गुरुवार, दिसंबर 23, 2010

लहसुन को भूल गए कार-ओ-बारी



बड़ी काबिले गौर बयान दी 'कारोबारी' बंधु ने. आगे का कोई मतलब समझने से पहले जरा कारोबार का कोट('') समझिए, ये प्याज का भंडारण करने वाले कारोबारी नहीं, कार में बार लगाने वाले हैं. अब भाई जान फिल्म सिटी के हों, या फिर किसी और 'मायानगरी' के बात बड़े पते की कह दी. दिल में चुभ कर अटक गई उनकी बात. अब निकाल रहा हूं, तो मीठी मीठी सी सिहरन हो रही है.

मौका बड़ा नहीं था, रोज की तरह रास्ते से सही सलामत ही जा रहे थे, टाइम तो 'दिव्य अवस्था' में जाने का हो ही गया था, अरे भाई, हफ्ते में एक दिन तो ये 'अवस्था' बनती ही है. तो बंधु जी उस शाम जरा जल्दी निपटा लिए 'प्रोग्राम'. फंडा साफ है, कार अपनी है तो 'बार' के लिए किसी और दुकान क्या फेरी लगाना. जब चाहो, जब गई महफिल. पेड़ के नीचे अंधेरे कोने में...वो एफएम से आ रही नीली पीली ससुरी किसी डिस्को की टिमटाम को हलकान करती है.

अब इससे ज्यादा महफिल की जिक्रा क्या करनी. समझदार के लिए आनंद का इशारा काफी होता है. कहानी में ट्विस्ट तो तब आया, जब कार में 'बार' समेत एक जेंटिल मैन मिल गए. बीच सड़क पर मैसेज देखते हुए, या कि एमएमएस देखते हुए. दीदार चाहे जिसका कर रहें हो, बीच सड़क पर सुध बुध खोए हुए हैं, कुछ ऐसे कि मोड़ पर कनफ्यूजन क्रियेट हो जाए, कि इनके दायें से पास करें, कि बाएं से. बंधु को गुस्सा तो इतना आया कि बीच में ही घुसेड़ दें...

लेकिन कार के बार में इतनी भी हिम्मत नहीं, कि इतना हिंसक बुला दे. जुबानी तीरबाज तो भाई साहब स्वभाव के है, कुछ दूर आगे तमाक से कार रोककर मुड़ गए पीछे और माथा पीट लिए-
कहने लगे-
भाई साहब,
इतनी अजूबी चीज, कितनी आसानी से समझा रहे हैं.
'समझदारों' की फिल्मसिटी जैसी जगह भी मुर्ख रहते हैं.
कहा तो हमें ज्याता है, कार में बार लगाए घूमते हैं.
यहां तो ये जनाब हमसे ज्यादा नशे में लगते हैं.

बंधु ने पूरा जुमला काढ़ दिया.मुखातिब हो गए मुझसे अपनी चिर परिचित व्यंग्यवाणी में-
-भाई जान, आज का दिन ही खराब है. चैनल पर दिन भर प्याज प्याज हो रहा है. रहा है मैंने लहसुन की याद क्या दिला दी, मेरी तो लेने पर उतर आए लोग.
- अरे, मियां, आपने क्या बात करती, लहसून खाता कौन है. लहसुन के बिना तो सबका काम चल जाए, बिना प्याज के आजकल क्या बनता है,
-लेकिन महोदय जी, लहसुन भी तो चालीस पचास से तीन सौ रुपये के पार पहुंच गया है. जरा इसका इनफ्लेशन परसेंटेज देखिए. अगर, प्याज के दाम तीस पैंतिस से सत्तर अस्सी हुआ तो पूरी सरकार सिर पर उठा ली, लहसुन के प्रति भी तो फर्ज बनता है.
बंधु बड़े दुखित स्वर में सुना रहे थे मुझे प्याज लहसुन से भेदभाव की पीड़ा. कहने लगे, मैंने तो जैसे गुस्ताखी कर दी थी भाई जान.मेरे जवाब से महोदय जी को जैसे लहसुन लग गया.
-मियां, लेकिन ये भी तो देखिए, लहसुन खाता कौन है भाई जी, जैन, ब्राम्हण जैसे कई बड़े पंथ हैं, जो लहसुन के नाम से तौबा तौबा करते हैं. इस शहर में जो बड़े खरीददार हैं, वो तो अमूमन छूते ही नहीं. यानी मार्केट का मालदार हिस्सा तो लहसुन से अछूती है. तो खपत कहां होती है. कुछ बोलने से पहले जरा इकनॉमी का भी ख्याल किया कीजिए...है कि नहीं.
-लेकिन महोदय जी, मनाही तो लहसुन के साथ प्याज की भी है. इस पैमाने से तो 'मेन मार्केट' में प्याज की भी खपत नहीं होनी चाहिए, यहां तो मारामारी मची है. और आपको पता है, ये किल्लत भी 'मेन मार्केट' के खिलाड़ियों की देन है. एक दिन में किलो पर 50 रुपये का मुनाफा तो यही बटोर रहे हैं. लेकिन हम चिला रहे हैं महंगाई महंगाई, जैसे, प्याज की लागत मूल्य बढ़ गई हो, दूसरी चीजों की महंगाई से तंग आकर किसानों ने ठान ली हो,कि हम भी अब महंगे बेचेंगे. उन्हें तो आज भी 10 बार रुपए ही एक किलो के मिलते होंगे. ये तो सर महंगाई नहीं, ये तो लूट है न.
-तो आपके कहने का मतलब, हम खबर चलानी छोड़ दे, सरकार को न घेरें. क्या कर रही है सरकार. यहां पब्लिक की इतनी मुश्किल है, कि सारा पूरे लंच डिनर का जायका खराब हो रहा है. और वो पवार है कि कह रहा है- तीन हफ्ते में हालत समान्य होगी.
-महदोय जी, मैं भी यही कह रहा हूं, ऐसी लूट नहीं मचनी चाहिए, सरकार को सख्ती करनी चाहिए. गोदाम भरने के खिलाफ कड़ी सजा के प्रावधान करनी चाहिए. मैं तो ये कह रहा हूं, ये सिर्फ प्याज के लिए ही क्यों, लहसुन के लिए क्यों नहीं. ये तो पांच गुनी महंगी हो गई है पिछले 1 महीने में.
-तौबा तौबा, आप फिर से लहसुन के पीछे पड़ गए. अब छोड़िए भी ज्यादा मत छीलिए, हाथ से बदबू आने लगेगी.
बंधु का दर्द अपने चरम पर बयां हो रहा था. लहसुन छिलने की बात पर सबके ठहाके छूट पड़े, महोदय जी के एक बैचमेट ने थोड़ी सी चुटकी ले ली...
-अरे भाई जान आपने भी तो हद कर दी, बाबा मना कर रहे हैं, और आप लहसुन की बात किए जा रहे हैं. जैसे चिढ़ा रहे हैं. बाबा लहसुन खाते ही नहीं, खबर बनाए.

इस बात पर पूरा दफ्तर हंसने लगा. बाबा भी मंद मंद मुस्कर रहे थे. कार में बैठे मैं और बंधु जी भी इस चुटकी पर चुहचुहाने लगे. साला, बात कारोबार से निकली थी, और लहसुन पर खत्म हुई. दिव्यअवस्था का तो सत्यानाश होना ही था.

शुक्रवार, नवंबर 26, 2010

भला कोई देता है जूते से श्रद्धांजलि!


जी नहीं, जूते से श्रद्धांजलि कोई नहीं देता, जो देता है वो दिल से देता है. ये हम सब जानते हैं, इसीलिए मेरा 9 साल का बच्चा भी समझता है, श्रद्धांजलि दिल से दो, तो कोई मैटर नहीं करता, पांव में जूता है या पांव गंदे हैं।

वाकया टीवी पर हो रहा था. मुंबई हमले के शहीदों को श्रद्धांजलि सभा में कुछ लोग जूता पहनकर दिख गए. भाई लोगों ने काट दिया गोला, लगा दिया ऐरो. हेडर दे दिया- ये कैसी श्रद्धांजलि। बेटा बोला- पापा, ये किस बात पर सर्किल लगा है, ये ऐरो क्या दिखा रहा है।

मैं कहने वाला था- बेटा, श्रेष्ठ सफाई पसंद लोगों को ये अच्छा नहीं लगता, कि कोई जूता पहन कर हाथ जोड़े चकाचक सफेद श्रद्धांजलि सभा में कोई काले कलूटे जूते पहनकर आए. इससे डिजाइन में फर्क पड़ता है. इससे पहले वो बोल पड़ा-

अच्छा, जूता पहनकर आए हैं इसलिए. लेकिन हम तो अपने स्कूल के प्रेयर में जूता पहनकर ही प्रार्थना करते हैं. इनमें क्या गलत है. और पूजा पर आप भी तो हमें कभी कभार गंदे पांव भी बिठा लेते हो, कई बार छोटू को तो आप जूता पहने ही गोद में बिठा लेते हो. 'माताजी'(मां सरस्वती) तो बुरा नहीं मानती

मैं तो भैया निरुत्तर था. मैंने कहा- बेटा कोई बात नहीं, तुम इस बहस में पड़ ही क्यों रहे हो, नहीं अच्छा लग रहा तो- CHANGE THE CHANNEL!

THATS IT

सोमवार, नवंबर 15, 2010

मियां, भलाई अब 'भज्जी' को भजने में है


ये विचार भज्जी के शतकों ने फोड़ा. आठवें नंबर आकर दो दो बार सेंचुरी मारना, आखिर दुनिया में पहली बार तो हो रहा है. वो भी तब जब टीम के सारे दिव्यपुरुषों को दिन में तारे नजर आ रहे थे.

कभी हम भी क्रिकेट के आशिक हुआ करते थे, अजहर कपिल और गावस्कर के हुनर में मीन मेख निकाला करते थे (जैसी कि अपने इंडिया में क्रिकेट फैन होने का मापदंड है)लेकिन उब गए. अब तो सिर्फ हारने जीतने के नतीजों से पता चल जाता है. बाकी गुणगान तो टीवी पर ही देख लेते हैं. हार गए तो पीछे से देते हैं हुरा (डंडा का भोजपुरी संस्करण) और जीतने पर सजा देते हैं मऊर(सेहरा का भोजपुरी संस्करण)

जाने क्यों भज्जी का खेल अपने आप में विद्रोह लग रहा था. एक एक गेंद पर किसी इच्छित क्रांति का आगाज. सिस्टम को तोड़ने की हुंकार. भज्जी में हाशिये पर खड़े उस आखिरी शख्स का चेहरा दिख रहा था, जो सिर्फ कहने भर के लिए लोक-तंत्र में है. उसका अपना योगदान है, लेकिन उसकी 'हीरोगीरी' किसी काम की नहीं मानी जाती.

