शनिवार, फ़रवरी 27, 2010

कान पकड़िए, 'बाबा' के भक्त नहीं बनेंगे



मुंह में राम
बगल में बाला

साधु के चोले
में देह का दलाल
 
साधना साईं की
संपर्क सोनू पंजाबण से
 
साधना की आड़ में
जिस्म का सौदागर
 
आश्रम को बनाया
अय्याशी का अड्डा
 
ये है दिल्ली के
सेक्स रैकेट का स्वामी


दिल्ली के खानपुर के हैं बाबा. साईं बाबा के नाम पर मंदिर और आश्रम खोल रखा था. बाबा साधना तो करते थे साईं की, लेकिन संपर्क थे सोनू पंजाबण से (इंटर स्टेट सेक्स रैकेट की सरदार) ताना बाना बुन रखा था 500 लड़कियों के नेटवर्क का, जिन्हे बनारस से बॉम्बे, बैंगलुरू से कोलकाता तक के हाई सोसाइटी में सप्लाई करता था बाबा...

ये तो बाबा के कर्म है, अब पढ़िए बाबा की एबीसी. बाबा चित्रकूट से हैं, तुलसीदास की नगरी से. 1995 में दिल्ली आए थे काम करने, शुरु किया एक फाइव स्टार में सिक्योरिटी कार्ड की नौकरी से, लेकिन जल्दी ही असली 'काम' शुरु कर दिया. लाजपत नगर के एक पार्लर में लग गए लेकिन 1997 में छापा पड़ा तो पकड़े गए, जिस्मफरोशी कराने के आरोप में कई महीने जेल रहे. जेल में दाढ़ी बाल बढ़ गए, लुक साधु वाला हो गया, तो फिर इसे ही बेचना शुरु कर दिया. बन गए साईं बाबा के भक्त और शुरु कर दिए प्रवचन. कुछ ही साल में मंदिर और आश्रम बनवा लिए.

अब देखिए बाबा की पैठ. नॉर्थ एवेन्यू तक पहुंच गए थे बाबा के तार. 2008 में रुतबा इतना हो गया था कि सांसदों की नगरी में साईं भजन संध्या करवा दिये जहां बीजेपी नेता वी के मलहोत्रा से लेकर कीर्ति आजाद सरीखी हस्तियां शामिल हुईं. चित्रकूट के में हुए कार्यक्रम में यूपी के कई मंत्री और सांसद शामिल हुए. बाबा के धरे जाने के बाद अब सब कह रहे हैं, उन्हें बाबा के करतूतों का पता नहीं था. उनके साथ सैकड़ों लोगों को बाबा ने धोखा दिया, उनकी साईं श्रद्धा का फायदा उठाया. लेकिन जब बाबा का मुंह खुलेगा, तो कितने चेहरे लाल होंगे ये कहना अभी मुश्किल है

सवाल है कि आप बाबाओं के फेर में पड़ते क्यों हैं, अगर आप साईं के भक्त हैं, राम के भक्त हैं, और किसी फ्लाने-चिलाने के भक्त हैं तो आपको बाबाओं का जरिया क्यों चाहिए? आप नहीं जानते आपकी श्रद्दा की वजह से इन बाबाओं की ठेकेदारी कितनी बड़ी हो जाती है, कान पकड़िए, किसी बाबा के भक्त नहीं बनेंगे आप...

बुधवार, फ़रवरी 24, 2010

मंदी में महंगाई के मारे

किस पर्सन में कहें- मंदी में महंगाई के ‘मारों’ की व्यथा. राह चलते एक के बाद एक मिलते जाते हैं, ‘मारे’ एक हों तो न, यूं कहें कि घर से दफ्तर तक पूरा रास्ता मंदी में महंगाई के मारों से भरा पड़ा है. इसलिए इन पर तो एक सीरीज बनती है. क्योंकि ये ‘मारे’ भी अजीब है, जो जितना ‘मारा’ है वो उतने की भरपाई में जुटा हुआ है. किसी को अंदाजा तक नहीं, कि इस मारा-मारी में ‘मार’ सब पर दुगनी पड़ रही है.

