मंगलवार, मार्च 31, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 4


लोहे को शीशे में बदलते हुए देखने का इतना पुराना एहसास आज भी दहशत पैदा करता है। पाश का लोहा पढ़ते हुए 'कुछ करने' का मन होता था, इस शीशे को देखकर जख्मी होने का डर सताता है-

कुछ भी हो सकता है
बदल गया है लोहे का रंग रूप
तपते-तपते शीशे में तब्दील हो चुका है लोहा*

शीशा जो चमकता है
चकाचौंध पैदा करता
शीशा जो होड़ पैदा करता है
अपना चेहरा सबसे आगे देखने की

शीशा जो चिपकता नहीं बदन पर
उतर सकता है सीधे आत्मा में
शीशा जो चेहरा दिखाता है
चीर सकता है आपको दो हिस्सों में

शीशे की दुनिया में कुछ भी हो सकता है
आप प्रेम कविताएं लिख सकते हो
और आपके बच्चों को आ सकते हैं
जनसंहार के सपने

हम शीशे के कगार पर खड़े हैं
हम कभी भी निगल सकते हैं शीशा
और भूल सकते हैं लोहे को।


*क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश का लोहा

बुधवार, मार्च 25, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 3


अजीब सी शिकायत दर्ज है डायरी के इस पन्ने में। लहरों की खुशी भी है, और बहने का मलाल भी. आधी रात का वक्त था, सपने की जगह उनींदी रात में बालकनी के बाहर सूने क्षितिज पर उफान रही थी नदी-
मुझे इतनी भी दूर
मत बहा ले जाओ नदी
काफी दूर आ गया हूं
तुम्हारी कोख में हिचकोले खाते
तुम्हारी तहों में गुम होते
काफी दूर आ गया हूं मैं

तुम्हारे साथ चलते-चलते
अब तो मैं पत्थर भी न रहा
घिसा हुआ बदन कुछ और ही दिखता है
जैसे पावन तुम्हारा जल
वैसे पवित्र मेरा चिकना बदन

इससे पहले कि किसी के हाथ लगूं
बना दिया जाऊं किसी मंदिर का देवता
न कुछ देख सकूंगा
न कुछ सुन सकूंगा
न बोल सकूंगा
मैं निष्कर्म हो जाऊंगा

थाम लो अपनी रफ्तार
मुझे वापस लौटना है इसी जन्म में

शनिवार, मार्च 21, 2009

एक दिन कविता के नाम

21 मार्च आज है वर्ल्ड पोएट्री डे। यूनेस्को ने साल 1999 में 21 मार्च को वर्ल्ड पोएट्री डे के तौर पर मनाने का एलान किया था. तमाम कवि हृदय आत्माओं के लिए मेरे दोस्त देवांशु झा का भेजा ये खास उदगार...

सदियों पहले एक परिंदे की दर्द भऱी आवाज में ढल कर तुम किसी की रूह में उतरीं. एक डाकू जिसने उस दर्द को महसूस किया और उस दर्द के पेट से तुम पैदा हुई। डाकू महर्षि बन गया और दर्द कविता. यूं तो अंजान ताकतों की प्रार्थना का रहस्य भी कविता है लेकिन वाल्मीकि ही तुम्हारे पिता थे और फिर मेघ की भाषा में तुम्हें कालिदास ने बात करने की कला सिखलाई. तुम्हें रंगीनियों से संवारा.तुम्हारे अंदर सीता की तकलीफ भवभूति की कलम से उभरी. तुम्हारी रंगीनियों ने पहली बार करुणा और अंधकार की भाषा भवभूति से सीखी.

तुम चलती रही..बहती रही. भास, दण्डी..श्रीहर्ष..और न जाने कितनी ही जुबां से संवरती रही शंकर, कुमारिल ने तुम्हें दर्शन के जेवर पहनाये। तुम्हारी धारा उत्तर से दक्षिण की ओर बहने लगी. सुदूर तमिलनाडु में तुम्हें एक नया कलेवर मिला॥

एक वक्त ऐसा भी आया जब धारा कुछ रुक सी गई। लेकिन फिर अमीर खुसरो॥की जुबां में तुम ताजा हो उठीं॥और राम तुम्हारे हाथों कुछ और संवर से गए तुलसी की कलम से। कृष्ण की शख्सियत को सूर ने तुम्हारे सहारे से एक नई चांदनी से भर दिया. कबीर ने तुम्हें तोड़ना फोड़ना सिखाया. तुम खुद अपनी राह बनाकर चलने की कला उस फकीर से सीख गईं.