इस सिस्टम में भ्रष्ट्र बने रहना कितना आसान है. राजू से लेकर रामालिंगा तक, गुटखा किंग्स से लेकर 'चाराबाजों' और चव्हाणों तक. सब अपने अपने काले कलूटे चेहरे और नापाक हाथों के साथ सिस्टम का हैंडल पकड़े हुए हैं (कहीं न कहीं) इन 'दिव्यपुरुषों' के आगे कितनी फीकी लगती है पब्लिक. इन्हीं की खबरे होती है, खबरों में कहने भर को ठुकाई होती है, ये लेकिन यहां तो पिछवाड़ा ही मोटा हो गया है इनका. घुम फिर कर वापस खबरों में आ जाते हैं.अगली बार पुराने आरोप दफ्न हो चुके होते हैं. बड़े आराम से दांत चिहारे बाइट दे रहे होते हैं

दादा जी एक जुमला कहते थे, सौ पापी मरते हैं तो एक चोर पैदा होता है, सौ चोर मरते हैं तो एक नेता पैदा होते हैं. (इसके आगे भी है, लेकिन संदर्भ से बाहर है)आज के दौर में ये जुमला भी महंगाई का मारा लगता है. सौ की जगह पता नहीं हजार भी कम पड़े शायद..

इनके जुल्म के मारे हाशिए पर खड़ा 'भज्जी' जब आक्रामक होता है, तो उसे 'उग्र' करार दे दिया जाता है. उसकी कतार ही अलग कर दी जाती है- कानून के निशाने पर खड़ी एक विद्रोही कतार. समझ में नहीं आता इन दिव्यपुरुषों के लिए कहां चला जाता है कानून. इनके घपले के पैसे वापस देश को मिल जाए,तो ससुरी देश की दशा 'उस जमाने के' अमरीका रूस से भी बेहतर हो जाए.

लेकिन नहीं, इन्हें तो चुराने और उड़ाने की आदत है. बगैर चोरी के तो कोई मालदार बना ही नहीं, आकड़े देखकर तो यही लगता है. दवाई में चोरी, दारू में चोरी, बिल्डिंग में दलाली,नीलामी में दलाली. गेम्स में घपलेबाजी, सिनेमा में लफ्फाजी. सुना है दिल्ली के किसी गुटका किंग फेमिली में होने वाली शादी में 25 करोड़ रुपये सिर्फ हीरो हीरोइनों को बुलाने पर खर्च किया जा रहा है. शाहरुख, सलमान, कैटरीना और 'मुन्नी' सब आ रहे हैं. बताते हैं, सिर्फ 6 करोड़ तो शाहरुख मियां नाच कर लूट ले जाएंगे (बख्शीस)

इनके आगे 'भज्जी' की क्या औकात. दो शतक से भला हीरो बन जाएगा? उनके लिए तो और भी नहीं, जिनकी 'कतार' ही अलग है. लेकिन सावधान, ये भज्जी अभी और रिकार्ड तोड़ सकता है. 'बदलाव का बल्ला' उसके हाथों को लग चुका है. वो खेल का 'दांवपेच' भी समझ चुका है और बारीकी भी.

मियां, आज भज्जी जाने क्यों 'पावर' का पर्याय लग रहा था, जिसकी कमी देश की 80 फीसदी पब्लिक में खलती है. सारे लोग अपनी अपनी जगह से ऐसी 'रिकार्डतोड़ बैटिंग' करने लगे, तो इन दिव्य पुरुषों से छुट्टी मिल जाएगी.
इसलिए, भेजे में ये टाइटिल खटका- मियां भलाई तो अब भज्जी को भजने में ही है.

शुक्रवार, नवंबर 05, 2010

संभालना अपने अपने दीये



माथे पर सजाकर
रौशनी की टोकरी
फिर से आया है दीया
अंधेरे से दो-दो हाथ करने
अपने दिल में जलाए
उम्मीदों का उजाला
हुंकार भरेगा अंधेरा
हाहाकार मचाएगा
दीये को डराएगा
बुझ जाने का डर दिखाएगा
देखिगा
कहीं कम न पड़ जाए
दीये का हौसला
गिर न जाए उसके माथे से
रौशनी की टोकरी
सुबह सूरज आएगा
तो सब संभाल लेगा

रविवार, अक्तूबर 24, 2010

दिन का दुखड़ा सुनो


किसने काट लिए दिन के पर
देखो, कितना लंगड़ा के चलता है ये दिन

कभी कितना मस्त था
नीले लिबास में सूरज का साफा बांधे
चमकता हुआ झकास सा वो दिन

भिनसार में आंखे खोलता
सूरज चढ़ते दौड़ उछलता कूदता
दो पहर तक पसीने में तर-ब-तऱ
घड़ी दो घड़ी सुस्ताता
आमियों की छाव में चैन की बांसुरी बजाता

दिन भर के लिए आना होता है
कितनी अच्छी तरह जानता था
शाम होते होते खुद को समेटने लगता
गोधुली से हर रोज शाम की शान बढ़ाता
चुपचाप गुम हो जाता रात की गोद में
सूरज को निगलकर चुपचाप सो जाता
सितारों के सपने देखता
नींद खुलती तो चांद से बतियाता

एक चक्र में कितना कुछ दे जाता था वो दिन
यहां तो अपना चक्र ही भूल गया है
न ठीक से सोता है न ठीक से जागता है

दिन भर उनींदा सा रहता है
अपने पांव का जख्म सहलाता हुआ!

मंगलवार, सितंबर 21, 2010

और क्या करूं, तुम्हारे लिए अयोध्या भी बन गया!



अयोध्या के रूप में मैं, लीजिए जी मैं आ गया, चार महीने को हुए आपसे कुछ बात करते हुए. क्या करें जी, मन में कुछ मलाल सा हो रहा था लिखने पढ़ने के बार बार बेअसर रहने से. मई-जून में महीने भर गांव में रहा, घड़ी की सुइयां माजी की तरफ मुड़ गईं थी. शहर आया, तो फिर से निरर्थकता सताने लगी. 24 घंटे न्यूज चैनल कुनबे का हूं. कुनबे के मान अपमान में मैं भी शरीक था- जाहिर है. इस ख्याल ने मन का वो मलाल और भी बढ़ा दिया. मैं बेकलम सा हो गया. सोचने लगा कि लिखकर क्या फायदा, कोई सुनने सुधरने या विचारने वाला तो है नहीं. अगर है भी तो उसका हमे पता नहीं.

अयोध्या पर आने वाले फैसले ने मेरे अंदर के इंसान को डरा दिया. 20 साल के थे तब हम. सूझ-बूझ थी, कि मस्जिद टूटने के बाद क्या होगा. मैंने कलम उठा लिया. और अयोध्या जाने कब अयोध्या बन गया-


6 दिसम्बर, 1992
18 साल से ये तारीख मुझे चुभती रही है. ऐसी नासूर बन चुकी है ये तारीख जिसकी अब सिहरन भी नहीं सही जाती. उस दिन मेरी बेबसी की इम्तेहां हो गईं. मैं चुपचाप देखती रही. मेरी एक निशानी को हमेशा हमेशा के लिए मिटा दिया गया...

बाबरी नाम की वो मस्जिद मेरे लिए उतनी ही प्यारी थी, जितनी राम जन्मभूमि. अपनी दो औलादों की तरह. दुनिया की कौन मां होगी जो अपने ही बच्चों में फर्क करती हो. लेकिन मेरा दर्द कोई नहीं समझता. मेरे एक बच्चे को छीनकर मेरे सामने ही जमींदोज कर दिया गया...

मैंने वो दर्द भी झेल लिया था. मैं अपने दर्द के साथ खामोश हो गई थी, लेकिन मेरे जख्म को सूखने नहीं दिया गया। कभी मजहब के नाम पर, तो कभी सियासत के नाम पर. मेरे दामन को अखाड़ा बना दिया गया। किसी ने कभी मेरे दिल की बात नहीं सुननी चाही। किसी ने मेरी गोद में बसने वालों की राय नहीं जाननी चाही.

देश को आजादी मिलने के बाद तो जैसे मेरी अमन की जिंदगी को काली नजर लग गई. मेरे बाशिंदो को तो कभी ये मलाल नहीं रहा कि मंदिर कब बना और मस्जिद कब बनी. इनसे बगैर पूछे ही नारे बुलंद किए जाने लगे।
किसकी आस्था, किसकी धरोहर. इस पर तो सबसे पहले मेरा हक बनता है. लेकिन लोगों ने तो अपने अपने झंडे बुलंद कर रखे हैं. ये सब देख- सुनकर मुझे कितना दर्द होता है, ये कोई नहीं जानता. 18 साल से तारीख दर तारीख ऐसे ही दावे किए जाते है. मेरे दर्द की परवाह किए बगैर.

कोर्ट भी क्या फैसला करे. इसके हवाले करे, तो उसको दुख. उसको हवाले करे तो इसको कष्ट. 18 साल से कोर्ट भी पसोपेश में है. दोनों पक्ष चाहते, तो इस विवाद में बीच का रास्ता निकल सकता था, लेकिन लोग हैं कि पीछे हटने को तैयार नहीं. कह रहे हैं इस कोर्ट में दावा सही साबित नहीं होता, तो उपरी अदालत में जाएंगे।

किसी को राम मंदिर चाहिए, किसी को मस्जिद. मैं आपसे, पूरे देश से पूछना चाहूंगी. क्या मेरे आंगन में बने इतने मंदिर और मस्जिद कम हैं जो नई निशानी बनाने का जुनून है। क्या ऐसी जिद का कभी अंत हुआ है. एक कोर्ट का फैसला नहीं मानने वाले, क्या जरूरी है कि ऊपरी अदालत के फैसले को पचा लें? विवाद को सुलझाने के लिए कोर्ट तो व्यवस्था ही देगा. लेकिन यहां तो लोग मजहब की आड़ में सत्ता को हिलाने के लिए तैयार हैं. मेरी मानिए- मेरे बाशिंदों को मंदिर-मस्जिद से ज्यादा बस सुकून चाहिए। हिंदू हो या मुसलमान अपने शहर को कोई अखाड़ा नहीं बनने देना चाहता.


सुना आपने, मेरे बाशिंदों को वक्त की सुई पीछे घुमाने की आदत नहीं. वो आज में जीते हैं, कल के सुंदर से सपने में खुश रहना चाहते हैं। ये तो अमन से ज्यादा मांग भी क्या रहे हैं. मेरे आंगन में मंदिर-मस्जिद के विवाद पर साठ साल से चल रहा है मुकदमा।

सुनवाई होती रही, गवाहियां होती रहीं। इतिहासकारों के बयान दर्ज हुए, एएसआई की रिपोर्ट लिखते लिखते 15 हजार पन्नों से ज्यादा भर गए। लेकिन वक्त की सुइयों ने आगे का रुख नहीं किया. इस तनातनी में मेरी हालत क्या होगी. इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। मेरी हर गली, हर कूचे में सख्त पहरा बिठा दिया गया है. मेरे अपने बाशिंदे जैसे मेरी गोद में ही अजनबी हो गए हैं।

अब इससे ज्यादा क्या करें- पत्रकार हैं तो हवाला ही तो दे सकते हैं, कि भैये संभल के, दुनिया सिर्फ एक बार ही मिल सकती है. इंसान बनकर फैसला करो, और इंसान बनकर अमल करो.

