सोमवार, नवंबर 15, 2010

मियां, भलाई अब 'भज्जी' को भजने में है


ये विचार भज्जी के शतकों ने फोड़ा. आठवें नंबर आकर दो दो बार सेंचुरी मारना, आखिर दुनिया में पहली बार तो हो रहा है. वो भी तब जब टीम के सारे दिव्यपुरुषों को दिन में तारे नजर आ रहे थे.

कभी हम भी क्रिकेट के आशिक हुआ करते थे, अजहर कपिल और गावस्कर के हुनर में मीन मेख निकाला करते थे (जैसी कि अपने इंडिया में क्रिकेट फैन होने का मापदंड है)लेकिन उब गए. अब तो सिर्फ हारने जीतने के नतीजों से पता चल जाता है. बाकी गुणगान तो टीवी पर ही देख लेते हैं. हार गए तो पीछे से देते हैं हुरा (डंडा का भोजपुरी संस्करण) और जीतने पर सजा देते हैं मऊर(सेहरा का भोजपुरी संस्करण)

जाने क्यों भज्जी का खेल अपने आप में विद्रोह लग रहा था. एक एक गेंद पर किसी इच्छित क्रांति का आगाज. सिस्टम को तोड़ने की हुंकार. भज्जी में हाशिये पर खड़े उस आखिरी शख्स का चेहरा दिख रहा था, जो सिर्फ कहने भर के लिए लोक-तंत्र में है. उसका अपना योगदान है, लेकिन उसकी 'हीरोगीरी' किसी काम की नहीं मानी जाती.

इस सिस्टम में भ्रष्ट्र बने रहना कितना आसान है. राजू से लेकर रामालिंगा तक, गुटखा किंग्स से लेकर 'चाराबाजों' और चव्हाणों तक. सब अपने अपने काले कलूटे चेहरे और नापाक हाथों के साथ सिस्टम का हैंडल पकड़े हुए हैं (कहीं न कहीं) इन 'दिव्यपुरुषों' के आगे कितनी फीकी लगती है पब्लिक. इन्हीं की खबरे होती है, खबरों में कहने भर को ठुकाई होती है, ये लेकिन यहां तो पिछवाड़ा ही मोटा हो गया है इनका. घुम फिर कर वापस खबरों में आ जाते हैं.अगली बार पुराने आरोप दफ्न हो चुके होते हैं. बड़े आराम से दांत चिहारे बाइट दे रहे होते हैं

दादा जी एक जुमला कहते थे, सौ पापी मरते हैं तो एक चोर पैदा होता है, सौ चोर मरते हैं तो एक नेता पैदा होते हैं. (इसके आगे भी है, लेकिन संदर्भ से बाहर है)आज के दौर में ये जुमला भी महंगाई का मारा लगता है. सौ की जगह पता नहीं हजार भी कम पड़े शायद..

इनके जुल्म के मारे हाशिए पर खड़ा 'भज्जी' जब आक्रामक होता है, तो उसे 'उग्र' करार दे दिया जाता है. उसकी कतार ही अलग कर दी जाती है- कानून के निशाने पर खड़ी एक विद्रोही कतार. समझ में नहीं आता इन दिव्यपुरुषों के लिए कहां चला जाता है कानून. इनके घपले के पैसे वापस देश को मिल जाए,तो ससुरी देश की दशा 'उस जमाने के' अमरीका रूस से भी बेहतर हो जाए.

लेकिन नहीं, इन्हें तो चुराने और उड़ाने की आदत है. बगैर चोरी के तो कोई मालदार बना ही नहीं, आकड़े देखकर तो यही लगता है. दवाई में चोरी, दारू में चोरी, बिल्डिंग में दलाली,नीलामी में दलाली. गेम्स में घपलेबाजी, सिनेमा में लफ्फाजी. सुना है दिल्ली के किसी गुटका किंग फेमिली में होने वाली शादी में 25 करोड़ रुपये सिर्फ हीरो हीरोइनों को बुलाने पर खर्च किया जा रहा है. शाहरुख, सलमान, कैटरीना और 'मुन्नी' सब आ रहे हैं. बताते हैं, सिर्फ 6 करोड़ तो शाहरुख मियां नाच कर लूट ले जाएंगे (बख्शीस)

इनके आगे 'भज्जी' की क्या औकात. दो शतक से भला हीरो बन जाएगा? उनके लिए तो और भी नहीं, जिनकी 'कतार' ही अलग है. लेकिन सावधान, ये भज्जी अभी और रिकार्ड तोड़ सकता है. 'बदलाव का बल्ला' उसके हाथों को लग चुका है. वो खेल का 'दांवपेच' भी समझ चुका है और बारीकी भी.

मियां, आज भज्जी जाने क्यों 'पावर' का पर्याय लग रहा था, जिसकी कमी देश की 80 फीसदी पब्लिक में खलती है. सारे लोग अपनी अपनी जगह से ऐसी 'रिकार्डतोड़ बैटिंग' करने लगे, तो इन दिव्य पुरुषों से छुट्टी मिल जाएगी.
इसलिए, भेजे में ये टाइटिल खटका- मियां भलाई तो अब भज्जी को भजने में ही है.

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