बुधवार, मार्च 11, 2009

साल के पहले दिन



पहला दिन है साल का। होली है आज. सभ्य लोग फगुआ को भी होली कहते हैं. इसलिए मैं भी होली कह रहा हूं. यानी अब तक के समीकरण के मुताबिक आप मुझे भी सभ्य कह सकते हैं. लेकिन जेहनी तौर पर मैं आज भी हूं ठेठ. ठेठ बिहारी.

रंगत बदल गई है, काले से हल्का पीला हो गया हूं। लेकिन अंदर से रंग वही है- चटख काला. सूरज के सारे रंगों को समेट लिया जो है.

फिर भी, रंग बदलती रहती हैं स्मृतियां। मैं फिलहाल जहां हूं रंगों के साथ कुछ ऐसे बदलती है दुनिया कि पूरा पैटर्न बदल जाता है.

लाल रंग से याद आती है वो रात जब पहली बार समझ आया था रंग का मतलब। पहली बार देखी थी किसी स्त्री की देह. उस देह में आदमी के लिए जगह. आदमी के लिए बेचैन इच्छा. एकाकार होने की वो तमान्ना.

गुलाबी रंग के वो ख्वाब जो छत पर गुलजार के गीतों की तरह सुबह की ढंडी बयार में देह की गर्मी के साथ सफेद चादर में ठिठुरते थे। हर रोज शिकायत होती थी लालमुंहे सूरज से, जो सपने के बीच टपक पड़ता था. याद आता है उसका सुर्ख पीला रंग. कातिलना अंदाज में भी कितना क्यूट लगता था सूरज. होली के दिन वो भी कितनी सुस्ती से आसमान की चढ़ाई शुरू करता था. उसे भी पता था कीचड़ में होली का मजा ही कुछ और होता है.

आज एसी न्यूज रूम में सूरज का वो पीलापन इतना मुखर है, कि कंप्यूटर के की-बोर्ड की हर खटखट से उड़ रहा है उस बाल्टी में घोरी हुई 'गोरकी मिट्टी' का साफ सुथरा कीचड़ा। 99 साल के बाबा की वो मुरझाई हुई पीठ, जिस पर रगड़ कर भाग जाया करते थे कीचड़. मटमैले रंग का वो कीचड़ यहां से हरे रंग का दिखता है.
हरे रंग का इसलिए भी कि फागुन की वो पीली सी हरियाली पक रही होती थी। ये रंग फागुन की मस्ती का है, उसकी उमड़ती जवानी का है. आग में भुन कर क्या स्वादिष्ट लगती थीं अधपकी गेहूं की बालियां. चने की टहनियां और मटर की लतरें. अजीब से कोलाज के रंग में दिखती हैं निठल्ली शाम की रंगीन महफिल. दाने दाने में होता था एक अजीब सा नशा.

ढलने का अफसोस तकिन भी नहीं होता था फगुवा की मतवाली शाम को। अब शुरु होता था रात के साथ रोमांस. हर गले से फूटती थी वो बेकरार सी राग. रंग ऐसा कि एक घड़ी बाद इतनी उजली हो उठती थी रात कि सपने भी साफ दिखने लगते थे. घर लौटने के बाद मां- पापा दिखते थे छत के कोने पर एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए.

मेरे आते ही पापा पूछ बैठते थे मां से- तुम्हारा हाथ कितना रूख हो गया है। देखो तो बबून, मैं झूठ कह रहा हूं. लगता है कि तुम्हारी मां इन्हीं फटे हाथों से इतना चिकना 'पुआ' बनाती है. 'छूने भर से फूट जाने वाले दहीबड़े' बनाती है. मैं समझ जाता था पापा मां को प्यार कर रहे हैं. मेरे सामने बस इशारों में बात कर रहे हैं. मां-पापा के प्यार से लाल हो जाता था मेरा चेहरा

आज भी चेहरा लाल है, यूं कहे कि रंगों से सतरंगी हो गया है 'पापा के बबुन का मुखड़ा' मगर रंग असली नहीं है, दोस्तों ने लेपा ही है इतना रंग- लाल-पीला-नीला-हरा और गुलाबी- मैं क्या करूं। हर रंग में दिख रहा है- एक नया जमाना. साल के पहले दिन याद आ रहा है पीछे छूट चुकी वो रंगीनियां.

1 टिप्पणी:

संगीता पुरी ने कहा…

होली की ढेरो शुभकामनाएं ...