अब आप ही बताइए, बात नहीं मानिएगा, तो मेरे मन का मलाल बढ़ाईएगा ही न. इसमें मेरा कुछ स्वार्थ लगता हो, तो ये भी बताईएगा

सोमवार, मई 24, 2010

तपिश में बारिशों के अरमान

इतनी शिद्दत भरी है तपिश कि कहीं चैन नहीं. सूरज चाचू इतने तपे तपे हैं, कि सुलगते अरमान दहकने से लगे हैं. कई बार तपिश तो सिर्फ एक बहाना लगती है. पसीने के पीछे परेशानी कोई और लगती है. बार बार नजर जाती है मटमैले आसमान से, बड़ा बीमार सा लगता है आसमान. ऊपर से 'ऊपरवाले' का, नीचे से 'नीचेवालों' का उत्सर्जित ताप झेलते हुए.

एक दोस्त ने पूछ दिया (फेसबुक पर) पहले तो दादा-परदादा बारिशों के टोटके करते थे. 'ऊपरवाले' का ध्यान खीचने के लिए कीचड़ में मेंढकों के जोड़ों को निकाल कर शादी कराते थे (ताकि वो बेदिल बच्चों की तरस का तो ख्याल करेगा)आज के दौर में कौन से टोटका करे...

अब इस सवाल के जवाब में तपते, सुलगते तमाम अरमान छलक पड़े, गनीमत है, कंप्यूटर पर बैठा था, अंजुरी में समेट कर उस दोस्त के साथ आपको भी परोस रहा हूं. गले से नहीं उतरे तो कहिएगा, जी न चुराइएगा...


बारिश के लिय़े टोटके के
रूप में मेरी सलाह तो यही है कि-

एक बार 'उनकी' जुल्फों को उड़ाकर देखिए
तपती हथेलियों पर बूंदों की रिमझिम तय है

फसाना लगे तो माफ कीजिएगा.
दिल बहलाने के अफसाने ऐसे ही हसीन होते हैं

जाने क्यों ख्वाब में सजे
कांटे भी फूलों से गुलजार लगते हैं

अफसानों में आपने कालीदास के
मेघों को महबूब मैसेज पहुंचाते देख रखा है

तो उनके जुल्फों के कहने पर
ऊपर वाला इतना भी नहीं पिघलेगा?

आसार तो ऐसे कतई नहीं दिखते
आप उनकी जुल्फों से जरा खिलवाड़ करके तो देखिए

लबों पे अपने एक बार
सजा तो लीजिए बारिशों के अरमान

इतनी भी संगदिल नहीं उनकी जुल्फें

* बारिश के लिए टोटके के रूप में तो मेरी सलाह जरा रोमांटिक है-

शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010

नई-पुरानी के बीच 'सेकेंडहैंड' सोच



किसको नई कहूं
किसको पुरानी

कई बार बेमानी लगती हैं
नई भी
पुरानी भी
बिकने को बेकरार
बाजारु उसूलों के बीच

नए पुराने का
क्या घनचक्कर बन जाता है

कभी सवाल
पहली आंखो देखी का होता है

जो पहले आई
पुरानी तो वही होती है
जो बाद में आए
नई तो वही कही जाती है

कभी सवाल होता है
पहले अंतःप्रवेश का

पहली का बंधन
पहली पहली बार बंधा था
उसके लिए मैं पहला
मेरे लिए वो पहली

भौतिक लिहाज से
तो पहली को पुरानी नहीं
नई कहा जाना चाहिए

लेकिन
नई पर बादवाली का
दावा भी कुछ कम नहीं


बार बार बाजार का
हवाला देती है बाद वाली
वो जानती है
अपनी जिंदगी में वो भी दूसरी है
अपनी जिंदगी में मैं भी दूसरा
फिर भी कहती है
नई तो मैं हूं
मेरा रंग नया
मेरा रोगन नया
मेरी पूरी रंगत नई
मेरा हौसला नया
मेरी मंशा नई
मेरा सफर नया
मेरी मंजिल नई
मेरा यार नया
मेरा प्यार नया

चेहरा पुराना है तो क्या हुआ
मत देखो तन मेरा
मन से मैं ‘सेकेंड हैंड’ नहीं
बाजार में सौदा नया होता है
सामग्री कोई जरूर नहीं

नई पुरानी के बीच-बहस में
उलझा हुआ मैं सोचता हूं
इसमें न नई की खता है
न पुरानी का कसूर
ये सब आदमी के
असीम अरमानों का अंजाम है

‘एडगुरू’ ठीक ही कहते हैं
एक से मेरा क्या होता है

शुक्रवार, अप्रैल 02, 2010

न्यूज रुम के महामूर्ख मच्छर!



कुत्ते नाहक ही बदनाम है अपनी टेढ़ी दुम को लेकर, इन मच्छरों की तो जात ही टेढ़ी है. जाने इन्हें कान के आस पास काटने में क्या मजा आता है. हर बार यहीं मार खाते हैं, हर बार यहीं मसले जाते हैं, लेकिन कान पर काटने से बाज नहीं आते.

जाने न्यूज रुम में कहां से आ गए हैं इतने सारे लंबी टांगों वाले मरकटिया मच्छर- बेकार में ड्यूटी बढ़ाने! पेज कारे करने' के साथ हाथ भी लाल करने पड़ते हैं. क्या करें- ससुरे इतना भी नहीं समझते, आदमी के 'अंदर का शोर बाहर निकालने वाली' मशीन पर अपना राग अलापना कितना जानलेवा होता है. भगाने से भी नहीं भागते ढीठ कहीं के...घूम फिर कर कान पर मंडराने लगते हैं.

समझते नहीं, एक तो 'विदाउट ब्रेक काम करो, बीच-बीच में ताली पीटते रहो. सुबह तक ढेर लग जाता है डेस्क पर. जिस दिन हाफ सेंचुरी लगाने की फुरसत नहीं लगी, उस दिन भी 20-25 मच्छरों की लाशें 'एक शिफ्ट में हुई हिंसा' का सबूत पेश कर रही होती है. उखमज कहीं के, जैसे पैदा होते हैं, वैसे ही मारे जाते हैं. लेकिन बेकार में प्रोड्यूसर को पापी बना जाते हैं. डेस्क पर खून के धब्बे देखकर मैनेजमेंट तो यही कहेगा! सफाई वाले नहीं समझ पाते, डेस्क पर इतने करीने से क्यों रखी हुई हैं मच्छरों की लाशें.

इस लिहाज से कितने मूर्ख लगते हैं न्यूज रुम के मच्छर. भुक्खड़ इतने कि न सामने वाले की संवेदना का एहसास, न रीझ का, न खीझ का. इनकी चतुराई का अंदाजा इसी बात से लगाइए, कि निकलते हैं 'चिकने चुपड़े डेस्क के अंदर जमी गर्द' से, लेकिन पांव पर बैठना तक गवारा नहीं. जैसे इनकी तौहीन हो जाएगी. जान की बाजी लगाकर काटने दौड़ते हैं कान पर.

एक तो जाने क्यों दफ्तर में घुसते ही कान लाल-भभूका हो जाता है (डॉक्टर बेहतर बताएंगे क्यों) दूसरे ये लगते हैं उसी पर मुंह मारने. जरा भी 'सेंस' होता, तो समझ लेते 'रिसते जख्म में सींक डालना' इंसानियत नहीं होती. खून पीना है तो 'मोटी चमड़ी वाली जगह' का पी लो यार. ये कान की जगह का पीने की कैसी लत?.

ये ठीक है कि तुम्हारे पास भी 'शीशाबंद शीतल हॉल' में एक बार घुसने के बाद निकलने का चारा नहीं बचता. लेकिन ये तो समझो, तुम न्यूज रुम के मच्छर हो, किसी गंदी नाली के नहीं, तुम्हारी 'सेंसिबलिटी' तो हमसे मैच करनी चाहिए!

शुक्रवार, मार्च 12, 2010

बड़ा सख्त आदेश है!


(चित्र-एम वुवेरकर जी की स्केच से)

हमारी सुबह रात ग्यारह बजे शुरु होती है
सो कुछ देर के लिए आप मुझे अपने विपरीत समझिए

दिन में स्कूल जाते अपने जिगर के टुकड़ों
उनकी सुबह उठने की कमसिन सी मुश्किलों
उन्हें उनींदी आखों से नहाते, खाते, पहनते, तैयार होते देखते
बार बार घड़ी देखते, हर बस की सीटी पर उन्हें चहकते
उनकी शहद घोलती जुबान से
बाय पापा! सुनते....

जिसे अरसा हो गया है ये सबकुछ भोगते हुए

जमाना हो गया है जिसे
सुबह स्नान की तैयारी कर रही पत्नी
स्नान के बाद भींगे बालों से पानी झाड़ते
तोलिए में लिपटी बाथरुम से कमरे में भागती
सर पर तौलिया रखे तुलसी को धूप दिखाती
18 से साल बीवी और 10 साल से बच्चों के बीच घुलते हुए

वो आपके समरुप कैसे हो सकता है
आप उसे अपने विपरीत ही मानिए, खिलाफ नहीं

बात ऑफिस की है
शिफ्ट शुरु तो इंचार्ज ने कहा
कुमार साहब, आज भी आपके हिस्से 'बाबा' की स्टोरी है
आपके फेवरेट खिलंदड़ बाबा- नित्यानंद
स्टोरी तो ठीक है, आज भी कोई नया एंगल है
लेकिन एक 'गाइड लाइन' है

बाबा के वो वाले विजुअल नहीं लगाने है
जिनमें बाबा सेविका की जांघ पर 'टांग साधना' कर रहे हैं
घने बालों के पीछे होंठ भिड़ा सेविका का 'ओष्टपान' कर रहे हैं
अकेले कमरे में बाबा जिंदगी के फुल मजे ले रहे हैं

भाड में जाएं...
धर्म, अध्यात्म, अनुशासन, नीति, नीयत
और कुल मिलाकर भगवा कैरेक्टर
ये वाले विजुअल आज के पैकेज में नहीं लगाने हैं

तेल मालिश और मसाज तक ठीक है
मोहतरमा का भी कहना है
मैं तो बाबा के प्राइवेट रूम में गई थी
सिर्फ सेवा करने के लिए
इस बात का कोई गलत मतलब न निकाला जाए
सो, आज ध्यान रखिएगा

अरे हां,
बैकग्राउंडर पैकेज में वो वाले विजुअल जरूर लगे होंगे
उन्हें भी री-एडिट में हटना इंश्योर कीजिएगा
बड़ा सख्त हिदायत है

ये और बात है
किसी हीरोइन का 'लिप लॉक' मिल जाए
किसी मॉडल का मैलफंक्शन मिल जाए
कोई हॉट कैलेंडर शूट मिल जाए
मल्लिका के कार वॉश जैसी कोई तड़कती भड़कती 'क्लिप'मिल जाए
देखेंगे, चला लेगें, और क्या करेंगे...
लाइफ में कुछ एडवेंचर तो होनी ही चाहिए

सच नहीं दिखा सकते तो न सही
लोगों के साथ खुद को भी चौंकाना ही सही
रगों में खून के साथ उबलते बुलबुले फूटने चाहिए
मुट्ठियों में आती अकड़न कम होना चाहिए
लेकिन जिंदगी में भी तो कुछ न कुछ तो होना चाहिए

बस, बाबा के कुकर्म का ख्याल रखिएगा
दुनिया को हद से ज्यादा न दिखाइएगा
बड़ा सख्त आदेश है, गौर फरमाइएगा
गुड मिडनाइट!

