शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009

ऐसा 'क्लीयर कन्फ्यूजन' !



कौन से सीन का जिक्र पहले करें- अनुराग ने किसी भी सीन को सीन रहने ही नही दिया।(सीखो बॉलीवुड वालों) उन्होंने हर सीन को कड़ी बना दी है- जो बड़ी बेबाकी से मिलती है अगली कड़ी से और मिलकर एक बिंदास कहानी (अनअपॉलोजेटिक) को जन्म देती है. देवदास को नए सिरे से पैदा करती है. बेहद सटीक जुमला गढ़ा है आज के देवदास के लिए- तेरा इमोशनल अत्याचार. प्यार में अत्याचार और अत्याचार में भी प्यार के बने रहने का कन्फ्यूजन बड़ा दिलचस्प बयां किया है. गजब की क्लियारिटी है जिंदगी के इस कन्फ्यूजन में. तभी तो अनुराग का देवदास शरतचंद्र के देवदास की तरह मरता नहीं, बल्कि मौत के कगार से लौट आता है- वापस मुहब्बत की गोद में. पारो का प्यार नहीं मिला, तो क्या हुआ?

ये 21 वीं सदी का दर्शन है, भोग के दौर की आत्ममुग्धता(देवदास की पहचान), जो आज भी औरों को देखे बिना अपने अंदर खुद के होने की तलाश करती है। इस तलाश में वो अब भी एडिक्ट होता है. लेकिन वजह दिल की ठेस नही बनती अब, देह का जूठा होना बन जाता है जिंदगी के लिए जहर. प्यार यहां मन नाम के किसी अदृश्य अंग में नहीं हिचखोले खाता, देह में उतरकर बवाल मचाता है. दिल-विल का कोई चक्कर नहीं. पेट के चार अंगुल नीचे जब आग सुलगती है, तो प्यार रूह से रास्ता नहीं मांगता, बल्कि देह से सीधे डिमांड करता है- 'कब दोगी' या फिर 'चाहिए नहीं क्या?' जब चाहिए तो 'प्लैटॉनिक पाखंड' कैसा?

क्लीयर फंडा है देव-डी का- 'जिंदगी के मीठे से बुखार का।' आप सोच रहे होंगे कि में फिल्म की बात कर रहा हूं या जिंदगी की? तो अनुराग की तरह मैं भी क्लीयरली कन्फ्यूज्ड हूं. इसी कन्फ्यूजन में उन्होंने फिल्म में जिंदगी उड़ेल दी है, तो मैं भी सिनेमा से पहले जिंदगी की बात करने लगा. मैं कोई फिल्म क्रिटिक नहीं हूं, और न ही अनुराग ने मुझे अपनी फिल्म की तारीफ करने के लिए 'कॉन्टैक्ट' किया था. बल्कि मैं तो अनुराग की पहली फिल्म देख रहा था- ब्लैक फ्राइडे जरूर घर में डीवीडी मंगाकर देखी थी, उस फिल्म ने बस इतना किया था कि अनुराग नाम के डाइरेक्टर का नाम दिमाग के लिस्ट में डाल दिया था. बस इतना ही परिचय है-जो पूरी तरह एकतरफा है.

दिल से कहूं तो देव-डी देखने मैं देवदास की वजह से गया था- आज के जमाने में उस लाजवाब किरदार का नया इंटरप्रेटेशन देखने- क्या पता था, ढाई घंटे में एक नया देवदास ही रच डालेगा डाइरेक्टर। गजब! लास्ट फ्रेम तक को नहीं बख्शा है भाई ने 'सीन को पलटने' से. सच कहें तो 'देव डी' का क्रेडिट लाइन जैसे ही उल्टे से सीधा होता है, कहानी एक और मोड़ लेती है. कहानी वहां से शुरू होती है जहां जिंदगी की जड़े साफ दिखाई देती है. इन्हीं जड़ों के साथ पैदा होती है देव और पारो की मोहब्बत. पारो चुंकि लड़की थी, इन्हीं जड़ों से सिमटी रह गई, देव बड़े बाप का बेटा था, तालीम के लिए इंग्लैंड चला गया. देव लौटा तो जिंदगी बदल चुकी थी. पारो जवान हो चुकी थी. मुहब्बत के मायने बदल चुके थे. लंबे प्रवास के दौरान अपने आप पर बुरी तरह मोहित हो चुका देव पहली बार किसी दूसरे के मोहपाश में बंधता है- क्लीयर नहीं कि ये देह की आरजू थी या मन की.

