बुधवार, अप्रैल 29, 2009

नीले, पीले दो सवालों के जवाब में


अगर आपके लक्ष्य को दिलरुबा कहूं, जैसे कि गालिब ने कहा है- अपने हर अरमान को अपने महबूब के रूप में बयां किया है, जिंदगी की नाकामियों को लख्त-ए-जिगर की रुसवाई के रूप में इजहार किया है- हर सांस में अपने यार का एहसास किया है, मसलन-
यह न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतजार होता।

गालिब ने यहां शख्स का अक्स परोसा है, वो यहां मर रहा है, दुनिया को अलविदा कह रहा है, लेकिन अफसोस नहीं- कह रहा है- मेरी तो किस्मत में ही नहीं लिखी थी यार से मुलाकात, पूरी उम्र उसका इंतजार करता रहा, वो नहीं आई मिलने, अब जीने में कोई फायदा नहीं, जब तक जीते तब तक इंतजार का दर्द उठाते रहते।

आप इस शख्स की मायूसी को समझ सकती हैं- जिंदगी में मंजिल के होने का एक मतलब ये होता है। मिल गई तो मंजिल, वर्ना रास्ता. अगर मंजिल नहीं तो रास्ता भी नहीं. रास्ता नहीं तो सफर कैसी. सफर नहीं होने का मतलब तो आप समझ सकती हैं-ठहर जाना होता है. और जहां ठहर गए, समझिए वहीं मर गए- जिंदगी से नाता खत्म. उठिए, अपनी आंखे खोलने से पहले एक मंजिल तय कीजिए, और पाने की तमन्ना छोड़ दीजिए.
सफर शुरू कीजिए!

उसे तब तक जुड़ना ही कहते हैं, जब तक दो चीजें एक दूसरे में समा न जाएं. और गांठ इसी जुड़ाव को कहते हैं- जो अक्सर बांधी गई होती है।

जो अपने आप बंध जाए- वो गांठ नहीं- इसी बंधन से तो एकाकार होने का रास्ता शुरू होता है। तब किसी गांठ की दरकार नहीं होती- दो गज (1+1)कपड़े मिलकर एक चादर बन जाते हैं- और फिर एकाकार होकर चांदनी रात की मद्धम लहरों में लहराते हैं.

चाहत तो ऐसी है, लेकिन कहां- वो गांठ कपड़े का मर्म ही नहीं समझता।

सोमवार, अप्रैल 27, 2009

बेबी की तबियत मंदी है!

'ये क्या हो गिया...?'
उसके ये मासूम अलफाज आज मेरी जुबान पर आश्चर्य कर रहे थे। मेरा चेहरा बिलकुल इस अलफाज के वक्त गोल हुए उसके मुंह में समा रहा था।

ये क्या हो गिया? जब वो पूछता है, तो जाने क्यों लगता है2 साल का बच्चा(बेबी कहने पर खुश होने वाला बच्चा) जाने कैसे सब समझ रहा है- पापा को कोई परेशानी हुई है।

उनकी आंखों में आज वो चमक नहीं, जो अक्सर मेरे चेहरे पर रौशन होती है. पापा कितने खिलखिलाते है. जब मैं एक थप्पड़ जड़ता हूं चिक पर, तो कैसा मुंह बनाते हैं. आंखों में बिना पानी आए ऊं...हूं...उं...करके रोते हैं. इतना भी बच्चा नहीं मैं, पापा की नौटंकी समझता हूं, मैं भी उन्हीं की तरह नौटंकी करता हूं- गरम करने के बाद कान जब लाल हो जाते हैं तो मैं भी मुंह बना कर पूछ लेता हूं- पापा, ये क्या हो गिया??? हु...हु,॥हू...

वो बेबी बीमार है, रात से ही बुखार था, नाइट शिफ्ट के बाद सुबह जब घर लौटा तो देखा बेबी- छि-छी-सीट पर बैठा है, बिलकुल मुरझाया हुआ चेहरा, सूखे हुए होठं, बुझी हुई सी आंखें देखकर मेरे मुंह से भी यही निकला- ये क्या हुआ? मेरी कमजोरी है, मैं दर्द को चेहरे पर उतरने से रोक नहीं पाता। लेकिन उसे इस हालत में देखकर मेरा रंग जाने कितना उतर गया कि बेबी होंठ टेढ़ी कर रोने लगा- पापा...आआआआ।