रात का यही सच सीने में सुलग रहा था
परेशान कर रहा था, सो कह दिया
इसे आप दिन के विपरीत मान सकते हैं
ये आपके खिलाफ नहीं है.

बुधवार, मार्च 10, 2010

'औऱतों' के लिए 'पुरुष' की एक कविता

पिछली पोस्ट (जिसमें अधिकतर लोगों को 'आचार' पसंद आया) में जिस 'पुरुष नीयत' की बात अंडरकरंट थी, वो इस कविता में खुलकर सामने आई है, जब नीयत ठीक रहती है, तो आदमी इस तरह की रचना करता है. लिंगभेद के आधार पर ये कविता एक पुरुष (उदयकांत दीक्षित, ब्लॉग भावसरिता) ने लिखी (और भेजी) है. आप पढ़े और देखें, कि नीयत से दर्द के एहसास में कितना फर्क पड़ता है.

हाँ , बेटी ! तुझे मैं जन्म दूंगी ।
जानती हूँ , तेरे जन्म पर ,
नहीं बजेंगी थालियाँ ।
गूंजेंगी नहीं घर में ,
ढोलक की थापियाँ ।
सास ,ससुर अन्य घर वालों के ,
चेहरे लटके होंगे।
मेरे पति याने तुम्हारे पिताभी
साथ ,साथ उनके,
कहीं भटके होंगे ।
मैं जानती हूँ ,
घर में छाई होगी उदासी ,
खुशियों के बदले ,मानो ,
मिल रही हो फांसी ।
फिर भी मैं ,
तुझे जन्म दूंगी ।
अपने अधूरे अरमान ,
तुझसे पूरा करूंगी ।
किरण बेदी , कल्पना चावला का ,
स्वप्न मैंने भी देखा ।
परिस्थिति वश ,स्वप्न पर ,
खिंची एक आड़ी रेखा ।
हाँ , तब से अब तक ,
बहुत आत्म बल संजोया है ।
धीरज का संबल ले इच्छाओं को ,
आज तुम में पिरोया है ।
जन्म लेगी तू अवश्य ,
इस धरती पर आयेगी ।
घर की स्थितियां भी बदलेंगी ।
तेरे जन्म तक मना लूंगी सबको ,
आशा है घर परिवार का ,
स्नेह प्रेम तू जरूर पायेगी ।
तेरा जन्म , मेरा निश्चय है ,
रंग उसमें अवश्य भरूँगी ।
हाँ ,बेटी ! कुछ भी हो ,
तेरी भ्रूण हत्या मैं ,
नहीं करूंगी ,नहीं करूंगी ।
हाँ,तुझे जन्म दूंगी ,
मैं तुझे जन्म दूंगी .

आरक्षण का आचार डालेगी कलावती!


ये जुमला सुनकर कई पाठक जरूर मुझे लालू, मुलायम और मायावती का समर्थक मान सकते हैं, मुझे पिछड़ा कह सकते हैं, मेरे लेख को सियासी लेख कह सकते हैं, लेकिन आज मुझे परवाह नहीं. भले ही मीडिया और ब्लाग के 'मार्शल्स' मुझे संसद के विरोधियों की तरह धकिया दें...मेरी बात को शायद कलावती जैसी ही समझेगी, जिसकी हंडिया में आरक्षण आचार से ज्यादा कुछ नहीं होगा- एक ऐसी 'चटक चीज' है जिससे पेट कतई नहीं भरने वाला, हर चटकारे के साथ भोजन की जरूर भूख बढाएगा. लेकिन हंडिया में होगा क्या- तो सिर्फ आचार, खाने का एक दाना नहीं.

'महिला आरक्षण पर इतिहास रचने' के सामूहिक स्लोगन पर जाने क्यों याद आ गई कलावती. विदर्भ की वही विधवा कलावती, जिसका हवाला देकर 'कांग्रेस के युवराज' ने संसद में देश की महिलाओं की हालत बखान की थी. महिलाओं के प्रति अपनी (और अपनी पार्टी) की संवेदनशीलता जताई थी. राहुल गांधी के हवाले के बाद वो कलावती भी सपना देखने लगी. राजनीति के जरिए अपनी और अपनी जैसी महिलाओं की दशा सुधारने की. राजनीति के जरिए विदर्भ की हालत बयां करने की. जाहिर है इसके लिए उसे चुनाव में उतरना होता. उसकी इच्छा रही होगी कि वो उसी राहुल की पार्टी से चुनाव में उतरे, जिसने उसका नाम पूरे देश में ऊंचा किया. उसने चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर दिया. राहुल गांधी, कांग्रेस को भी ये बात पता चली. लेकिन टिकट कांग्रेस ने नहीं दिया, वो विदर्भ जनआंदोलन समिति के टिकट पर वानी विधान के मैदान में उतरी. राहुल अगर 'कलावती' के चिंतक होते, चुनाव में सियासी समकीरण के मारे नहीं होते, तो दौड़कर जाते कलावती का सपना पूरा करने, लेकिन नहीं...

अब देखिए सियासत, इस बार राहुल भूल गए थे कलावती का हवाला. इस बार कांग्रेस कलावती से डर रही थी. आखिर सियासी 'पंजे' का इस्तेमाल कर कांग्रेस ने कलावती को बीच चुनाव में बैठने पर मजबूर कर दिया. जिन सज्जन ने कलावती को चुनाव की जगह समाज सेवा का पाठ पढ़ाया था, वो पुराने 'कांग्रेसमिजाजी' और सुलभ इंटरनेशनल के मुखिया बिन्देश्वर पाठक थे. पाठक जी ने कलावती को कुछ इन शब्दो में समझाया (जो कुछ अखबारों में छपा था)
'मैं कलावती को कहना चाहूंगा, वो राजनीति की दीवार में सिर न भिड़ाए, वो अगर विदर्भ के लोगों की हालत हाईलाइट करना चाहती है, तो ये समाज सेवा के जरिए भी किया जा सकता है.'

यानी तुम करो समाज सेवा, हम मारेंगे मलाई! पाठक जी की 'सलाह' का असर ये हुआ कि कलावती बीच चुनाव में बैठ गई. सियासी दबाव के आगे उसने विधान सभा में पहुंचकर अपनी बात रखने का सपना छोड़ दिया. अगर ऐसा है कलावती जैसियों के सपने का हश्र, तो महिला आरक्षण का क्या फायदा होगा? जैसा कि मीडिया एक सुर में चिल्ला रहा है.(खासकर हिंदी मीडिया) देश में महिलाओं की हालत के आंकड़े भला मीडिया से भी छिपे हैं क्या? वो नहीं जानते आज की तारीख में महिलाओं के लिए आरक्षण से ज्यादा सुरक्षा, घरेलू हिंसा, दहेज, शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्याएं बड़ी हैं? इन समस्याओं की आधी आबादी का कितना प्रतिशत तबाह हो रहा है, कितनी औरतों को इन समस्याओं के आगे देश क्या, अपने समाज की दशा और दिशा समझने की सुध नहीं रहती?

अगर मीडिया वाले ये समझते हैं कि सियासत में उतरने से महिलाएं महिलाओं का कल्याण करेंगी, तो उनके सामने मायावती, राबड़ी देवी, जयललिता, उमा भारती, वसुंधरा राजे जैसियों के उदाहरण नहीं है. महिलाओं के लिए क्या खास किया है इन देवियों ने अपने राज में? कौन सा कल्याणकारी कार्य कर दिया इन्होंने? राजस्थान में, कि यूपी में, कि बिहार में, कि मध्य प्रदेश में, कि तमिलनाडु में, कहां सुधरी है महिलाओं की हालत? इनमें से कई देवियां तो घोटाले में मर्दों के भी कान काटने वाली हैं. क्या ये आंकड़े मीडिया की पहुंच के बाहर हैं? महिला कल्याण के मोर्चे पर कलावती का उदाहरण इन पार्टियों की फितरत समझने के लिए काफी नहीं? फिर ये भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है कि महिला आरक्षण से 'सब कुछ' सुधर जाएगा?

अगर मीडिया ये समझता है, कि महिला आरक्षण बिल के कानून बन जाने से पार्टियां महिलाओं को 33 फीसदी टिकट बांटने लगेंगी, तो क्या मीडिया का आकलन इतना घटिया हो गया है? जैसी इन पार्टियों की फितरत रही है, वो महिलाओं को किस अनुपात में प्रतिनिधित्व देंगें? अरे जो बीजेपी, जो कांग्रेस, जो लेफ्ट, आज तक अपनी नीयत या ईमानदारी किसी महिला को टिकट नहीं थमाया, महिलाओं को 'आधी आबादी; क्या, 'आबादी के दसवे हिस्से' का भी दर्जा नहीं दिया, वो अचानक महिलाओं के कल्याण के लिए सुर में सुर क्यों मिलाने लगीं?

संसद में इतनी बड़ी नौटंकी क्यों. दागी और अपराधियों को टिकट देने के लिए यही पार्टियां कैसे कैसे बहाने देती हैं, कानूनी 'छेदों और परिच्छेदों' का बहाना देती हैं, कभी मिल जुलकर एकजुट होने और कानून बनाने की बात कह दो तो साफ कहते हैं- दागियों के खिलाफ एकजुटता मुमकिन नहीं, फिर आरक्षण पर इतने एकजुट कैसे हो गए? ऐसा लगता है जैसे महिलाओं को सीट देने में कोई कानूनी अड़चन आ रही थी, संसद में उसी बाधा को दूर करने के लिए एकजुट हो रहे हों. इसी एकजुटता से लालू और मुलायम के सवाल में सच्चाई नजर आती है- ये 33 फीसदी आरक्षण सीट हथियाने का हथकंडा है

लेकिन हैरत होती है मीडिया को देखकर (एक बार फिर कहना चाहूंगा खासकर हिंदी मीडिया) पार्टियों को छोड़िए, कि इनके सुर में ऐसे एकसुर हो गया मीडिया, कि कान तक नहीं दिया आरजेडी, एसपी, बीएसपी और दूसरे विरोधियों की दलीलों को. (अंग्रेजी में तो फिर भी बहस हुई, हिंदी में तो इतिहास रचने के सिवा कुछ स्लग ही नहीं सूझा) ये ठीक है, इनके आकाओं का खुद मुंह नहीं है महिला कल्याण का नारा देने का, न लालू की नीयत ठीक है, न मुलायम की, और मायावती की तो और भी नहीं, लेकिन इनके इशारों को बहस के बीच ही न घसीटा जाए, ऐसा भी तो नहीं होना चाहिए. संसद में नहीं हुआ, शायद विरोधियों का संख्या बल नहीं था, लेकिन मीडिया के मंच पर ऐसा क्यों, कि सबकी पट्टी एक हो गई- राज्यसभा ने रच दिया इतिहास!