शुरुआत करते हैं, सोसायटी मार्केट में कोने पर रेवड़ी की ठेली लगाने वाले से. मेवाड़ आइसक्रीम की ठेली से आप सभी परिचित होंगे- देसी आइसक्रीम के साथ बादाम मिल्क शेक परोसते हैं- फरवरी मार्च में आते हैं राजस्थान के दूर दराज के गांवों से और दीवाली तक वापस चले जाते हैं...

कल अचानक दिख गई थी उसकी ठेली. मार्केट के उसी कोने पर, जहां पिछले साल लगी थी. उसे देखकर अचानक ठिठका. अरे, ये तो गंगा है, ये आ गया मतलब मार्च आ गया. पिछली दीवाली पर तो यही कह कर गया था. वक्त से हफ्ता डेढ़ हफ्ता पहले आ गया, अरे हां, आखिर फरवरी भी तो खत्म ही होने वाली है...

उसे देखकर मैं मुस्कराया, उसने भी दूर से देखते सलाम किया. मैं भी दुकान पर चला गया. पिछले 2 साल से जान पहचान है. एक तरह की आत्मीयता हो गई है. 17-18 साल का लड़का है. शादी ब्याह नहीं हुआ, शहर में पिछले दो साल से आना जाना है. जितने दिन रहता है सौ-दो सौ कमा लेता है, इसी के लिए इतनी दूर से आता है, अब फरवरी में आया है, तो सीधे दीवाली पर ही जाएगा. बीच में जितनी गर्मी पड़ेगी, मेवाड़ की मलाई उतनी ही बिकेगी....

हाल चाल की बात होने के बाद उसने एक ग्लास भर बादाम शेक आगे बढ़ाया-
सर ये लो, मौसम का पहला ग्लास...
मैंने भी ये परवाह किए बिना कि जुकाम में इतना ढंडा शेक नुकसान करेगा, चम्मच से धीरे धीरे चाटना शुर कर दिया.
सोंधे दूध और देसी हाथ से बना ये शेक, कहना नहीं होगा स्वादिष्ट लगता है. कुछ देर के लिए आदमी डॉक्टरों की नसीहत भूल जाता है- ठेली वाले पानी बढ़िया यूज नहीं करते, दूध में भी मिलावट होती है, चीनी भी तीसरे चौथे दर्जे की होती है, हाईजीन के दूसरे स्टैंडर्ड भी फॉलो नहीं करते ठेली वाले, इसलिए, यहां फटकना लेकिन बीमारी, खासकर ‘इंफ्केशस डिजीज’ को दावत देना है. लेकिन ठेली वाले से इतनी आत्मीयता है कि पास जाने पर इन चीजों का ख्याल नहीं रहता.

मैंने ग्लास खाली कर दस का नोट आगे किया, जैसा कि पिछले साल करता था. इस बार उसने पैसे तो लिए, लेकिन ये कहते हुए-
सर, पांच रुपये और. इस साल 15 का रेट हो गया है.

पांच रुपये का झटका अचानक लगा. हालांकि जल्द ही ये समझ गया कि दूध और चीनी के दाम बढ़े हैं, कीमत तो ज्यादा नहीं बढ़ाई. रहन सहन और खान पान के दूसरे खर्चे भी तो बढ़ गए हैं. ग्लास पर पांच रुपये कुछ ज्यादा नहीं...जिनको पीना होगा मेवाड़ मिल्क शेक, वो पंद्रह देंगे...

वैसे देखा जाए, तो एक चीज पर एक साल में 50 परसेंट का चूना ज्यादा होता है. आदमी झेल तो लेता है, लेकिन कहीं न कहीं उसे एडजस्ट करने की सोचता है. उसकी ठेली पर से लौटते हुए मेरे भी मन में भी पांच रुपये की कचोट सी उठी-
मन में डॉक्टर की दबी हुई नसीहतें याद आने लगी.हाईजीन के सवाल प्रचंड होने लगे.

