सोमवार, फ़रवरी 22, 2010

मेरी जानिब मैं



मै किसी भी जानिब चलता
इस रफ्तार से इतनी ही मंजिल पाता
चुना था दिल से दिल्ली तक भटकना
जैसी भी हो, यही थी उस लम्हे की खता

एक हाथ आता, तो दूसरा बिखरता
एक बिखरता तो दूसरा संभलता
जब भी मुड़कर देखा किसी पड़ाव से
पीछे छुट रहे क्षितिज पर ये साफ दिखा
लेकिन बढ़ता रहा, चलता रहा है
माया में, कि मृगतृष्णा में नहीं कह सकता

मैं इसी जानिब आता
इस रास्ते तो हाथ में यही शहर आता

भाड़े पर खरीदा आशियाना,
और लिया किराये का आसमान
बेच दी हाथ की दस अंगुलिया
गिरवी रख दिए सारे अरमान

बिकता रहा वक्त भी मेरे साथ
कहने को मैं वक्त के साथ चलता रहा

मैं यही निरंतर चाहता
वो सब ले जाता, बस मेरी निशानी छोड़ जाता