बुधवार, जुलाई 01, 2009

नुक्ताचीनी 'न्यूयार्क' के बहाने


शरीफों के लिए इशारा काफी होता है. इस मुहावरे के मुताबिक आप शरीफ हैं, तो बस दिल थामकर इशारे समझते जाइए, हम आपको एक शरीफ-ए-अजीम की दास्तां सुनाने जा रहे हैं, जैसा कि ऊपर इशारा साफ है- एक फिल्म के बहाने
कबीर...
यही नाम है उनका। पूरा नाम कबीर खान

शक्ल सूरत के बारे में बताने की जरूरत नहीं, आने टीवी पर उन्हें इंटरव्यू देते देखा होगा। लंबे छरहरे, गोरे-चिट्टे, तीखे नाक-नक्श और फूले हुए गाल, मुंह के दोनों सिरों तक करीनेदार पतली काली मूंछ, माशाअल्लाह, क्या गजब ढाती है पर्सनालिटी.

उनके कॉलेजिया दोस्तों के मुंह से एक बार उनका बखान सुना था- कॉलेज में हर 'दिलवाली' लड़की के दिल का अरमान हुआ करते थे कबीर खान.
इंशाअल्लाह, आज भी होंगे,
लेकिन कभी इस बात का गुमां उनके चेहरे पर झलकता तक नहीं. उसी तरह जैसे उनके अंदर आतंकवाद को लेकर इतनी गहरी हलचल थी, इसकी आहट तक नहीं मिलती उनके चेहरे से. पूछो तो बस यूं ही बता देते हैं, मगर देखो, तो अंदर से हिला देते हैं- खूबी ये कि यहां भी उनकी वही शराफत दिखती है
तब भी जब सैम की पूरी कहानी बयां करने के बाद आखिर में उसके किरदार को मौत के घाट उतार देते हैं, ये जानते हुए कि वो बेगुनाह है। सिर्फ इसलिए कि उसका रास्ता गलत है, उसे एफबीआई को गोलियों से भुनवा देते हैं। ये कहते हुए कि टेरोरिज्म को किसी भी रूप में जस्टीफाई नहीं किया जा सकता. इस क्रम में वो सैम की माशूका पर भी तरस नहीं खाते, सैम के साथ माया को भी शहीद कर डालते हैं.

लेकिन इशारा समझिए, दोनों को बेरहमी से मौत के घाट उतारने के बाद कितनी शराफत से दुनिया वालों (अमेरिका) से पूछते हैं-
सैम को मारकर भी क्या हासिल कर लिया. क्या उखाड़ लिया आतंकवाद का, 12,00 को डिटेन किया, 9 महीने तक इन्हें जानवरो से भी बदतर हालत में रखा, एक समीर को मारा, जाने कितने जरार शाह, जाने कितने लखवी, जाने कितने फजलुल्लाह पैदा हुए, और हर शहर में जाने कितने 'कसाब' पैदा कर रहे हैं. पूरी दुनिया में फैल गई है इनकी पौध. 1200 की तादाद इतनी बढ़ जाएगी, काश सैम को मारने से पहले एक बार भी सोचा होता.

जो तुम्हारे तुम्हारे टॉर्चर की वजह से अपनी नजरों में डूब कर मर गया- उसे मौका मिलेगा तो कुछ भी कर गुजरेगा, किसी को भी मौत के घाट उतार सकता है। ये समीर से सीखिए, वो तो फिर भी इतना दिल रखता है कि अपनी माशूका के लिए अपना मिशन मुल्तवी कर देता है. वो जानता है- अगले पल मुझे मरना है, तो जैसे बाहें हवा में लहरा कर पूरा आसमान समेट लेता है. चुप रहकर भी कह जाता है- देख लो दुनिया वालो, हम तो हंसते खेलते, अमन के ख्वाब बुनते बुनते ही मारे गए.

इतना कहने की हिम्मत बहुतों ने नहीं बटोरी, लेकिन कबीर ने न सिर्फ हिम्मत दिखाई, बल्कि इसके लिए बेमिसाल तानाबाना भी तैयार किया।