कहीं ये मीडिया के 'फॉरवर्ड चरित्र' का मेनिफेस्टेशन तो नहीं. मैं ठीक ठीक समझ नहीं पा रहा

शनिवार, मार्च 06, 2010

हमें नहीं चाहिए ऐसा 'हुसैन'!



बड़े अफसोस के साथ ये लिखना पड़ रहा है. हुसैन के बारे में इससे पहले ऐसी सोच कभी नहीं आई, बड़ी कद्र करते थे हुसैन की, कई बार मिले भी हैं, दिल्ली में कई प्रदर्शनियां कवर की हैं. इंटरव्यू भी किया है. जितनी बार मिले, उनके शून्य से सफर के बारे में जाना, उनकी जिजिविषा, उनकी लगन और कुछ अलग करने की प्रतिभा से प्रभावित हुए. जिस देश ने उन्हें फिल्मी पोस्टर के पेंटर से 'इंडिया का पिकासो' बना दिया, उस देश को बदले में ये तोहफा?

अगर आपका इस देश में कोई विरोध करे, तो आप देश छोड़कर चले जाएं? ये कहां की बुद्धिमानी, ये कहां का देश प्रेम है? इसी देश में शाहरुख खान हैं जो ताल ठोककर 'ठाकरों'से लड़ते हैं, जनता और मीडिया भी मजहब का ख्याल किए बगैर खूब साथ देती है. ऐसी लड़ाई हुसैन साहब भी लड़ सकते थे. फिर क्यों नहीं लड़ी? क्या उनके पास दलीलें खत्म हो गई थीं, या कूची में वो जान ही नहीं रह गई, जिसकी बदौलत वो कभी क्रांति का दावा किया करते थे? अगर दलीलें खत्म हो गईं, तो इसका हिसाब तो हुसैन साहब के पास ही होगा, न कि इस देश के पास, कि क्यों आप इस देश की जनता से अपील करने लायक भी नहीं रहे, कि बंधुओं, मैंने अपनी कला के जरिए तुम्हारी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाई?

मेरा मकसद उस विवाद को हवा देना कतई नहीं. मैं उस विवाद में नहीं पड़ना चाहता कि हुसैन ने हिंदू देवी देवताओं की नग्न पेंटिंग बनाई वो सही है या गलत, इससे कई लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची, वो वाजिब है, या धर्मान्धता. बस इतना जरूर कहना चाहूंगा कि जिस देवी की अराधना के साथ देश के बच्चे पेंसिल पकड़ते हैं, आप उन्हें वस्त्रहीन दिखाते हैं, इसके पीछे सिर्फ कला का तर्क काफी नहीं. जो लोग आप पर गुमान करते हैं, आपको इंडिया का पिकासो कहते हैं, उन्हें अगर कला की बारीकी नहीं समझ आ रही, तो आपको समझानी चाहिए- कैसे, ये हुसैन साहब को तय करना चाहिए

हुसैन को जो भी दिया हिंदुस्तान ने दिया. उन्हें किसने कहा है देश छोड़ने को? ये उनका सेल्फ इंपोज्ड एक्जाइल है। क्या हुसैन छोटे हो जाते अगर ये कह देते, कि माफ कीजिएगा, अगर मेरी किसी कृति से जाने अंजाने किसी की भावना को ठेस पहुंची? ये माफी नहीं बडप्पन है, और ये देश ऐसे लोगों से भरा है. आपने विस्मिलाह खान का किस्सा तो सुना ही होगा, कैसे अमेरिका में उन्हें बसने का प्रलोभन दिया जा रहा था, उनके लिए बनारस बसाने की बात हो रही थी, लेकिन बिसमिल्ला खान ने कहा- बनारस तो बना दोगे, गंगा कहां से लाओगे...? कहां बिस्मिल्ला खान, और कहां हुसैन, ऐसे हुसैन का हम आचार डालेंगे...

हुसैन साहब भले ही कहें, मैं किसी देश भी की नागरिता की परिधि पार कर चुका हूं, मैं विश्व नागरिक हूं. लेकिन जो शख्स अपने देश का न हुआ, वो दुनिया का क्या होगा. हुसैन साहब कतर में बसें, या दुबई में, वो पैगम्बर मोहम्मद की नग्न पेंटिंग नहीं बना पाएंगे, ये तो मैं शर्तिया कह सकता हूं.

गुरुवार, मार्च 04, 2010

मर गया तक्षक



मैंने इतने नेवले
पाल लिए हैं अपने इर्द गिर्द

कि अब मुझे
सांपो से तनिक भी खतरा नहीं रहा

मैं अभेद्य हूं
कितने ही ताकतवर सर्पदंश से

मेरा मुलाजिम
बन चुका है तारीख का तक्षक

शनिवार, फ़रवरी 27, 2010

कान पकड़िए, 'बाबा' के भक्त नहीं बनेंगे



मुंह में राम
बगल में बाला

साधु के चोले
में देह का दलाल
 
साधना साईं की
संपर्क सोनू पंजाबण से
 
साधना की आड़ में
जिस्म का सौदागर
 
आश्रम को बनाया
अय्याशी का अड्डा
 
ये है दिल्ली के
सेक्स रैकेट का स्वामी


दिल्ली के खानपुर के हैं बाबा. साईं बाबा के नाम पर मंदिर और आश्रम खोल रखा था. बाबा साधना तो करते थे साईं की, लेकिन संपर्क थे सोनू पंजाबण से (इंटर स्टेट सेक्स रैकेट की सरदार) ताना बाना बुन रखा था 500 लड़कियों के नेटवर्क का, जिन्हे बनारस से बॉम्बे, बैंगलुरू से कोलकाता तक के हाई सोसाइटी में सप्लाई करता था बाबा...

ये तो बाबा के कर्म है, अब पढ़िए बाबा की एबीसी. बाबा चित्रकूट से हैं, तुलसीदास की नगरी से. 1995 में दिल्ली आए थे काम करने, शुरु किया एक फाइव स्टार में सिक्योरिटी कार्ड की नौकरी से, लेकिन जल्दी ही असली 'काम' शुरु कर दिया. लाजपत नगर के एक पार्लर में लग गए लेकिन 1997 में छापा पड़ा तो पकड़े गए, जिस्मफरोशी कराने के आरोप में कई महीने जेल रहे. जेल में दाढ़ी बाल बढ़ गए, लुक साधु वाला हो गया, तो फिर इसे ही बेचना शुरु कर दिया. बन गए साईं बाबा के भक्त और शुरु कर दिए प्रवचन. कुछ ही साल में मंदिर और आश्रम बनवा लिए.

अब देखिए बाबा की पैठ. नॉर्थ एवेन्यू तक पहुंच गए थे बाबा के तार. 2008 में रुतबा इतना हो गया था कि सांसदों की नगरी में साईं भजन संध्या करवा दिये जहां बीजेपी नेता वी के मलहोत्रा से लेकर कीर्ति आजाद सरीखी हस्तियां शामिल हुईं. चित्रकूट के में हुए कार्यक्रम में यूपी के कई मंत्री और सांसद शामिल हुए. बाबा के धरे जाने के बाद अब सब कह रहे हैं, उन्हें बाबा के करतूतों का पता नहीं था. उनके साथ सैकड़ों लोगों को बाबा ने धोखा दिया, उनकी साईं श्रद्धा का फायदा उठाया. लेकिन जब बाबा का मुंह खुलेगा, तो कितने चेहरे लाल होंगे ये कहना अभी मुश्किल है

सवाल है कि आप बाबाओं के फेर में पड़ते क्यों हैं, अगर आप साईं के भक्त हैं, राम के भक्त हैं, और किसी फ्लाने-चिलाने के भक्त हैं तो आपको बाबाओं का जरिया क्यों चाहिए? आप नहीं जानते आपकी श्रद्दा की वजह से इन बाबाओं की ठेकेदारी कितनी बड़ी हो जाती है, कान पकड़िए, किसी बाबा के भक्त नहीं बनेंगे आप...

बुधवार, फ़रवरी 24, 2010

मंदी में महंगाई के मारे

किस पर्सन में कहें- मंदी में महंगाई के ‘मारों’ की व्यथा. राह चलते एक के बाद एक मिलते जाते हैं, ‘मारे’ एक हों तो न, यूं कहें कि घर से दफ्तर तक पूरा रास्ता मंदी में महंगाई के मारों से भरा पड़ा है. इसलिए इन पर तो एक सीरीज बनती है. क्योंकि ये ‘मारे’ भी अजीब है, जो जितना ‘मारा’ है वो उतने की भरपाई में जुटा हुआ है. किसी को अंदाजा तक नहीं, कि इस मारा-मारी में ‘मार’ सब पर दुगनी पड़ रही है.

शुरुआत करते हैं, सोसायटी मार्केट में कोने पर रेवड़ी की ठेली लगाने वाले से. मेवाड़ आइसक्रीम की ठेली से आप सभी परिचित होंगे- देसी आइसक्रीम के साथ बादाम मिल्क शेक परोसते हैं- फरवरी मार्च में आते हैं राजस्थान के दूर दराज के गांवों से और दीवाली तक वापस चले जाते हैं...

कल अचानक दिख गई थी उसकी ठेली. मार्केट के उसी कोने पर, जहां पिछले साल लगी थी. उसे देखकर अचानक ठिठका. अरे, ये तो गंगा है, ये आ गया मतलब मार्च आ गया. पिछली दीवाली पर तो यही कह कर गया था. वक्त से हफ्ता डेढ़ हफ्ता पहले आ गया, अरे हां, आखिर फरवरी भी तो खत्म ही होने वाली है...

उसे देखकर मैं मुस्कराया, उसने भी दूर से देखते सलाम किया. मैं भी दुकान पर चला गया. पिछले 2 साल से जान पहचान है. एक तरह की आत्मीयता हो गई है. 17-18 साल का लड़का है. शादी ब्याह नहीं हुआ, शहर में पिछले दो साल से आना जाना है. जितने दिन रहता है सौ-दो सौ कमा लेता है, इसी के लिए इतनी दूर से आता है, अब फरवरी में आया है, तो सीधे दीवाली पर ही जाएगा. बीच में जितनी गर्मी पड़ेगी, मेवाड़ की मलाई उतनी ही बिकेगी....

हाल चाल की बात होने के बाद उसने एक ग्लास भर बादाम शेक आगे बढ़ाया-
सर ये लो, मौसम का पहला ग्लास...
मैंने भी ये परवाह किए बिना कि जुकाम में इतना ढंडा शेक नुकसान करेगा, चम्मच से धीरे धीरे चाटना शुर कर दिया.
सोंधे दूध और देसी हाथ से बना ये शेक, कहना नहीं होगा स्वादिष्ट लगता है. कुछ देर के लिए आदमी डॉक्टरों की नसीहत भूल जाता है- ठेली वाले पानी बढ़िया यूज नहीं करते, दूध में भी मिलावट होती है, चीनी भी तीसरे चौथे दर्जे की होती है, हाईजीन के दूसरे स्टैंडर्ड भी फॉलो नहीं करते ठेली वाले, इसलिए, यहां फटकना लेकिन बीमारी, खासकर ‘इंफ्केशस डिजीज’ को दावत देना है. लेकिन ठेली वाले से इतनी आत्मीयता है कि पास जाने पर इन चीजों का ख्याल नहीं रहता.

