शुक्रवार, मार्च 12, 2010

बड़ा सख्त आदेश है!


(चित्र-एम वुवेरकर जी की स्केच से)

हमारी सुबह रात ग्यारह बजे शुरु होती है
सो कुछ देर के लिए आप मुझे अपने विपरीत समझिए

दिन में स्कूल जाते अपने जिगर के टुकड़ों
उनकी सुबह उठने की कमसिन सी मुश्किलों
उन्हें उनींदी आखों से नहाते, खाते, पहनते, तैयार होते देखते
बार बार घड़ी देखते, हर बस की सीटी पर उन्हें चहकते
उनकी शहद घोलती जुबान से
बाय पापा! सुनते....

जिसे अरसा हो गया है ये सबकुछ भोगते हुए

जमाना हो गया है जिसे
सुबह स्नान की तैयारी कर रही पत्नी
स्नान के बाद भींगे बालों से पानी झाड़ते
तोलिए में लिपटी बाथरुम से कमरे में भागती
सर पर तौलिया रखे तुलसी को धूप दिखाती
18 से साल बीवी और 10 साल से बच्चों के बीच घुलते हुए

वो आपके समरुप कैसे हो सकता है
आप उसे अपने विपरीत ही मानिए, खिलाफ नहीं

बात ऑफिस की है
शिफ्ट शुरु तो इंचार्ज ने कहा
कुमार साहब, आज भी आपके हिस्से 'बाबा' की स्टोरी है
आपके फेवरेट खिलंदड़ बाबा- नित्यानंद
स्टोरी तो ठीक है, आज भी कोई नया एंगल है
लेकिन एक 'गाइड लाइन' है

बाबा के वो वाले विजुअल नहीं लगाने है
जिनमें बाबा सेविका की जांघ पर 'टांग साधना' कर रहे हैं
घने बालों के पीछे होंठ भिड़ा सेविका का 'ओष्टपान' कर रहे हैं
अकेले कमरे में बाबा जिंदगी के फुल मजे ले रहे हैं

भाड में जाएं...
धर्म, अध्यात्म, अनुशासन, नीति, नीयत
और कुल मिलाकर भगवा कैरेक्टर
ये वाले विजुअल आज के पैकेज में नहीं लगाने हैं

तेल मालिश और मसाज तक ठीक है
मोहतरमा का भी कहना है
मैं तो बाबा के प्राइवेट रूम में गई थी
सिर्फ सेवा करने के लिए
इस बात का कोई गलत मतलब न निकाला जाए
सो, आज ध्यान रखिएगा

अरे हां,
बैकग्राउंडर पैकेज में वो वाले विजुअल जरूर लगे होंगे
उन्हें भी री-एडिट में हटना इंश्योर कीजिएगा
बड़ा सख्त हिदायत है

ये और बात है
किसी हीरोइन का 'लिप लॉक' मिल जाए
किसी मॉडल का मैलफंक्शन मिल जाए
कोई हॉट कैलेंडर शूट मिल जाए
मल्लिका के कार वॉश जैसी कोई तड़कती भड़कती 'क्लिप'मिल जाए
देखेंगे, चला लेगें, और क्या करेंगे...
लाइफ में कुछ एडवेंचर तो होनी ही चाहिए

सच नहीं दिखा सकते तो न सही
लोगों के साथ खुद को भी चौंकाना ही सही
रगों में खून के साथ उबलते बुलबुले फूटने चाहिए
मुट्ठियों में आती अकड़न कम होना चाहिए
लेकिन जिंदगी में भी तो कुछ न कुछ तो होना चाहिए

बस, बाबा के कुकर्म का ख्याल रखिएगा
दुनिया को हद से ज्यादा न दिखाइएगा
बड़ा सख्त आदेश है, गौर फरमाइएगा
गुड मिडनाइट!

रात का यही सच सीने में सुलग रहा था
परेशान कर रहा था, सो कह दिया
इसे आप दिन के विपरीत मान सकते हैं
ये आपके खिलाफ नहीं है.

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

मीडिया में कार्यरत लोगों के दिली भाव..आदेश का पालन तो करना ही है.

निर्मला कपिला ने कहा…

सच नहीं दिखा सकते तो न सही
लोगों के साथ खुद को भी चौंकाना ही सही
रगों में खून के साथ उबलते बुलबुले फूटने चाहिए
मुट्ठियों में आती अकड़न कम होना चाहिए
लेकिन जिंदगी में भी तो कुछ न कुछ तो होना चाहिए
क्या कह सकते हैं मगर इन बाबाओं से तौबा है। अच्छी पोस्ट। धन्यवाद्

हिमान्शु मोहन ने कहा…

आप के ब्लॉग पर कहाँ से कैसे आया, ये तो पता नहीं; आ कर अच्छा लगा ये पता है।
ये बेचैनी जो मजबूर कर दे अभिव्यक्ति के लिए, यही साझा तो ताक़त है।
जारी रहिए, साधुवाद!