इसी देह और मन के कन्फ्यूजन में कहानी छिपी है देव की, जो ये बताने वाले के सिर पर शराब की बोतल फोड़ देता है, कि बिस्तर में क्या मजा देती है पारो। देह तोड़ कर रख देती है पारो. देव ने भी ऐसी पारो की देह की ऐसी तपिश देखी थी. जब वो प्यार करती थी तो वाकई काट खाती थी. यहां देव के मन पर भारी पड़ता है देह. लेकिन मन भी कुछ कम नहीं. उसके गहरे कोने में बैठ जाता है- अरे, पारो तो देह की भूखी है.

इसी कन्फ्यूजन में बरबाद होता है देव और अपने देह से बेलाग हो जाता है, लेकिन मन से भुला नहीं पाता पारो का प्यार। इसे भुलाने के लिए वो नशा करता है, कॉल गर्ल के कोठे पर जाकर देह की डिमांड करता है, लेकिन देह को भोग नहीं पाता। चंद्रमुखी आज पैसे पर बिकती है, लेकिन उसे पता चल जाता है, चंदा देह तो वो खरीद चुका है, उसके मन का क्या करेगा, जो कमरे में होते हुए भी अगले कस्टमर के बारे में सोच रहा है. मन बिना देह किस काम का, वो तो अछूत ही रहेगा. अगर बिना मन की ही देह चाहिए थी, तो पारो क्या कम थी?
लेकिन पारो वाकई कम नहीं थी। वो देव के इंकार के बाद शादी कर चुकी थी, लेकिन देव के बुलावे पर आने में जरा भी देर नहीं करती. वो आती है, देव का अस्त व्यस्त कमरा ठीक करती है, बिस्तर लगाती है, उस पर सोती भी है, लेकिन देव की देह तो कब का साथ छोड चुकी थी. वो 'उफान' पर चढ़ने से पहले ही 'उतर' जाता है. एक मिनट में देव की देह को औकात दिखा जाती है पारो.

अब भला देव का कहां ठिकाना हो- वो तो अच्छा था कि चंदा का दर्द उसके दिल को छू गया। स्कूल में एमएमएस कांड के बाद जिस तरह उसे हर जगह से दुत्कार मिली- देह की वजह से, जबकि उसे मालूम भी नहीं थी देह की कीमत. उसके लिए इच्छा ज्यादा नहीं थी देह. जब हर तरफ से दुत्कार पड़ी निकल पड़ी इसी देह को बेचने. गजब का दर्द है न- बिलकुल सटीक गीत रचा है देव डी के लिए- 'ये कैसी आंख मिचौली खेले जिंदगी...' ' चली गई है साली खुशी, कहां चली गई है साली खुशी...'

ये वाकी जिंदगी की बातें है, जो रबर की तरह खिंचती चली जा रही है, सिनेमा के लिहाज से देव-डी की चर्चा अगली पोस्ट में

2 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

चलिए अपने दृश्य दर दृश्य फिल्म को ज्स्टीफाई कर डाला -अपना पना नजरिया है -मैंने तो फिल्म को विकृत सेक्स फंतासियों का कूडादान ही माना है -जो किशोर मनों पर बहुत बुरा प्रभाव डाल सकती है !

Vaibhav Anand ने कहा…

Vinod ji,
aapki lekhni me jaadu hai magar aap filmo ka 'satyarth prakash' kyon likhne ki koshish kar rahe hain? Devdas aur dev d ki tulna aisi hai jaise ki pooja karna aur potty karna. Nagnata pahle bhi thi magar shalinata ke libaas me, aaj shalinta ka libaas hi nagnata ban gaya hai aur iski shuruat raj kapur aur subhash ghai ne ki jise anuraag jaise director aage badha rahe hain, dev d ( valgur copy of devdas), gulaal (physicic copy of haasil and omkaara) jaisi filme iska example hai. Anuraag se better to tigmanshu dhuliya aur farhaan akhtar hain, jo fuhadta me bahte nahi, balki use bhi shaleen bana dete hain.