मैंने ग्लास खाली कर दस का नोट आगे किया, जैसा कि पिछले साल करता था. इस बार उसने पैसे तो लिए, लेकिन ये कहते हुए-
सर, पांच रुपये और. इस साल 15 का रेट हो गया है.

पांच रुपये का झटका अचानक लगा. हालांकि जल्द ही ये समझ गया कि दूध और चीनी के दाम बढ़े हैं, कीमत तो ज्यादा नहीं बढ़ाई. रहन सहन और खान पान के दूसरे खर्चे भी तो बढ़ गए हैं. ग्लास पर पांच रुपये कुछ ज्यादा नहीं...जिनको पीना होगा मेवाड़ मिल्क शेक, वो पंद्रह देंगे...

वैसे देखा जाए, तो एक चीज पर एक साल में 50 परसेंट का चूना ज्यादा होता है. आदमी झेल तो लेता है, लेकिन कहीं न कहीं उसे एडजस्ट करने की सोचता है. उसकी ठेली पर से लौटते हुए मेरे भी मन में भी पांच रुपये की कचोट सी उठी-
मन में डॉक्टर की दबी हुई नसीहतें याद आने लगी.हाईजीन के सवाल प्रचंड होने लगे.

‘यार इससे बढ़िया तो वो प्रो-बायोटिक मिल्क है. हाइजीनिक भी और प्योर भी. औऱ सबसे बड़ी बात आज भी बजट में है- पिछले साल भी दस में आती थी इस साल भी. ये और बात है मल्टीनेशनल कंपनी ने दाम बढ़ाने की जगह दस मिलीलीटर मात्रा कम कर दी है, लेकिन छंटाक भर कम से क्या फर्क पड़ता है. पांच का सिक्का तो बचता है.‘

अगले दिन शाम को मैं फिर मार्केट की तरफ गया, उसकी रेड़ी की तरफ से भी गुजरा, लेकिन मेवाड़ मिल्क शेक की तलब जाने क्यों नहीं थी. उसने दुआ सलाम भी की, लेकिन मैं दूर से ही निकल गया. शॉपिंग के बाद जब गले में तराश का एहसास हुआ, तो मुझे उसकी ठेली याद आई, लेकिन तब तक मेरे कदम प्रो-बायोटिक मिल्क खरीदने के लिए बढ़ चुके थे.

10 रुपये में दो घूंट की शीशी लिए मैं वापस लौट रहा था. उसने मुझे आते हुए देखा लेकिन तब तक मैं शीशी खाली कर चुका था, और नजरे चुराते हुए घर को लौट रहा था.

मेरी जेब में पांच रुपये ज्यादा बजे थे, लेकिन मैं सोच रहा था अगर सब ऐसे ही सोचने लगे, तो इस मेवाड़ी ठेले वाले का क्या होगा? क्या ये भी ग्लास छोटा कर दाम दस रुपये कर लेगा, या धंधा मंदा होने पर अगले साल से आना बंद कर देगा?

सोमवार, फ़रवरी 22, 2010

मेरी जानिब मैं



मै किसी भी जानिब चलता
इस रफ्तार से इतनी ही मंजिल पाता
चुना था दिल से दिल्ली तक भटकना
जैसी भी हो, यही थी उस लम्हे की खता

एक हाथ आता, तो दूसरा बिखरता
एक बिखरता तो दूसरा संभलता
जब भी मुड़कर देखा किसी पड़ाव से
पीछे छुट रहे क्षितिज पर ये साफ दिखा
लेकिन बढ़ता रहा, चलता रहा है
माया में, कि मृगतृष्णा में नहीं कह सकता

मैं इसी जानिब आता
इस रास्ते तो हाथ में यही शहर आता

भाड़े पर खरीदा आशियाना,
और लिया किराये का आसमान
बेच दी हाथ की दस अंगुलिया
गिरवी रख दिए सारे अरमान

बिकता रहा वक्त भी मेरे साथ
कहने को मैं वक्त के साथ चलता रहा

मैं यही निरंतर चाहता
वो सब ले जाता, बस मेरी निशानी छोड़ जाता

बुधवार, फ़रवरी 17, 2010

रूह से रू-ब-रू एक हिंसक सवाल




हिंसा क्या है…
कई बार पूछ बैठता हूं
खून की दौड़ान से फड़कती नसों से


शब्दों से लेकर चित्रों तक
रक्तरंजित परिवेश में
एक निहायत ही हिंसक युग में
कई बार भूल जाता हूं
पिछली बार नसों ने क्या कहा था
अपने मौन बयान में

लेकिन बार बार जानना चाहता हूं

क्या हिंसा का मतलब सिर्फ ये है
कि देह की परिधि में
नसों, धमनियों के रास्ते
रूह की परिक्रमा करने वाला लहू
चमड़ी का दरवाजा तोड़ते हुए
सड़क पर बिखर जाए?


इसे क्या कहेंगे आप?
जब किसी चाहत पर
चुनी हुई चुप्पी का मुलम्मा चढ जाए
आपके सामने खून बहे
और आप आह तक न करें?


क्या कहना चाहेंगे आप?
जब देह की आयतों में
रूह के लिए कोई जगह न बचे
आप आत्मा को आसमान में छोड़ दें
और खुद साउंडप्रूफ बेडरुम में सो जाएं?


क्या आप इसे अहिंसा कहेंगे?
जब कोई अमन के ख्वाब को
चमड़ी के रंग से नापने लगे
कोई लाख फिकरे कसता रहे
आप ये मान के चलें,
अभी आवाज उठाने का वक्त नहीं!


क्या ये अहिंसा है?
जब आप अपनी डिमांड को राइट कहें
और दूसरे की मांग को
बूट से कुचल देने वाली क्रांति समझें?


मैं दिगभ्रमित,
आज जो खड़ा हुआ देह के दरवाजे पर
नसों ने मेरा स्वागत चीख से किया
खून भरी आंखों की कर्णभेदी चीखों से
दहशत से भरी मेरी आंखों में
आंख डाल कर चीखने लगी मेरी नसें-
हिंसा...
खून से सनी एक कुंठा है
छींटे तो इसके कुछ इसी तरह पड़ते हैं...
किसकी गरदन, किसकी देह, किसकी रूह
ये जाने बिना किसी के ऊपर पड़ जाते हैं
छींटे,
इंसानी शक्ल के जानवर के अंदर
लगातार लाल हो रहे शैतानी देह के


हिंसा...
बारूद के ढेर पर बलखाती कोई नचनिया है
लाल जोड़े में सजी एक खिलंदड़ी
रुपये लुटाने वालों के हर इशारे पर
अपनी मस्ती में चूर होती जुनूनजादी
हरामजादी,
पैरों तले माटी के मुलायम रोड़े रौंदती जाती है
लेकिन कभी गिनती नहीं करती
कितने रोड़ों को धूल में तब्दील कर दिया


हिंसा खून की दौड़ान का थम जाना है
हिंसा जीव के अंदर से रूह का रुखसत हो जाना
तुम्हारे पास कोई और परिभाषा है
तो बताओ?

शनिवार, फ़रवरी 13, 2010

और पड़ो 'ठाकरों' के पीछे!

लो, हो गया जिसका डर था...पुणे में आतंकियों ने 10 की जान ले ली, सुबह तक जाने ये तादाद और कितनी बढ़ेगी...

कहां तो वेलेंटाइन डे पर कुछ नरम सी पंक्तियां लिखने के लिए कंप्यूटर खोला था...लेकिन उससे पहले टीवी पर लगातार ब्लास्ट की खबर...

और पड़ो ठाकरों के पीछे, और बनाओ मुद्दा उस बात को जो है नहीं, दहशत के सौदागर इसी फिराक में रहते हैं, कब लोहा गर्म हुआ कि चोट किया जाए...

क्या हासिल हुआ ठाकरे को चमका कर. सबको पता था, ठाकरे के दो चार दस गुंडे कुछ नहीं बिगाड़ेंगे खान का, कहीं कुछ तोड़ फोड़ करते तो सरकार निपट लेती, 50 साल से निपट ही रही थी, आज उसकी बात को तनिक भी हवा नहीं देनी थी- क्या कह रहा है, क्या धमकी दे रहा है, किस गंदी जुबान में बात कर रहा है...

ऐसा कहकर बोलकर, गरिया कर, हफ्ते भर तक मीडिया को हाईजैक किए रखा. जैसे पहली बार कोई नफरत भरी फुंफकार मारी हो, ले दे कर पीछे पड़े गए...हर खबर को भुलाकर. और सब मुद्दे तो छोड़ो न, महंगाई और मंदी तो सियासत का एक हिस्सा है, इस पर हर खबर की अपनी राय है, सख्त तेवर किसी के भी नहीं, जैसे सब सरकार के चट्टे बट्टे हैं, लेकिन देश की सुरक्षा...उसका जायजा...सबकुछ ठाकरे की जुबान पर कुरबान कर दिया गया. कभी सोचा किसी ने इस एक हफ्ते में कि...

सरकार क्या कर रही है
खुफिया एजेंसियां क्या कर रही है
सिक्योरिटी फोर्सेज की तैयारी कितनी है
सिक्योरिटी स्ट्रैटजी कैसी है देश की
निगरानी किस तरह और कितनी हो रही है
खुफिया इनपुट्स की एनालिसिस किस तरह हो रही है
केन्द्र और राज्य का को-ऑर्डिनेशन कैसा है

दूर दूर तक कहीं कोई खबर नहीं. मीडिया अपने को पहरेदार कहता है, तो इन सवालों को पहरा कौन देगा, कौन इनके उत्तर के लिए गन माइक और कैमरा भांजेगा...कौन इन सवाल के प्रहार से सरकार के पिछवाड़े पर बेंत मारेगा..?

ये ठाकरे में क्या रखा है, वो तो न कुछ करेंगे, न करने देंगे. मुंबई हमले में देखा नहीं था- सड़क पर न ठाकरों का पता था न 'सेना' का...सब दुम दबाए बैठे थे,कहां के राष्ट्रभक्त हैं, इनके रहने न रहने, कहने न कहने से कोई फर्क पड़ेगा?

इन्हें मुंह मत लगाना आइन्दे से भैया, नहीं तो लगाओ,तो डंडा करने के बाद ही छोड़ो, कि आगे एक शब्द लिखने से पहले सौ बार सोचें, वर्ना कुछ करो ही मत. वर्ना तुम्हारा मुद्दा चुनने का सेंस ही खत्म हो जाएगा. ऐसे ही धमाके होते रहेंगे, और तुम लंबे लंबे विजुअल चलाते रहोगे, एक स्कीन पर कई विंडो बना कर.