‘यार इससे बढ़िया तो वो प्रो-बायोटिक मिल्क है. हाइजीनिक भी और प्योर भी. औऱ सबसे बड़ी बात आज भी बजट में है- पिछले साल भी दस में आती थी इस साल भी. ये और बात है मल्टीनेशनल कंपनी ने दाम बढ़ाने की जगह दस मिलीलीटर मात्रा कम कर दी है, लेकिन छंटाक भर कम से क्या फर्क पड़ता है. पांच का सिक्का तो बचता है.‘

अगले दिन शाम को मैं फिर मार्केट की तरफ गया, उसकी रेड़ी की तरफ से भी गुजरा, लेकिन मेवाड़ मिल्क शेक की तलब जाने क्यों नहीं थी. उसने दुआ सलाम भी की, लेकिन मैं दूर से ही निकल गया. शॉपिंग के बाद जब गले में तराश का एहसास हुआ, तो मुझे उसकी ठेली याद आई, लेकिन तब तक मेरे कदम प्रो-बायोटिक मिल्क खरीदने के लिए बढ़ चुके थे.

10 रुपये में दो घूंट की शीशी लिए मैं वापस लौट रहा था. उसने मुझे आते हुए देखा लेकिन तब तक मैं शीशी खाली कर चुका था, और नजरे चुराते हुए घर को लौट रहा था.

मेरी जेब में पांच रुपये ज्यादा बजे थे, लेकिन मैं सोच रहा था अगर सब ऐसे ही सोचने लगे, तो इस मेवाड़ी ठेले वाले का क्या होगा? क्या ये भी ग्लास छोटा कर दाम दस रुपये कर लेगा, या धंधा मंदा होने पर अगले साल से आना बंद कर देगा?

सोमवार, फ़रवरी 22, 2010

मेरी जानिब मैं



मै किसी भी जानिब चलता
इस रफ्तार से इतनी ही मंजिल पाता
चुना था दिल से दिल्ली तक भटकना
जैसी भी हो, यही थी उस लम्हे की खता

एक हाथ आता, तो दूसरा बिखरता
एक बिखरता तो दूसरा संभलता
जब भी मुड़कर देखा किसी पड़ाव से
पीछे छुट रहे क्षितिज पर ये साफ दिखा
लेकिन बढ़ता रहा, चलता रहा है
माया में, कि मृगतृष्णा में नहीं कह सकता

मैं इसी जानिब आता
इस रास्ते तो हाथ में यही शहर आता

भाड़े पर खरीदा आशियाना,
और लिया किराये का आसमान
बेच दी हाथ की दस अंगुलिया
गिरवी रख दिए सारे अरमान

बिकता रहा वक्त भी मेरे साथ
कहने को मैं वक्त के साथ चलता रहा

मैं यही निरंतर चाहता
वो सब ले जाता, बस मेरी निशानी छोड़ जाता

बुधवार, फ़रवरी 17, 2010

रूह से रू-ब-रू एक हिंसक सवाल




हिंसा क्या है…
कई बार पूछ बैठता हूं
खून की दौड़ान से फड़कती नसों से


शब्दों से लेकर चित्रों तक
रक्तरंजित परिवेश में
एक निहायत ही हिंसक युग में
कई बार भूल जाता हूं
पिछली बार नसों ने क्या कहा था
अपने मौन बयान में

लेकिन बार बार जानना चाहता हूं

क्या हिंसा का मतलब सिर्फ ये है
कि देह की परिधि में
नसों, धमनियों के रास्ते
रूह की परिक्रमा करने वाला लहू
चमड़ी का दरवाजा तोड़ते हुए
सड़क पर बिखर जाए?


इसे क्या कहेंगे आप?
जब किसी चाहत पर
चुनी हुई चुप्पी का मुलम्मा चढ जाए
आपके सामने खून बहे
और आप आह तक न करें?


क्या कहना चाहेंगे आप?
जब देह की आयतों में
रूह के लिए कोई जगह न बचे
आप आत्मा को आसमान में छोड़ दें
और खुद साउंडप्रूफ बेडरुम में सो जाएं?


