रविवार, नवंबर 29, 2009

लो, अब झेलो 'बैताल बे-अदब'* को...




जब से हुए हैं जिल्ल-ए-सुब्हानी मेरे खिलाफ
मुंसिफ मेरे खिलाफ, गवाही मेरे खिलाफ
मेरी तो एक बात भी पहुंची न उसके पास
उसने तो जो सुना, सुना ही मेरे खिलाफ
इस बार आसमां वाले भी मेरे खिलाफ हैं
ये शहरवाले तो पहले से ही थे खिलाफ


हमारी लेखनी तो आपके लिए लिजलिजी ही साबित हुई, लीजिए, अब झेलिए इस बेकाबू बैताल को.

भाई जान, दोस्त बन गए हैं, दफ्तर में बगल की सीट पर बैठते बैठते. तुलसी रजनीगंधा खाने वाली 'बुर्जुआ जमात' से ताल्लुक बताते हैं. लीकर नहीं, कभी कभार बीयर पी लेते हैं. सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाते, खैनी कभी कभार दाब लेते हैं.

लखनऊ के रहने वाले हैं, इससे ज्यादा मैं उनके बारे में बताऊ, ये उनको गवारा नहीं. सो परिचय इतने ही तक. एक खासियत है, जो मैं आपको खासतौर पर बताना चाहुंगा- मियां बात-बात में ऐसा वजनदार शेर मारते हैं, कि हिलाकर रख देते हैं. सुनकर दिल इतना बाग बाग हो जाता है कि मैं कई बार कह बैठता हूं-
'मियां, जिस दिन अकबर जैसी हैसियत हुई, आपको दरबार का रत्न बना कर रख लेंगे.

ऐसे 'रिटर्न्स' पर भाई की घनी मूछों के बीच से फू'ता ठहाका क्या नवाबी होता है. अक्सर 'शराफत की चुप्पी' ओढे रहते हैं, लेकिन खबर की मार पर इतने भद्दे तरीके से बिलबिलाते हैं, कि पूरा चोला गंदा कर देते हैं- बड़ा करारा करंट(सवाल) मारता है भाई- मुंबई हमले की बरसी पर तो जैसे हमलावर ही हो गए-

जरा मुजाहिरा किजिए...

'कुमार साहब, मैं तो 'हमला' हो गया, हमला देखते देखते 12 महीने के पेट से हो गया....'दफ्तर से निकलते ही भाईजान फट पड़े. लग गया, बेटा आज तो चाय की दुकान पर बवाल हुआ. मैंने पहले ही संभालने की कोशिश की-

26 नवंबर पर कई चीजें अच्छी हुईं. बहादुरों को टीवी के जरिए देश ने सलाम किया. एक साल बाद के फर्क का अंदाजा हुआ....

लेकिन भाई जान तो अलग ही मूड में थे-
लेकिन जो भी हुआ वो टीवी पर ही हुआ. वो भी हमले को बेशर्मी से बेचने की होड़ के साथ....

इतना कहने के साथ ही भाई साहब 'हेडर' और 'प्वाइंटर' के साथ 'चीर फाड़' करने लगे

ये बेचने की होड़ नहीं तो क्या थी?
जो तारीख(26/11) से तीन दिन पहले ही हमले का 'रीक्रियेशन' दिखने लगा, और तारीख आने तक हमला इतनी बार रिपीट हुआ कि आंखे एक साल पहले हमले के खून से भर गईं.
तारीख के मुताबिक हमला आज भी जारी था, कल भी और परसों भी जारी रहने वाला है, लेकिन तारीख खत्म होते होते हाथी के पेट में गुम हो गया जज्बा.

ये टीवी का हव्वा नहीं तो क्या था?
किसी ने फिल्म बनाई, तो किसी ने डॉक्यूमेंट्री तो किसी ने 'स्पेशल'. किसी ने एलबम बेचा, तो किसी ने शॉर्ट फिल्म बेच डाली(एक घंटे की फिल्म 10 ब्रेक के साथ) अगर ये मौका इतना ही बड़ा था देश के लिए, तो प्रधानमंत्री ने पहली बरसी को इतना सीरियसली क्यों नहीं लिया? ऐसा होता तो वो अमेरिका में दावत उड़ा रहे होते? ऐसा नहीं कि उनका दौरा अचानक हुआ होगा. महीने भर पहले तो प्लान हुआ ही होगा. फिर इतने बड़े मौके पर विदेश क्यों गए. इस पर मीडिया की मौन समहति देखिए. अपनी धुन में किसी को उनका देश में न होना खटका तक नहीं. मनमोहन पर इतना मोहित है मीडिया कि कोई अंजान दंपति घुसा ओबामा की दावत में और देश में हेडलाइन बनी- पीएम की सुरक्षा में चूक!

भला ऐसी भी देशभक्ति होती है, भला ऐसा भी कहीं 'एहतियात' होता है?
कल तक लाचार थीं खुफिया एजेंसियां, सुरक्षा एजेंसियां भी निहत्थी थीं कल तक, सियासतदां निठल्ले थे, एक दिन में इतने 'जज्बेदार' कहां से हो गए
ये आतंकवाद के खिलाफ एकजुट दिखने की औपचारिकता नहीं थी तो क्या थी?
जो हमले की विभत्स तस्वीरो को हू-ब-हू दिखाने की होड़ में बुनियादी बातें 'खूनी कालीन' के नीचे दबा दी गईं. नकली किरदारों और 'फर्जी फायरिंग' के शोर में गुम हो गया वो जज्बा....

मैंने बीच में रोका, भाई बात बड़ा बवाली कर रहे हो, चुप रहो, हिंदी से अंग्रेस तक कहीं जगह नहीं मिलेगी. चुप करो. इस पर वो आहिस्ता तो हुए लेकिन शोर भुनभुनाहट में बदल गया.

अब यार, साले लोग, कमीशन के चक्कर में पीड़ितों का मुआवजा तक रोके हुए हैं, और हम उनके घड़ियाली आंसू दिखाने को मजबूर हैं. वो पाटील बार बार गृहमंत्री बन जाता है, सियासत की सौदेबाजी पर ढंग से एक सवाल भी नहीं खड़ा कर पाते.
संसद में सवाल उठा भी तो, खबरों में सदन में दो मिनट की चुप्पी दिखाई गई. दाब दी गई वो खबर, कि आज तक कितनों को मुआवजा मिला और कितनों का दाब दिया गया. ऐसा लग रहा हो, मुंबई पर हमला हमला नहीं, मुफ्त का एडवेंचरस माल हो, जितना चाहो जिस एंगल से चाहो, दिखाते रहो. ये खबर अभियान बनने लायक थी...एक आध अंग्रेजी चैनलों पर दिखा भी, तो कुछ उखड़ा नहीं....

अरे ठीक है, रीढ़ की हड्डी सीधी नहीं, सिर्फ इमोशनल-इमोशनल ही खेलना है, तो ढंग से खेलो. दिन भर कसाब कसाब चिल्लाते रहते हो, कुछ पता भी है, कसाब के 9 साथी कहां हैं, उनका क्या हुआ. ससूरों की लाश अब तक सड़ रही है. केमिकल के साथ जली भुनी लाश कितने तक बची रहती. अस्पताल की मोर्चरी में सड़ रही है. सालों को दो गज जमीन नसीब नहीं हो रही है. देश के मुसलमानों ने कह दिया है, अपने वतन की धरती पर दुश्मनों के लिए कोई जगह नहीं. कोई अपने इलाके के कब्रिस्तान में उन्हें जगह देने को तैयार नहीं. कोर्ट से आदेश निकल चुका है. लेकिन नहीं. ये कितनी बड़ी बात है कौमी एकता और एकजुटता के लिए. लेकिन हमें तो भैया कसाब को बोलता दिखाना है.

उफफफफफफफफफ...ये आदमी बेचैन कर देता है यार...

* भई जी हल्के में मत लीजिएगा स्टार को, ट्रेड मार्क है. अब बैताल बे-अदब नाम से मेरे ब्लॉग पर कॉलम लिखा करेंगे.

रविवार, नवंबर 22, 2009

क्यों नहीं कर दिया जाए ठाकरे को बैन?



अगर लोकतांत्रिक सिद्धांतो की कसौटी पर देखा जाए बहुत ओछी बात है. लेकिन सवाल है, कि क्या उस शख्स को लोकतंत्र की परवाह है? जो खुद अपनी तर्जनी को तमाम कायदे कानूनों से ऊपर मानता हो, और जब चाहे, जिस पर चाहे, चाहे जो भी उसके 'हितो' के खिलाफ खड़ा हो, उस पर हमला कर दे, बयान छोड़ो, सामना का कोई अंक उठाकर देख लो- हर वाक्य में असंसदीय शब्द गुंथे पड़े है. ठाकरे की भाषा में गढ़ा गया हर मुहावरा एक गाली की तरह है. उस शख्स को इतना भाव क्यों?


ऐसी भावना ठाकरे के 'हमलों' से आहत हर दिल की होगी. लेकिन सुबह कैब में सच के जिस अंदाज से सामना हुआ, उसने मुझे आप लोगों से कुछ कहने को मजबूर कर दिया. वर्ना बात तो दो दिन पुरानी हो चुकी है.

कैब में बैठा वो शख्स ओबी वैन(जिसके जरिए खबरें लाइव दिखाई जाती है) का ड्राईवर है. पड़ोस में ही रहता है, और अक्सर मुझसे पहले कैब में बैठा हुआ होता है. कैब मेरे पिक अप प्वाइंट पर पहुंची, तो मैंने कार में कुछ शोर गुल सुना. बैठा तो देखा- वैन के ड्राइवर का चेहरा तमतमाया हुआ था. बात छिड़ी थी चैनल पर ठाकरे के गुंडों के हमले की. बाल ठाकरे के समर्थन वाले बयान की, 'सामना' में हमले को जायज ठहराने की. मेरे आने पर आवाज थोड़ी नीची हुई, लेकिन मैं महसूस कर सकता था उसका गुस्सा-

'ये क्या हो रहा है सर, बताइए, एक आदमी सरेआम हमला करवाता है, और अगले दिन उसे अखबार में लिखकर जायज ठहराता है, और हम उसे राष्ट्रीय खबर बनाते हैं, बकायदा उसके नफरत भरे शब्दों को ग्राफिक्स बनवा कर दिखाते हैं. आपको नहीं लगता ठाकरे हमारे हथियार से हमीं पर हमला करता है.'

मैने सुबह की सर्दी में हाथ मलते अनमने से जवाब दिया- क्या हो गया भाई, आज सुबह सुबह गरम हो रहो, आज क्या कर दिया ठाकरे ने?

'कुछ हुआ नहीं, मैं आप सब सीनियर्स से सवाल पूछ रहा हूं- हम तो ओवी वैन चलाने वाले ठहरे, जहां कहोगे वहीं गाड़ी लगा देंगे, वहां से चाहे तुम जो दिखाओ, लेकिन हमारा भी कुछ मन करता है. आप सच्ची बताइए, क्या ठाकरे को सिर चढ़ाने वाले हमीं नहीं? '

मैं उसके इस 'कनक्लूजन' से हिल गया- ऐसा कैसे कह सकते हो...

'अरे सर, चुनावों में कई बार साबित हो चुका है ठाकरे का सच, फिर भी हम उसे मराठा छत्रप की तरह पेश करते हैं. मराठी को लेकर जो भी बोल दे, जो भी कह दे- बिना सोचे समझे दिन भर ताने रहते हैं- ठाकरे ने ये बोल दिया, बड़ा संकट आ गया. अरे काहे का संकट- उसके बोलने से खुद महाराष्ट्र में फर्क पडता है क्या? अगर पड़ता तो महाराष्ट्र कब का देश से अलग हो गया होता...

'अच्छा ये राज ठाकरे को देखो ना, ये जो 13 सीटें मिली हैं उसी मीडिया वालों ने ही दिलवाई हैं. पुरबियों पर हमले कर कर पहले तो टीवी पर छा गया, नफरत के नये सरदार के रूप में ही सही, टीवी ने उसे हीरो बना दिया. क्या जरूरत थी ऐसे निगेटिव हीरो का एजेंडा दिखाने की? चैनल वाले किस मुंह से उसका इंटरव्यू दिखा रहे थे, क्या हिंदी, क्या अंग्रेजी सब चैनल वाले खास बातचीत और एक्सक्लूसिव का बैंड लगाकर राज ठाकरे का इंटरव्यू चला रहे थे- क्या मकसद था भैया? सर, आप मानो या न मानो, ठाकरों को सर हमीं चढ़ा रहे हैं...


