रविवार, अप्रैल 05, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 5


मंदी में मुरझाए मन को अब भी सटीक लगती है ख्वाबों में उतरी ये कविता। भले ही दृश्य पूरी तरह गुम हो चुका है वक्त की सलवटों में...

उस दृश्य में मुझे नहीं आना था।
मैं घुमक्कड़
मैं यायावर
मैं क्या जानूं
कोई ऐसे भी स्थिर हो सकता है।
एक पेड़ था वो
अपनी गिरी हुई पत्तियों के ऊपर जड़वत खड़ा
सूखे किनारे कहते हैं कभी पेड़ के पास बहती थी नदी
अब कोसों दूर जा चुकी थी अपना जल समेटे
पेड़ से दूर छिटकी नदी में डुबकियां लगाता सूरज!
अहा, कितना सुंदर दृश्य!
नंगा नहाता सूरज और
उछल उछल कर नहलती नदी
अहा, कितना सुंदर प्रेम!
मैं मोहित
मैं सम्मोहित
जा बैठा पेड़ के ऊपर
अगले ही पल
मेरी आंखों में डूब गया पूरा
गिर गया जड़वत खड़ा पेड़
जीवन के स्पर्शमात्र
पता नहीं
किसके इंतजार में सूख गया
शायद, मुझे उस दृश्य में नहीं आना था।

1 टिप्पणी:

पशुपति शर्मा ने कहा…

नहलती नदी का अच्छा प्रयोग है...