क्या आप इसे अहिंसा कहेंगे?
जब कोई अमन के ख्वाब को
चमड़ी के रंग से नापने लगे
कोई लाख फिकरे कसता रहे
आप ये मान के चलें,
अभी आवाज उठाने का वक्त नहीं!


क्या ये अहिंसा है?
जब आप अपनी डिमांड को राइट कहें
और दूसरे की मांग को
बूट से कुचल देने वाली क्रांति समझें?


मैं दिगभ्रमित,
आज जो खड़ा हुआ देह के दरवाजे पर
नसों ने मेरा स्वागत चीख से किया
खून भरी आंखों की कर्णभेदी चीखों से
दहशत से भरी मेरी आंखों में
आंख डाल कर चीखने लगी मेरी नसें-
हिंसा...
खून से सनी एक कुंठा है
छींटे तो इसके कुछ इसी तरह पड़ते हैं...
किसकी गरदन, किसकी देह, किसकी रूह
ये जाने बिना किसी के ऊपर पड़ जाते हैं
छींटे,
इंसानी शक्ल के जानवर के अंदर
लगातार लाल हो रहे शैतानी देह के


हिंसा...
बारूद के ढेर पर बलखाती कोई नचनिया है
लाल जोड़े में सजी एक खिलंदड़ी
रुपये लुटाने वालों के हर इशारे पर
अपनी मस्ती में चूर होती जुनूनजादी
हरामजादी,
पैरों तले माटी के मुलायम रोड़े रौंदती जाती है
लेकिन कभी गिनती नहीं करती
कितने रोड़ों को धूल में तब्दील कर दिया


हिंसा खून की दौड़ान का थम जाना है
हिंसा जीव के अंदर से रूह का रुखसत हो जाना
तुम्हारे पास कोई और परिभाषा है
तो बताओ?

शनिवार, फ़रवरी 13, 2010

और पड़ो 'ठाकरों' के पीछे!

लो, हो गया जिसका डर था...पुणे में आतंकियों ने 10 की जान ले ली, सुबह तक जाने ये तादाद और कितनी बढ़ेगी...

कहां तो वेलेंटाइन डे पर कुछ नरम सी पंक्तियां लिखने के लिए कंप्यूटर खोला था...लेकिन उससे पहले टीवी पर लगातार ब्लास्ट की खबर...

और पड़ो ठाकरों के पीछे, और बनाओ मुद्दा उस बात को जो है नहीं, दहशत के सौदागर इसी फिराक में रहते हैं, कब लोहा गर्म हुआ कि चोट किया जाए...

क्या हासिल हुआ ठाकरे को चमका कर. सबको पता था, ठाकरे के दो चार दस गुंडे कुछ नहीं बिगाड़ेंगे खान का, कहीं कुछ तोड़ फोड़ करते तो सरकार निपट लेती, 50 साल से निपट ही रही थी, आज उसकी बात को तनिक भी हवा नहीं देनी थी- क्या कह रहा है, क्या धमकी दे रहा है, किस गंदी जुबान में बात कर रहा है...

ऐसा कहकर बोलकर, गरिया कर, हफ्ते भर तक मीडिया को हाईजैक किए रखा. जैसे पहली बार कोई नफरत भरी फुंफकार मारी हो, ले दे कर पीछे पड़े गए...हर खबर को भुलाकर. और सब मुद्दे तो छोड़ो न, महंगाई और मंदी तो सियासत का एक हिस्सा है, इस पर हर खबर की अपनी राय है, सख्त तेवर किसी के भी नहीं, जैसे सब सरकार के चट्टे बट्टे हैं, लेकिन देश की सुरक्षा...उसका जायजा...सबकुछ ठाकरे की जुबान पर कुरबान कर दिया गया. कभी सोचा किसी ने इस एक हफ्ते में कि...

