मंगलवार, जुलाई 29, 2008

पत्नी का पंच-२ (बताइए, अब क्या जवाब दें?)

बहुत दिन बाद मिला ‘पत्नी का पंच’
मिला भी तो `मिला कि जवाब ढूंढने पर भी नहीं मिला...
वो हुआ यूं कि दफ्तर से लौटा तो घर के मेन दरवाजे के बाहर बालकनी का सीन बदला बदला दिखा. हैरानी तो नहीं, इसे सुखद आश्चर्य ही कहूंगा- पत्नी का हरा भरा गुट देखकर अच्छा लगा.
पत्नी के साथ तीन और औरते अपनी अपनी कुर्सियां बरामदे में सेंटर टेबल के इर्द-गिर्द टिका कर बैठी हुई हैं...चाय और मठरी के साथ मजे ले रही हैं...खिलखिला रही हैं, ठहाके लगा रही है...देख कर लगा कि हां, शहर में दोस्ती इसी तरह बेलाग होनी चाहिए. अंदर की लाग भले ही न हो, बाहर का लाग इतना तो हो ही, कि जब मिलें तो वक्त कट जाएं...

खैर स्टोरी ये नहीं है, स्टोरी ये हैं कि मैं अपना सुखद आश्चर्य जताए बिना सपाट भाव से उन्हें देखते हुए सीढ़ियां चढता रहा. उन्होंने आहट पाकर मेरी तरफ देखा और थोड़ी झिझक के साथ सबका वॉल्यूम कम हुआ...जो कि फ्रैंकली स्पीकिंग- मुझे अच्छा नहीं लगा...फिर भी उनकी झिझक पर हल्की मुस्कान बिखेरता मैं अदर चला गया, मैंने देखा पत्नी का आने का मन था, मगर दोस्तों को पति के आगे छोटा कैसे कर दे, पति तो परमानेंट है, उनकी ज्यादा चिंता क्या करनी... वो दुविधा भरी मुस्कान के साथ मुझे देखती रही.

जो भी हो, मैं पत्नी की इस सोच से शत प्रतिशत सहमत हूं. प्यार हो न हो, बढ़ती उम्र में एक दूसरे की चिंता ठीक ठाक हो जाती है. इसे आप जवानी के प्यार से कम नहीं समझ सकते.

खैर स्टोरी ये भी नहीं है
स्टोरी है कि पांच मिनट के भीतर कोई बहाना बनाकर दोस्तों से छुटकारा पा गई, आते ही नींबू पानी बनाया और अगले ही पल रोज के मुड में...
‘क्या बात है, आज बुझे बुझे नहीं दिख रहे, आज खुद गाड़ी चलाकर नहीं आ रहे हो क्या...
बड़े खिल रहे हो...
मेरा चेहरा बुझा हुआ वाकई नहीं था
‘कहां यार, ये बुझन भी अजीब चीज है, होती तो रोज है, लेकिन कभी दिखती है कभी नहीं दिखती...’

फिर मैंने इश्यू बदला
आज तुम लोग बहुत ‘गिल’(भोजपुरी में हंसी का ठिकाना न रहना)दिख रही थी...अच्छा अच्छा है...देखकर हमें अच्छा लगा...अब तुम्हारा भी अच्छा वक्त कट जाता होगा...’
‘कहां जी, कहां कटता है वक्त...नहीं कटता है घर में, तभी बरामदे में बैठ जाते हैं...अब बैठते बैठते काफी मिलना जुलना हो गया है...50-60 का खर्चा भी बढ़ गया है। ह..हा...हा...अच्छा है, ना जी,’
मुझे वाकई अच्छा लगा पत्नी को खुश देखकर...

अब देखिए असली स्टोरी...
सुस्ताने जा ही रहा था कि तकिए के सहारे चाय लेकर मेरे ही सोफे पर बैठ गई...मुझे लग गया अब टीवी चर्चा शुरू होगी। सवाल कितने गंभीर होते हैं, ये तो आप लोग पिछले पंच में ही देख चुके हैं। यही तो खूबी है, पत्नी पंच भी मारती भी है, तो प्यार से..
पूछा-
अच्छा एक बात बताओ...अभी हम सब औरत लोग यही बात कर रहे थे...ये टीवी वाले और कितने नीचे गिरेंगे यार...दिन ब दिन भरोसा घटता जा रहा है...कह रही थीं-
-आज तो हद ही हो गई...दिन भर धमाके ही गिनते रहे...
-अरे तब तो हद ही हो गई, जब धमाके गिनाना बंद किया और फिल्मी ब्रेक पर लंच करने गए तब तो हद ही कर दी-एक चैनल पर आ रहा था, कि सलमान से कटरीना की कुट्टी हो गई, उसी वक्त, ठीक उसी वक्त एक चैनल पर आ रहा था-ये कैट सल्लू की ही है...हाथों में हाथ डाले कटरीना और सलमान टीवी की भाषा में कह रहे थे- हम साथ साथ हैं...