उमर नाम का लड़का जाता है अमेरिका पढ़ने, वो डिटेन कर लिया जाता है. उमर का कसूर इतना है कि वो सैम नाम के सस्पेक्ट का साथी रह चुका है. एफबीआई ने धोखे से उसकी गाड़ी में हथियार और विस्फोटक रखा, और न्यूयार्क में बड़ी ड्रामेबाजी के साथ उसे सरेआम पकड़ा. हमला ऐसे जैसे चींटी पर एके-47 लेकर दौड़े हों एफबीआई वाले. मकसद, उमर के जरिए सैम तक पहुंच सके एफबीआई. उमर जिस हालत में पकड़ा गया, उससे मुसलमान ही नहीं, किसी भी कौम के रोंगटे खड़े हो जाएं. उमर के भी हुए, वो एफबीआई से बार बार कहता रहा- मैं सैम का दोस्त था, मगर सात साल से संपर्क में नहीं. लेकिन इंटरोगेटर इरफान मानने को तैयार नहीं. वो पूरी कहानी सुनता है- अमेरिका में एंट्री से लेकर आखिर तक. सैम न चाहते हुए भी बताते जाता है.
पहले दिन कितना नर्वस था जब न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी में दाखिल हुआ था. किस तरह उसे माया नाम की हसीना मिली थी. समीर नाम का दिलेर मिला था. वो दौड़ में गोरे को पछाड़कर अमेरिका का झंडा बुलंद करता है. वो माया की आंखों में अपनी दुनिया बसाने का ख्वाब बुन रहा था. माया से उमर को भी प्यार हो गया- धोखे से. वो नहीं जानता था माया सैम पर मर-मिट चुकी है. जब ये पता चलता है तो उमर का दिल टूट जाता है. इसी के साथ हवाई हमले में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर ढह जाता है.
फिर क्या था, जैसे कयामत आ गई, एक पल में दुनिया बदल गई।


उमर सैम-माया की दुनिया से चला गया। इधर सैम न्यूयॉर्क से वाशिंग्टन जाते हुए डिटेन कर लिया जाता है. आरोप ये कि हमले से कुछ दिन पहले उसने ट्रेड सेंटर की तस्वीरें ली थी, वो तस्वीरें किसके लिए खींची थी उसने? इस बात का जवाब न सैम के पास था, न एफबीआई के पास उसके लिए कोई सहानुभूति. सैम पर 9 महीने तक टॉर्चर कैंप में जुल्म होता रहा. वो बेकसूर था इसी बल पर 9 महीने तक नहीं टूटा. आखिर वो रिहा कर दिया गया, लेकिन अपने देश की सुरक्षा एजेंसी के खिलाफ नफरत से भर उठता है सैम.

वो एफबीआई को सबक सिखाने के लिए गैंग और प्लान तैयार कर चुका होता है. इसी मोड़ पर उमर डिटेन किया जाता है। इंटरोगेटर इरफान उसे किसी तरह राजी कर लेता है सैम की दुनिया में दाखिल होने के लिए- उसका दोस्त बनकर उसके प्लान की जानकारी देने के लिए. उमर आता है और माया-सैम की जिंदगी में फिर से घुल मिल जाता है. वो आया था सैम को सही रास्ते पर लाने- अगर गलत रास्ते पर होगा तो, लेकिन सैम उसे अपने प्लान को अंदाजा तक नहीं होने देता. ये सारी सूचनाएं देने के बाद भी एफबीआई को यकीन नहीं होता. उमर को भी यकीन नहीं होता- जब पहली बार उसे सैम के प्लान के बारे में पता चलता है, लेकिन जब तक वो माया के साथ मिलकर एफबीआई से उसे न मारने की गारंटी लेता, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. सैम ने एफबीआई हेडक्वार्टर में बम लगा रखा है.
बेशक सैम का रास्ता गलत है, लेकिन एफबीआई ने जो किया वो भी कुछ सही नहीं था। ब्लास्ट का खतरा टल जाने के बाद भी उसे पकड़ा नही जाता, गोलियों से भून दिया जाता है।


कबीर सैम को उसके किये की सजा तो देते हैं, लेकिन एफबीआई के सामने बड़ी खामोशी से सवाल भी खड़ा करते हैं- मार कर क्या खाक किया?

इस ताने बाने का टेक्निकल साइड भी उतना ही टाइट है- रीयल लोकेशन, असली एंबियंस, झकझोर देने वला कैमरा वर्क, हर शॉट बोलता हुआ। हर सीन का दूसरे से इमोशनल अटैचमेंट लगता है। मसलन, जेल की प्रताड़ना और माशूका से मोहब्बत के बीच, वतनफरोशी और नफरत के बीच, दोस्ती और मुखबिरी के बीच गजब का 'टच' है। आप बंध जाते हैं. हर सीन में संवाद जैसे उबलते हैं, खामोशी भी है अगर तो वो सुलगती हुई दिखाई देती है.

बंधु, 100 रुपये में न्यूयार्क घूम आने का मौका है, 3 घंटे का टाइम निकालिए और सैर कर आईए न्यूयार्क का. जाइए देख आइए बॉलीवुड की पहली इंटरनेशनल हिंदी फिल्म. ऐसी कैटरीना कभी देखी न होगी, ऐसा नील कभी दिखा न होगा, जॉन तो खैर जॉन है ही.

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