गुरुवार, जनवरी 28, 2010

इतना गहरा गीत...



ये गीत नहीं इबादत है इश्क की, और ये वही कर सकता है, जो इसे महसूस करता है. ये सिर्फ अलफाज नहीं, जीते जागते अहसास हैं, जो गुलजार साहब ने एक फिल्मी गीत में उड़ेल दिया है...

ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं
दांत से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र कब की बरस के सफेद हो गई
कारी बदरी जवानी की छटती नहीं
मन लगे धड़कन बढ़ने लगी है
चेहरे की रंगत उड़ने लगी है

डर लगता है तन्हा सोने में जी
दिल तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी.....

आशिक का हाल ये नया नहीं हैं, लेकिन गुलजार साहब के अलफाजों ने इसे आज के दौर में नई गहराई दी है. डर को इश्क की गहराई बना दी है अलफाजों ने. और आशिक का बचपना...जरा दूसरा अंतरा देखिए

किसको पता था पहलू में रखा
दिल ऐसा पाजी भी होगा
हम तो हमेशा समझते थे कोई
हम जैसा हाजी ही होगा
हाय जोर करें
कितना शोर करें
बेवाज़ा बातें पे ऐंवे गौर करें
दिल सा कोई कमीना नहीं
कोई तो रोके कोई तो टोके
इस उम्र में अब खाओगे धोखे

डर लगता है इश्क करने में जी
दिल तो बच्चा है जी...

सोचिए जी सोचिए, गुलजार साहब कुछ कह रहे हैं, इस उम्र में भी इश्क का सलीका सीखा रहे हैं. लेकिन इस जमाने में जब प्यार को सौदे की तरह ट्रीट किया जा रहा है. टीवी पर 'इमोशनल अत्याचार' का स्टिंग हो रहा है, प्यार का ये एहसास अपनी ठसक के साथ हाजिर होता है.

शुक्रवार, जनवरी 22, 2010

ये मेरे दद्दा का आपीएल है



वीर की तरह गरज रहे हैं फ्रेंजाइजी ओनर्स- ये मेरे दद्दा का आईपीएल पाकिस्तान को छोड़कर हर देश के खिलाड़ी के लिए है...
लेकिन पाक (खिलाड़ी और सरकार) को ये सुनाई ही नहीं दे रहा. सब सुनाई दे रहा है, लेकिन ये दद्दा वाला एंगिल नहीं दिख रहा जबकि टाइटिल से ही क्लीयर है, आईपीएल में चलेगी अपनी मर्जी.

लेकिन मर्जी पर बहस बड़ी हो चली है.
ये कैसी कैसी मर्जी
किसकी है ये मर्जी
ऐसी मनमर्जी क्यों?

ये मर्जी है शाहरुख खान की, प्रीति जिंटा की, शिल्पा शेट्टी की और विजय माल्या का. अब जरा कनेक्शन देखिए, आईपीएल का ये वो तबका है, जो मुंबई से ताल्लुक रखता है. वो मुंबई, जिसकी तारीख में आतंकियों ने 26/11 का काला अध्याय जोड़ दिया. जिस पाकिस्तानी की धरती से आए थे आतंकी, उस धरती के लालों को इसी का तो सिला मिल रहा है.

लेकिन पाक खिलाड़ियों को ये बात समझ नहीं आ रही. तने हुए रिश्तों में ये उम्मीद भी कैसे पाल रहे थे पाक खिलाड़ी- कि भारत के क्रिकेट बाजार में उनकी पहले जैसी ही बोली लगेगी. आईपीएल में नीलामी से पहले तक पाकिस्तान सबूत सबूत चिल्लाता रहा था. तब कहां गए थे ये खिलाड़ी- कि पड़ोसी और मित्र देश के साथ ऐसी अनदेखी ठीक नहीं.

