रविवार, मई 24, 2009

अब ठाकरे खोदेंगे उत्तर भारतीयों की कब्र!

खुद बाल ठाकरे की कब्र (सियासी) खुद चुकी है, लेकिन जुबान से जहर नहीं उतरा। चुनावी नतीजों के बाद निजी तौर पर मैं ये मानकर चल रहा था कि ठाकरे घराने को होश आ चुका होगा, कि मराठी लोग इतने भोले नहीं, जितना उन्होंने समझ रखा है ( या बार बार उत्तर भारतीयों के खिलाफ बयान देकर बना रखा है)। आम मराठी लोगों को उन्हें शौक नहीं इतना निर्लज्ज होने का...बिना किसी जनाधार के पूरे महाराष्ट्र को पूरे देश से अलग करने का. लेकिन ठाकरे ने फिर साबित किया कि उन्हें छोड़कर बाकी सब नफरत की राजनीति के कच्चे खिलाड़ी हैं.

हमें इस बात से नहीं मतलब कि उन्होंने उत्तर भारतीयों के कांग्रेसी नेताओं को उन्होंने सांप कहा कि नाग (जैसा कि 'सामना' में कृपाशंकर सिंह को सांप और संजय निरुपम को नाग कहा है) मतलब इस बात से है कि लोकतंत्र में जनाधार के पैमाने पर औकात पता चलने के बाद भी बाज नहीं आ रहे बाल ठाकरे। ठाकरे की मराठी राजनीति को महाराष्ट्र की जनता का समर्थन नहीं करती, ये बात साफ हो चुका है फिर भी बाल ठाकरे का बयान सुनिए- ''उत्तर भारतीय नेता कह रहे हैं हमे मुंबई में आने से कोई नहीं रोक सकता, लेकिन उन्हें पता होना चाहिए मराठियों ने औरंगजेब की कब्र खोदी थी, ज्यादा बोलेंगे तो मराठी उनकी भी कब्र खोद देंगे।

इस बयान में कुछ नया नहीं है, ऐसे ही बयानों पर सिंकती रही है ठाकरे परिवार की रोटी, पलता है ठाकरे परिवार का पेट, हार के बाद मराठी लोगों को नए तर्क के साथ जगाने में जुट गए हैं बाल ठाकरे, जब जय महाराष्ट्र के नारे से काम नहीं चला तो इसमें दिल्ली, पंजाब और राजस्थान जैसे पश्चिमी राज्यों को भी जोड़ लिया."दिल्ली वाले हमेशा डरते रहे हैं कि मराठी एक दिन शासक बनेंगे। महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान को छोड़ कर किसी भी राज्य ने योद्धा पैदा नहीं किया। पूरे उत्तर भारत में या तो गुलाम पैदा हुए या फिर मुगलों और अग्रेजों के चमचे. मराठी लोग 500 साल से लड़ रहे हैं, लड़ना इनके खून में है, हमेशा से मराठियों की शान तलवार रही है, और जब तक ये तलवार मजबूत है तब तक मराठियों की तरफ कोई आंख उठा कर नहीं देख सकता"

देखिए कैसे ललकार रहे हैं ठाकरे। अब बताइए भला, कौन आंख उठाकर देख रहा है मराठियों की तरफ? कौन उन्हें दोयम दर्जे का बता रहा है, यही कह रहा है न जैसे देश के बाकी शहर, वैसे बाकी देश के लिए मुंबई। यही बात तो मराठी जनता भी कह रही है, अगर नहीं कहती तो ठाकरे की पार्टिय(यों) के आगे महाराष्ट्र में कोई नहीं टिकता. लेकिन ठाकरे की ढीठई देखिए-''शिवसेना के बाजुओं में अब भी इतनी ताकत है कि उन लोगों के हाथ काट दे, जो मुबंई को महाराष्ट्र से अलग करना चाहते हैं। "

चलिए, किसी और को नहीं, तो कम से कम मराठी लोग समझ गए हैं ठाकरे परिवार को मालदार मुंबई से इतना प्यार क्यों है.

शनिवार, मई 23, 2009

मनमोहनी 'शपथ' का पॉलिटिकल पैकेज

दूरदर्शन में भी बड़ा दम है, कई बार नहीं चाहते हुए भी ऐसा सच दिखा जाता है कि हैरानी होती है। अब तक आपने दूरदर्शन पर शपथ समारोह तो कई देखें होंगे, जिसका फल्सफा यही होता है- हार हो या जीत, सियासत का शिष्टाचार इतना हो कि अपनी दलगत-दूरियां समेटते हुए इसमें सब शामिल हो. दिल में शिकवे-शिकयतें चाहे जितनी हो, जुबां पर मुस्कराहट कम चौड़ी नहीं होनी चाहिए...

मनमोहन मंत्रिमंडल के शपथ-ग्रहण समारोह में आडवाणी इसी परंपरा निर्वाह के तहत आए थे थोड़ा लेट ही सही, हाथ जोड़े हंसते-मुस्कराते पहुंचे मंत्रिमंडल के सम्मान में...लेकिन उनके सम्मान में सियासी शिष्टाचार तक नहीं दिखा...ये देखकर वाकई हैरानी हुई

विपक्ष के सबसे बड़े नेता के लिए बैठने की जगह तक फिक्स नहीं थी, उम्र के लिहाज से भी कइयों से सीनियर हैं आडवाणी लेकिन किसी बैठने का इशारा करना भी मुनासिब नहीं समझा। आडवाणी चलते चलते अगली पंक्ति के करीब पहुंच चुके थे...रास्ते में दिग्विजय सिंह मिले, शीला दीक्षित मिलीं...सबने हाथ मिलाया लेकिन बैठने का इशारा नहीं किया। राहुल गांधी मिले तो उन्होंने गर्मजोशी जरूर दिखाई, मुस्कराहट के साथ उनका स्वागत किया लेकिन कुर्सी नहीं बताई...

सीट मिलने से पहले आडवाणी से चिदंबरम भी मिले, ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मिले...लेकिन ये भी राहुल के नक्शे कदम पर हाथ मिलाकर आगे बढ़ गए...ये पूरा नजारा बगल की कुर्सी पर बैठे श्रीप्रकाश जायसवाल देख रहे थे, लेकिन न खुद कुर्सी से उठे न अपने किसी जूनियर को उठने के लिए कहा
श्रीप्रकाश की अगली कतार में सीट खाली थी, लेकिन इशारा नहीं किया...आडवाणी को खड़े देखकर शरद पवार जरूर दौड़े आए...लेकिन इससे पहले कि उस खाली सीट पर आडवाणी को बिठाते- राम विलास पासवान लपक कर विराजमान हो गए...शरद पवार की पहल पर आडवाणी के लिए कुर्सी का इंतजाम तो हुआ...लेकिन सीट कहां मिली...भैरो सिंह शेखावत के बगल में, जो पार्टी में रहते हुए आडवाणी की पीएम पद की दावेदारी को चुनौती दे चुके थे, इसकी खुन्नस साफ दिखी। आडवाणी ने मुंह तक फेर कर नहीं देखा शेखावत की तरफ

बैठने की सीट तो अगली कतार में मिल गई, लेकिन आडवाणी से कोई मिलने तक नहीं आया...न सोनिया न मनमोहन...अगली कतार में अनदेखे से बैठे रहे विपक्ष के सबसे बड़े नेता...जैसे सोच में डूबे आडवाणी को याद आ रहा था वो जमाना, जब विपक्ष के नेता की अगुवानी सत्ता पक्ष के बड़े नेता किया करते थे, ज्यादा दूर नहीं, 2004 के शपथ समारोह में ही जब मनमोहन सिंह पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे- अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवानी में खुद आए थे...लेकिन इस बार वो शिष्टाचार कहीं नहीं था।

इस मामले में आडवाणी की कंजूसी भी साफ दिख रही थी, शपथ तो वही मनमोहन ले रहे थे, लेकिन 'जाने किस वजह से' इतने दुखी थे पीएम इन वेटिंग कि ताली पर भी हाथ नहीं हिले। यही हाल लालू मुलायम पासवान अमर के चौथे मोर्चे का दिखा. सीट तो हंसते हंसते ली थी, लेकिन ताली के नाम पर सिर झुकाने के सिवा और कुछ नहीं किया. समर्थन दिया बिना शर्त, लेकिन समारोह में गए तो किसी ने पूछा तक नहीं. खासकर रामविलास की हालत तो और भी मुश्किल दिखी, लालू के साथ यूपीए से अलग क्या हुए जीत के रिकार्डधारी दामन पर हार का दाग लगवा बैठे...पार्टी का सुपड़ा साफ हुआ सो अलग...अब दाग छिपाएं भी तो कैसे?

पासवान की तरह लालू जी भी यहीं सोचते दिखे कि - मुझसे तो मीरा कुमार ही भली हैं, पूरे साल कोई नहीं जानता-सुनता इनके बारे में लेकिन कांग्रेस मंत्रिमंडल में बर्थ हर बार पक्की होती है...मेरा तो मिनिस्टर स्टेटस गया ही, दुलारी रेल का खेल भी बिगड़ गया

अमर-मुलायम ने भी बड़ा दम लगाकर बनाया था यूपीए को अपना सियासी हमदम, लेकिन महफिल में आकर पता चला अब न कोई हमदम रहा न को दोस्त...एक पल तो ऐसा आया कि अजनबी सी महफिल में बड़े भैया मुलायम भी बिछड़ गए...तब देखते बन रही थी छोटे भैया की अमर बेचैनी- लेकिन हालत ऐसी कि बताना भी मुश्किल और छिपाना भी मुश्किल...बेचारे अकेले गए थे अकेले ही लौटे, अमर और मुलायम जब समारोह के बाद लौट रहे थे, तब बेहद दार्शनिक हो गया था दृश्य का अंदाज...दोनों को सियासत की सीढ़ियां नीचे उतार रही थीं...न कोई काफिला, न कोई हुजूम॥बस अकेले अकेले

ये सियासी शिष्टाचार पर मंथन है या किसी और बात का अफसोस- इसे हर कोई अपने-अपने नजरिए से देख रहा है. आप भी टिप्पणी करें, लेकिन हमारी तरफ से इतना तो साफ दिखता है सियासी शिष्टाचार के मामले में नेताओं की अभिनय क्षमता कम हुई है

गुरुवार, मई 21, 2009

बस एक घूंट












नीले थे तमाम कतरे खून के
कतई नीला था रगों में दौड़ता हुआ लहू


जैसे मारे खौफ के
स्याह साबित हो रहा हो खून का वजूद


जैसे तैयार हो गया हो तरल
किसी की छत पर गिरे आसमान का


जैसे हर नब्ज के साथ
सौ उम्मीदों को एक उदासी ने डंसा हो

जैसे तुम्हारी यादों की बनी स्याही
पीली पड़ी हथेलियों पर उतरी हो

जैसे अमावस की रात का अंधेरा
नीली जोश के सात रात पर मर मिट गया हो

वाकई,
चटख नीला था रगों में आवारा फिरता खून
तब तक,
जब तक तुम मुझे नहीं मिले थे

अब तक,
हमारी सफेद आंखों का नीला पानी
एक दूसरे की आंखों में मिल चुका है
रोष के मारे
लाल हो चुकी हैं हमारी आंखें
कि भला-
कोई ऐसा भी बे-वफा होता है
जैसी ये जिंदगी है?

अब जबकि
दोनों की आंखों में
बह रहा है ये सुर्ख लाल पानी
रगों में उतरने लगा है
आंसू जैसी उमाड़ वाला बेकाबू पानी

आओ,
पी लेते हैं सिर्फ एक घूंट
अपना नीलापन बहा चुके इस लाल पानी की

सोमवार, मई 18, 2009

सौ 'सोनार' की, एक 'लोहार' की

लोकतंत्र में ये बताने की जरूरत नहीं है सोनार कौन है लोहार कौन है- 15वीं लोक सभा के नतीजे सामने हैं तब तो और भी नहीं...
गजब का है मुहावरा- 100 सोनार की एक लोहार की- जो सामाजिक ढांचे के विपरीत लोहार को सोनार से ज्यादा असरदार साबित करता है, ये भी बताता है सोनार (चमकती दमकती देह और वजन से हल्का लेकिन से गद्दी से मालदार) की आदत होती है चोट करते रहने की, अपनी मर्जी (हित) के मुताबिक चीजों को आकार देने की। लेकिन लोहार (काला कलूटा, धीर गंभीर मगर स्थूल और लाचार) की स्थूल देह जब हरकत में आती है, चोट करने की उसकी बारी आती है चीजों को जड़ से हिलाकर रख देता है।

अब इस कहावत को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में फिट कर देखते हैं- सोनार मतलब नेता और लोहार मतलब जनता समझे तो तस्वीर कुछ तरह बनती है...