अगले ही पल वो मेरे गोद में आकर चिपक गया। पता चला, सुबह उठने के वक्त तेज बुखार आया, फिर दस्त और...।

अभी रात को ही तो हंसते खेलते सोया था। कूद-कूद कर, भाग-भाग कर खाया था ये क्या हो गया। धौंकनी की तरह चलती उसकी छाती पर फिरती अंगुलियां जैसे ये पता करने की कोशिश कर रही थी। ठीक से बोलता नहीं, वर्ना बता देता। मेरे -क्या हुआ- के जवाब में सिर्फ सिर की तरफ इशारा किया- ये...पापा, ये....। ये इशारा भी बडी मुश्किल से किया था, इतनी पतली आवाज में पापा शब्द सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए. भट्ठी की तरह तपते उसे सिर की आंच में जैसे रात भर की भूख प्यास दिन के 10 बजे जल कर खाक हो गई.

महीने के आखिरी दिन है, अब तक जेबें आमतौर पर उल्टी हो जाती हैं। बेबी की बीमार हालत में इस उल्टी जेब का ख्याल ऐसा कि एक पल को धक से कर गया सीना। कदम अपने आप उठ पड़े अस्पताल की तरफ। उपरवाले तेरा शुक्रिया, दो-तीन घंटे भर के अंदर बेबी के माथे पर पसीने की बूंदे चमक उठीं. बदन की तपिश बूंदो में बह गई. कलेजे को ढंडक पहुंची.

घर आने के बाद कई घंटो तक चिपका रहा सीने से, जैसे मेरी सांसों से उसकी कमजोर धड़कनों को सहारा मिल रहा हो. इस अहसास ने मुझे भी दिन भर तकिए के सहारे लेटाए रखा-दरवाजा खिड़कियां बंद रखे- ताकि उसे शाम होने का एहसास न हो. वर्ना रोज की तरह 'बाइक' लेकर बाहर निकलने की जिद करने लगता. सो कर उठा तो लाइट जला दी, ताकि उसे रात होने का एहसास हो. इसी रौशनी के धोखे में शहर के बच्चे दिन रात से अंजान होते हैं।

बेबी भी अंजान है। इस बात से भी अंजान कि पापा कितने मजबूर हैं. जिनकी गोद में वो सुकून से सो रहा था, वो पापा उसे चुपके से बिस्तर पर लिटाकर ऑफिस चले गए हैं।

रात के 12 बज रहे हैं, वो अब भी सुकून से सो रहा है, पता नहीं जगेगा तो क्या सोचेगा.

गुरुवार, अप्रैल 23, 2009

कहां तक टूं...टूं करे भाई?


बड़ी मजबूरी हैं, भेजा खराब हो जाता है सुन सुन कर- टूं टूं नहीं जी, टूं टूं के पीछे छिपी असली आवाजें सुन सुन कर। कान पक गए हैं 15 लोक सभा चुनाव में। जाने संसद में जुटेंगे तो कौन सी भाषा में बात करेंगे ये टूं...टूं...
पूछिए तो ये सवाल भी बन सकता है- राइटर का एडीटर से, चैनलों का सरकार से- बता दो मेरे मालिक कहां तक टूं टूं करें (हमारे टीवी पर गाली की जगह मशीनी आवाज को लगाने को चलताऊ भाषा में टूं टूं लगाना कहते हैं). जहरीले गांधी के 'कटुआ बयान' को तो टूं टूं कर छंटुआ बना दिया, अब किस किस पर करें, राबड़ी के 'साला-नीच' पर करें कि लालू के 'बुलडोजर-हरामजादा' पर, मुन्नाभाई की 'झप्पी-पप्पी' पर करे कि अखिलेस दास की 'नफासत' से टपकती ठरक पर? बताओ सर, कहां कहां टूं टूं करें...

अब तक तो टूं टूं पर सीधा हक ठाकरे खानदान का ही बनता था, अब तो बलबीर पुंज भी 'सर्कस के शेर' पर अनपार्लियामेन्ट्री चाबुक चलाने लगे हैं। एक के बाद एक लाइन में लग कर खड़े हैं टूं टूं कराने वाले. भैया, हमसे इतनी शराफत की उम्मीद क्यों? ये सारे लोग संसद में जमा होते हैं, कानून बनाते हैं, हम सबको रास्ता दिखाते हैं- लेकिन भरी भीड़ में खुद 'भद्र जुबान' की लेनी कर देते हैं, हमसे इतनी उम्मीद क्यों कि हम टूं टूं करा कर गिने चुने खबरिया आशिकों को बतावें- भइया ना, सुन कर ही समझ लो, इन गंदे लोगों की भाषा सुनने लायक नहीं- तुम्हारे बच्चे बिगड़ जाएंगे.