नानक की भाषा में तुम कई विरोधों को साथ लेकर चलीं. और जयदेव, चैतन्य, कम्ब और पंपा तुम्हें रोशन करते गए.. सदियां बीतती रही. भाषा बदलती रहीं.. फारसी में बेदिल की कलम से तुम खिल उठी. तो मीर के शेर और नज्म तुम्हें खुदा के करीब ले गए. गालिब की पीड़ा और दर्द में तुम पिघल सी गई और टैगोर ने तुम्हें झरने का प्रवाह दिया. पश्चिम को पूर्व से मिला दिया. बंकिम ने तुम्हें मुक्ति की चाह दी और भारती के स्वरों में तुमने विद्रोह करना सीखा.

प्रसाद के सहारे तुमने इस संस्कृति की धारा में फिर से डुबकी लगाई. निराला के प्रचंड ओज में तुम्हारे बंधन टूट गए तुम परंपरा और आधुनिकता के बीच भिड़ंत करती रहीं।जीवनानंद ने तुम्हें नई छवियां दीं तो मुक्तिबोध ने तुम्हें अंधकार से प्रकाश में जाने की छटपटाहट. नागार्जुन ने तुम्हें भदेस होना सिखलाया और अज्ञेय की भाषा में अभिजात्य हो गईं. अब तुम्हारे स्वर कुछ बदले हुए हैं। तुम्हारी शैली भी बदल गई है. तुम्हारी पहचान मुश्किल है. तुम कविता हो या कुछ और कहना आसां नहीं.

लेकिन जीवन जब भी गम. खुशी,हार-जीत के लम्हों से गुजरता है. तुम सांस लेती हो. जब भी बादल गरजते हैं, झरने बहते हैं..नदियां उफनती हैं, चिड़ियां चहचहाती हैं, किसान खेतों में काम करते हैं.बच्चे जिद करते हैं..मां रोती है..और पिता मुस्कराते हैं. तुम मौजूद रहती हो. और शायद किसी न किसी भाषा, जुबां में इस धरती के जीवित रहने तक तुम भी सांस लेती रहोगी.. क्योंकि जीवन एक कविता ही है.

रविवार, मार्च 15, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 2

*'पुरानी सायकिल की स्मृति में' नाम से दर्ज है ये पन्ना। कविता तो भूल चुका था, लेकिन वो सायकिल अब भी याद है. भूले भी तो कैसे-

तुम्हे खरीदा ऐसा था जैसे पा लिया हो
अपनी तरह से लीक तोड़ रहा था तुम्हारा हरा रंग
मलमल की तरह चुभा करती थी तुम
अपनी ढेर साली काली बहनों की आंखों में
तुम इकलौती थी इतनी हरी भरी

तुम्हारे साथ मैंने पहली बार जाना
अपने कदमों की रफ्तार इतनी भी तेज हो सकती है
कि मोटरवालों को भी पीछे छोड़ सकूं
तुम्हे चाहिए होते थे बस सधे हुए हाथ
और थोड़ी सी पतली सी सड़क
मुझे अच्छी लगती थी
तुम्हारी इतनी कम अपेक्षाएं

मैं सीख चुका था हैंडिल संभालना
तुम्हारे आने से पहले ही
उस बनिये की सायकिल भगा-भगा कर
जो दलान पर थूक पीस रहा होता था
पिता से चावल गेहूं के मोल-भाव करते हुए

कितनी ललक से भरा हुआ था
उस दिन जब तुम आने वाली थी.
मुझे हालांकि अच्छा लगा था उस दूकानदार का मजाक
जिसने तुम्हारे पीछे करियर सेट करते हुए
उड़ेल दिया था मेरी अधीरता पर बाल्टी भर पानी
'रुक जाओ यार उतावले तो ऐसे हो रहे हो
जैसे सायकिल पर चढ़े ही नहीं आज तक.

तुम्हें शायद बुरा लगा था
तभी मेरी जल्दीबाजियों को ढोती रही
तुम बिना कुछ कहे
जो नए सिरे से पैदा होने लगी थी तुम्हारे आने के साथ
मेरी थकान को अपने पहियो में लपेटती रही तुम चुपचाप
मैं अब तुम्हारे साथ दौड़ने लगा था

तुम मारे खुशी के चमक उठती थी
जब मैं मल रहा होता था तुम्हारे बदन पर नारियल का तेल
तुम कभी कभार चिढ़ भी जाती थी
जब मुझे तकलीफ सी होती थी
तु्म्हें दूसरे के हाथों सौपने की कल्पना से भी

