मंगलवार, दिसंबर 02, 2008

बस, यूं ही जलती रहे ये लौ!


मुंबई के आसमान में चांद मुस्करा रहा है
सचिन, संजु, आमिर, शाहरुख, बिग बी, सोनम, सोनू जैसे सारे सितारे उबल रहे हैं
नीचे जमीन पर मोमबत्तियों की लौ हर लम्हा तेज हो रही है
हर आखं में समा रही है झिलमिलाती हुई मोमबत्ती की सीधी सुंदर लौ
बुझती हुई सी आंखों में चौड़ी होती दिख रही है रौशनी
बस इतना ही चाहिए था!

शहीद बेटे के पिता के सीने में कुलांचे मार रही है बेटे सी हिम्मत
वो दिखा रहा है सीएम तक को दरवाजे से बाहर का रास्ता
‘जा चला जा, बड़ा आया है हमदर्द बनने, मुझे नहीं चाहिए तेरी छपट भरी सहानुभूति’
शहीद की बेवा बैरंग लौटा रही है सरकार की रुपयों से तोली हुई दया
बेटे के कंधे से गिर रहा ‘घड़े का पानी’ तर कर रहा है ‘कमीनों का पायजामा’
ताल ठोक कर कह रहा है बंधक-मैं तो फिर भी आउंगा ताज में,ओबेराय में
बस यही तो चाहिए था!

खबरों के बीच से गायब हो रही है ‘कॉमेडी’ की ‘गुदगुदी’
स्वर्ग-पाताल की चौहद्दी नापने वाले एंकरों की बदल रही है भाषा
रिपोर्टरों की पीटूसी में साफ झलक रहा है एकजुट आक्रोश
‘विनोद जी’ फिर से पीछे पड़ गए हैं बुलेटप्रुफ जैकेटों में दलाली खाने वाले,
देश की पीठ में छूरा भोंक मोर्चे पर जवानों को आगे करने वाले मतलबपरस्तों के
लग तो यही रहा है अपनी पोजीशन पर वापस लौट रहा है लोकतंत्र का चौथा खंभा
अब और क्या चाहिए!

अब छोड़िए गोली मारिये, भले ही कुछ प्रोड्यूसर अब भी इस मानसिकता वाले रह गए है जो मानते हैं कि ‘कब्रिस्तान में आतंकियों को दफनाने के लिए जमीन नहीं देने की खबर’ का वाइस ओवर कोई लड़की नहीं कर सकती, या लड़की की आवाज में ‘शहीदों की वीरगाथा’ का पैकेज अच्छा नहीं लगेगा.(लता जी, सुन रही है न, ये भूल गए कि आपकी आवाज में- ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...” सुनकर नेहरु जी जैसे व्यावहारिक नेता की आंखों से आंसू छलक पड़े थे.) ऐसे लोगों पर तरस खाईए और आगे बढ़ जाईए, ऐसों वैसों की तो वो सोच भी खोखली साबित हुई कि ‘कि दर्शक अगर देश की चिंता वाली खबर देखता, तो अपने टीवी पर डीडी न्यूज चैनल फिक्स कर लेता. छोड़िए जाने दीजिए, टीआरपी की टांग पर चलने वाले ये लोग विचार के स्तर पर अल्पसंख्यक है, बिलकुल ‘बीजेपी के क्रियेटिव लीडर’ मुख्तार अब्बास नकवी की तरह, जिन्हें मोमबत्तियों की लौ के साथ गूंजती आवाज नहीं सुनाई देती, नीम रौशनी में भी नजर लिपिस्टिक पर चिपकती है. अगर हाथ मारें तो नकवी साहब रामू से कम बड़े फिल्ममेकर नहीं होंगे, जिन्हें खून से सने मातम में भी कोई ‘सीन’ दिखाई देता है.

बस इन्हीं चीजों की कमी खटक रही थी, अब जो लोग अपनी हदों से बाहर निकले है, एक दूसरे की चिंता के लिए दो पल का वक्त निकाल रहे हैं, अपने मतलब से बाइट देने वाले औरों की खातिर माइक पर रहे हैं, दुआ करो ऐ मेरे वतन के लोगों, कि अबकी जो आंख खुली है, ये जो नई रौशनी दिखी है, ये बुझने न पाए. बार बार नहीं आती ऐसी पॉजिटिविटी. इस चिराग को हमें मिल जुल कर उस मुकाम तक रौशन करना है, जब सारे चाराखोर,ताबूतखोर, कफनचोर, बंदूकबाज, कबूतरबाज आदि-आदि टाइप के ‘लोगों’ की औकात साफ साफ दिखने लग जाए. आखिर इन्हीं ‘त्रियम दर्जे’ के लोगों की खातिर चुनाव आयोग ने वोटरो को पप्पू तक कह डाला, आइए, इसी लौ में मिलकर कहते हैं-
“हमें पप्पू नहीं बनना ‘आयोग महोदय’, आपको शायद पप्पू का मतलब नहीं पता, पप्पू मर्दों के पायजामे के भीतर चड्ढी में दुबके किसी और ‘चीज’ को कहते हैं”

‘आयोग महोदय’ आपको पता भी है,पप्पू क्या से क्या कर सकता है? औकात पर आ जाए तो ‘चड्ढी’ फाड़ सकता है, अपनी खोल में समा जाए, तो फिर कोई परवाह नहीं, सरकार जाए तो जाए, जब आपको नहीं परवाह हर सीट पर दो चार दागी बिठाते हुए, झूठ बोलकर हलफनाफा थमाने वाले उम्मीदवारों को खड़ा करते हुए, तो आपके शब्दों में ‘पप्पू को खड़ा होने’ की क्या जरूरत?


‘खड़ा करने’ से पहले ‘ठप्पा मारने’ का विकल्प तो दो, पब्लिक इस बार यूं ही नहीं ठप्पा मारेगी

1 टिप्पणी:

mahashakti ने कहा…

शहीदों को नमन, ये शब्‍द बहुत छोटे है।