अब मत पड़ना ठाकरे के पीछे, भाव ही मत देना, नहीं तो ये ठाकरे देश को अपने नफरत से रसातल में भेज देगा. तुम्हारे कैमरे का इस्तेमाल कर तुमपर ही निशाना साधेगा और...

आप कल्पना भी नहीं कर सकते है- भोजपुरी में कहावत है- कुक्कुर के पल्ले पड़ने पर हमेशा खाई में ही ले जाएगा, वही ठाकरे करेगा. कभी मजहब की खाई, कभी आतंक की...

गुरुवार, फ़रवरी 11, 2010

ठाकरेगर्दी- गुंडों की डिक्शनरी में नया शब्द



खत्म कर दो ठाकरे की ठसक
ठाकरे को ठोक दो
ठाकरे को ठेल दो जेल में
नही चलेगी ये ठाकरेगर्दी

टीवी पर एक से बढ़कर एक स्लग देखने को मिल रहे है (इनमें से कुछ मैने भी बनाए हैं) लेकिन कोई असर पड़ रहा है क्या?

पूरे कुनबे ने मीडिया को हाईजैक कर लिया है. एक के बाद एक बुलेटिन एक के बाद एक स्पेशल सब ठाकरे को समर्पित...

जितनी गाली गलौच 'सामना' के गुंडे करते हैं, उससे 'भारी भरकम शब्द'(थोड़ी सभ्य भाषा में) टीवी पर सुनाई दे रहे हैं. लेकिन 'मातोश्री'के बाशिंदो को कोई फर्क नहीं पड़ रहा. जैसे मंद मंद मुस्करा रहे हो- दे लो बेटा, दे लो, ये तो हमारा पचासो साल पुराना खेल है, जितना खेलोगे हमारे तो उतने ही मजे हैं- दो जी भर के, निकाल लो अपनी भड़ास...हमारी तो फितरत है, न कुछ करेंगे, न कुछ करने देंगे...

'ठाकरेगर्दी' मातोश्री के इसी पचास साल के खेल की उपलब्धि है- यूं कहें की सबसे बड़ी उपलब्धि. इससे पहले क्या क्या नहीं किया ठाकरे घराने ने- पिच खोदने से लेकर उत्तर भारतीयों को भगाने का बीड़ा उठाने तक, लेकिन ऐसा धांसू विशेषण कभी नहीं मिला-जो 'खान' की खिलाफत में मिला. मातोश्री में तो जश्न है इस उपलब्धि पर...

आखिर करना क्या होता है. जितनी रात को मैं ठाकरेगर्दी की व्याख्या कर रहा हूं, उतनी रात को रोज एक पेज लिखना होता है- कुछ नए स्लग्स और हेडर के साथ. फिर सुबह अपने आप ही हंगामा मच जाता है. विजुअल न होते हुए भी कुछ सड़े हुए शब्द छांटकर टीवी वाले शुरु हो जाते हैं. ठाकरे ने ये कह दिया, ठाकरे ने वो कह दिया...अरे यार, आफत हो गई.

इससे तो बड़ी आफत तब, जब कोई प्रोड्यूसर कोई शब्द या एंगिल मिस करे, फिर तो संपादक महोदय जैसे खा जाएंगे- जाहिल कहीं के, जिस शब्द से टीआरपी मिलेगी, वही मिस कर गए- कैसे पापी प्रोड्यूसर हो, टीआरपी को पैदा होने से पहले ही गला घोंट देते हो...

और ये बात जैसे ठाकरे अपने चेंबर में बैठकर सुन रहे होते हैं, अगली सुबह रोज नया जुमला मारते हैं, और बेचारा प्रोड्यूसर...

खैर, यहां प्रोड्यूसर का दर्द कोई मायने नहीं रखता, पत्रकारिता की नौकरी में ये तो बहुत छोटा सा दर्द है, बड़ा दर्द ये है कि चाहते हुए भी कोई शब्द सार्थक नहीं बन पड़ता. न बहस सार्थक न असर सार्थक. जितना दिखाया, उतना ही मामला बिगड़ता गया, जितना ठोका, उतना ही हौसला बढ़ता गया. न 'खान' की मुसीबत कम हुई, न सरकार पर कार्रवाई का दवाब बढ़ा, जो जैसा था, वैसा ही रहा. ले दे कर कई चैनलों की टीआरपी जरूर बढ़ी, लेकिन उसका क्या अचार डालेगा प्रोड्सूयर?

कहते हैं पत्रकारों में अब वो बात नहीं, ठोकने की वो ताकत नहीं, वो जोश नहीं, वो होश नहीं...कहां से रहेगा भैया. कई दिन की माथापच्ची के बाद मिलता क्या है- गुंडागर्दी का एक पर्याय- ठाकरेगर्दी. अब इसे ही गोद में लेकर हिला रहे हैं, जैसे अपना पैदा किया हुआ खेलाते हैं- एक गुंड किस्म की औलाद ठाकरेगर्दी...

हाय रे बदकिस्मती! कम से कम कान में ही फुसफुसा दे- तू किसकी पैदा की हुई है बदजात!

मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

एक गुजरा हुआ, एक जूठा सा लम्हा...



उस दिन मुट्ठी में
जैसे आसमान भर लिया था

मारे रोमांच के उस फरवरी की
खुश्क ढंडक में ऐसे सिहर गया था देह
जैसे गोल घूमती दुनिया
मुझे भी अपने साथ नचा गई हो.

अल्लाह के करम जैसे वो होंठ
मुझ बंजारे पर रहमतों की बारिश कर रहे थे

मेरे कदम जमीं पर नहीं पड़ रहे थे
दो देह आंखों ही जुबान में एक हो रहे थे
गजब ये कि दोनों अपनी जगह से विस्तार ले रहे थे

सामने अपनी छवि की एक और देह पड़ी थी
जैसे एक छवि की दो काया बन गई हो

गजब था वो रोमांच-
होने और न बचने की निश्चितता के बीच
देह के उस दोहरापन का

दो देहों के बीच
सिमटती हुई-पिसती हुई
मोटी भैंस जितनी गोरी- वो काली मनहूस दूरी
और देह की हद तोड़कर
रूह तक समा जाने का वो जोश जोश

गजब की थी
वो 9 फरवरी,
जब एक लम्हे के लिए
आसमान मेरी मुट्ठी में सिमटने उतर आया था

वो आसमान
कई बार मेरे कमरे की छत से टपकता है
संगमरमर सी फर्श पर
गिर कर चकनाचूर हो जाता है
हर रोजृ कई बार

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

और भी कुछ कहता है ठाकरे का 'काला झंडा'


स्वागत में काले झंडे?
जिनकी करतूतें काली वो झंडे का रंग भी काला ही चुनते हैं। जरा सोचिए सन्यासियों के चोले पहनने वाले की फितरत इतनी काली क्यों है?

वैसे इस पर सोचने से कोई फायदा नहीं, क्योंकि काले में कितनी कालिख मिली हुई है, इसका पता लगाना तकनीकि रूप से मुमकिन नहीं. लेकिन ठाकरे का काला झंडा और भी बहुत कुछ कहता है, कोई और होता तो शिवसेना के गुंडे लाठियों और डंडों से स्वागत करते, लेकिन ये राहुल हैं...राहुल से आगे झंडे से ज्यादा की औकात नहीं शिवसेना के नकली शेरों की...

इसी से अंदाजा लगाइए, शिवसेना की मुंबई में औकात और मौके के हिसाब से राजनीति करने की फितरत. बेचारा उद्धव, राहुल की मुंबई यात्रा की खबर सुनकर ही डर गया, बाप काला झंडा दिखाने की फरमान कर रहा था, तो बेटा कह रहा था- इस मौके पर राहुल को मुंबई आने की क्या जरूरत थी? (अब तुझ जैसे सनकियों से कोई पूछकर मुंबई जाएगा? या घुसने से पहले इजाजत लेनी पड़े या चुंगी देनी पड़े?) तुम्हारी जुबान में राहुल बोलते तो यही कहते- मुंबई तुम्हारे बाप की है क्या?

ठाकरे तो चाहते हैं, सारी दुनिया उन्ही की जुबान बोले, बात बात में अपनी जुबान गंदी करे. ये नफरत की गंदी सियासत है. उसी ढर्रे पर चल रहा है 'चाचे' का बागी 'भतीजा' लेकिन डर उसका भी कम नहीं, वो जानता है अपनी औकात, तभी तो आखिरी वक्त तक तय ही नहीं कर पाया, राहुए आएंगें, तमाम गिदड़भभकियों को धत्ता बताएंगे, तो कि किस रंग के झंडे में मुंह छिपाएंगे. जो भी है वो सिर्फ जुबानी धमकियों में ही है. कई मौकों पर जाहिर हो चुका है, सैनिक कहे जाने वाले ये गुंडे कायर हैं, और राहुल के आगे तो भींगी बिल्ली...

कम ऑन राहुल, गो ऑन...

गुरुवार, फ़रवरी 04, 2010

एक बयान बॉलीवुड के खिलाफ


देश से मुंबई को अलग करने की बात कर रहा है ठाकरे कुनबा...
शाहरुख खान को पाकिस्तान भेजने की बात कर रहा है ठाकरे परिवार...
शाहरुख का समर्थन करने वालों को धमका रहे हैं ठाकरे के गुण्डे
फिर भी, चुप है बॉलीवुड. आखिर क्यों? 

ब्लॉग और ट्विटर पर कुछ टिप्पणियों को छोड़ दें, तो बॉलीवुड ठाकरे की तमाम गुंडागर्दी के बाद भी पूरी तरह नहीं जागा ज्यादातर की जुबान अब भी सिली हुई है, जिनके बोलने से फर्क पड़ता, आखिर क्यों...
ठाकरे से क्यों डरता है बॉलीवुड?
ठाकरे के दर पर क्यों झुकता है बॉलीवुड?
ठाकरे के आगे कमजोर क्यों है बॉलीवुड?


वजह चाहे जो हो, बॉलीवुड की इसी कमजोरी का फायदा उठाता रहा है ठाकरे कुनबा.मातोश्री में बैठकर बॉलीवुड के लिए फतवे जारी करना बाल ठाकरे का कोई नया शगल नहीं. अब तो ऐसा करने के लिए एक और ठाकरे पैदा हो गया, जो अपने चाचा की तर्ज पर ब़ॉलीवुड को डराता है, धमकाता है, अपनी बात मनवाता है, और यहां तक कि माफी भी मंगवाता है  

राज ठाकरे से माफी मांग कर करण जौहर नो तो हद कर दी थी. मामला था उनकी फिल्म वेक अप सिड में मुंबई की जगह बंबई शब्द के इस्तेमाल का, जिस पर भड़क गए राज ठाकरे. इस बयान पर पूरा देश, पूरी मीडिया करन जौहर के साथ था, लेकिन  करण को ज्यादा परवाह थी राज ठाकर के गुस्से की...और वो पहुंच गए राज ठाकरे से माफी मांगने...
 