कुछ ही दिनों में तुम बड़ी हो गई थी
अपने रंग रुप को भूल चुकी दुल्हान की तरह समझदार
और मैं एक पति की तरह लाचार
मुझे याद आता है तु्म्हारा बेझिझक कीचड़ में कूद पड़ना
मेरा बोझ अपने उदर में थामे हुए
खेतो के लिए खाद,
घर के लिए सीमेंट
जानवरों के लिए चारा।

तुम लाख कहती हो चुप भी करो
पुराने दिन ऐसे ही होते हैं
मैं तुम्हारी रंगत से आंख नहीं मिला पाता
जो मेरे साथ रहते उतरी थी
मेरे हाथों में अब भी लिपटी हुई है तुम्हारी थकान
जो तुम्हारे बदन से कीचड़ हटाते हुए जम गई थी

औरों की तरह मैं कैसे कह दूं
तुम बुढ़ी हो चुकी हो
घर के एक कोने में पुरानी सी पड़ी हो.
तुमने जो भी दिया है मुझे
हमेशा नया ही दिया है.

बुधवार, मार्च 11, 2009

साल के पहले दिन



पहला दिन है साल का। होली है आज. सभ्य लोग फगुआ को भी होली कहते हैं. इसलिए मैं भी होली कह रहा हूं. यानी अब तक के समीकरण के मुताबिक आप मुझे भी सभ्य कह सकते हैं. लेकिन जेहनी तौर पर मैं आज भी हूं ठेठ. ठेठ बिहारी.

रंगत बदल गई है, काले से हल्का पीला हो गया हूं। लेकिन अंदर से रंग वही है- चटख काला. सूरज के सारे रंगों को समेट लिया जो है.

फिर भी, रंग बदलती रहती हैं स्मृतियां। मैं फिलहाल जहां हूं रंगों के साथ कुछ ऐसे बदलती है दुनिया कि पूरा पैटर्न बदल जाता है.

लाल रंग से याद आती है वो रात जब पहली बार समझ आया था रंग का मतलब। पहली बार देखी थी किसी स्त्री की देह. उस देह में आदमी के लिए जगह. आदमी के लिए बेचैन इच्छा. एकाकार होने की वो तमान्ना.

गुलाबी रंग के वो ख्वाब जो छत पर गुलजार के गीतों की तरह सुबह की ढंडी बयार में देह की गर्मी के साथ सफेद चादर में ठिठुरते थे। हर रोज शिकायत होती थी लालमुंहे सूरज से, जो सपने के बीच टपक पड़ता था. याद आता है उसका सुर्ख पीला रंग. कातिलना अंदाज में भी कितना क्यूट लगता था सूरज. होली के दिन वो भी कितनी सुस्ती से आसमान की चढ़ाई शुरू करता था. उसे भी पता था कीचड़ में होली का मजा ही कुछ और होता है.

आज एसी न्यूज रूम में सूरज का वो पीलापन इतना मुखर है, कि कंप्यूटर के की-बोर्ड की हर खटखट से उड़ रहा है उस बाल्टी में घोरी हुई 'गोरकी मिट्टी' का साफ सुथरा कीचड़ा। 99 साल के बाबा की वो मुरझाई हुई पीठ, जिस पर रगड़ कर भाग जाया करते थे कीचड़. मटमैले रंग का वो कीचड़ यहां से हरे रंग का दिखता है.
हरे रंग का इसलिए भी कि फागुन की वो पीली सी हरियाली पक रही होती थी। ये रंग फागुन की मस्ती का है, उसकी उमड़ती जवानी का है. आग में भुन कर क्या स्वादिष्ट लगती थीं अधपकी गेहूं की बालियां. चने की टहनियां और मटर की लतरें. अजीब से कोलाज के रंग में दिखती हैं निठल्ली शाम की रंगीन महफिल. दाने दाने में होता था एक अजीब सा नशा.

ढलने का अफसोस तकिन भी नहीं होता था फगुवा की मतवाली शाम को। अब शुरु होता था रात के साथ रोमांस. हर गले से फूटती थी वो बेकरार सी राग. रंग ऐसा कि एक घड़ी बाद इतनी उजली हो उठती थी रात कि सपने भी साफ दिखने लगते थे. घर लौटने के बाद मां- पापा दिखते थे छत के कोने पर एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए.

मेरे आते ही पापा पूछ बैठते थे मां से- तुम्हारा हाथ कितना रूख हो गया है। देखो तो बबून, मैं झूठ कह रहा हूं. लगता है कि तुम्हारी मां इन्हीं फटे हाथों से इतना चिकना 'पुआ' बनाती है. 'छूने भर से फूट जाने वाले दहीबड़े' बनाती है. मैं समझ जाता था पापा मां को प्यार कर रहे हैं. मेरे सामने बस इशारों में बात कर रहे हैं. मां-पापा के प्यार से लाल हो जाता था मेरा चेहरा

आज भी चेहरा लाल है, यूं कहे कि रंगों से सतरंगी हो गया है 'पापा के बबुन का मुखड़ा' मगर रंग असली नहीं है, दोस्तों ने लेपा ही है इतना रंग- लाल-पीला-नीला-हरा और गुलाबी- मैं क्या करूं। हर रंग में दिख रहा है- एक नया जमाना. साल के पहले दिन याद आ रहा है पीछे छूट चुकी वो रंगीनियां.

