सोमवार, अप्रैल 27, 2009

बेबी की तबियत मंदी है!

'ये क्या हो गिया...?'
उसके ये मासूम अलफाज आज मेरी जुबान पर आश्चर्य कर रहे थे। मेरा चेहरा बिलकुल इस अलफाज के वक्त गोल हुए उसके मुंह में समा रहा था।

ये क्या हो गिया? जब वो पूछता है, तो जाने क्यों लगता है2 साल का बच्चा(बेबी कहने पर खुश होने वाला बच्चा) जाने कैसे सब समझ रहा है- पापा को कोई परेशानी हुई है।

उनकी आंखों में आज वो चमक नहीं, जो अक्सर मेरे चेहरे पर रौशन होती है. पापा कितने खिलखिलाते है. जब मैं एक थप्पड़ जड़ता हूं चिक पर, तो कैसा मुंह बनाते हैं. आंखों में बिना पानी आए ऊं...हूं...उं...करके रोते हैं. इतना भी बच्चा नहीं मैं, पापा की नौटंकी समझता हूं, मैं भी उन्हीं की तरह नौटंकी करता हूं- गरम करने के बाद कान जब लाल हो जाते हैं तो मैं भी मुंह बना कर पूछ लेता हूं- पापा, ये क्या हो गिया??? हु...हु,॥हू...

वो बेबी बीमार है, रात से ही बुखार था, नाइट शिफ्ट के बाद सुबह जब घर लौटा तो देखा बेबी- छि-छी-सीट पर बैठा है, बिलकुल मुरझाया हुआ चेहरा, सूखे हुए होठं, बुझी हुई सी आंखें देखकर मेरे मुंह से भी यही निकला- ये क्या हुआ? मेरी कमजोरी है, मैं दर्द को चेहरे पर उतरने से रोक नहीं पाता। लेकिन उसे इस हालत में देखकर मेरा रंग जाने कितना उतर गया कि बेबी होंठ टेढ़ी कर रोने लगा- पापा...आआआआ।

अगले ही पल वो मेरे गोद में आकर चिपक गया। पता चला, सुबह उठने के वक्त तेज बुखार आया, फिर दस्त और...।

अभी रात को ही तो हंसते खेलते सोया था। कूद-कूद कर, भाग-भाग कर खाया था ये क्या हो गया। धौंकनी की तरह चलती उसकी छाती पर फिरती अंगुलियां जैसे ये पता करने की कोशिश कर रही थी। ठीक से बोलता नहीं, वर्ना बता देता। मेरे -क्या हुआ- के जवाब में सिर्फ सिर की तरफ इशारा किया- ये...पापा, ये....। ये इशारा भी बडी मुश्किल से किया था, इतनी पतली आवाज में पापा शब्द सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए. भट्ठी की तरह तपते उसे सिर की आंच में जैसे रात भर की भूख प्यास दिन के 10 बजे जल कर खाक हो गई.

महीने के आखिरी दिन है, अब तक जेबें आमतौर पर उल्टी हो जाती हैं। बेबी की बीमार हालत में इस उल्टी जेब का ख्याल ऐसा कि एक पल को धक से कर गया सीना। कदम अपने आप उठ पड़े अस्पताल की तरफ। उपरवाले तेरा शुक्रिया, दो-तीन घंटे भर के अंदर बेबी के माथे पर पसीने की बूंदे चमक उठीं. बदन की तपिश बूंदो में बह गई. कलेजे को ढंडक पहुंची.

घर आने के बाद कई घंटो तक चिपका रहा सीने से, जैसे मेरी सांसों से उसकी कमजोर धड़कनों को सहारा मिल रहा हो. इस अहसास ने मुझे भी दिन भर तकिए के सहारे लेटाए रखा-दरवाजा खिड़कियां बंद रखे- ताकि उसे शाम होने का एहसास न हो. वर्ना रोज की तरह 'बाइक' लेकर बाहर निकलने की जिद करने लगता. सो कर उठा तो लाइट जला दी, ताकि उसे रात होने का एहसास हो. इसी रौशनी के धोखे में शहर के बच्चे दिन रात से अंजान होते हैं।

बेबी भी अंजान है। इस बात से भी अंजान कि पापा कितने मजबूर हैं. जिनकी गोद में वो सुकून से सो रहा था, वो पापा उसे चुपके से बिस्तर पर लिटाकर ऑफिस चले गए हैं।

रात के 12 बज रहे हैं, वो अब भी सुकून से सो रहा है, पता नहीं जगेगा तो क्या सोचेगा.

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