सरकार क्या कर रही है
खुफिया एजेंसियां क्या कर रही है
सिक्योरिटी फोर्सेज की तैयारी कितनी है
सिक्योरिटी स्ट्रैटजी कैसी है देश की
निगरानी किस तरह और कितनी हो रही है
खुफिया इनपुट्स की एनालिसिस किस तरह हो रही है
केन्द्र और राज्य का को-ऑर्डिनेशन कैसा है

दूर दूर तक कहीं कोई खबर नहीं. मीडिया अपने को पहरेदार कहता है, तो इन सवालों को पहरा कौन देगा, कौन इनके उत्तर के लिए गन माइक और कैमरा भांजेगा...कौन इन सवाल के प्रहार से सरकार के पिछवाड़े पर बेंत मारेगा..?

ये ठाकरे में क्या रखा है, वो तो न कुछ करेंगे, न करने देंगे. मुंबई हमले में देखा नहीं था- सड़क पर न ठाकरों का पता था न 'सेना' का...सब दुम दबाए बैठे थे,कहां के राष्ट्रभक्त हैं, इनके रहने न रहने, कहने न कहने से कोई फर्क पड़ेगा?

इन्हें मुंह मत लगाना आइन्दे से भैया, नहीं तो लगाओ,तो डंडा करने के बाद ही छोड़ो, कि आगे एक शब्द लिखने से पहले सौ बार सोचें, वर्ना कुछ करो ही मत. वर्ना तुम्हारा मुद्दा चुनने का सेंस ही खत्म हो जाएगा. ऐसे ही धमाके होते रहेंगे, और तुम लंबे लंबे विजुअल चलाते रहोगे, एक स्कीन पर कई विंडो बना कर.

अब मत पड़ना ठाकरे के पीछे, भाव ही मत देना, नहीं तो ये ठाकरे देश को अपने नफरत से रसातल में भेज देगा. तुम्हारे कैमरे का इस्तेमाल कर तुमपर ही निशाना साधेगा और...

आप कल्पना भी नहीं कर सकते है- भोजपुरी में कहावत है- कुक्कुर के पल्ले पड़ने पर हमेशा खाई में ही ले जाएगा, वही ठाकरे करेगा. कभी मजहब की खाई, कभी आतंक की...

गुरुवार, फ़रवरी 11, 2010

ठाकरेगर्दी- गुंडों की डिक्शनरी में नया शब्द



खत्म कर दो ठाकरे की ठसक
ठाकरे को ठोक दो
ठाकरे को ठेल दो जेल में
नही चलेगी ये ठाकरेगर्दी

टीवी पर एक से बढ़कर एक स्लग देखने को मिल रहे है (इनमें से कुछ मैने भी बनाए हैं) लेकिन कोई असर पड़ रहा है क्या?

पूरे कुनबे ने मीडिया को हाईजैक कर लिया है. एक के बाद एक बुलेटिन एक के बाद एक स्पेशल सब ठाकरे को समर्पित...

जितनी गाली गलौच 'सामना' के गुंडे करते हैं, उससे 'भारी भरकम शब्द'(थोड़ी सभ्य भाषा में) टीवी पर सुनाई दे रहे हैं. लेकिन 'मातोश्री'के बाशिंदो को कोई फर्क नहीं पड़ रहा. जैसे मंद मंद मुस्करा रहे हो- दे लो बेटा, दे लो, ये तो हमारा पचासो साल पुराना खेल है, जितना खेलोगे हमारे तो उतने ही मजे हैं- दो जी भर के, निकाल लो अपनी भड़ास...हमारी तो फितरत है, न कुछ करेंगे, न कुछ करने देंगे...

'ठाकरेगर्दी' मातोश्री के इसी पचास साल के खेल की उपलब्धि है- यूं कहें की सबसे बड़ी उपलब्धि. इससे पहले क्या क्या नहीं किया ठाकरे घराने ने- पिच खोदने से लेकर उत्तर भारतीयों को भगाने का बीड़ा उठाने तक, लेकिन ऐसा धांसू विशेषण कभी नहीं मिला-जो 'खान' की खिलाफत में मिला. मातोश्री में तो जश्न है इस उपलब्धि पर...