मंगलवार, मार्च 10, 2009

पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने-1

पन्ने पुराने हैं, लेकिन पन्नों पर उतरी इबारत अब तक मटमैली नहीं हुई. शब्दों के बीच पसरी उदासी भी एक अलग रंग में दिखती है. जब उतरना हुआ तो देखिए इस 'रंगहीन' ने भी चुना रंगों के त्योहार का मौका. वो साल 2000 था-

मैं रंगहीन हूं
या रंगहीन हो गया हूं
जो भी कह लो अपनी सुविधा से
निरा सफेद या घुप्प काला.

मैं चाहता था मेरा रंग नीला हो
मगर मुझ पर फेंक दिया गया लाल रंग

मुझे लाल से पहचाना जाता रहा
मैं नीले के स्वप्न में डूबा रहा।

नीला कभी उतरा नहीं
लाल कभी चढ़ा नहीं

जब भी कपड़े उतारता हूं
तुम देख लेती हो मेरी रंगहीनता !

*अजीब है रंगो का विज्ञान भी। सफेद वो जो सूरज की सतरंगी किरणों से एक भी रंग नही लेता, और काला वो जो सूरज की सारे रंगों को अपने अंदर समेट लेता है। काले और सफेद के बीच लाल रंग की हकीकत और नीले रंग का सपना...

आप सबको बहुत बहुत मुबारक हो रंगों का त्योहार- Happy होली!

रविवार, मार्च 01, 2009

कमिंग अप- 'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'

11 साल पहले की बात है। यही मार्च का महीना है, जब दिल्ली में 9 महीने बिताने के बाद घर लौटने की बारी आने वाली थी. फागुन की बेकाबू बयार में उजड़ा हुआ सा मन अजीब उलझन में फंसा हुआ था. नौ महीनों में कुछ ऐसा बैठ गया था जेहन के अंदर, जो घर लौटने की बेसब्री को बे-असर सा कर रहा था.

इस शहर ने भी कही न कहीं अपने से जोड़ लिया था। दिल्ली के तंग कमरे में गांव वो उजास याद धुंधली पड़ने लगी थी. वो सुस्त सुबह, वो सुनी-सी दोपहरी, मायूसी से भरा वो शाम का धुंधलका- जिनकी उबन ने शहर की भीड़ में धकेला था- भीड़ से निकलने की खुशी पर भारी पड़ रहे थे. जहां तक मुझे याद है इसका एहसास सर्दियों से ही होने लगा था. पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद शहर में ही नौकरी ढूंढे, या गांव जाकर मास्टर बन जाएं, इस दुविधा में देर तक तनी रहती थी रजाई. देर रात तक जलती रहती थी ट्यूबलाइट.

इन्हीं दिनों की एक डायरी हाथ लगी है, जिनके पन्नों पर दर्ज है उस समय का पूरा एहसास। इसे संयोग ही कह सकते हैं, कि जब किताबों के कबाड़ से हाथ लगी वो डायरी, मार्च महीने की मस्त बयार फिर से बेकाबू है. फैसला तो मैंने अपने दिल की सुनते हुए वापसी का कर लिया था, लेकिन 3 महीने के बेनतीजा संघर्ष ने फिर से दिखा दिया दिल्ली का रास्ता. वापस लौट गया मैं. लेकिन वापसी के बाद कई साल तक बनी रही वही दुविधा. नौकरी लग चुकी थी, लेकिन मन नहीं लगा था. पेट नौकरी से भरता रहा, लेकिन मन गांव की उन्हीं गलियों उलझा रहा.

देह और मन की यही उलझन बयां हुई है पुरानी डायरी के पन्नों में जो अब पीली पड़ चुके हैं। सोच रहा हूं, पीली पड़ चुकी डायरी के फटेहाल पन्नों को आपके सामने रखूं. आपसे पूछूं, क्या इनमें दर्ज हुई वो दुविधा, वो बेचैनी, वो तड़प सिर्फ मेरी है या आपकी भी?

देर बस अगली पोस्ट की है. उसके बाद हर रोज आप पढ़ सकते हैं- पीली पड़ चुकी डायरी का एक पन्ना.