिफ्ट (1997) में अब भी जांच चल रही है. ब्रह्मदत्त द्विवेदी मर्डर केस (1998)में बड़े नेताओं के नाम आ रहे थे, उसका क्या हुआ? बिहार पुलिस यूनिफॉर्म घोटाला (1975), बिहार चारा घोटाला (1995) धोती साड़ी घोटाला(1997), इंजीनियरिंग एडमिशन घोटाला (1998) बिहार दवा घोटाला (2000) जैसे कई मामलों में या तो जांच चल रही है या मामले अंडरट्रायल हैं. मुलायम, लालू, राबड़ी और मायावती जैसी हस्तियों पर आय से ज्यादा संपत्ति मामलों में सिर्फ तारीखें बंट रही है ये हो क्या रहा है!

कहना नहीं होगा, ये सारे मामले सियासत और सियासी हस्तियों से जुड़े हुए हैं, और इनके नतीजे देशहित में काफी हो सकते थे, लेकिन नहीं, फिर भी सरकारें चाहती हैं इतन सीबीआई के सियासी इस्तेमाल का आरोप नहीं लगे. नीयत पर तो अंगुली उठाना दूर की बात है., कोई है सीबीआई से सवाल पूछने वाला? आप उठाएंगे, तो आपकी नीयत ही सियासी संदेह के घेरे में आ जाएगी, जैसा जरनैल सिंह के साथ हुआ। सबने शुरू में यही समझा ये सिख विद्रोहियों की करतूत है।

जय हो, जय हो, जय हो, इतना गरम जूता और सीबीआई का इतना ढंडा बस्ता! भैया भूगोल का सिद्धांत हैं- हवा जब गर्म होती है तो बवंडर खड़ा होता है। अपनी जगह से उपर उठती है हवा। और फिर किधर बह निकले क्या पता? प्रकृति का नियम है- इसे कौन रोक सकता है, गलत चाहे जितना ठहरा लें

2 टिप्‍पणियां:

media narad ने कहा…

हिंदी मीडिया जगत पर नई वेबसाइट लॉन्च हुई है. कृपया आप भी नजर डाले. आपके सुझावों और आपके विचारों का स्वागत है. वेबसाइट है www.medianarad.com

पशुपति शर्मा ने कहा…

विनोदजी, बिलकुल सही लिखा है आपने देश का प्रधानमंत्री जब ये कहे कि बरगद गिरता है तो धरती हिलती है ऐसे में गृहमंत्री को परे जूते को कैसे गलत ठहरा सकते हैं... भावनाएं आहत होंगी... कोई जवाब नहीं मिलेगा... लोगों को मूर्ख बनाने की कला को ही अपना हुनर समझा जाएगा तो कभी-कभी जूते तो चलेंगे ही, आखिर कोई कब तक पत्रकारिता का पाठ पढ़कर बैठा रहेगा।