नतीजे बता रहे हैं देश के जिन 'सोनारों' ने पांच साल तक अपने फायदे के लिए राजनीति को आकार देना चाहा उन्हें 'लोहारों' ने तहस नहस कर दिया। 'मुसलमानों के हाथ काटने वाले' बयान को 'हवा देने वाले' या फिर 'खुल कर निंदा न करने वालों' को बता दिया की लोहार की चोट क्या होती है. दामन में दंगे का दाग छुपाकर चुनावी रैलियों में 'विकास बड़ी बड़ी बातें' कहने वालों को दिखा दिया कि बार बार चोट करने की अपनी आदत से बाज आओ.

लोहार इतने भी स्थूल नहीं होते जो झांसे में आ जाए। वो अपनी जगह पर स्थूल होते हुए भी समझते हैं- काले धन की वापसी की बात अब क्यों हो रही है, अपनी सरकार के दौरान तो आप भी औरों की तरह कुंडली मारकर बैठेगे- और लाओगे तो भी क्या करोगे- उसमें लोहारों का क्या फायदा- लूटेंगे तो सोनार ही. 'सबको साथ लेकर चलने' का सच इतना नंगा है कि डर गए लोहार. पता नहीं कब कौन सा फायरब्रांड बनने की कोशिश करेगा और कटुआ कह कर काटने लगेगा. और सारे दलील भी यही देंगे 15 वीं शताब्दी में हमारे साथ जो हुआ उसी का तो बदला ले रहे हैं. ये हमारा राष्ट्रधर्म है और इस धर्म का प्रचार पूरे देश में रथ यात्राएं कर होने लगेगा.

पता नहीं, इतना सीनियर होते हुए भी आडवाणी जी ये क्यों नहीं समझ पाए। पता नहीं, समझे भी हों तो साथियों ने अमल नहीं किया हो, और वो ताउम्र के लिए पीएम इन वेटिंग रह गए. लेकिन जिन्होंने समझी ये बात- उनका भला ही हुआ- उड़ीसा का उदाहरण पहले से ही था, इस बार बंगाल में ममता और बिहार में नीतिश कुमार ने साबित कर दिया कि 'सबको साथ लेकर चलने' का नारा देने से पहले जमीन किस तरह से तैयार करनी पड़ती है.

नेताओं को लोकतंत्र का सोनार कह देने से ऐसा नहीं है कि उनकी जाति सिर्फ एक होती है, इनकी एक उपजाति लालू-पासवान जैसी होती है। ये गजब के सोनार हैं- अपनी चोट पर इन्हें औरों से ज्यादा खुद घमंड होता है. चोट करते हैं तो माइक लगाकर ढिंढोरा पीटते हैं- देखो- मैंने क्या शॉट मारा. यूपीए की मलाई को चुपके चुपके खाई, लेकिन अलग हुए तो खूब ढिंढोरा पीटा. लेकिन लोहार समझ गए- चारा खाने वाले पांच साल तक मलाई खाकर अब कोई और 'आइटम' खाने की जुगाड़ में है, वर्ना जिस मुलायम से वर्षों तक कठोर तनातनी रही, वो अचानक दोस्त बन गए. लोहारों ने पंचतंत्र की गदहे और सियार की दोस्ती वाली कहानी पढ़ी है, सो समझ गए अमर के जुगाड़ पर अचानक हुई दोस्ती का मतलब. पासवान के पास तो खैर बोलने के लिए मुंह ही नहीं रहा, लालू और अमर की जुबान खुली भी तो लग गया 'मलाई' से पेट भरा नहीं है अभी, बिन बुलाए समर्थन की थाली लेकर फिर से हाजिर है.