आप बताइए, क्या ये हमारी जिम्मेवारी बनती है?और ये जो जुबान पर तेल लगा कर चुनावों मंचों से एक दूसरे पर पिले पड़े हैं, इनके लिए कोई लाइन है या नहीं? शायद नहीं, तभी तो, गाली गलौज करने के बदले इन्हें सजा ही क्या मिलती है- ले दे कर एक चुनाव आयोग की नोटिस, जिसका जवाब इन्हें 'कुछ दिनों के भीतर' देना होता है. हम सुनते हैं-आप भी सुनते हैं- इन्हीं 'कुछ दिनों के भीतर' ये दो चार और को गरिया देते हैं।

ये अच्छी तरह जानते हैं चुनाव आयोग को- जो हलफनामे में दिए गए ब्योरे को आखिरी सच मान लेता है. सब जानते हुए भी छुरा-चाकू-गन-बंदूक चलाने वालों के नामांकन पर इजाजत की मुहर लगाता है. ये चुनाव आयोग क्या कर लेगा, जो सब देखकर भी 'दाब कर' बैठा रहता है.इस देश में सबको सब करने की इजाजत है, लेकिन हमें 'टूं..टूं नहीं करने' की इजाजत नहीं, चलो भैया, झेल ही रहे हैं...

शनिवार, अप्रैल 11, 2009

चल निकला जूते का कारोबार


जूते के प्रति आदमी की संवेदनशीलता को देखकर तो यही लगता है कि उत्पत्ति के समय से ही जूता एक एक जरूरी सामान बन गया होगा- आखिर रास्ते के कंकड़ पत्थरों से रक्षा, ठोकरों से राहत जूते के सिवा और कौन दे सकता है। कहना नहीं होगा कि समय के साथ जूते की स्तर भी परिष्कृत होता गया....लेकिन मतलब वही रहा- जूता पड़ जाए... तो समझ लीजिए- पीठ पर पड़े तो धुनाई, सर पर पड़े तो जगहंसाई।

पहनने में शानदार, मारने में मजेदार अपने दोनों मतलब के साथ जूता एक ग्लोबल प्रोडक्ट है, लेकिन इसका बड़ी तीव्र अनुभूति हुई एक विज्ञापन को देखकर, जो एक राष्ट्रीय अखबार के पूरे फ्रंट पेज के खबरों पर अपने आकर्षक डिजाइन में हावी था। कहीं कोई खबर नहीं, सिर्फ जूते ही जूते। ऐसा विज्ञापन कोई पहली बार नहीं छपा, लेकिन जूतों के बीच खबरों का गायब होना- पल भर के लिए हंसी छूट गई. विचारों पर जूते का दूसरा मतलब हावी हो गया. मुंह से बरबस ही निकल पड़ा- ये देखो जूते का कमाल.

यकीनन, इस विज्ञापन को देखकर औरों को भी यही लगा होगा- जरूर याद आई होगी बुश के बाद चिदंबरम और नवीन जिंदल पर पड़े जूते की और यकीनन, विज्ञापन देने वाले ने भी यही सोचा होगा, हालिया घटनाओं के साथ उसकी देशी कंपनी का नाम पढ़ने वालों के जेहन में मल्टीनेशनल ब्रांड की तरह हमेशा के लिए बस जाएगा। और संपादक जी ने भी यही सोचा होगा- जूते की खबर छापने से बढ़िया है- जूते का ऐड छाप दो. चार पैसे मिल जाएंगे- तो मालिक की भी चांदी हो जाएगी. आखिर जूते को कैश करने का इससे बढ़िया मौका क्या हो सकता है?