सर जी, आप सर्वे कराकर देख लो- आज मेरे जैसा अनपढ़ भी कहेगा- मीडिया के इसी लोकतांत्रिक तरीके का तो फायदा उठा रहे हैं ये ठाकरे. जरा इनकी राजनीति देखिए- एक ठाकरे अमिताभ पर हमला करता है, तो दूसरा चुप रहता है, दूसरा सचिन पर हमला करता है, तो पहला चुप रहता है. एक बीएमसी को निशाना बनाता है, तो दूसरा बैंको को मराठी में वेबसाइट निकालने की धमकी देता है...ये अपना घर चलाने की राजनीति नहीं तो क्या है? दोनों का राग एक है, लेकिन कभी किसी मसले पर एकराग में बोलते हुए देखा है?

इतनी बात होते होते दफ्तर आ चुका था- लेकिन मेरे मन में सवाल बहुत गंभीरता से गूंज रहा था- क्यों नहीं इन ठाकरों को बैन कर दिया जाए- चैनल पर इनसे जुड़ी कोई खबर न दिखाई जाए, इनके किसी भी बयान को न उठाया जाय?

शनिवार, नवंबर 14, 2009

'ठाकरों' की गाल पर सचिन का 'सिक्सर'- वाह सचिन वाह!



क्रिकेट के मैदान पर सचिन ने जाने कितनों को दिन में तारे दिखाए, राजनीति और विवादों पर वो अक्सर चुप ही रहते हैं, लेकिन जब जुबान खोली तो एक शॉट में मराठी राजनीति की बखिया उधेड़ दी.
वाह सचिन वाह, 'सच की पिच' पर 'नफरत की गेंद' को ऐसा उड़या कि गेंद बाउन्ड्री से बाहर और बस मुंह ताकते रह गया ठाकरे घराना.

अब तक ये क्रिकेट के मैदान पर होता दिखा था- सचिन के बल्ले से गेद निकली, फील्डर के पास कोई चांस नहीं, सिर के पीछे हाथ रखे और होंठ भींचे गेंद को बॉन्ड्री से बाहर जाते हुए देखने के सिवा कोई चारा नहीं. सचिन ने ये हाथ मैदान के बाहर भी दिखा दिया. ठाकरे परिवार भी शेन वॉर्न की तरह बगलें झांक रहा है. मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही, हिम्मत नहीं हो रही कि झूठी ही सही कोई अपील करें.

जो बात खुद को बड़ा से बड़ा मराठी 'सेक्युलर दिग्गज' कहने वाला नहीं कह सका, वो बात सचिन बोलते-बोलते बोल गए- मुंबई पूरे भारत की है, इस पर जितना हक मराठी का है, उतना ही हक हर भारतवासी को है. इससे आगे सचिन ने अपनी शराफत का ख्याल किया, वर्ना राज ठाकरे और बाल ठाकरे की जुबान में बोलते यही कहते- मुंबई किसी की बपौती नहीं, और जो ऐसा मानते हैं वो अपने बाप को गाली देते हैं, और इस बहाने अपनी मां की नीयत पर सवाल उठाते हैं....ठाकरों की जुबान में ऐसी गंदी भाषा का कोई अंत नहीं...क्या मुंह लगना...

मुंबई पूरे देश की है- ये बात सचिन की जगह कोई और बोलता तो उसका मुंह नोच लेते ठाकरे. लेकिन मुंह तो बंद ही है, 'मुखपत्र' भी खामोश है. कहीं कोई कुछ नहीं बोल रहा. वो जानते हैं कि क्रिकेट के इस भगवान पर उंगली उठाई, मराठी सपूत पर सवाल उठाए, तो बिहार यूपी वालों को तो छोड़ो, मराठी ही मुंह नोच लेंगे- अबे, अपनी राजनीतिक रोटी के लिए औरों के मुंह का निवाला छीनने वाले, मराठी धरती को देश की ताकत से अलग आंकने वाले, दुनिया में देश का नाम बदनाम करने वाले- तू होता कौन है अपने मास्टर को आंख दिखाने वाला...

ये सचिन की ताकत है, और सच की इस ताकत का पूरा अंदाजा है सचिन को. इस सच को कोई नकार नहीं सकता. 'ठाकरों' की बोलती भरसक बंद है, बेचारे हाथ में चूड़ी पहने 'कुर्बान' की करीना के पीछे पड़े हैं. पोस्टर पर नंगी पीठ को साड़ी पहना रहे हैं...छी छी छी...अब यही काम रह गया है

गुरुवार, नवंबर 12, 2009

उन कच्चे बरतनों की पक्की याद...


