बुधवार, मार्च 10, 2010

'औऱतों' के लिए 'पुरुष' की एक कविता

पिछली पोस्ट (जिसमें अधिकतर लोगों को 'आचार' पसंद आया) में जिस 'पुरुष नीयत' की बात अंडरकरंट थी, वो इस कविता में खुलकर सामने आई है, जब नीयत ठीक रहती है, तो आदमी इस तरह की रचना करता है. लिंगभेद के आधार पर ये कविता एक पुरुष (उदयकांत दीक्षित, ब्लॉग भावसरिता) ने लिखी (और भेजी) है. आप पढ़े और देखें, कि नीयत से दर्द के एहसास में कितना फर्क पड़ता है.

हाँ , बेटी ! तुझे मैं जन्म दूंगी ।
जानती हूँ , तेरे जन्म पर ,
नहीं बजेंगी थालियाँ ।
गूंजेंगी नहीं घर में ,
ढोलक की थापियाँ ।
सास ,ससुर अन्य घर वालों के ,
चेहरे लटके होंगे।
मेरे पति याने तुम्हारे पिताभी
साथ ,साथ उनके,
कहीं भटके होंगे ।
मैं जानती हूँ ,
घर में छाई होगी उदासी ,
खुशियों के बदले ,मानो ,
मिल रही हो फांसी ।
फिर भी मैं ,
तुझे जन्म दूंगी ।
अपने अधूरे अरमान ,
तुझसे पूरा करूंगी ।
किरण बेदी , कल्पना चावला का ,
स्वप्न मैंने भी देखा ।
परिस्थिति वश ,स्वप्न पर ,
खिंची एक आड़ी रेखा ।
हाँ , तब से अब तक ,
बहुत आत्म बल संजोया है ।
धीरज का संबल ले इच्छाओं को ,
आज तुम में पिरोया है ।
जन्म लेगी तू अवश्य ,
इस धरती पर आयेगी ।
घर की स्थितियां भी बदलेंगी ।
तेरे जन्म तक मना लूंगी सबको ,
आशा है घर परिवार का ,
स्नेह प्रेम तू जरूर पायेगी ।
तेरा जन्म , मेरा निश्चय है ,
रंग उसमें अवश्य भरूँगी ।
हाँ ,बेटी ! कुछ भी हो ,
तेरी भ्रूण हत्या मैं ,
नहीं करूंगी ,नहीं करूंगी ।
हाँ,तुझे जन्म दूंगी ,
मैं तुझे जन्म दूंगी .

3 टिप्‍पणियां:

Amitraghat ने कहा…

सुन्दर कविता........"
प्रणव सक्सैना
amitraghat.blogspot.com

Suman ने कहा…

nice

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता पहले भी पढ चुकी हूँ याद नही कहाँ पढी थी। धन्यवाद्