जूता जब खबरों का प्रायोजक बन जाए, तो पॉपुलरिटी स्टंट का नया फार्मूला अपने आप इजाद हो जाता है। एक ऐसा आइडिया, जो हमेशा के लिए जिंदगी बदल सकता है। ऐसे में ये संभावना ये ज्यादा हो जाती है- कि कल को जूता पड़ने की क्रिया भी प्रायोजित हो जाए. जिसे चाहिए होगी पॉपुलॉरिटी- उठा लेगा भाड़े पर किसी को फेंकने के लिए. कैमरे तैमरे तो होंगे ही, बस अपना 'रियेक्शन टाइट रखने' की जरूरत रहेगी. जूता पड़ने पर मुस्कराना होगा, कूल डाउन...कूल डाउन...टेक इट इजी...जैसे जुमले लाल हुए चेहरे के साथ उछालने होंगे. कैमरे के साथ एक तीर से दो निशाने सधेंगे- जूता फेंकने वाला और खाने वाला दोनों बन जाएंगे महान

इस महानता का बखान करने के लिए- अखबारों में अच्छी हेडिंग, टीवी पर ऐरो, सर्किल और अनुप्रासिक टेक्स्ट मौजूद होंगे ही. अगर एक जूता खाने से इतनी पॉपुलारिटी मिलती हो, तो बुरा क्या है, अगर हैसियत बड़ी है- तो जूता कंपनी भी घटना को प्रायोजित करने को राजी हो जाएगी. आप इसके लिए मुंतदर अल जैदी के फेंके जूते की अरब जगत में बढ़ी बिक्री का आंकड़ा पेश कर सकते हैं. जब अखबार को सर्कुलेशन और टीवी को टीआरपी से विज्ञापन मिल सकते हैं, तो आपको तो इस आंकड़े के बाद अच्छे प्रायोजक मिल जाएंगे. हर लिहाज से सस्ता सुंदर और टिकाऊ फार्मूला लेकर आया है ये जूता.

गुरुवार, अप्रैल 09, 2009

इतना 'गरम जूता',और सीबीआई का 'ढंडा बस्ता'


बेशक जूते को इतना गरम नहीं होना चाहिए, और अगर हो भी तो चिदंबरम जैसे तेज,ईमानदार और शरीफ मंत्री की तरफ नहीं उछलना चाहिए था, फिर भी अगर उछला तो इसकी जितनी निंदा की जाए उतनी कम है- गांधी के अहिंसा धर्म वाले देश में तो और भी। अब जबकि बापू के आदर्शों का इशारा करते हुए जब जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह ने माफी मांग ली हैं, और ये साफ कर दिया है, उनके विचारों में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं, वो बस एक क्षणिक बौखलाहट भर थी। वो बेचैनी जो सीबीआई के ढंडे बस्ते की वजह से पैदा हुई.

टीवी पर आप सब जरनैल सिंह को ये कहते हुए सुन चुके हैं- कि ठीक है, सीबीआई ने टाइटलर को क्लीन चीट दे दिया, लेकिन दोषी कौन है, ये कौन तय करेगा। या तो सरकार तय करे, या फिर सीबीआई बताए। अगर फ्लाने का दामन साफ है, तो 3000 सिखों को जिंदा जलाने के मामले में दोषी कौन है?

बैचैन कर देने वाला सवाल तो है ही, और ये संयोग था कि इस सवाल के सामने चिदंबरम जैसे 'नॉन-पॉलिटिशियन' मिनिस्टर थे, जो इतने डिप्लोमैटिक जरूर हैं कि वो कह सकें- कि मैं न तो जज हूं, कि दोषी और निर्दोष तय करूं, पार्टी इंचार्ज भी नहीं, जो ये तय करूं कि किसे टिकट दें या न दें, लेकिन इस सवाल का जवाव कौन देगा- 25 साल तक जांच किए, और किसी को दोषी ठहराए बिना चल दिए! और कितना साफ कहे जरनैल सिंह- उन्हें इस बात का मलाल नहीं कि टाइटलर को क्लीन चिट क्यों दी, मलाल ये है कि आप तो पल्ला झाड़कर ही चल दिए, और सरकार ने भी हिसाब किताब नहीं किया, भैया, चुनाव में जाना है, जनता पूछेगी तो क्या जवाब देंगे, 84 के दंगे की आग जमीन ने लगाई या आसमान ने?

उस वक्त राजीव गांधी ने बड़ी आसानी से कह दिया था- 'जब बड़ा पेड़ जमीन पर गिरता है, तो धरती पल भर के लिए कांप ही जाती है' अब इतने बड़े फैसले के बाद अगर एक जूता पांव से निकल गया तो इसे क्यों नहीं उसी फार्मूले के तहत देखा जाना चाहिए- जब हजारों लोगों की आस टूटी, तो एक बंदा बौखला गया, तो क्या बड़ी बात हो गई?

