शनिवार, फ़रवरी 13, 2010

और पड़ो 'ठाकरों' के पीछे!

लो, हो गया जिसका डर था...पुणे में आतंकियों ने 10 की जान ले ली, सुबह तक जाने ये तादाद और कितनी बढ़ेगी...

कहां तो वेलेंटाइन डे पर कुछ नरम सी पंक्तियां लिखने के लिए कंप्यूटर खोला था...लेकिन उससे पहले टीवी पर लगातार ब्लास्ट की खबर...

और पड़ो ठाकरों के पीछे, और बनाओ मुद्दा उस बात को जो है नहीं, दहशत के सौदागर इसी फिराक में रहते हैं, कब लोहा गर्म हुआ कि चोट किया जाए...

क्या हासिल हुआ ठाकरे को चमका कर. सबको पता था, ठाकरे के दो चार दस गुंडे कुछ नहीं बिगाड़ेंगे खान का, कहीं कुछ तोड़ फोड़ करते तो सरकार निपट लेती, 50 साल से निपट ही रही थी, आज उसकी बात को तनिक भी हवा नहीं देनी थी- क्या कह रहा है, क्या धमकी दे रहा है, किस गंदी जुबान में बात कर रहा है...

ऐसा कहकर बोलकर, गरिया कर, हफ्ते भर तक मीडिया को हाईजैक किए रखा. जैसे पहली बार कोई नफरत भरी फुंफकार मारी हो, ले दे कर पीछे पड़े गए...हर खबर को भुलाकर. और सब मुद्दे तो छोड़ो न, महंगाई और मंदी तो सियासत का एक हिस्सा है, इस पर हर खबर की अपनी राय है, सख्त तेवर किसी के भी नहीं, जैसे सब सरकार के चट्टे बट्टे हैं, लेकिन देश की सुरक्षा...उसका जायजा...सबकुछ ठाकरे की जुबान पर कुरबान कर दिया गया. कभी सोचा किसी ने इस एक हफ्ते में कि...

सरकार क्या कर रही है
खुफिया एजेंसियां क्या कर रही है
सिक्योरिटी फोर्सेज की तैयारी कितनी है
सिक्योरिटी स्ट्रैटजी कैसी है देश की
निगरानी किस तरह और कितनी हो रही है
खुफिया इनपुट्स की एनालिसिस किस तरह हो रही है
केन्द्र और राज्य का को-ऑर्डिनेशन कैसा है

दूर दूर तक कहीं कोई खबर नहीं. मीडिया अपने को पहरेदार कहता है, तो इन सवालों को पहरा कौन देगा, कौन इनके उत्तर के लिए गन माइक और कैमरा भांजेगा...कौन इन सवाल के प्रहार से सरकार के पिछवाड़े पर बेंत मारेगा..?

ये ठाकरे में क्या रखा है, वो तो न कुछ करेंगे, न करने देंगे. मुंबई हमले में देखा नहीं था- सड़क पर न ठाकरों का पता था न 'सेना' का...सब दुम दबाए बैठे थे,कहां के राष्ट्रभक्त हैं, इनके रहने न रहने, कहने न कहने से कोई फर्क पड़ेगा?

इन्हें मुंह मत लगाना आइन्दे से भैया, नहीं तो लगाओ,तो डंडा करने के बाद ही छोड़ो, कि आगे एक शब्द लिखने से पहले सौ बार सोचें, वर्ना कुछ करो ही मत. वर्ना तुम्हारा मुद्दा चुनने का सेंस ही खत्म हो जाएगा. ऐसे ही धमाके होते रहेंगे, और तुम लंबे लंबे विजुअल चलाते रहोगे, एक स्कीन पर कई विंडो बना कर.

अब मत पड़ना ठाकरे के पीछे, भाव ही मत देना, नहीं तो ये ठाकरे देश को अपने नफरत से रसातल में भेज देगा. तुम्हारे कैमरे का इस्तेमाल कर तुमपर ही निशाना साधेगा और...

आप कल्पना भी नहीं कर सकते है- भोजपुरी में कहावत है- कुक्कुर के पल्ले पड़ने पर हमेशा खाई में ही ले जाएगा, वही ठाकरे करेगा. कभी मजहब की खाई, कभी आतंक की...

1 टिप्पणी:

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

मीडिया की माया अपरम्पार है। बैठे ठाले किसी भी चोर उच्चके,बेईमान,लम्पट,देशद्रोही को हीरो बनाना तो इसका बाएं हाथ का खेल है...ठाकरे जैसों को तो इनकी चरणवन्दना करनी चाहिए कि आज वो लोग जिस मुकाम(?) पर हैं वो सब इसी मीडिया का पुण्य प्रताप है।