रविवार, सितंबर 28, 2008

सुलगती हुई शाम के कोलाहल में...


शाम का पान बेहद रुहानी होता है, ढलती शाम के साथ चढते रंग वाला, यूं कहें कि टपकते हुए सूरज की लाली बंदे की जुबां पर पसर जाती है...और ये मौका जब फुरसत के दिन मिले तो जैसे बरसों की मुराद पूरी हो जाती है.
फुरसत के इस जिक्र से खयाल आता है, वो लम्हें तब कितने गर्मजोश हुआ करते थे, गुलजार का वो गीत उन चांदनी रातों में साकार हो उठता था-


जाड़ों की नर्म धूप और आंगन में लेटकर
आंखों पे खिंच कर तेरे दामन के साये को
औंधे पड़े रहे कभी करवट लिए हुए
बर्फिली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर
वादी में गूंजती हुई, खामोशियां सुने
आंखों में भींगे भींगे से लम्हें लिए हुए
बैठे रहे तस्व्वुर-ए-जाना किए हुए...

जी हां, दिल ढूंढता है फुरसत के वही रात दिन. यूं कहें कि पान एक निशानी है, ढलती शाम से बढ़ते उन चांदनी रात के इंतजार की. पगडंडी पर मुंह में पान चबाते, बाजार से अगली सुबह की मस्त उम्मीद में घर लौटते हुए...जब रात का सन्नाटा बढ़ता था, तो गांव का बेखौफ कोलाहल कानों में संगीत की तरह गूंजता था. धुली हुई चांदनी में नहाया हुआ कोलाहल...

पान उसी कोलाहल का साथी है, शाम का मन होता है, तो बुला लेती है आगोश में...फुरसत होती है, तो मैं भी गर्मजोशी दिखाता हूं...निकल पड़ता हूं...अब तो खैर पांवों में थकान होती है, जमाना ऐसा हो चला है कि अगले कदमों का भरोसा नहीं मिलता. उठेंगे या नहीं. लेकिन पान की खुशबू में बसा वो कोलाहल खींच ही लेता है- फुरसत के लम्हों को ढलती शाम की सरगर्म आगोश में...
पान की दुकान, ये हर मोहल्ले की वो जगह है जिसके खोखे पर पूरे मोहल्ले का नक्शा चस्पा होता है. पान की दुकान पर होने वाली चहल-पहल बता देती है कि मोहल्ला कितना खुशहाल है.

बम धमाकों की बात कहता हूं, आप मोहल्ले के पान की दुकान पर आते ही समझ जाते सोसायटी वालों की जेहनी हालत वैसी नहीं है, वो बस आते हैं, पैसे बढ़ाते हैं, और वैसे ही गुमसुम मुंह में पान दबाए, सिगरेट की डिबिया उठाये, मुंह लटकाए चल देते हैं. पानवाला भी लगता है, अपने आप में बिजी है, उसके चेहरे से साफ पता चलता है, उसके अंदर उधम मची हुई है- अपने ग्राहकों के उन संवादों का, जो दुकान से दस कदम दूर रहते हुए उसके कानों में गूंज उठते थे, आज उसमें धमाकों के बाद पसरा हुआ सन्नाटा सांय सांय कर रहा है.
कुछ सूझता नहीं बंधु, इसीलिए उन लहुलहान लम्हों में आपसे मुखातिब नहीं हुआ, क्या करें, जिसकी रूह जख्मों के तसव्वुर से ही कांप जाती हों, वो जख्मों को रोज जिंदा देखें, उसकी रुहानी हालत क्या होगी. कई बार सन्नाटा इतना घना हो जाता है कि वो शोर करने की बजाय शब्दहीन हो जाता है. वो फूट नहीं पाता, वो यूं ही घुटता रहता है. पता नहीं, उन दरिंदों की क्या नीयत है. इंसानी रिश्ते अब और धमाके नहीं झेल सकते...कितना झेलें, विश्वास की डोर कितनी देर अक्षत रहे, वो अमन के दुश्मन जान गए हैं, चोट कहां करना है- इन्हीं कमजोर नसों पर जो कमजोर पड़ गई हैं. उन्हें मजहब से क्या, दीन से क्या, धर्म से क्या, वो तो बस इंसान को इंसान नहीं रहने देना चाहते-एक दूसरे के लिए हैवान बना देना चाहते हैं. बिगाड़ देना चाहते हैं वो संतुलन जिससे दुनिया टिकी है.