कहने को तो बहुत पाकिस्तान में ये पॉपुलर हैं, लेकिन फिर सचिन, शाहरुख जैसी अपील क्यों नहीं करते- हम भाई भाई हैं. सरकार को भी भाइचारे का ख्याल रखना चाहिए. लेकिन जब इस तने हुए रिश्ते का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, तो सियासत का राग अलाप रहे हैं खिलाड़ी, क्रिकेट में सियासत मिलाया जा रहा है.

ये बिलकुल गलत है, दोनो देशों के बीच अमन की आशा में क्रिकेट एक अहम कड़ी है, और इसमें सियासत नहीं मिलाई जानी चाहिए, लेकिन जनमानस का क्या करें. जनता पाकिस्तान की वर्डकप में जीत का दुआ मांगती है, लेकिन हमले के बाद पाकिस्तान के दोमुंहेपन पर आह भी भरती है. ये ठीक है, कि अपने पाले हुए आतंक का सबसे बड़ा शिकार खुद पाकिस्तान भी है, लेकिन सारी दुनिया से सबूत मांगने के बाद भारत से बार बार सूबत की मांग करने का क्या तुक?

आखिर भारत से किस भाईचारे की उम्मीद रखते हैं पाक खिलाड़ी? उन्हें भी पता है भारतीय जनमानसा का, कि 26/11, खासकर इसके बाद पाक सरकार के टालमोटल के बाद कैसे एंटी-पाकिस्तान हो गया है. अगर आईपीएल के फ्रेंचाइजी भी ऐसा समझते हैं, तो बुरा क्या है? वैसे भी खिलाड़ी खरीदना उनका निजी मामला है. फिर इतनी हाय तौबा क्यों?

ऐसा तो कतई नहीं, कि आईपीएल में खेलने का मौका देने के बाद पाक सरकार सुधर जाती, या पाक में पॉपुलर ये खिलाड़ी संबंध बेहतर बनाने के लिए अपने देश में जनमत तैयार करते? अगर ऐसा नहीं, तो ये पूरी बहस ही बेकार है.

रविवार, जनवरी 17, 2010

ज्योति दा, जवाब भी तो देते जाते!


"तुम खाना खा रहे हो और तुम्हारी थाली पर कोई लात मार दे, तो क्या करोगे?
इस सवाल का जवाब ईमानदारी से दो, वामपंथ का मूलमंत्र तुम्हें समझ आ जाएगा"


19 साल बाद अचानक गूंज पड़े ज्योति दा के वो अलफाज, जो उन्होंने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था. वो कॉलेज के दिन थे, बीए में पढ़ते थे, जब ज्योति दा 1991 के चुनाव अभियान में बिहार आए थे.

उस दौर में गजब की थी उनके चेहरे पर चमक. बौद्धिकता उनके पूरे व्यक्तित्व से टपकती थी, उजले उजले बाल, सफेद धोती-कुर्ता, मटमैटले खादी की जैकेट और मोटे वाला चश्मा- भीड़ में अगर न भी पहचाते, तो कह देते- यही ज्योति दा हैं.

चुनावी सभा के दौरान उनसे मिलना हुआ था. तब बिहार में आईपीएफ का उदय हो रहा था, वामपंथी राजनीति हिंसा का रूप ले रही थी. ये बहस का बड़ा मुद्दा था. हिम्मत तो नहीं हो रही थी, लेकिन प्रश्न को बाल-सुलभ बना कर पूछ लिया था वामपंथी राजनीति का मतलब...

इस सवाल का जवाब जिस सरलता से ज्योति दा ने दिया, वो आज भी गूंजता है. 'बाजार के बीचों बीच' बस जाने के बाद ये सवाल और भी सालता है, और जवाब उतना ही बेचैन करता है...

सच कहें, तो पेट ने इस सवाल पर कभी सोचने का मौका ही नहीं दिया, और न कभी ज्योति दा से मिलना हुआ- बस अपनी 'थाली' बचाते रह गए...

वो एक रात की गर्दिश में इतना हार गया
लिबास पहने रहा और बदन उतार गया