लाल सोना पीटने वालों की तो पूछिए मत, 60 साल पहले ही हो चुके हैं- अपना एजेंडा नहीं समझा पाए- ये वर्ग हित की बात करते हैं, कि राष्ट्रहित की या फिर '...हित' की, लोहारों को इनकी न 'साथ आने की बात' समझ आई न 'दूर जाने की'। न्यूक्लियर डील को देशहित के खिलाफ कहकर हट तो गए शक्ल सूरत से समझदार दिखने वाले करात साहब, लेकिन जनआंदोलन नहीं बना पाए मुद्दे को- अगर ये राष्ट्रहित से जुड़ा इतना ही बड़ा मुद्दा था तो. बल्कि उल्टे लाल गुट ने कांग्रेस के साथ दोबारा आने पर भी कन्फ्यूजन बनाए रखा- न चुनाव के दौरान न चुनाव बाद. लोहार समझ गए- ये 'लाल लोग' सत्ता की सफेद मलाई फिर से खाने की तैयारी में हैं.

अब मिलिए सियासत के मोटे सोनारों से- बाहुबलियों से। हर पार्टी ने इनकी हकीकत जानते हुए भी जनता के सामने उतारा था अपनी 'साख' बढ़ाने के लिए, वो भी देश के कानून का हवाला देते हुए- मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी,अरुण कुमार शुक्ला 'अन्ना', अतीक अहमद, अक्षय प्रताप सिंह, मुन्ना शुक्ला, डी पी यादव। पप्पू यादव, आनंद मोहन और शहाबुद्दीन को तो कोर्ट ने पहले ही किनारा कर दिया था लेकिन इन्होंने अपनी बीवियों रंजीता रंजन, लवली आनंद और हेना साहिब को मैदान में उतारा था. इनकी पार्टियों को जिक्र इसलिए जरूरी नहीं, क्योंकि जिसने भी इन्हें उतारा बाहुबलियों पर इनकी नजर कहीं न कही एक है- एक घाट पर पानी पीने वाले. लेकिन लोहारों ने बता दिया- अगर घाट गंदा हो, तो आपको तय करना पड़ेगा, प्यासे मर जाएं, यहां पानी नहीं पीना है, वर्ना चोट ऐसी पड़ेगी कि बाहु का बल और बंदूक की नाल धरी की धरी रह जाएगी.

हारने वाली पार्टियों के समर्थकों, अगर आपने यहां तक पढ़ने की जहमत उठाई है तो मेरी बात का बुरा न मानना, अब तक मैने जो कहने की कोशिश की है, उसका अंडरकरंट लब्बोलुआब ये है कि लोकतंत्र में लोहार से सीधे जुड़े मुद्दे के बिना बात नहीं बनती. समझ लीजिए इस मामले में पूरे देश के लोहार एक होते हैं, वर्ना महाराष्ट्र के लोहारों को लुभाने के लिए राज ठाकरे और शिवसेना ने कुछ कम किया था- नतीजा क्या हुआ, याद नहीं तो इलेक्शन कमीशन की साइट पर जाकर देख लीजिए।
अब समझ लीजिए- लौहपुरुष कहलाने और कमजोर प्रधानमंत्री करार दिए जाने में क्या फर्क है. राहुल और वरुण गांधी में क्या फर्क है. ये भी जान लीजिए, लोहारों को वंशवाद और विदेशी मूल की बातें 21 वीं सदी में नहीं सुहाती. घटिया मुद्दों के बहाने लोहारों के पेट की अनदेखी होगी, तो वो लात मारेगा ही. दिल की बात कीजिए, लोहार आपके भी होंगे।

रविवार, मई 10, 2009

मां नहीं हूं फिर भी...

मां नहीं हूं फिर भी, एक बेटी का पिता हूं इसलिए भी, समझ सकता हूं कि मां का मतलब औलाद के लिए क्या होता है। किसी की जिंदगी में मां के होने का मतलब क्या होता है. तपते बदन पर मां के हाथ फेरने का असर क्या होता है. मां औरत होती है, लेकिन मैं मर्द होते हुए भी इस औरत को समझना चाहता हूं, उसके दिए हुए शरीर में उसकी भावनाएं उड़ेलना चाहता हूं.

मेरे अंदर इस भावना के बीज पापा ने बोए थे। पापा कहा करते थे हर मर्द में कुछ हिस्सा औरत का होता है, क्योंकि औरत किसी देह का नाम नहीं, बल्कि कुछ गुणों का नाम है, पांच गुण गिनाते थे पापा जो स्त्री की संरचना में होती है- प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति, और समर्पण। इन्हीं भावनाओं की प्रबलता से बनती है औरत, जितनी मजबूत होती है ये भावनाएं उतनी ही मजबूत और बेमिसाल होती है औरत.

