शनिवार, अगस्त 22, 2009

अब डॉगी को चाहिए दुल्हनिया



कब तक रहूंगा मुंह मारने के लिए मजबूर?
मैं भी रचाने जा रहा हूं शादी!
मुझे चाहिए एक प्यारी कुतिया!
रंग-रूप, जाति धर्म का बंधन नहीं!
मुझे चाहिए एक केयरिंग कुतिया!!

 
हैरान मत होइए, मौका देखकर मुंह मारने के लिए बदनाम इस जानवर को इंसानी लब्ज में फरमाइश करते सुनकर, शादी के मामले इंसान की राह पर चल पड़े हैं कुत्ते भी.शादी के सपने जाने कब से संजोते रहे होंगे, लेकिन अब इनके ख्वाब पूरे होने लगे हैं, कुत्तों की शादी का ख्वाब पूरा करने में इनके मालदार मालिक भी खूब इंट्रेस्ट ले रहे हैं, अपने प्यारे कुत्तों के लिए देने लगे हैं शादी का विज्ञापन  
 
फिल्मों में तो जाने कितनी बार परोसा गया है कुत्तों का रोमांस, हीरो हीरोइन के मिलन के साथ मिलाई जाती है इनकी भी जोड़ी, इसका अंदाज भले ही कॉमिक होता है, लेकिन जनाब अब ये हंसने की बात नहीं, बल्कि रीयल लाइफ में भी होने लगी है कुत्तों की शादी. 
जरा गौर कीजिए इस विज्ञापन पर..
"स्वस्थ सुंदर और व्यावहार कुशल कुत्ते के लिए चाहिए एक केयरिंग कुतिया"
ये विज्ञापन तो किसी कुत्ता मालिक ने दिया है, लेकिन कई मालिक तो शादी के विज्ञापनों में सीधे कुत्तों को ही आगे कर देते हैं.
"शादी के लिए मुझे चाहिए एक ऐसी प्यारी कुतिया, जो मुझे प्यार करे, मैं जीवन भर उसका गुलाम रहूंगा"
 
बेशक, शादी उन कुत्तों के नसीब में नहीं, जिनका कोई मालिक नहीं, लेकिन जिन कुत्तों के मालिक हैं, जो कुत्ते बड़े बंग्ले, बड़ी कार और मोटी आमदनी वाले मालदार मालिक के साथ घूमते हैं, उनकी शादी का सपना तो सच होने ही लगा है...आखिर इंसानों से किस मामले में कम हैं कुत्ते-
बड़ी कार, अलग कमरा, और नौकर चाकर होते हैं कुत्तों के
इम्पोर्टेड फूड आइटम्स मिलते हैं खाने में
कुत्तों के लिए खुल चुके हैं फाइव स्टार होटल
कुत्तों के लिए शुरू हो चुकी है विमान सेवा
देश भर में है पेट शॉप की भरमार
योगा की तर्ज पर कुत्तों के लिए है डोगा गुरू

इस हाई स्टैंडर्ड लाइफ में तो बस एक ही कमी खटकती है- कमी सिर्फ एक दुल्हन की. अब भला कुत्ते क्यों नहीं चाहें, उनकी भी जिंदगी शादी के बाद इंसानों की तरह बदल जाए. ये माना कि कुत्ते बोल नहीं सकते, लेकिन मालिक तो समझते हैं- बेचारे कब तक मुंह मारने के लिए अभिशप्त रहेंगे.

*हंसिए मत, पत्रकारिता के मानदंड (आदमी कुत्ते को काटता है, तो खबर होती है) के मुताबिक खबर है कुत्तों की शादी की फरमाइश. हां, मुझे कोस जरूर सकते हैं, कि न्यूज चैनल्स की तरह 'कुत्तों की आड़ में' मैं भी 'असली मुद्दों को दाब' रहा हूं. लेकिन सब कुछ खुलेगा अगली पोस्ट में...

