गुरुवार, अप्रैल 23, 2009

कहां तक टूं...टूं करे भाई?


बड़ी मजबूरी हैं, भेजा खराब हो जाता है सुन सुन कर- टूं टूं नहीं जी, टूं टूं के पीछे छिपी असली आवाजें सुन सुन कर। कान पक गए हैं 15 लोक सभा चुनाव में। जाने संसद में जुटेंगे तो कौन सी भाषा में बात करेंगे ये टूं...टूं...
पूछिए तो ये सवाल भी बन सकता है- राइटर का एडीटर से, चैनलों का सरकार से- बता दो मेरे मालिक कहां तक टूं टूं करें (हमारे टीवी पर गाली की जगह मशीनी आवाज को लगाने को चलताऊ भाषा में टूं टूं लगाना कहते हैं). जहरीले गांधी के 'कटुआ बयान' को तो टूं टूं कर छंटुआ बना दिया, अब किस किस पर करें, राबड़ी के 'साला-नीच' पर करें कि लालू के 'बुलडोजर-हरामजादा' पर, मुन्नाभाई की 'झप्पी-पप्पी' पर करे कि अखिलेस दास की 'नफासत' से टपकती ठरक पर? बताओ सर, कहां कहां टूं टूं करें...

अब तक तो टूं टूं पर सीधा हक ठाकरे खानदान का ही बनता था, अब तो बलबीर पुंज भी 'सर्कस के शेर' पर अनपार्लियामेन्ट्री चाबुक चलाने लगे हैं। एक के बाद एक लाइन में लग कर खड़े हैं टूं टूं कराने वाले. भैया, हमसे इतनी शराफत की उम्मीद क्यों? ये सारे लोग संसद में जमा होते हैं, कानून बनाते हैं, हम सबको रास्ता दिखाते हैं- लेकिन भरी भीड़ में खुद 'भद्र जुबान' की लेनी कर देते हैं, हमसे इतनी उम्मीद क्यों कि हम टूं टूं करा कर गिने चुने खबरिया आशिकों को बतावें- भइया ना, सुन कर ही समझ लो, इन गंदे लोगों की भाषा सुनने लायक नहीं- तुम्हारे बच्चे बिगड़ जाएंगे.

आप बताइए, क्या ये हमारी जिम्मेवारी बनती है?और ये जो जुबान पर तेल लगा कर चुनावों मंचों से एक दूसरे पर पिले पड़े हैं, इनके लिए कोई लाइन है या नहीं? शायद नहीं, तभी तो, गाली गलौज करने के बदले इन्हें सजा ही क्या मिलती है- ले दे कर एक चुनाव आयोग की नोटिस, जिसका जवाब इन्हें 'कुछ दिनों के भीतर' देना होता है. हम सुनते हैं-आप भी सुनते हैं- इन्हीं 'कुछ दिनों के भीतर' ये दो चार और को गरिया देते हैं।

ये अच्छी तरह जानते हैं चुनाव आयोग को- जो हलफनामे में दिए गए ब्योरे को आखिरी सच मान लेता है. सब जानते हुए भी छुरा-चाकू-गन-बंदूक चलाने वालों के नामांकन पर इजाजत की मुहर लगाता है. ये चुनाव आयोग क्या कर लेगा, जो सब देखकर भी 'दाब कर' बैठा रहता है.इस देश में सबको सब करने की इजाजत है, लेकिन हमें 'टूं..टूं नहीं करने' की इजाजत नहीं, चलो भैया, झेल ही रहे हैं...

3 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

चलो भैया, झेल ही रहे हैं... उसके सिवा चारा ही नहीं ।

परमजीत बाली ने कहा…

यह सब असली मुद्दो से ध्यान हटाने की तरकीबे हैं ।एक बार वोट मिल जाए तो उसी के गले जा लगेगें जिसे अभी गाली दे रहे हैं।

Anil ने कहा…

मैंने टीवी देखना ही बंद कर दिया है। खबरें पाने के लिये चिट्ठे और BBC की साइट ही देखता हूँ, बाकी सब देखने लायक ही नहीं रह गये हैं।