पापा अक्सर सीता का उदाहरण दिया करते थे- धर्म के लिहाज से नहीं, व्यावहार के लिहाज से, कि अपनी जगह पर सीता कितनी कट्टर औरत थी। मर्द के इशारे पर हर तरह का इम्तहान दिया, लेकिन हर इम्तहान को अपना कर्तब्य समझा। राजा की बेटी झाड़-फूस में रही लेकिन मर्द से शिकायत के नाम पर अपनी ममता को कमजोर नहीं पड़ने दिया. ये सीता के अंदर मौजूद इन पांच भावनाओं की प्रबलता का नतीजा था.

सीता तो औरत थीं, लेकिन इस औरत को समझने के लिए पापा राम का उदाहरण भी देते थे। कहते थे- कि जो पांच भावनाएं औरत को पूजनीय बनाती हैं, उनका अनुपात अगर मर्द में औसत से ज्यादा हो जाए तो वो पुरुषोत्तम बन जाता है। वो प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति और समर्पण की साक्षात मूर्ति बन जाता है.

मदर्स डे पर मुझे एक ऐसी ही कहानी से रूबरू हुआ- मिस इंडिया वर्ल्ड-2009 पूजा चोपड़ा की कहानी सुनकर मुझे उसकी मां पर गर्व हुआ। इंटरव्यू में जैसा पूजा चोपड़ा ने बताया- उसकी पैदाइश के साथ मां ने लगातार दूसरी बेटी को जन्म दिया। जबकि उसके पिता और घरवाले बेटा चाहते थे. उनकी ये ख्वाहिश इतनी मुखर थी कि पूजा की पैदाइश पर मातम पसर गया. उसकी मां को कोसा जाने लगा. विवाद इतना बढ़ा कि पूजा की मां को पति का घर छोड़ना पड़ा. कोई आसरा नहीं, जीने का कोई सहारा नहीं, लेकिन पूजा और उसकी बड़ी बहन शुभ्रा को लेकर उनकी मां निकल गई घर से. कुछ दिन बच्चों को ननिहाल छोड़ा और खुद नौकरी में जुट गई. अपने बुते पर न सिर्फ बेटियों को पाला-पोसा, पढ़ाया लिखाया, बल्कि उनके अंदर इतनी पॉजिटिव सोच भरी कि वो मिस इंडिया जैसे मॉडर्न कॉन्टेस्ट में हिस्सा ले सके...आज वो इस बात पर खुशनसीबी जाहिर कर रही है कि वो अपनी बेटी के नाम से जानी जा रही है...

ये शायद मेरे अंदर रचा बसा पापा का वो पाठ था कि पूजा की कहानी से मैं सिहर गया। मां के संधर्ष के आगे मेरा सिर श्रद्धा से झुक गया। शायद इसलिए भी इतने गहरे उतरी वो भावना कि मैं भी एक बेटी का पिता हूं- मुझे याद है जब वो पैदा हुई थी तो किस तरह मेरा लड़कपन एक झटके में मुरझा गया था. जब पहली बार गोद में आई थी तो किस तरह मेरे कंधे चौड़े हुए थे- एक लंबी सांस ने किस तरह सीने में कितने सपने भर दिए थे. गांव में बेटियों का हश्र मैने देखा था. आप चाहे बेटी से जितना प्यार करते हो- उस ढर्रे को ज्यादा नहीं बदल सकते. बेटी बड़ी होने के साथ मेरे अंदर ये एहसास भी बड़ा होता गया कि इस ढर्रे पर बिटिया को नहीं जाने दूंगा. कुछ करूंगा.

मैं आज समझ सकता हूं- कुछ करने की ये भावना पापा के उन्हीं पाठ की वजह से इतनी बलवती हुई, जो उन्होंने राम और सीता का उदाहरण देकर समझाया था. उन्हीं भावनाओं के साथ आज अपनी जमीन छोड़कर, शहर में बंजारा बनकर बेटी के सपने को आकार दे रहा हूं. कुछ कर जाए तो मेरे अंदर की औरत को सुकून मिले.

