रविवार, अक्तूबर 24, 2010

दिन का दुखड़ा सुनो


किसने काट लिए दिन के पर
देखो, कितना लंगड़ा के चलता है ये दिन

कभी कितना मस्त था
नीले लिबास में सूरज का साफा बांधे
चमकता हुआ झकास सा वो दिन

भिनसार में आंखे खोलता
सूरज चढ़ते दौड़ उछलता कूदता
दो पहर तक पसीने में तर-ब-तऱ
घड़ी दो घड़ी सुस्ताता
आमियों की छाव में चैन की बांसुरी बजाता

दिन भर के लिए आना होता है
कितनी अच्छी तरह जानता था
शाम होते होते खुद को समेटने लगता
गोधुली से हर रोज शाम की शान बढ़ाता
चुपचाप गुम हो जाता रात की गोद में
सूरज को निगलकर चुपचाप सो जाता
सितारों के सपने देखता
नींद खुलती तो चांद से बतियाता

एक चक्र में कितना कुछ दे जाता था वो दिन
यहां तो अपना चक्र ही भूल गया है
न ठीक से सोता है न ठीक से जागता है

दिन भर उनींदा सा रहता है
अपने पांव का जख्म सहलाता हुआ!

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