‘अच्छा तुम ही बताओ, ये बकवास नहीं है तो क्या...हम कैसे मान लें कौन सी खबर अच्छी थी, और कौन सी खबर- ऐंवी है...’
सच कहूं तो मेरे लिए भी बीबी की ये खबर किसी ब्रेकिंग न्यूज से कम नही थी- ये क्या चुतियापा है यार...खैर मैने जाहिर नहीं होने दिया
‘मैने कहा- अपना अपना सोर्स है यार...होता है...’
‘क्या खाक होता है यार, अब टीवी का कोर्स नहीं किया लेकिन इतना तो लगता है कि इसमें सोर्स नहीं अप्रोच का फर्क है. बिना कन्फर्म किए तुम कोई खबर दिखा कैसे सकते हो यार...’

मैने कहा-‘अरे, तो क्या हो गया सलमान कटरीना की खबर से कौन सा देशहित का नुकसान हो गया...हैं..’
‘अब देशहित का आप लोग न कहो यार, टीआरपी के आगे आपलोगों को कुछ दिखता है?, इतना बडा धमाका हुआ है- कोई मुहिम, कोई एक्शन है आप लोगों के पास...कुछ नहीं है- सिर्फ धमाकों की गिनती के सिवा....लोगों लेकिन सच कहूं- टीआरपी अब तुम्हारे लिए जल्दी भ्रम साबित होने वाली है.
मैने मन ही मन कहा- कैसे?
‘तुम लोग क्या समझते हो, सलमान कटरीना हमें अच्छे लगते हैं, इनकी वजह से हम टीवी देखते हैं, तो क्या इनसे जुड़ी कोई भी सड़ी गली खबर देखते रहेंगे...उबन हो रही है जनाब...आज हम इसी पर बात कर रहे थे...’
मैने फिर बेशर्मी की- मजे लो यार, कटरीना जलने कटने की चीज नहीं, और कुछ नहीं तो सलमान के लिए देखो यार, क्या बॉडी है भाई की...
अब बीवी कुछ हल्की नजर आ रही थी
‘वही तो मैं सोचती हूं यार, कितना क्यूट कपल है, काहे के लिए आलतू फालतू की चीज कहते हो बेचारों के बारे में...बेचारों ने आज तक खुद नहीं कहा- प्यार है या नहीं, है तो कितना, नहीं है तो क्यो...लेकिन तुम लोग बिना बाइट-वाइट के लगे रहते हो. अगर यही लगता है कि सल्लू कैट की टीआरपी है, तो यही दिखाओ यार कि दोनों में कितना प्यार है...कब कहां मिले, कैसे मिले, कैसे एक दूसरे के साथ है- क्या फीलिंग है, क्या जोड़ी है...मैं दावे के साथ कहती हूं- दुनिया तो चिपक कर देखेगी...

अब आप ही बताइए, मैं क्या जवाब देता...(अव्वल तो ये कि क्या मेरी जवाब देने की औकात है?)
मैं भूंजे चबाते हुए अपनी लाज पचा रहा था, लेकिन चेहरे पर पसीना नहीं आने दे रहा था. बस चुप था, पत्नी समझ गई कि बेचारा हार मान लिया है-दिल से...सो उसने टॉपिक चेंज कर दिया...

‘और बताओ, ये सब छोड़ो, ये हम दर्शकों का काम है...और कैसा रहा आज का दिन...बाकी सब ठीक रहा...’
अपनी बाजी देख अब मैं दार्शनिक हो रहा था...
‘अब क्या बाकी और क्या ठीक यार...जो ठीक होता है वही बाकी होता है...’
पत्नी चकरा गई, माथा पीटकर कहा- मतलब....?
‘हां, ठीक ही कह रहा हूं- जो ठीक होता है वही बाकी होता है....जो भी अच्छा होता है, वो ऐक्चुअली होता कहा हैं...वो तो बाकी ही रहता है न...’
‘……. …….’
‘मतलब, जो बाकी नहीं होता, वो टीक भी नहीं रहता, नहीं समझी...’
‘अरे बाबा समझ गई, इतनी भी बुद्धू नहीं हूं, तुम लोग टीवी वाले आदत से बाज नहीं आओगे, घुमा फिर कर खबर क्या साधारण सी बात की भी चक्करघिन्नी बनाए रखोगे...अब देखो, बाकी और ठीक दोनों ही अलग स्वतंत्र शब्द हैं, लेकिन अलंकार के फेविकोल से ऐसे चिपका रहे हो दोनों को, कि सही सही मतलब का ठिकाना बदल रहा है. चलो, तुम्हारा दर्द समझती हूं, लेकिन पत्नि के सामने इतनी कठिन भाषा में दुखी होने की क्या जरूरत...
कम ऑन यार...’
दुआ कीजिए, ऐसा प्यारा पंच हमेशा मिलता रहे!

5 टिप्‍पणियां:

प्रभाकर पाण्डेय ने कहा…

रोचकता से परिपूर्ण और यथार्थ।

vipinkizindagi ने कहा…

सच भी मजेदार भी

pallavi trivedi ने कहा…

bahut badhiya...

Udan Tashtari ने कहा…

हा हा!! बहुत बढिया.

बाल किशन ने कहा…

हा हा हा .
काफ़ी अच्छा लिखा आपने रोचक अंदाज में.
अपन की तो यही दुआ है एसा पंच आपको हरदम मिलता रहे.