शुक्रवार, मई 08, 2009

चु.आ. जी, क्या अपना जरनैल पप्पू है?

लो जी, चु.आ. जी आप पप्पू पप्पू चिल्लाते रहे, उसने ठोक कर कह दिया- जा नहीं डालते वोट. किसी पर ठप्पा नहीं लगाऊंगा, सारे के सारे एक जैसे हैं, नागनाथ और सांपनाथ में कोई फर्क नहीं होता. शिकार के लिए जाल डालते हैं तो दोनों एक जैसे फन को छुपा लेते हैं, जब खाने की बारी आती है तो सीधे निगल लेते हैं. जा, नहीं करता समर्थन- न उल्टे का, न सीधे का, तुम्हारे कहने से क्या पप्पू हो जाऊंगा?

सच कहूं चु.जी. तो आपके पप्पू की परिभाषा भी कुछ क्लीयर नहीं है, वर्ना हम ये भी बताते चलते कि आप जरनैल को पप्पू क्यों नहीं कहेंगे? आपने तो पप्पू का प्रोमोशन कर कर ये इस्टैबलिश कर दिया कि पप्पू वो है जो वोट नहीं डालता, इमेज कुछ ऐसे बनाई कि वो कोई गोल-मटोल, थोड़ा अक्ल से मंद, राजा बेटा टाइप का पार्टी-पसंद इंसान है, लेकिन वो पप्पू ही क्यों, वो चिंटू, मिंटू, संटू, मंटू कोई भी हो सकता है? आखिर पप्पू का कैरेक्टर क्या है? सिर्फ वोट नहीं डालने की आदत से भला किसी का कैरेक्टर तैयार होता है?

चु.आ. जी, आप भी गजब करते हैं- अपना जरनैल किस लिहाज से पप्पू टाइप का दिखता है? जरनैल के गुस्से की झलक तो आप पहले ही देख चुके हो, जिसके जूते ने 15वीं लोकसभा के चुनाव को ऐतिहासिक बना दिया, जिसने विरोध जताने के हथियार का अविष्कार कर दिया, हिंसक अविष्कार के बावजूद जिसने अपने आचरण से बता दिया कि उसका मकसद किसी व्यक्ति का अपमान करना नहीं था, वो न दलगत राजनीति से प्रेरित था, उसका गुस्सा भी क्षणिक नहीं था, बल्कि वो सिस्टम से खफा था। उसके वोट नहीं डालने से यही जाहिर होता है, फिर भी क्या आप उसे पप्पू कहेंगे?

क्यों भैया क्यों? वोट न देकर अपना विरोध जताने वाले के लिए पप्पू जैसी द्विअर्थी संज्ञा का इस्तेमाल क्यों? किसी भी हिंदीभाषी क्षेत्र में चले जाइए- पूछने पर पप्पू का पता मर्दों के पजामे के अंदर ही मिलेगा, फिर या किसी बाहुबली या नेता टाइप के अड्डे पर सेवा के लिए रखे गए लौंडों के रूप में. पप्पू नाम के साथ मर्द मसखरी करते हैं- उसके अजीबोगरीब कैरेक्टर पर, जो 'रस की उल्टी-धारा' में बहता है, उसे ही पप्पू कहते हैं.

ऐसे पप्पू दो चार या दस तो हो सकते हैं, बिहार में 64 परसेंट, यूपी में 60 परसेंट, जम्मू-कश्मीर में 76 परसेंट और दिल्ली में पूरे के पूरे 50 परसेंट पप्पू कैसे हो सकते हैं?
चु.आ. जी, कहीं जानबूझकर आप गाली तो नहीं दे रहे वोट नहीं देने वालो को?


सोच लीजिए, मामला मानहानी का बनता है, आपको क्या लगता है- नाकामी आपकी और पप्पू कहलाना कबूल करें हम? जब आप ही के कानून पर खरा उतर रहा है आपका सिस्टम तो वोटरों से कैसी उम्मीद, जिनका काम है बस एक ठप्पा लगाना?

