बुधवार, फ़रवरी 24, 2010

मंदी में महंगाई के मारे

किस पर्सन में कहें- मंदी में महंगाई के ‘मारों’ की व्यथा. राह चलते एक के बाद एक मिलते जाते हैं, ‘मारे’ एक हों तो न, यूं कहें कि घर से दफ्तर तक पूरा रास्ता मंदी में महंगाई के मारों से भरा पड़ा है. इसलिए इन पर तो एक सीरीज बनती है. क्योंकि ये ‘मारे’ भी अजीब है, जो जितना ‘मारा’ है वो उतने की भरपाई में जुटा हुआ है. किसी को अंदाजा तक नहीं, कि इस मारा-मारी में ‘मार’ सब पर दुगनी पड़ रही है.

शुरुआत करते हैं, सोसायटी मार्केट में कोने पर रेवड़ी की ठेली लगाने वाले से. मेवाड़ आइसक्रीम की ठेली से आप सभी परिचित होंगे- देसी आइसक्रीम के साथ बादाम मिल्क शेक परोसते हैं- फरवरी मार्च में आते हैं राजस्थान के दूर दराज के गांवों से और दीवाली तक वापस चले जाते हैं...

कल अचानक दिख गई थी उसकी ठेली. मार्केट के उसी कोने पर, जहां पिछले साल लगी थी. उसे देखकर अचानक ठिठका. अरे, ये तो गंगा है, ये आ गया मतलब मार्च आ गया. पिछली दीवाली पर तो यही कह कर गया था. वक्त से हफ्ता डेढ़ हफ्ता पहले आ गया, अरे हां, आखिर फरवरी भी तो खत्म ही होने वाली है...

उसे देखकर मैं मुस्कराया, उसने भी दूर से देखते सलाम किया. मैं भी दुकान पर चला गया. पिछले 2 साल से जान पहचान है. एक तरह की आत्मीयता हो गई है. 17-18 साल का लड़का है. शादी ब्याह नहीं हुआ, शहर में पिछले दो साल से आना जाना है. जितने दिन रहता है सौ-दो सौ कमा लेता है, इसी के लिए इतनी दूर से आता है, अब फरवरी में आया है, तो सीधे दीवाली पर ही जाएगा. बीच में जितनी गर्मी पड़ेगी, मेवाड़ की मलाई उतनी ही बिकेगी....

हाल चाल की बात होने के बाद उसने एक ग्लास भर बादाम शेक आगे बढ़ाया-
सर ये लो, मौसम का पहला ग्लास...
मैंने भी ये परवाह किए बिना कि जुकाम में इतना ढंडा शेक नुकसान करेगा, चम्मच से धीरे धीरे चाटना शुर कर दिया.
सोंधे दूध और देसी हाथ से बना ये शेक, कहना नहीं होगा स्वादिष्ट लगता है. कुछ देर के लिए आदमी डॉक्टरों की नसीहत भूल जाता है- ठेली वाले पानी बढ़िया यूज नहीं करते, दूध में भी मिलावट होती है, चीनी भी तीसरे चौथे दर्जे की होती है, हाईजीन के दूसरे स्टैंडर्ड भी फॉलो नहीं करते ठेली वाले, इसलिए, यहां फटकना लेकिन बीमारी, खासकर ‘इंफ्केशस डिजीज’ को दावत देना है. लेकिन ठेली वाले से इतनी आत्मीयता है कि पास जाने पर इन चीजों का ख्याल नहीं रहता.

मैंने ग्लास खाली कर दस का नोट आगे किया, जैसा कि पिछले साल करता था. इस बार उसने पैसे तो लिए, लेकिन ये कहते हुए-
सर, पांच रुपये और. इस साल 15 का रेट हो गया है.

पांच रुपये का झटका अचानक लगा. हालांकि जल्द ही ये समझ गया कि दूध और चीनी के दाम बढ़े हैं, कीमत तो ज्यादा नहीं बढ़ाई. रहन सहन और खान पान के दूसरे खर्चे भी तो बढ़ गए हैं. ग्लास पर पांच रुपये कुछ ज्यादा नहीं...जिनको पीना होगा मेवाड़ मिल्क शेक, वो पंद्रह देंगे...

वैसे देखा जाए, तो एक चीज पर एक साल में 50 परसेंट का चूना ज्यादा होता है. आदमी झेल तो लेता है, लेकिन कहीं न कहीं उसे एडजस्ट करने की सोचता है. उसकी ठेली पर से लौटते हुए मेरे भी मन में भी पांच रुपये की कचोट सी उठी-
मन में डॉक्टर की दबी हुई नसीहतें याद आने लगी.हाईजीन के सवाल प्रचंड होने लगे.

‘यार इससे बढ़िया तो वो प्रो-बायोटिक मिल्क है. हाइजीनिक भी और प्योर भी. औऱ सबसे बड़ी बात आज भी बजट में है- पिछले साल भी दस में आती थी इस साल भी. ये और बात है मल्टीनेशनल कंपनी ने दाम बढ़ाने की जगह दस मिलीलीटर मात्रा कम कर दी है, लेकिन छंटाक भर कम से क्या फर्क पड़ता है. पांच का सिक्का तो बचता है.‘

अगले दिन शाम को मैं फिर मार्केट की तरफ गया, उसकी रेड़ी की तरफ से भी गुजरा, लेकिन मेवाड़ मिल्क शेक की तलब जाने क्यों नहीं थी. उसने दुआ सलाम भी की, लेकिन मैं दूर से ही निकल गया. शॉपिंग के बाद जब गले में तराश का एहसास हुआ, तो मुझे उसकी ठेली याद आई, लेकिन तब तक मेरे कदम प्रो-बायोटिक मिल्क खरीदने के लिए बढ़ चुके थे.

10 रुपये में दो घूंट की शीशी लिए मैं वापस लौट रहा था. उसने मुझे आते हुए देखा लेकिन तब तक मैं शीशी खाली कर चुका था, और नजरे चुराते हुए घर को लौट रहा था.

मेरी जेब में पांच रुपये ज्यादा बजे थे, लेकिन मैं सोच रहा था अगर सब ऐसे ही सोचने लगे, तो इस मेवाड़ी ठेले वाले का क्या होगा? क्या ये भी ग्लास छोटा कर दाम दस रुपये कर लेगा, या धंधा मंदा होने पर अगले साल से आना बंद कर देगा?

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