आखिर करना क्या होता है. जितनी रात को मैं ठाकरेगर्दी की व्याख्या कर रहा हूं, उतनी रात को रोज एक पेज लिखना होता है- कुछ नए स्लग्स और हेडर के साथ. फिर सुबह अपने आप ही हंगामा मच जाता है. विजुअल न होते हुए भी कुछ सड़े हुए शब्द छांटकर टीवी वाले शुरु हो जाते हैं. ठाकरे ने ये कह दिया, ठाकरे ने वो कह दिया...अरे यार, आफत हो गई.

इससे तो बड़ी आफत तब, जब कोई प्रोड्यूसर कोई शब्द या एंगिल मिस करे, फिर तो संपादक महोदय जैसे खा जाएंगे- जाहिल कहीं के, जिस शब्द से टीआरपी मिलेगी, वही मिस कर गए- कैसे पापी प्रोड्यूसर हो, टीआरपी को पैदा होने से पहले ही गला घोंट देते हो...

और ये बात जैसे ठाकरे अपने चेंबर में बैठकर सुन रहे होते हैं, अगली सुबह रोज नया जुमला मारते हैं, और बेचारा प्रोड्यूसर...

खैर, यहां प्रोड्यूसर का दर्द कोई मायने नहीं रखता, पत्रकारिता की नौकरी में ये तो बहुत छोटा सा दर्द है, बड़ा दर्द ये है कि चाहते हुए भी कोई शब्द सार्थक नहीं बन पड़ता. न बहस सार्थक न असर सार्थक. जितना दिखाया, उतना ही मामला बिगड़ता गया, जितना ठोका, उतना ही हौसला बढ़ता गया. न 'खान' की मुसीबत कम हुई, न सरकार पर कार्रवाई का दवाब बढ़ा, जो जैसा था, वैसा ही रहा. ले दे कर कई चैनलों की टीआरपी जरूर बढ़ी, लेकिन उसका क्या अचार डालेगा प्रोड्सूयर?

कहते हैं पत्रकारों में अब वो बात नहीं, ठोकने की वो ताकत नहीं, वो जोश नहीं, वो होश नहीं...कहां से रहेगा भैया. कई दिन की माथापच्ची के बाद मिलता क्या है- गुंडागर्दी का एक पर्याय- ठाकरेगर्दी. अब इसे ही गोद में लेकर हिला रहे हैं, जैसे अपना पैदा किया हुआ खेलाते हैं- एक गुंड किस्म की औलाद ठाकरेगर्दी...

हाय रे बदकिस्मती! कम से कम कान में ही फुसफुसा दे- तू किसकी पैदा की हुई है बदजात!

मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

एक गुजरा हुआ, एक जूठा सा लम्हा...



उस दिन मुट्ठी में
जैसे आसमान भर लिया था

मारे रोमांच के उस फरवरी की
खुश्क ढंडक में ऐसे सिहर गया था देह
जैसे गोल घूमती दुनिया
मुझे भी अपने साथ नचा गई हो.

अल्लाह के करम जैसे वो होंठ
मुझ बंजारे पर रहमतों की बारिश कर रहे थे

मेरे कदम जमीं पर नहीं पड़ रहे थे
दो देह आंखों ही जुबान में एक हो रहे थे
गजब ये कि दोनों अपनी जगह से विस्तार ले रहे थे

सामने अपनी छवि की एक और देह पड़ी थी
जैसे एक छवि की दो काया बन गई हो

गजब था वो रोमांच-
होने और न बचने की निश्चितता के बीच
देह के उस दोहरापन का

दो देहों के बीच
सिमटती हुई-पिसती हुई
मोटी भैंस जितनी गोरी- वो काली मनहूस दूरी
और देह की हद तोड़कर
रूह तक समा जाने का वो जोश जोश

गजब की थी
वो 9 फरवरी,
जब एक लम्हे के लिए
आसमान मेरी मुट्ठी में सिमटने उतर आया था

वो आसमान
कई बार मेरे कमरे की छत से टपकता है
संगमरमर सी फर्श पर
गिर कर चकनाचूर हो जाता है
हर रोजृ कई बार

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

और भी कुछ कहता है ठाकरे का 'काला झंडा'


स्वागत में काले झंडे?
जिनकी करतूतें काली वो झंडे का रंग भी काला ही चुनते हैं। जरा सोचिए सन्यासियों के चोले पहनने वाले की फितरत इतनी काली क्यों है?