बुधवार, अगस्त 12, 2009

स्वाइन फ्लू का पॉजिटिव पैकेज

टीवी खबरों की रौ में ज्यादा मत बहिए, 21 या 29 इंच के फ्रेम में इलाज के मारामारी देखकर घबराइए नहीं, हिम्मत रखिए, यहां तो शॉट्स ही वही सेलेक्ट किये जाते हैं, जिनमें मारामारी हो, अफरातफरी हो, बाइट भी डराने वाली हो, लेकिन आप ये देखकर डरिए नहीं, स्वाइन फ्लू के कुछ ऐसे सच हैं, जो दिल से डर निकालने के लिए जानना जरूरी है।
जी हां,
वाइरस से खतरनाक है खौफ
स्वाइन फ्लू से डरिए नहीं
वाइरस का मुकाबला कीजिए.
स्वाइन फ्लू से डरना मना है


जितना डरेंगे, आपके ऊपर उतना ही हावी होगा स्वाइन फ्लू का वायरस. ये माना कि छुआछूत से फैलने की वजह से पूरी दुनिया में इसे महामारी का दर्जा मिला हुआ है, लेकिन ये कोई डरने की वजह नहीं
सबसे पहले गौर कीजिए इसके लक्षण पर, आखिर स्वाइन फ्लू के लक्षणों में ऐसा कुछ नहीं, जो आम फ्लू से ज्यादा खतरनाक हो. आम वाइरल इन्फेक्शन में भी सर्दी जुकाम के साथ हल्का बुखार, नाक बहने और गले में खराश की शिकायत होती है, यही स्वाइन फ्लू में भी होता है, ज्यादा गंभीर होने पर उल्टी की शिकायत होती है,लेकिन इतने भर से जानलेवा कैसे हो सकती है बीमारी. हां, आपके अंदर का खौफ वायरस को ताकतवर जरूर बना सकता है

अगर ताकत के लिहाज से भी देंखें, तो पहले से मौजूद वायरस की तुलना में H1N1 वायरस बेहद कमजोर है अगर दूसरे वायरल इन्फेक्शन 4 से पांच दिन में ठीक होते हैं, स्वाइन फ्लू का इलाज ज्यादा से ज्यादा 7 दिन में पूरा हो जाता है. इससे ज्यादा खतरनाक तो मलेरिया और टायफायड जैसी बीमारियों के वायरस हैं, जिनकी चपेट में आने के बाद महीने दो महीने तक नहीं उतरता बुखार. अगर मलेरिया, टायफायड से लड़ सकते हैं तो स्वाइन फ्लू से क्यों नहीं।

साफ है, स्वाइन फ्लू की चपेट में आने के बाद आपको सिर्फ 7 दिन तक इसके वायरस से मुकाबला करना है. एक बार बुखार उतर जाए, तो पूरी तरह रिकवरी हो जाती है स्वाइन फ्लू में। न कोई दाग रहता है, न बीमारी का कोई और निशान. कुछ दिन तक कमजोरी जरूर रहती है, लेकिन खान पान सुधरने और कुछ दिन के आराम के बाद ये धीरे धीरे नॉर्मल हो जाती है. अव्वल तो ये, एक बार इलाज पूरा होने के बाद आपका शरीर H1N1 से लड़ने में पूरी तरह सक्षम हो जाता है

अगर अब भी स्वाइन फ्लू से आपका डर नहीं गया, आप अब भी ये समझते हैं कि स्वाइन फ्लू की चपेट में आने का मतलब मौत को गले लगाना है, तो जरा इन आंकड़ों पर गौर कीजिए पुरी दुनिया में स्वाइन फ्लू के 2 लाख मरीज बताए जाते हैं, इनमें अब तक 1900 की मौत हुई है. आप खुद कैलकुलेट कीजिए, स्वाइन फ्लू में मृत्युदर 1 फीसदी से भी कम है. जबकी टीबी में 3.5 फीसदी, और चेस्ट इन्फेक्शन की दूसरी बीमारियों में मृत्यु दर 11 फीसदी तक है.

क्या अब भी आपके पास स्वाइन फ्लू से डरने की वजह है? दुनिया भर में जो भी मौते हुई हैं, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक बुनियादी स्तर पर लापरवाही वजह की वजह से हुई है. एहतियात के साथ वक्त पर जांच, और जांच के मुताबिक पूरा इलाज, यही है स्वाइन फ्लू से बचने का उम्दा उपाय. आप तमाम खतरनाक बीमारियों का सामना पहले ही कर चुके हैं, फिर स्वाइन फ्लू से क्या डरना.

