गुरुवार, मई 21, 2009

बस एक घूंट












नीले थे तमाम कतरे खून के
कतई नीला था रगों में दौड़ता हुआ लहू


जैसे मारे खौफ के
स्याह साबित हो रहा हो खून का वजूद


जैसे तैयार हो गया हो तरल
किसी की छत पर गिरे आसमान का


जैसे हर नब्ज के साथ
सौ उम्मीदों को एक उदासी ने डंसा हो

जैसे तुम्हारी यादों की बनी स्याही
पीली पड़ी हथेलियों पर उतरी हो

जैसे अमावस की रात का अंधेरा
नीली जोश के सात रात पर मर मिट गया हो

वाकई,
चटख नीला था रगों में आवारा फिरता खून
तब तक,
जब तक तुम मुझे नहीं मिले थे

अब तक,
हमारी सफेद आंखों का नीला पानी
एक दूसरे की आंखों में मिल चुका है
रोष के मारे
लाल हो चुकी हैं हमारी आंखें
कि भला-
कोई ऐसा भी बे-वफा होता है
जैसी ये जिंदगी है?

अब जबकि
दोनों की आंखों में
बह रहा है ये सुर्ख लाल पानी
रगों में उतरने लगा है
आंसू जैसी उमाड़ वाला बेकाबू पानी

आओ,
पी लेते हैं सिर्फ एक घूंट
अपना नीलापन बहा चुके इस लाल पानी की

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत भावपूर्ण और गहन अभिव्यक्ति!!

आओ,
पी लेते हैं सिर्फ एक घूंट
अपना नीलापन बहा चुका ये लाल पानी

-बहुत बढ़िया.