आपकी कृपा से खूब दागी खड़े हैं मैदान में, हलफनामें में एक से बढ़कर एक झूठ बोला, जो कभी पैदल नहीं चलते वो भी कहते हैं मैं बे-कार हूं. करोड़ों के फ्लैट और प्लॉट को हजारों लाखों का बताया. चुनाव में उतरे तो लिमिट के बावजूद भोंपू भी खूब बजे, पोस्टर, पर्चे और नोट के खर्चे भी खूब दिखे, नामांकन से लेकर प्रचार तक नेताओं के काफिले लंबे चौड़े ही होते दिखे, गाली गलौज भी खूब हो रहा है. किसी का कुछ हुआ?

क्यों नहीं हुआ कुछ चु.आ जी? संवैधानिक अधिकार में आप हमसे बड़े हैं, वर्ना एक झटके में आप ही को पप्पू कह डालते. इज्जत करते हैं इसलिए नहीं कह रहे. बताईए भला ठप्पा लगाने का विकल्प भी ठीक से दिया है? कई सीटों पर आगे खाई और पीछे कुआं जैसा समीकरण बना हुआ है- आपकी अंखमुंदी अदा के चलते. अगर पप्पू की परिभाषा आपने इस आधार पर गढ़ी है कि लोकतंत्र में जो गैर-जिम्मेवार है वो पप्पू है, तो खुद आंख खोलकर देखो- पप्पू कौन है. अपना जरनैल तो शर्तिया नही है।

गुरुवार, मई 07, 2009

मोहब्बत का मीट- दो पीस

मीट और मोहब्बत का...ये वेजिटेरियन लोगों को अजीब सा जुमला लगेगा, लेकिन गजब का ये मोहब्बत का नॉनवेज एहसास। मीट की दुकान में तो कई बार गया हूं, लेकिन इस बार कसाई का जुमला जेहन में बैठ गया.

देखने में कितना हिंसक दृश्य होता है मीट शॉप का। हर तरफ मांस ही मांस, हर तरफ लटकती मुर्गों और बकरों की छिली हुई देह, चाकू, दाब और कसाई का हाथ सबकुछ खून और मांस के छीटों से सना हुआ...लेकिन कसाई की भंगिमा ऐसी कि दुनिया के बड़े से दार्शनिक को भी चकित कर दे।

कसाई का चेहरा कतई साथ नहीं देता इस दृश्य का। बिलकुल भावशून्य-सपाट चेहरा, पूरी पर्सनालिटी में जिंदगी और मौत का जरा सा भी अंतर्विरोध नही दिखता. सख्ती से सिले हुए होठ- ठीए पर कसाई के हर प्रहार में गजब का आत्मविश्वास दिखता है- ठीए पर ठक... ठक॥ ठक... इतनी सधी हुई कि इसकी बुलंदी में गुम हो जाती है सबकी आवाज. खुद कसाई भी इस आवाज में इस कदर गुम होता है कि वो बस तोल कर फेंके गए मीट को निवालों में बांटता चला जाता है, इतना सिद्धहस्त कि टुकड़े करने के लिए प्रहार अलग और गंदगी निकालने के लिए प्रहार अलग...

मीट की दुकान में अजीब सी शांति होती है- मछली की दुकान से अलग। ग्राहक चुप, कैश काउंटर पर मैनेजर चुप, फ्रीजर से ठंडा मीट निकाल कर ठीए पर रखने वाला स्पॉटब्वाय चुप- कसाई के दर्शन में सब गुम होते हैं- सामने हाथ बांधे खड़े हुए, मांस को टुकड़ों में कटते देखते हुए, अपनी बारी का इंतजार करते हुए। बेहद संयमित और एक तरह से हतप्रभ. मीट की दुकान में इतनी तहजीब!

'हां जी सर, आपका कितना...'
'2 किलो मटन भैया...
''2 किलो? घर में मेहमान आ रहे हैं क्या सरजी, आप तो...
'हां हां, भैया, जरा ढंग का मीट देना...
''ये लो जी...कट...कट...कट...कट...कट...'
मिनट भर में 2 किलो मीट कट कर तैयार...एक बराबर साफ-सुंदर टुकड़े। तराजू पर फेंका- वजन ठीक
दो किलो। वाह क्या एक्यूरेसी है...!

पैक करते हुए कसाई ने थैले में दो पीस मीट अलग से डाल दिए, मैने पूछा ये कैसा मीट डाल दिया भैया....
'सर जी, ये दो पीस मीट मोहब्बत के हैं- खाईए और खुश रहिए...'