सोमवार, अगस्त 10, 2009

कुत्ते की आदमियत

कहानी में सिर्फ दो किरदार हैं- एक आदमी और एक कुत्ता. ये दास्तां है दो दरिंदों की (ग्रामर जाए भांड में, अनुप्रास देखिए) लेकिन कहानी का नैरेशन कैसे बने- कौन बने कुत्ता और कौन आदमी। कायदे से आदमी हूं, मुझे आदमी ही रहना चाहिए, दिखता तो आदमी ही हूं, जान बूझकर कुत्ता क्यों बनूं। कुत्ते तो वैसे भी राह चलते मिल जाएंगे। उसी को कहीं से उठा लेते हैं। कहानी से पहले इतनी सफाई इसलिए कि आदमी बनने के बाद अगर किरदार में 'कुत्तापन' नजर आए, तो प्लीज बुरा न मानिएगा. कहानी में सिचुएशन को समझिएगा- बिलकुल सच्ची-मुच्ची समझकर

अजीब सी उमस थी उस शाम...
वैसे तो पसीने से तर बतर शरीर को सूखाड़ की हवा से ढंडक मिलती है, लेकिन इस बार बारिश न होने का एहसास इतना कड़वा है, कि बाजार में 'भाव' सुनकर पसीने में चुनचुनी पैदा होने लगती है। जी हां, आपने ठीक समझा, मैं उस उमस भरी शाम को, बाजार गया था। दफ्तर में दिन में भर का थका हारा(चुसा हुआ कह लीजिए) रोजमर्रा की जरूरत का सामान लेने के बहाने 'चुनचुनी' को सहलाने गया था। सोचा कि बाहर की हवा में कुछ राहत मिले।

सेक्टर के मार्केट में रोज की तरह खूब चहल पहल। मार्केट में हर दुकान का फुटपाथ पर एक्सटेंशन है- मदर डेरी के साथ- ब्रेड अंडे, किराना दुकान के साथ पनीर वाला, कन्फेक्शनरी शॉप के साथ जलेबी, समोसे और ब्रेड पकौड़े वाला, मेडिकल शॉप वाला अपने आगे मोमो और रोल वाले को बिठाता है, उधर कोने में तंदूरी चिकन और कबाब वाला। आग और धुएं में पकते मांस के छोटे टुकड़ों की खुशबू गजब की सोंधी होती है। ऐसा, कि बंद नाक में भी घुस जाए। इसी खुशबू (वेज लोगों के लिए बदबू) की वजह से बेचारे की ठेली के इर्द गिर्द दर्जनों कुत्ते नाक बाए बैठे रहते हैं।

बच्चों की छोटी मोटी (मगर महंगी) चीजें खरीदने के बाद मुझे भी कबाब वाले कोने की तरफ से गुजरना था। उसी कोने में फलवाला बैठता है। लेकिन फल की ठेली से पहले ऐसा हवा का झोंका चला, कि धुंए के साथ मेरी नाक में वो सोंधी महक बुरी तरह चढ़ गई। गंध में यही तो खास बात होती है, उसका अहसास आपने जिन जिन क्षणों में किया है, उस गंध के साथ तमाम लम्हे ताजा हो उठते हैं। हम उन लम्हों के डिटेल में नहीं जाएंगे, वर्ना कहानी का रुख बदल जाएगा। गंध का असर इतना हुआ कि मेरे अंदर का जानवर राल टपकाने लगा था। एहसास इतना तीव्र की, जेब की परवाह नहीं की, फौरन एक जोड़ी लेग पीस का आर्डर दे दिया।ऑर्डर के साथ पेमेंट भी कर दिया कि कहीं बाद में इरादा न बदल जाए।

कुत्तों के साथ मैं भी मांस को पकते हुए देखने लगा। कभीपांच मिनट में पक गया मेरा ऑर्डर। लेकिन अब खाएं कहां? भरे बाजार में अकेले खाना? इसका तो मैंने खयाल ही नहीं किया. वैसे कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन मुझे तो आदत ही नहीं. एक पल में आइडिया आया चलो पार्क में बैठ जाएंगे, ताजी हवा में बैठ लेंगे, खा भी लेंगे. कबाब वाला प्लेट में प्याज और चटनी के साथ लेग पीस सजा चुका था. मैं उसे दूसरी प्लेट से ढंक कर पार्क की तरफ चल दिया.

नोचने खाने की तीव्र इच्छा के साथ तेज चलते हुए अभी आधे रास्ते ही पहुंचा था कि एक कुत्ता भोंक पड़ा। पिछली टांगों के बीच दुम दबाए और दंत निपोरे कुत्ता लगातार मेरी तरफ बढ़ रहा था। मैंने दुत्कारा, फिर भी ढीठ बना रहा. मैंने खुद को निहारा, यार भेष भूषा तो ठीक ही ठाक है, फिर मुझे देखकर क्यों भौंकने लगा. मैंने फिर दुत्कारा, वो हड़का, लेकिन पैंतरा बदल कर तकरीबन पास आ गया. तब मेरा ध्यान हाथ में चिकन पीस पर गया. तो अच्छा, जनाब की नाक में भी सोंधी खुशबू भर गई है. तब तक झपटने को तैयार हो गया कुत्ता. लेकिन ऐन वक्त पर मेरे अंदर का जानवर भी जाग गया. पलक झपकते ही पत्थर उठाया, और दे मारा, पहली रोड़ी लगी नहीं, लेकिन कुत्ता डर गया, फिर भी बाज नहीं आया. वो फिर झपटा, अब तक मेरे अंदर का जानवर भी हिंसक हो गया. दूसरी रोड़ी भाई के सिर पर लगी, तो पता चला, कि इस आदमी से मांस का टुकड़ा छिनना आसान नहीं.

हालांकि कुत्ते का उग्र रूप देखकर मेरे रोएं खड़े हो गए थे, लेकिन वो कुत्ता ही क्या जो तरस खा जाए, हार मान जाए। मैने मुकाबले का इरादा छोड़ दिया था। क्योंकि उसके समर्थन में कई कुत्ते जमा हो गए थे। कुत्तों के बीच अकेले आदमी के हाथ मांस का टुकड़ा...सरासर नाइंसाफी है. लेकिन मांस पर मेरे अंदर का जानवर भी कम लोभित नहीं था, वो क्यों फेंके औरों को अपना निवाला. लेकिन कुत्तों को इससे क्या, बाजार में आदमियों की भीड़ में उनकी हिम्मत तो होती नहीं अकेले क्यों छोड़ दें. मांस पर पहला हक तो उन्हीं का बनता है. उन्हें इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि टुकड़े आपने इतनी कड़क महंगाई में कितने कठोर दिल से खरीदा है. मेरे कदम पीछे पड़ने लगे. मैं बाजार की तरफ लौटने लगा. लेकिन कुत्तों ने पीछा नहीं छोड़ा. वो अब भी जीभ लपकाए मेरी तरफ बढ़ रहे थे.

मैं धीरे धीरे फिर से आदमियों के बीच आ गय़ा. और कुत्ते...ये देखकर संतोष हुआ कि कुत्तों का झुंड मेरा पीछा छोड़ चुका था. बाकी तो मुंह घुमाए वापस जा रहे थे, लेकिन पहला हमलावर आदमियों की भीड़ के बीच मुझे घुसते हुए देख जैसे हंस रहा था. देखने में तो वो दो पांव पर खड़ा और जीभ निकाले हंस रहा था, लेकिन मुझे लगा- वो हंस रहा था, जा बेटा जा, बख्श दिया तुझे. आदमी के बीच 'कुत्तों का कर्म करने' में शर्म आ रही थी तुझे, लेकिन हमारे बीच आकर भी तुम्हें हमारा धर्म नहीं समझ आया. जा आदमी के बच्चे, भीड़ में रहकर भी तू नहीं समझ पाएगा, हम कुत्ते कैसे मिल बांट कर खाते हैं. इतनी आदमियत तुममें नहीं.