वैसे इस पर सोचने से कोई फायदा नहीं, क्योंकि काले में कितनी कालिख मिली हुई है, इसका पता लगाना तकनीकि रूप से मुमकिन नहीं. लेकिन ठाकरे का काला झंडा और भी बहुत कुछ कहता है, कोई और होता तो शिवसेना के गुंडे लाठियों और डंडों से स्वागत करते, लेकिन ये राहुल हैं...राहुल से आगे झंडे से ज्यादा की औकात नहीं शिवसेना के नकली शेरों की...

इसी से अंदाजा लगाइए, शिवसेना की मुंबई में औकात और मौके के हिसाब से राजनीति करने की फितरत. बेचारा उद्धव, राहुल की मुंबई यात्रा की खबर सुनकर ही डर गया, बाप काला झंडा दिखाने की फरमान कर रहा था, तो बेटा कह रहा था- इस मौके पर राहुल को मुंबई आने की क्या जरूरत थी? (अब तुझ जैसे सनकियों से कोई पूछकर मुंबई जाएगा? या घुसने से पहले इजाजत लेनी पड़े या चुंगी देनी पड़े?) तुम्हारी जुबान में राहुल बोलते तो यही कहते- मुंबई तुम्हारे बाप की है क्या?

ठाकरे तो चाहते हैं, सारी दुनिया उन्ही की जुबान बोले, बात बात में अपनी जुबान गंदी करे. ये नफरत की गंदी सियासत है. उसी ढर्रे पर चल रहा है 'चाचे' का बागी 'भतीजा' लेकिन डर उसका भी कम नहीं, वो जानता है अपनी औकात, तभी तो आखिरी वक्त तक तय ही नहीं कर पाया, राहुए आएंगें, तमाम गिदड़भभकियों को धत्ता बताएंगे, तो कि किस रंग के झंडे में मुंह छिपाएंगे. जो भी है वो सिर्फ जुबानी धमकियों में ही है. कई मौकों पर जाहिर हो चुका है, सैनिक कहे जाने वाले ये गुंडे कायर हैं, और राहुल के आगे तो भींगी बिल्ली...

कम ऑन राहुल, गो ऑन...

गुरुवार, फ़रवरी 04, 2010

एक बयान बॉलीवुड के खिलाफ


देश से मुंबई को अलग करने की बात कर रहा है ठाकरे कुनबा...
शाहरुख खान को पाकिस्तान भेजने की बात कर रहा है ठाकरे परिवार...
शाहरुख का समर्थन करने वालों को धमका रहे हैं ठाकरे के गुण्डे
फिर भी, चुप है बॉलीवुड. आखिर क्यों? 

ब्लॉग और ट्विटर पर कुछ टिप्पणियों को छोड़ दें, तो बॉलीवुड ठाकरे की तमाम गुंडागर्दी के बाद भी पूरी तरह नहीं जागा ज्यादातर की जुबान अब भी सिली हुई है, जिनके बोलने से फर्क पड़ता, आखिर क्यों...
ठाकरे से क्यों डरता है बॉलीवुड?
ठाकरे के दर पर क्यों झुकता है बॉलीवुड?
ठाकरे के आगे कमजोर क्यों है बॉलीवुड?


वजह चाहे जो हो, बॉलीवुड की इसी कमजोरी का फायदा उठाता रहा है ठाकरे कुनबा.मातोश्री में बैठकर बॉलीवुड के लिए फतवे जारी करना बाल ठाकरे का कोई नया शगल नहीं. अब तो ऐसा करने के लिए एक और ठाकरे पैदा हो गया, जो अपने चाचा की तर्ज पर ब़ॉलीवुड को डराता है, धमकाता है, अपनी बात मनवाता है, और यहां तक कि माफी भी मंगवाता है  

राज ठाकरे से माफी मांग कर करण जौहर नो तो हद कर दी थी. मामला था उनकी फिल्म वेक अप सिड में मुंबई की जगह बंबई शब्द के इस्तेमाल का, जिस पर भड़क गए राज ठाकरे. इस बयान पर पूरा देश, पूरी मीडिया करन जौहर के साथ था, लेकिन  करण को ज्यादा परवाह थी राज ठाकर के गुस्से की...और वो पहुंच गए राज ठाकरे से माफी मांगने...
 
ये वही करण जौहर है, जिनके प्रोडक्शन की फिल्म माइ नेम इज खान ठाकरे कुनबे के गुस्से का खामियाजा भुगत रही है, लेकिन करण के मुंह से बोल तक नहीं फुट रहे. शाहरुख तो लाख बवाल मचने के बाद भी अपने बयान पर डटे रहे, लेकिन लगता है करण जौहर की हिम्मत एक बयान भर की भी नहीं
 
लेकिन बात सिर्फ करन जौहर या फिर शाहरुख की नहीं, मसला देशहित का है, जिस पर बॉलीवुड फिल्में तो बड़ी बड़ी बनाता है, बातें भी बड़ी बड़ी करता है, लेकिन ठाकरे की गुंडागर्दी के  सामने नतमस्तक है, वो भी तब, जब इस गुंडागर्दी मार सीधे फिल्म इंडस्ट्री पर पड़ रही है.

दूसरों की कौन कहे, मिलेनियम स्टार कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन परिवार समेत मातोश्री में मत्था टेकने को तैयार हैं. बाल ठाकरे ने अमिताभ की हालिया रिलीज फिल्म रण की तारीफ क्या कर दी, बिग बी ठाकरे के लिए रण का स्पेशल शो आयोजित करने की तैयारी में हैं. ठीक उसी तरह जैसे पा को गुजरात में टैक्स फ्री करने के प्रस्ताव पर दंगे से दागदार गुजरात के ब्रैंड अंब्सेडर बनने के लिए तैयार हो गए बिग बी. अमिताभ की पत्नी भी बाल ठाकरे की मुरीद हैं. राज ठाकरे ने जब बच्चन परिवार का जीना मुहाल कर दिया, तब जया ने कहा था- मैं तो सिर्फ एक ठाकरे को जानती हूं- वो है बाल ठाकरे.अब क्या बच्चन परिवार बताएगा, कि राज ठाकरे और बाल ठाकरे में क्या फर्क है? शाहरुख पर तो तो दोनों की एकमुश्त मार पड़ रही है?

ठाकरे का वार दिलीप कुमार जैसे स्टार भी झेल चुके हैं. दिलीप कुमार ने पाक के सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान कबूल करने की बात क्या कही, ठाकरे को मौका मिल  गया अपनी राजनीति चमकाने का. दिलीप कुमार से पुरानी दोस्ती को भूलाकर बाल ठाकरे ने उन्हें देश का दुश्मन करार दे दिया था..
 
आज वही, शाहरुख हैं के साथ हो रहा है, कल कोई और भी हो सकता है...वो संजय दत्त भी हो सकते हैं, जो कई बार ठाकरे को आदर्श बता चुके हैं. वो सलमान खान भी हो सकते हैं, जो ठाकरे परिवार के करीबी कहे जाते हैं. लेकिन शाहरुख पर इतना कुछ गुजरने के बाद भी दोनों खुल कर समने नहीं आ रहे.
 
इस मामले पर आमिर ने अपनी राय जरूर जाहिर किया, आमिर ने शाहरुख के बयान को जायज ठहराया, लेकिन आमिर पर भी भड़क गए ठाकरे, तो क्या इसी अंजाम से डरते हैं दूसरे सितारे, ठाकरे का गुस्सा मोल लेना नहीं चाहता बॉलीवुड? आखिर क्यों, क्या मुंबई में ठाकरे का राज चलता है।