इनके खिलाफ दुनिया का कोई हथियार काम नहीं आ सकता. क्योंकि ये हर वो जगह हैं, जहां आपका अंदेशा तक नहीं है. दांए सतर्क होते हो दो ये बाएं विस्फोट करते हैं. आप आगे सतर्क होते हो, तो ये पीछे वार करते हैं. ये दरअसल विचारों के लिजलिजे विषाणु हैं, जिसे सिर्फ आपकी इच्छाशक्ति ही मार सकती है, ये परमाणु बम से भी नहीं मर सकते लिजलिजे. आप बस ठान लीजिए, कि मुझे निजी तौर पर दहशतगर्दों का साथ नहीं देना, इनसे जुड़ी कोई सूचना कोई खबर नहीं छुपाना, इनसे कोई मोह नहीं रखना, ये किसी के नहीं होते है. हर आदमी अपने तमाम दुखों के बावजूद ये ठान ले तो, मुश्किल नही इन्हें मात देना. ये बेमौत मारे जाएंगे.

पान की दुकान से बात देखिए कितनी आगे बढ़ गई, अभी पान की दुकान पर मैं तो पहुंचा भी नहीं, लीजिए बस चंद कदम दूर है दुकान, मैं पान खाता तो हूं, लेकिन मीठा मसाले वाला. पान के बारे में एक बार बाबा ने कहा था, कि खैनी जर्दा सब तो खाते ही हो, तो खाओ, लेकिन पान के साथ मिलाकर इसका धर्म क्यों बिगाड़ते हो. अरे पान मुंह में जाएं, तो इसका मादक नशा पूरे तन बदन में छा जाना चाहिए, इतर गुलकंद, लॉन्ग इलायजी सौंफ, सुपारी ये सब एक साथ चीजें मुंह में जाएं, तो सोचो, क्या स्वर्ग का एहसास होगा.

जाते ही पान वाले ने टोका- आईए आईए भाई साहब, कहीं आउट स्टेशन चले गए थे क्या, दो तीन दिन बाद दर्शन हो रहे हैं...बोलिए क्या खाइएगा, वही 'सिंगल सींक'

मैंने टोका- क्यों, आज जल्दी में क्यों हो...

पानवाले की सांस लंबी होती चली गई-तीन दिन में बहुत कुछ बदल गया भाई साहब, अब कौन निकलता है घर से पान खाने, अब हम भी 9 बजे तक निकल जाते हैं, अब वो 12 बजे वाली मौज नहीं, लोग खाना खाकर टहलने निकलते थे, और हंसी खुशी मुंह में पान दबाकर जाते थे.

पानवाले की बात सुनकर लगा, किसी ने पान की पीठ में छूरा भोंक दिया है, और बूंद बूंद कर खून टपक रहा है. कुछ देर तक मैं इस बात पर खामोश रहा, लेकिन रहा नहीं गया-

'आप दुकान बंद करो भाई साहब, लेकिन ये अंत नहीं हैं, कम से कम उस कहानी का तो कतई नहीं, जो अभी आपने सुनाई...आदमी कैसे समा सकता है अपनी खाल के इतना भीतर, नहीं नहीं, ये अंत नहीं हो सकता. लोग निकलेंगे पान खाने, वो भी अब समझने लगेंगे, और ज्य़ादा भागे, तो ये अमन के दुश्मन हमारी खाल में घुसकर मारेंगे'
क्यों, गलत कह रहा हूं? नहीं, तो आईए, आप भी पान खाईए...!

कोई टिप्पणी नहीं: