शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010

नई-पुरानी के बीच 'सेकेंडहैंड' सोच



किसको नई कहूं
किसको पुरानी

कई बार बेमानी लगती हैं
नई भी
पुरानी भी
बिकने को बेकरार
बाजारु उसूलों के बीच

नए पुराने का
क्या घनचक्कर बन जाता है

कभी सवाल
पहली आंखो देखी का होता है

जो पहले आई
पुरानी तो वही होती है
जो बाद में आए
नई तो वही कही जाती है

कभी सवाल होता है
पहले अंतःप्रवेश का

पहली का बंधन
पहली पहली बार बंधा था
उसके लिए मैं पहला
मेरे लिए वो पहली

भौतिक लिहाज से
तो पहली को पुरानी नहीं
नई कहा जाना चाहिए

लेकिन
नई पर बादवाली का
दावा भी कुछ कम नहीं


बार बार बाजार का
हवाला देती है बाद वाली
वो जानती है
अपनी जिंदगी में वो भी दूसरी है
अपनी जिंदगी में मैं भी दूसरा
फिर भी कहती है
नई तो मैं हूं
मेरा रंग नया
मेरा रोगन नया
मेरी पूरी रंगत नई
मेरा हौसला नया
मेरी मंशा नई
मेरा सफर नया
मेरी मंजिल नई
मेरा यार नया
मेरा प्यार नया

चेहरा पुराना है तो क्या हुआ
मत देखो तन मेरा
मन से मैं ‘सेकेंड हैंड’ नहीं
बाजार में सौदा नया होता है
सामग्री कोई जरूर नहीं

नई पुरानी के बीच-बहस में
उलझा हुआ मैं सोचता हूं
इसमें न नई की खता है
न पुरानी का कसूर
ये सब आदमी के
असीम अरमानों का अंजाम है

‘एडगुरू’ ठीक ही कहते हैं
एक से मेरा क्या होता है

कोई टिप्पणी नहीं: