सोमवार, अगस्त 10, 2009

कुत्ते की आदमियत

कहानी में सिर्फ दो किरदार हैं- एक आदमी और एक कुत्ता. ये दास्तां है दो दरिंदों की (ग्रामर जाए भांड में, अनुप्रास देखिए) लेकिन कहानी का नैरेशन कैसे बने- कौन बने कुत्ता और कौन आदमी। कायदे से आदमी हूं, मुझे आदमी ही रहना चाहिए, दिखता तो आदमी ही हूं, जान बूझकर कुत्ता क्यों बनूं। कुत्ते तो वैसे भी राह चलते मिल जाएंगे। उसी को कहीं से उठा लेते हैं। कहानी से पहले इतनी सफाई इसलिए कि आदमी बनने के बाद अगर किरदार में 'कुत्तापन' नजर आए, तो प्लीज बुरा न मानिएगा. कहानी में सिचुएशन को समझिएगा- बिलकुल सच्ची-मुच्ची समझकर

अजीब सी उमस थी उस शाम...
वैसे तो पसीने से तर बतर शरीर को सूखाड़ की हवा से ढंडक मिलती है, लेकिन इस बार बारिश न होने का एहसास इतना कड़वा है, कि बाजार में 'भाव' सुनकर पसीने में चुनचुनी पैदा होने लगती है। जी हां, आपने ठीक समझा, मैं उस उमस भरी शाम को, बाजार गया था। दफ्तर में दिन में भर का थका हारा(चुसा हुआ कह लीजिए) रोजमर्रा की जरूरत का सामान लेने के बहाने 'चुनचुनी' को सहलाने गया था। सोचा कि बाहर की हवा में कुछ राहत मिले।

सेक्टर के मार्केट में रोज की तरह खूब चहल पहल। मार्केट में हर दुकान का फुटपाथ पर एक्सटेंशन है- मदर डेरी के साथ- ब्रेड अंडे, किराना दुकान के साथ पनीर वाला, कन्फेक्शनरी शॉप के साथ जलेबी, समोसे और ब्रेड पकौड़े वाला, मेडिकल शॉप वाला अपने आगे मोमो और रोल वाले को बिठाता है, उधर कोने में तंदूरी चिकन और कबाब वाला। आग और धुएं में पकते मांस के छोटे टुकड़ों की खुशबू गजब की सोंधी होती है। ऐसा, कि बंद नाक में भी घुस जाए। इसी खुशबू (वेज लोगों के लिए बदबू) की वजह से बेचारे की ठेली के इर्द गिर्द दर्जनों कुत्ते नाक बाए बैठे रहते हैं।

बच्चों की छोटी मोटी (मगर महंगी) चीजें खरीदने के बाद मुझे भी कबाब वाले कोने की तरफ से गुजरना था। उसी कोने में फलवाला बैठता है। लेकिन फल की ठेली से पहले ऐसा हवा का झोंका चला, कि धुंए के साथ मेरी नाक में वो सोंधी महक बुरी तरह चढ़ गई। गंध में यही तो खास बात होती है, उसका अहसास आपने जिन जिन क्षणों में किया है, उस गंध के साथ तमाम लम्हे ताजा हो उठते हैं। हम उन लम्हों के डिटेल में नहीं जाएंगे, वर्ना कहानी का रुख बदल जाएगा। गंध का असर इतना हुआ कि मेरे अंदर का जानवर राल टपकाने लगा था। एहसास इतना तीव्र की, जेब की परवाह नहीं की, फौरन एक जोड़ी लेग पीस का आर्डर दे दिया।ऑर्डर के साथ पेमेंट भी कर दिया कि कहीं बाद में इरादा न बदल जाए।

कुत्तों के साथ मैं भी मांस को पकते हुए देखने लगा। कभीपांच मिनट में पक गया मेरा ऑर्डर। लेकिन अब खाएं कहां? भरे बाजार में अकेले खाना? इसका तो मैंने खयाल ही नहीं किया. वैसे कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन मुझे तो आदत ही नहीं. एक पल में आइडिया आया चलो पार्क में बैठ जाएंगे, ताजी हवा में बैठ लेंगे, खा भी लेंगे. कबाब वाला प्लेट में प्याज और चटनी के साथ लेग पीस सजा चुका था. मैं उसे दूसरी प्लेट से ढंक कर पार्क की तरफ चल दिया.

नोचने खाने की तीव्र इच्छा के साथ तेज चलते हुए अभी आधे रास्ते ही पहुंचा था कि एक कुत्ता भोंक पड़ा। पिछली टांगों के बीच दुम दबाए और दंत निपोरे कुत्ता लगातार मेरी तरफ बढ़ रहा था। मैंने दुत्कारा, फिर भी ढीठ बना रहा. मैंने खुद को निहारा, यार भेष भूषा तो ठीक ही ठाक है, फिर मुझे देखकर क्यों भौंकने लगा. मैंने फिर दुत्कारा, वो हड़का, लेकिन पैंतरा बदल कर तकरीबन पास आ गया. तब मेरा ध्यान हाथ में चिकन पीस पर गया. तो अच्छा, जनाब की नाक में भी सोंधी खुशबू भर गई है. तब तक झपटने को तैयार हो गया कुत्ता. लेकिन ऐन वक्त पर मेरे अंदर का जानवर भी जाग गया. पलक झपकते ही पत्थर उठाया, और दे मारा, पहली रोड़ी लगी नहीं, लेकिन कुत्ता डर गया, फिर भी बाज नहीं आया. वो फिर झपटा, अब तक मेरे अंदर का जानवर भी हिंसक हो गया. दूसरी रोड़ी भाई के सिर पर लगी, तो पता चला, कि इस आदमी से मांस का टुकड़ा छिनना आसान नहीं.

हालांकि कुत्ते का उग्र रूप देखकर मेरे रोएं खड़े हो गए थे, लेकिन वो कुत्ता ही क्या जो तरस खा जाए, हार मान जाए। मैने मुकाबले का इरादा छोड़ दिया था। क्योंकि उसके समर्थन में कई कुत्ते जमा हो गए थे। कुत्तों के बीच अकेले आदमी के हाथ मांस का टुकड़ा...सरासर नाइंसाफी है. लेकिन मांस पर मेरे अंदर का जानवर भी कम लोभित नहीं था, वो क्यों फेंके औरों को अपना निवाला. लेकिन कुत्तों को इससे क्या, बाजार में आदमियों की भीड़ में उनकी हिम्मत तो होती नहीं अकेले क्यों छोड़ दें. मांस पर पहला हक तो उन्हीं का बनता है. उन्हें इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि टुकड़े आपने इतनी कड़क महंगाई में कितने कठोर दिल से खरीदा है. मेरे कदम पीछे पड़ने लगे. मैं बाजार की तरफ लौटने लगा. लेकिन कुत्तों ने पीछा नहीं छोड़ा. वो अब भी जीभ लपकाए मेरी तरफ बढ़ रहे थे.

मैं धीरे धीरे फिर से आदमियों के बीच आ गय़ा. और कुत्ते...ये देखकर संतोष हुआ कि कुत्तों का झुंड मेरा पीछा छोड़ चुका था. बाकी तो मुंह घुमाए वापस जा रहे थे, लेकिन पहला हमलावर आदमियों की भीड़ के बीच मुझे घुसते हुए देख जैसे हंस रहा था. देखने में तो वो दो पांव पर खड़ा और जीभ निकाले हंस रहा था, लेकिन मुझे लगा- वो हंस रहा था, जा बेटा जा, बख्श दिया तुझे. आदमी के बीच 'कुत्तों का कर्म करने' में शर्म आ रही थी तुझे, लेकिन हमारे बीच आकर भी तुम्हें हमारा धर्म नहीं समझ आया. जा आदमी के बच्चे, भीड़ में रहकर भी तू नहीं समझ पाएगा, हम कुत्ते कैसे मिल बांट कर खाते हैं. इतनी आदमियत तुममें नहीं.

1 टिप्पणी:

एकलव्य ने कहा…

वाह वाह कुत्ते की आदमियत बढ़िया रोचक पोस्ट.