गुरुवार, जनवरी 28, 2010

इतना गहरा गीत...



ये गीत नहीं इबादत है इश्क की, और ये वही कर सकता है, जो इसे महसूस करता है. ये सिर्फ अलफाज नहीं, जीते जागते अहसास हैं, जो गुलजार साहब ने एक फिल्मी गीत में उड़ेल दिया है...

ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं
दांत से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र कब की बरस के सफेद हो गई
कारी बदरी जवानी की छटती नहीं
मन लगे धड़कन बढ़ने लगी है
चेहरे की रंगत उड़ने लगी है

डर लगता है तन्हा सोने में जी
दिल तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी.....

आशिक का हाल ये नया नहीं हैं, लेकिन गुलजार साहब के अलफाजों ने इसे आज के दौर में नई गहराई दी है. डर को इश्क की गहराई बना दी है अलफाजों ने. और आशिक का बचपना...जरा दूसरा अंतरा देखिए

किसको पता था पहलू में रखा
दिल ऐसा पाजी भी होगा
हम तो हमेशा समझते थे कोई
हम जैसा हाजी ही होगा
हाय जोर करें
कितना शोर करें
बेवाज़ा बातें पे ऐंवे गौर करें
दिल सा कोई कमीना नहीं
कोई तो रोके कोई तो टोके
इस उम्र में अब खाओगे धोखे

डर लगता है इश्क करने में जी
दिल तो बच्चा है जी...

सोचिए जी सोचिए, गुलजार साहब कुछ कह रहे हैं, इस उम्र में भी इश्क का सलीका सीखा रहे हैं. लेकिन इस जमाने में जब प्यार को सौदे की तरह ट्रीट किया जा रहा है. टीवी पर 'इमोशनल अत्याचार' का स्टिंग हो रहा है, प्यार का ये एहसास अपनी ठसक के साथ हाजिर होता है.

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