ये तस्वीर देखते रहिए, नाराज है तो भी, इस तस्वीर में कितना कुछ है समझने को, कितना कुछ अन-समझा छोड़ देने को...

तब तक...
मैं 3 महीने से हो रही गले में खराश को 'खखार' लेता हूं...

बोलना खटकता है, चुप रहना सालता है, 'मंच' पर आकर सिर्फ मुंह ताकते रहने कितना अपमानजनक लगता है.
आंधी आई, बारिश हुई, तूफान आया (आते आते गुजर गया) कुछ भी तो नहीं बोला-
सेंसेक्स चढ़ा, सचिन सत्रह हजारी हुए, राज ठाकरे का उदय हुआ, सड़क की गुंडागर्दी सदन में समा गई- मैं 'निकम्मा' कुछ नहीं बोला...

आतंक का खतरा पैदा हुआ, 2012 में दुनिया के अंत की तारीख पक्की हो गई....
ये सब सुनते देखते प्रभाष जी चले गए...
फिर भी कुछ नहीं बोला...
दिल में ही रह गई उस मुलाकात की याद...1999 की बात है- 'सुबह सवेरे' के स्टूडियो में 'कंधे पर हाथ रखते हुए बड़ी आत्मीयता' से कहा-
बच्चा, (मैं पंडित नहीं) गांव से आए हो, जम के काम करो. जब तक गांव याद रहेगा, आगे बढ़ते रहोगे...(मुकेश कुमार जी गवाह हैं)

मौत की खबर पाकर मेरा भी मन हुआ जनसत्ता अपार्टमेंट जाऊं. लेकिन अगले ही पल एक झिझक ने घेर लिया.
कहां उनसे पहचान और साथ वक्त बिताने वाले बड़े बड़े संपादक और लिक्खाड़ और कहां मैं...
जाऊंगा तो सोचेंगे मीडिया में टीआरपी बढ़ाने का मुंह लेकर आया है...बड़े पत्रकारों की जमात में खुद को जबरन शामिल कराने आया है
सदमे पर हावी हो गई झिझक, मातम में नहीं गया, चुपचाप उनकी मौत के बाद छपे औरों के संस्मरण पढ़ता रहा...
अपनी चुप्पी में औरों संस्मरणों में उठाए गए सवाल के जवाब ढूंढता रहा- अब वैसे कागद कारे कौन करेगा? हिंदी पत्रकारिता का कौन होगा स्तंभपुरुष? (इस सवाल के आगे बड़े संपादक भी लाचार है!)

और कमाल देखिए, कि ये बात कहने में भी हफ्ता लग गया...

चुप्पी टूटी इस तस्वीर से... ऐसे ही कहीं नेट पर मिल गई थी...
तस्वीर देखते ही याद आ गया गांव...
वो कुम्हारिन जो प्राइमरी स्कूल के पीछे रहती थी. स्कूल की खिड़की से बाहर बरतन बनाने में हर रोज लीन...जितने रूखे उसके हाथ उतने ही चिकने कच्ची मिट्टी के वो बरतन...

मां के साथ कई बार उसके पास जाता था- अक्सर छुट्टी की घंटी बजने के बाद. स्कूल के बाद मां बरतन के लिए कहने जाती, मैं उनके पीछे कच्चे बरतनों को निहारने में जुट जाता...
कई कच्चे दीये, ढकने और मटकी मेरी इस हरकत की वजह से टेढे मेढ़े हो गए, लेकिन मां से आत्मीयता की वजह से कभी उसने कुछ कहा नहीं...बल्कि हाथ में एक दो दीये और थमा देती थी...
तस्वीर देखी, तो उसकी याद आ गई. पता नहीं वो किस हाल में होगी. क्या कर रहे होंगे उसके बेटे. घर फोन कर पूछा तो पता चला- उसका क्रांतिकारी विचार वाला पति पिछले 5 साल से घर नहीं लौटा...
बरतन से अब पेट नहीं भरता, सो बेटे गांव छोड़ कर चले गए हैं...
पिछली दीवाली पर मिट्टी के कुछ दीये और बरतन लेकर घर लेकर आई थी...मां ने अनाज के साथ कुछ खाने को दिया तो रोने लगी...
आंसुओं में बहकर बोझ कुछ हल्का हुआ तो मेरे बारे में पूछा...इस बार मां उसके आंसूओं में बह गई...