देश की सबसे बड़ी एजेंसी का अगर ये हाल है, ललित नारायण मिश्रा मर्डर केस से लेकर आरुषि हत्याकांड तक सीबीआई की विफल जांच की लंबी फेहरिस्त है, निठारी हत्याकांड में जिसे सीबीआई ने क्लीन चिट दिया उसे मौत की सजा हुई, आरुषि हत्याकांड में अब तक सीबीआई के हाथ खाली है, इनकी तो छोड़िए. ललित नारायण मिश्रा (1975) के हत्यारों का आज तक पता नहीं चला, केस अब भी अंडर ट्रायल है. सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री नरबहादुर भंडारी (1984-85) पर भ्रष्टाचार के दो मामलों का क्या हुआ. सेंट किट्स घोटाला (1990) अब भी अंडरट्रायल है. बाबरी मस्जिद ध्वंस (1992) का हाल तो सबको पता है. झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड (1996) में गुरू जी को क्लीन चिट मिल गई (दोषी कौन था नहीं पता चला)। दिल्ली हाउसिंग घोटाला (1996) में पूर्व मंत्री शीला कौल की क्या भूमिका थी नहीं पता चली। जयललिता बर्थ गिफ्ट (1997) में अब भी जांच चल रही है. ब्रह्मदत्त द्विवेदी मर्डर केस (1998)में बड़े नेताओं के नाम आ रहे थे, उसका क्या हुआ? बिहार पुलिस यूनिफॉर्म घोटाला (1975), बिहार चारा घोटाला (1995) धोती साड़ी घोटाला(1997), इंजीनियरिंग एडमिशन घोटाला (1998) बिहार दवा घोटाला (2000) जैसे कई मामलों में या तो जांच चल रही है या मामले अंडरट्रायल हैं. मुलायम, लालू, राबड़ी और मायावती जैसी हस्तियों पर आय से ज्यादा संपत्ति मामलों में सिर्फ तारीखें बंट रही है ये हो क्या रहा है!

कहना नहीं होगा, ये सारे मामले सियासत और सियासी हस्तियों से जुड़े हुए हैं, और इनके नतीजे देशहित में काफी हो सकते थे, लेकिन नहीं, फिर भी सरकारें चाहती हैं इतन सीबीआई के सियासी इस्तेमाल का आरोप नहीं लगे. नीयत पर तो अंगुली उठाना दूर की बात है., कोई है सीबीआई से सवाल पूछने वाला? आप उठाएंगे, तो आपकी नीयत ही सियासी संदेह के घेरे में आ जाएगी, जैसा जरनैल सिंह के साथ हुआ। सबने शुरू में यही समझा ये सिख विद्रोहियों की करतूत है।

जय हो, जय हो, जय हो, इतना गरम जूता और सीबीआई का इतना ढंडा बस्ता! भैया भूगोल का सिद्धांत हैं- हवा जब गर्म होती है तो बवंडर खड़ा होता है। अपनी जगह से उपर उठती है हवा। और फिर किधर बह निकले क्या पता? प्रकृति का नियम है- इसे कौन रोक सकता है, गलत चाहे जितना ठहरा लें

रविवार, अप्रैल 05, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 5


मंदी में मुरझाए मन को अब भी सटीक लगती है ख्वाबों में उतरी ये कविता। भले ही दृश्य पूरी तरह गुम हो चुका है वक्त की सलवटों में...

उस दृश्य में मुझे नहीं आना था।
मैं घुमक्कड़
मैं यायावर
मैं क्या जानूं
कोई ऐसे भी स्थिर हो सकता है।
एक पेड़ था वो
अपनी गिरी हुई पत्तियों के ऊपर जड़वत खड़ा
सूखे किनारे कहते हैं कभी पेड़ के पास बहती थी नदी
अब कोसों दूर जा चुकी थी अपना जल समेटे
पेड़ से दूर छिटकी नदी में डुबकियां लगाता सूरज!
अहा, कितना सुंदर दृश्य!
नंगा नहाता सूरज और
उछल उछल कर नहलती नदी
अहा, कितना सुंदर प्रेम!
मैं मोहित
मैं सम्मोहित
जा बैठा पेड़ के ऊपर
अगले ही पल
मेरी आंखों में डूब गया पूरा
गिर गया जड़वत खड़ा पेड़
जीवन के स्पर्शमात्र
पता नहीं
किसके इंतजार में सूख गया
शायद, मुझे उस दृश्य में नहीं आना था।