मंगलवार, मार्च 31, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 4


लोहे को शीशे में बदलते हुए देखने का इतना पुराना एहसास आज भी दहशत पैदा करता है। पाश का लोहा पढ़ते हुए 'कुछ करने' का मन होता था, इस शीशे को देखकर जख्मी होने का डर सताता है-

कुछ भी हो सकता है
बदल गया है लोहे का रंग रूप
तपते-तपते शीशे में तब्दील हो चुका है लोहा*

शीशा जो चमकता है
चकाचौंध पैदा करता
शीशा जो होड़ पैदा करता है
अपना चेहरा सबसे आगे देखने की

शीशा जो चिपकता नहीं बदन पर
उतर सकता है सीधे आत्मा में
शीशा जो चेहरा दिखाता है
चीर सकता है आपको दो हिस्सों में

शीशे की दुनिया में कुछ भी हो सकता है
आप प्रेम कविताएं लिख सकते हो
और आपके बच्चों को आ सकते हैं
जनसंहार के सपने

हम शीशे के कगार पर खड़े हैं
हम कभी भी निगल सकते हैं शीशा
और भूल सकते हैं लोहे को।


*क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश का लोहा

1 टिप्पणी:

पशुपति शर्मा ने कहा…

शीशा निगल लिया और लोहा अपना रहा नहीं... कैसे चलेगा काम सर...