ये वही करण जौहर है, जिनके प्रोडक्शन की फिल्म माइ नेम इज खान ठाकरे कुनबे के गुस्से का खामियाजा भुगत रही है, लेकिन करण के मुंह से बोल तक नहीं फुट रहे. शाहरुख तो लाख बवाल मचने के बाद भी अपने बयान पर डटे रहे, लेकिन लगता है करण जौहर की हिम्मत एक बयान भर की भी नहीं
 
लेकिन बात सिर्फ करन जौहर या फिर शाहरुख की नहीं, मसला देशहित का है, जिस पर बॉलीवुड फिल्में तो बड़ी बड़ी बनाता है, बातें भी बड़ी बड़ी करता है, लेकिन ठाकरे की गुंडागर्दी के  सामने नतमस्तक है, वो भी तब, जब इस गुंडागर्दी मार सीधे फिल्म इंडस्ट्री पर पड़ रही है.

दूसरों की कौन कहे, मिलेनियम स्टार कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन परिवार समेत मातोश्री में मत्था टेकने को तैयार हैं. बाल ठाकरे ने अमिताभ की हालिया रिलीज फिल्म रण की तारीफ क्या कर दी, बिग बी ठाकरे के लिए रण का स्पेशल शो आयोजित करने की तैयारी में हैं. ठीक उसी तरह जैसे पा को गुजरात में टैक्स फ्री करने के प्रस्ताव पर दंगे से दागदार गुजरात के ब्रैंड अंब्सेडर बनने के लिए तैयार हो गए बिग बी. अमिताभ की पत्नी भी बाल ठाकरे की मुरीद हैं. राज ठाकरे ने जब बच्चन परिवार का जीना मुहाल कर दिया, तब जया ने कहा था- मैं तो सिर्फ एक ठाकरे को जानती हूं- वो है बाल ठाकरे.अब क्या बच्चन परिवार बताएगा, कि राज ठाकरे और बाल ठाकरे में क्या फर्क है? शाहरुख पर तो तो दोनों की एकमुश्त मार पड़ रही है?

ठाकरे का वार दिलीप कुमार जैसे स्टार भी झेल चुके हैं. दिलीप कुमार ने पाक के सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान कबूल करने की बात क्या कही, ठाकरे को मौका मिल  गया अपनी राजनीति चमकाने का. दिलीप कुमार से पुरानी दोस्ती को भूलाकर बाल ठाकरे ने उन्हें देश का दुश्मन करार दे दिया था..
 
आज वही, शाहरुख हैं के साथ हो रहा है, कल कोई और भी हो सकता है...वो संजय दत्त भी हो सकते हैं, जो कई बार ठाकरे को आदर्श बता चुके हैं. वो सलमान खान भी हो सकते हैं, जो ठाकरे परिवार के करीबी कहे जाते हैं. लेकिन शाहरुख पर इतना कुछ गुजरने के बाद भी दोनों खुल कर समने नहीं आ रहे.
 
इस मामले पर आमिर ने अपनी राय जरूर जाहिर किया, आमिर ने शाहरुख के बयान को जायज ठहराया, लेकिन आमिर पर भी भड़क गए ठाकरे, तो क्या इसी अंजाम से डरते हैं दूसरे सितारे, ठाकरे का गुस्सा मोल लेना नहीं चाहता बॉलीवुड? आखिर क्यों, क्या मुंबई में ठाकरे का राज चलता है।

गुरुवार, जनवरी 28, 2010

इतना गहरा गीत...



ये गीत नहीं इबादत है इश्क की, और ये वही कर सकता है, जो इसे महसूस करता है. ये सिर्फ अलफाज नहीं, जीते जागते अहसास हैं, जो गुलजार साहब ने एक फिल्मी गीत में उड़ेल दिया है...

ऐसी उलझी नजर उनसे हटती नहीं
दांत से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र कब की बरस के सफेद हो गई
कारी बदरी जवानी की छटती नहीं
मन लगे धड़कन बढ़ने लगी है
चेहरे की रंगत उड़ने लगी है

डर लगता है तन्हा सोने में जी
दिल तो बच्चा है जी
थोड़ा कच्चा है जी.....

आशिक का हाल ये नया नहीं हैं, लेकिन गुलजार साहब के अलफाजों ने इसे आज के दौर में नई गहराई दी है. डर को इश्क की गहराई बना दी है अलफाजों ने. और आशिक का बचपना...जरा दूसरा अंतरा देखिए

किसको पता था पहलू में रखा
दिल ऐसा पाजी भी होगा
हम तो हमेशा समझते थे कोई
हम जैसा हाजी ही होगा
हाय जोर करें
कितना शोर करें
बेवाज़ा बातें पे ऐंवे गौर करें
दिल सा कोई कमीना नहीं
कोई तो रोके कोई तो टोके
इस उम्र में अब खाओगे धोखे

डर लगता है इश्क करने में जी
दिल तो बच्चा है जी...

सोचिए जी सोचिए, गुलजार साहब कुछ कह रहे हैं, इस उम्र में भी इश्क का सलीका सीखा रहे हैं. लेकिन इस जमाने में जब प्यार को सौदे की तरह ट्रीट किया जा रहा है. टीवी पर 'इमोशनल अत्याचार' का स्टिंग हो रहा है, प्यार का ये एहसास अपनी ठसक के साथ हाजिर होता है.

शुक्रवार, जनवरी 22, 2010

ये मेरे दद्दा का आपीएल है



वीर की तरह गरज रहे हैं फ्रेंजाइजी ओनर्स- ये मेरे दद्दा का आईपीएल पाकिस्तान को छोड़कर हर देश के खिलाड़ी के लिए है...
लेकिन पाक (खिलाड़ी और सरकार) को ये सुनाई ही नहीं दे रहा. सब सुनाई दे रहा है, लेकिन ये दद्दा वाला एंगिल नहीं दिख रहा जबकि टाइटिल से ही क्लीयर है, आईपीएल में चलेगी अपनी मर्जी.

लेकिन मर्जी पर बहस बड़ी हो चली है.
ये कैसी कैसी मर्जी
किसकी है ये मर्जी
ऐसी मनमर्जी क्यों?

ये मर्जी है शाहरुख खान की, प्रीति जिंटा की, शिल्पा शेट्टी की और विजय माल्या का. अब जरा कनेक्शन देखिए, आईपीएल का ये वो तबका है, जो मुंबई से ताल्लुक रखता है. वो मुंबई, जिसकी तारीख में आतंकियों ने 26/11 का काला अध्याय जोड़ दिया. जिस पाकिस्तानी की धरती से आए थे आतंकी, उस धरती के लालों को इसी का तो सिला मिल रहा है.

लेकिन पाक खिलाड़ियों को ये बात समझ नहीं आ रही. तने हुए रिश्तों में ये उम्मीद भी कैसे पाल रहे थे पाक खिलाड़ी- कि भारत के क्रिकेट बाजार में उनकी पहले जैसी ही बोली लगेगी. आईपीएल में नीलामी से पहले तक पाकिस्तान सबूत सबूत चिल्लाता रहा था. तब कहां गए थे ये खिलाड़ी- कि पड़ोसी और मित्र देश के साथ ऐसी अनदेखी ठीक नहीं.

कहने को तो बहुत पाकिस्तान में ये पॉपुलर हैं, लेकिन फिर सचिन, शाहरुख जैसी अपील क्यों नहीं करते- हम भाई भाई हैं. सरकार को भी भाइचारे का ख्याल रखना चाहिए. लेकिन जब इस तने हुए रिश्ते का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, तो सियासत का राग अलाप रहे हैं खिलाड़ी, क्रिकेट में सियासत मिलाया जा रहा है.

ये बिलकुल गलत है, दोनो देशों के बीच अमन की आशा में क्रिकेट एक अहम कड़ी है, और इसमें सियासत नहीं मिलाई जानी चाहिए, लेकिन जनमानस का क्या करें. जनता पाकिस्तान की वर्डकप में जीत का दुआ मांगती है, लेकिन हमले के बाद पाकिस्तान के दोमुंहेपन पर आह भी भरती है. ये ठीक है, कि अपने पाले हुए आतंक का सबसे बड़ा शिकार खुद पाकिस्तान भी है, लेकिन सारी दुनिया से सबूत मांगने के बाद भारत से बार बार सूबत की मांग करने का क्या तुक?

आखिर भारत से किस भाईचारे की उम्मीद रखते हैं पाक खिलाड़ी? उन्हें भी पता है भारतीय जनमानसा का, कि 26/11, खासकर इसके बाद पाक सरकार के टालमोटल के बाद कैसे एंटी-पाकिस्तान हो गया है. अगर आईपीएल के फ्रेंचाइजी भी ऐसा समझते हैं, तो बुरा क्या है? वैसे भी खिलाड़ी खरीदना उनका निजी मामला है. फिर इतनी हाय तौबा क्यों?

ऐसा तो कतई नहीं, कि आईपीएल में खेलने का मौका देने के बाद पाक सरकार सुधर जाती, या पाक में पॉपुलर ये खिलाड़ी संबंध बेहतर बनाने के लिए अपने देश में जनमत तैयार करते? अगर ऐसा नहीं, तो ये पूरी बहस ही बेकार है.

रविवार, जनवरी 17, 2010

ज्योति दा, जवाब भी तो देते जाते!


"तुम खाना खा रहे हो और तुम्हारी थाली पर कोई लात मार दे, तो क्या करोगे?
इस सवाल का जवाब ईमानदारी से दो, वामपंथ का मूलमंत्र तुम्हें समझ आ जाएगा"


19 साल बाद अचानक गूंज पड़े ज्योति दा के वो अलफाज, जो उन्होंने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था. वो कॉलेज के दिन थे, बीए में पढ़ते थे, जब ज्योति दा 1991 के चुनाव अभियान में बिहार आए थे.

उस दौर में गजब की थी उनके चेहरे पर चमक. बौद्धिकता उनके पूरे व्यक्तित्व से टपकती थी, उजले उजले बाल, सफेद धोती-कुर्ता, मटमैटले खादी की जैकेट और मोटे वाला चश्मा- भीड़ में अगर न भी पहचाते, तो कह देते- यही ज्योति दा हैं.

चुनावी सभा के दौरान उनसे मिलना हुआ था. तब बिहार में आईपीएफ का उदय हो रहा था, वामपंथी राजनीति हिंसा का रूप ले रही थी. ये बहस का बड़ा मुद्दा था. हिम्मत तो नहीं हो रही थी, लेकिन प्रश्न को बाल-सुलभ बना कर पूछ लिया था वामपंथी राजनीति का मतलब...

इस सवाल का जवाब जिस सरलता से ज्योति दा ने दिया, वो आज भी गूंजता है. 'बाजार के बीचों बीच' बस जाने के बाद ये सवाल और भी सालता है, और जवाब उतना ही बेचैन करता है...

सच कहें, तो पेट ने इस सवाल पर कभी सोचने का मौका ही नहीं दिया, और न कभी ज्योति दा से मिलना हुआ- बस अपनी 'थाली' बचाते रह गए...

वो एक रात की गर्दिश में इतना हार गया
लिबास पहने रहा और बदन उतार गया