शनिवार, मार्च 06, 2010

हमें नहीं चाहिए ऐसा 'हुसैन'!



बड़े अफसोस के साथ ये लिखना पड़ रहा है. हुसैन के बारे में इससे पहले ऐसी सोच कभी नहीं आई, बड़ी कद्र करते थे हुसैन की, कई बार मिले भी हैं, दिल्ली में कई प्रदर्शनियां कवर की हैं. इंटरव्यू भी किया है. जितनी बार मिले, उनके शून्य से सफर के बारे में जाना, उनकी जिजिविषा, उनकी लगन और कुछ अलग करने की प्रतिभा से प्रभावित हुए. जिस देश ने उन्हें फिल्मी पोस्टर के पेंटर से 'इंडिया का पिकासो' बना दिया, उस देश को बदले में ये तोहफा?

अगर आपका इस देश में कोई विरोध करे, तो आप देश छोड़कर चले जाएं? ये कहां की बुद्धिमानी, ये कहां का देश प्रेम है? इसी देश में शाहरुख खान हैं जो ताल ठोककर 'ठाकरों'से लड़ते हैं, जनता और मीडिया भी मजहब का ख्याल किए बगैर खूब साथ देती है. ऐसी लड़ाई हुसैन साहब भी लड़ सकते थे. फिर क्यों नहीं लड़ी? क्या उनके पास दलीलें खत्म हो गई थीं, या कूची में वो जान ही नहीं रह गई, जिसकी बदौलत वो कभी क्रांति का दावा किया करते थे? अगर दलीलें खत्म हो गईं, तो इसका हिसाब तो हुसैन साहब के पास ही होगा, न कि इस देश के पास, कि क्यों आप इस देश की जनता से अपील करने लायक भी नहीं रहे, कि बंधुओं, मैंने अपनी कला के जरिए तुम्हारी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाई?

मेरा मकसद उस विवाद को हवा देना कतई नहीं. मैं उस विवाद में नहीं पड़ना चाहता कि हुसैन ने हिंदू देवी देवताओं की नग्न पेंटिंग बनाई वो सही है या गलत, इससे कई लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची, वो वाजिब है, या धर्मान्धता. बस इतना जरूर कहना चाहूंगा कि जिस देवी की अराधना के साथ देश के बच्चे पेंसिल पकड़ते हैं, आप उन्हें वस्त्रहीन दिखाते हैं, इसके पीछे सिर्फ कला का तर्क काफी नहीं. जो लोग आप पर गुमान करते हैं, आपको इंडिया का पिकासो कहते हैं, उन्हें अगर कला की बारीकी नहीं समझ आ रही, तो आपको समझानी चाहिए- कैसे, ये हुसैन साहब को तय करना चाहिए

हुसैन को जो भी दिया हिंदुस्तान ने दिया. उन्हें किसने कहा है देश छोड़ने को? ये उनका सेल्फ इंपोज्ड एक्जाइल है। क्या हुसैन छोटे हो जाते अगर ये कह देते, कि माफ कीजिएगा, अगर मेरी किसी कृति से जाने अंजाने किसी की भावना को ठेस पहुंची? ये माफी नहीं बडप्पन है, और ये देश ऐसे लोगों से भरा है. आपने विस्मिलाह खान का किस्सा तो सुना ही होगा, कैसे अमेरिका में उन्हें बसने का प्रलोभन दिया जा रहा था, उनके लिए बनारस बसाने की बात हो रही थी, लेकिन बिसमिल्ला खान ने कहा- बनारस तो बना दोगे, गंगा कहां से लाओगे...? कहां बिस्मिल्ला खान, और कहां हुसैन, ऐसे हुसैन का हम आचार डालेंगे...

हुसैन साहब भले ही कहें, मैं किसी देश भी की नागरिता की परिधि पार कर चुका हूं, मैं विश्व नागरिक हूं. लेकिन जो शख्स अपने देश का न हुआ, वो दुनिया का क्या होगा. हुसैन साहब कतर में बसें, या दुबई में, वो पैगम्बर मोहम्मद की नग्न पेंटिंग नहीं बना पाएंगे, ये तो मैं शर्तिया कह सकता हूं.

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