शनिवार, जुलाई 11, 2009

लो जनाब, हम तो फिर 'न्यूयॉर्क' हो आए!

मैसेज तो पहली 'विजिट' में ही क्लीयर था, लेकिन इस बार 'रिपीट' करने गया था. पहले 'दौरे' के बाद बड़ी खामोशी से 'रेसपॉन्स' को ऑबजॉर्ब कर रहा था, देख रहा था कि जो चीज मुझे कनविंसिंग लगी, वो कितने औरों को लगती है, लेकिन मैं कह सकता हूं तादाद अच्छी है, तीसरे हफ्ते में हाउस फुल...

जो शहरी युवा 'फॉरेन माल' को इनज्वाय करने थियेटर में जाता था, जो मेट्रो फेमिली 'डीडीएलजे' और 'आरएनबीडीजे' की 'पैकेज्ड लव स्टोरी' को देख देख कर सुपर डुपर हिट बना देती थी, वो न्यूयार्क के मैसेज पर माथापच्ची करती दिख रही है। कबीर जी, अपने जमाने को अच्छा सिला दिया है, आपने अपने हुनर का।

अब तो घर में भी 'हॉन्ट' कर रहे हैं फिल्म के प्रोमोज. शीशा चकनाचूर होने जैसे साउंड इफेक्ट के साथ शुरू होता है सीक्वेंस, जॉन अब्राहम की चंद सेकेंट चीख हिलाकर रख देती है, कैटरीना की बात- ही डज नॉट नो इंगलिश, नील नीति की उदास खामोशी खास हो जाती है 30 सेकेन्ड के प्रोमो में. ठिठकने पर मजबूर कर देता है इरफान खान का डायलॉग- 'मुसलमानों के दामन पर जो भी दाग लगे हैं, उसे दूर करने के लिए खुद मुसलमानों को आगे आना होगा.'

कितना 'करेंट' है ये डायलॉग, जो उस डाइरेक्टर की कलम से निकला है जो खुद एक मुसलमान है, लेकिन फिल्म में साबित कितनी खूबी से साबित किया इस्लाम सिर्फ उसका मजहब है, ईमान है इंसानियत, और इंसानियत जब खतरे में घिर जाए, आत्महंता बनना पड़ना पता है। इस 'थॉट लाइन' के साथ अपनी बुराई को अपने अंदर ही खत्म करने की वकालत करते हैं कबीर खान। वो बुराई चाहे टेरोरिज्म की हो, या एफबीआई जैसी पुलिसिंग की.

जाने आपलोगों में से कितनों को पता होगा कि एफबीआई के जिस फेर में जॉन और नील नितिन मुकेश पड़े दिखाए जाते हैं, उसी तरह के फेर में खुद कबीर भी पड़े थे। फिल्म की तरह असल में भी सिर्फ मुसलमान होने के नाते. 9/11 के 15 दिन बाद न्यूयार्क से वाशिंग्टन जा रहे थे. विमान में अपने दोस्तों के साथ ये हिंदी में बात कर रहे थे, जिस पर किसी अंग्रेज मुसाफिर ने कंप्लेन कर दिया कि ये बंदे किसी 'सस्पेक्टेड लैंगवेज' में बात कर रह हैं. नाम पूछा तो टाइटिल भी खान निकला. पत्नी मिनी माथुर जरूर साथ थी, लेकिन जमाने का सवाल देखिए, 'माथुर' का पति 'खान' कैसे हो सकता है? फिर क्या था, एफबीआई ने डिटेन कर लिया. और 2 घंटे टेढे मेढ़े, चुभने वाले सवालों की बौछार, कड़ी पूछताछ और गहन जांच के बाद खुशनसीब थे कबीर की चंगुल से छुट गए. मौके की गंभीरता को उन्हें ये बात छुपानी पड़ी कि वो अफगानिस्तान जा चुके हैं. (एक बार डॉक्यूमेट्री के सिलसिले में, और दूसरी बार फिल्म काबुल एक्सप्रेस की शूटिंग के लिए) अगर ये बात बता देते तो शायद आप 'न्यूयार्क' नाम की फिल्म पर्दे पर नहीं देखते.

आप सोचिए, जिस शख्स का अनुभव इतना कड़वा रहा हो, उसने अगर इतने 'अबजेक्टिव ताने-बाने' में अपने जमाने की बात कहने की कोशिश करे, तो उसे दाद दो कदम आगे बढ़कर देनी चाहिए। जिस कंडीशन में कबीर फंसे थे, उसी कंडीशन में उन्होंने दो पात्रों को फंसाया है (क्योंकि किसी भी मसले के हमेशा दो पहलू होते हैं) जॉन जो प्रताड़ना से इतना बौखला जाता है कि मरने मारने पर उतारु हो जाता है, कैटरीना जो सब जानती है, लेकिन अपना मौन समर्थन देती है, और नील नितिन मुकेश जो प्रताड़ना से तंग आकर दोस्त की मुखबिरी करना मुनासिब समझता है, ताकि उसे गलत रास्ते से हटा पाए. ये दो विचार हैं, जो बेहद खूबसूरती से एक दूसरे भिड़ाए गए हैं. इस टकराव में जो मैसेज पैदा हुआ है, उसे कहीं न हीं दुनिया में 'मोस्ट पॉपुलर अमेरिकी' ओबामा भी मानने लगे हैं.

अच्छा मौका है, जब इस यूनिवर्सल मैसेज के साथ इस बार हम 'ऑस्कर्स' में दस्तक दें. बढ़िया विकल्प मिला है ऑस्कर का ख्वाब पूरा करने का. फिल्म में जहां इंडियन मिजाज के मुताबिक मेलोड्रामा है, तो तकनीकि लिहाज से भी फिल्म नीट एंड क्लीन, पेसी और परफेक्ट बनी है. कोई अंग्रेज ये नहीं कह सकता कोई सीन जबरन ठूंसा हुआ है, ऑस्कर की चाहत रखने वालों, आओ ईमानदारी से 'न्यूयार्क' के लिए मिशन ऑस्कर पर एक होते हैं.

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

हम भी देख ही आयेंगे अब!!