शनिवार, मार्च 21, 2009

एक दिन कविता के नाम

21 मार्च आज है वर्ल्ड पोएट्री डे। यूनेस्को ने साल 1999 में 21 मार्च को वर्ल्ड पोएट्री डे के तौर पर मनाने का एलान किया था. तमाम कवि हृदय आत्माओं के लिए मेरे दोस्त देवांशु झा का भेजा ये खास उदगार...

सदियों पहले एक परिंदे की दर्द भऱी आवाज में ढल कर तुम किसी की रूह में उतरीं. एक डाकू जिसने उस दर्द को महसूस किया और उस दर्द के पेट से तुम पैदा हुई। डाकू महर्षि बन गया और दर्द कविता. यूं तो अंजान ताकतों की प्रार्थना का रहस्य भी कविता है लेकिन वाल्मीकि ही तुम्हारे पिता थे और फिर मेघ की भाषा में तुम्हें कालिदास ने बात करने की कला सिखलाई. तुम्हें रंगीनियों से संवारा.तुम्हारे अंदर सीता की तकलीफ भवभूति की कलम से उभरी. तुम्हारी रंगीनियों ने पहली बार करुणा और अंधकार की भाषा भवभूति से सीखी.

तुम चलती रही..बहती रही. भास, दण्डी..श्रीहर्ष..और न जाने कितनी ही जुबां से संवरती रही शंकर, कुमारिल ने तुम्हें दर्शन के जेवर पहनाये। तुम्हारी धारा उत्तर से दक्षिण की ओर बहने लगी. सुदूर तमिलनाडु में तुम्हें एक नया कलेवर मिला॥

एक वक्त ऐसा भी आया जब धारा कुछ रुक सी गई। लेकिन फिर अमीर खुसरो॥की जुबां में तुम ताजा हो उठीं॥और राम तुम्हारे हाथों कुछ और संवर से गए तुलसी की कलम से। कृष्ण की शख्सियत को सूर ने तुम्हारे सहारे से एक नई चांदनी से भर दिया. कबीर ने तुम्हें तोड़ना फोड़ना सिखाया. तुम खुद अपनी राह बनाकर चलने की कला उस फकीर से सीख गईं.

नानक की भाषा में तुम कई विरोधों को साथ लेकर चलीं. और जयदेव, चैतन्य, कम्ब और पंपा तुम्हें रोशन करते गए.. सदियां बीतती रही. भाषा बदलती रहीं.. फारसी में बेदिल की कलम से तुम खिल उठी. तो मीर के शेर और नज्म तुम्हें खुदा के करीब ले गए. गालिब की पीड़ा और दर्द में तुम पिघल सी गई और टैगोर ने तुम्हें झरने का प्रवाह दिया. पश्चिम को पूर्व से मिला दिया. बंकिम ने तुम्हें मुक्ति की चाह दी और भारती के स्वरों में तुमने विद्रोह करना सीखा.

प्रसाद के सहारे तुमने इस संस्कृति की धारा में फिर से डुबकी लगाई. निराला के प्रचंड ओज में तुम्हारे बंधन टूट गए तुम परंपरा और आधुनिकता के बीच भिड़ंत करती रहीं।जीवनानंद ने तुम्हें नई छवियां दीं तो मुक्तिबोध ने तुम्हें अंधकार से प्रकाश में जाने की छटपटाहट. नागार्जुन ने तुम्हें भदेस होना सिखलाया और अज्ञेय की भाषा में अभिजात्य हो गईं. अब तुम्हारे स्वर कुछ बदले हुए हैं। तुम्हारी शैली भी बदल गई है. तुम्हारी पहचान मुश्किल है. तुम कविता हो या कुछ और कहना आसां नहीं.

लेकिन जीवन जब भी गम. खुशी,हार-जीत के लम्हों से गुजरता है. तुम सांस लेती हो. जब भी बादल गरजते हैं, झरने बहते हैं..नदियां उफनती हैं, चिड़ियां चहचहाती हैं, किसान खेतों में काम करते हैं.बच्चे जिद करते हैं..मां रोती है..और पिता मुस्कराते हैं. तुम मौजूद रहती हो. और शायद किसी न किसी भाषा, जुबां में इस धरती के जीवित रहने तक तुम भी सांस लेती रहोगी.. क्योंकि जीवन एक कविता ही है.

1 टिप्पणी:

सुनील मंथन शर्मा ने कहा…

नई शैली में कविता की कहानी पढ़कर बहुत अच्छा लगा. बधाई.