रविवार, फ़रवरी 15, 2009

आत्महंता के साथ ऐसा अत्याचार!


वो शायद देखने वाले के अंदर समा कर हिलोरें मारने की अदा है, जो कभी सिनेमा को कहानी की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि इसे जिंदगी की तरह देखा जाता है। कभी निर्देशक को किस्सागो नहीं माना जाता, बल्कि उसे जिंदगी की कहानी रुपांतरित करने वाला माना जाता रहा है. इस मामले में तो देव डी के साथ वाकई अत्याचार हो रहा है, मेरी पोस्ट पर भी एक 'सुधी दर्शक' ने इसे सेक्स की विकृत फंतासी करार दिया है, भाई जी ने ये भी कहा है कि ये फिल्म किशोरों के मन पर बुरा असर डाल सकती है, लेकिन ये कहने से पहले उन्होंने 'तकनीकि लिहाज' तक नहीं किया कि फिल्म को 'A' सर्टिफिकेट मिला है, और इसे 18 साल से कम उम्र के लोगों नहीं देखना चाहिए.


लेकिन असर' वाली बात तब भी बाकी ही रहती है, 1917 में जब शरतचंद का उपन्यास प्रकाशित हुआ था, तब इस असर की बात कहीं नहीं हुई, इसे साल दर साल क्लासिक का दर्जा मिलता गया। लेकिन 1928 में जब इस पर पहली फिल्म बनी सुगबुगाहट शुरू हो गई. समाज पर खराब असर की बात सबसे ज्यादा तब उठी उठी जब प्रथमेश चंद्र बरुआ ने देवदास की व्याथा को संवाद दिया. 1935 में देवादस पर पहली फिल्म बोलती फिल्म बनाई. शराबनोशी को बढ़ावा देने और युवाओं को मोहब्बत के नशे में बरबाद करने का इल्जाम 1995 में भी लगा, जब बिमल रॉय ने तब के सुपर स्टार दिलिप कुमार को देवदास का चोला पहनाया. अब देव डी पर सेक्स की विकृति बढ़ाने का आरोप!


किस सेक्स की बात कर रहे हैं लोग? क्या देव डी में ये दिखाने की कोशिश की गई है कि शादी में लड़की को सजा-धजा देखो तो कोने में बुलाकर 'काट' लो? या लड़की के मन में जब 'उमंग' उठे, तो उसे गद्दा उठा कर ईख के खेत में जाना चाहिए। या फिर प्यार में दगा हो, तो शराब पीना चाहिए और नशे में रंडी के कोठे पर जाना चाहिए? एक आत्महंता पर ये कैसा इल्जाम लगा रहे हैं लोग, जबकि वो 21 वीं सदी में भी अपने अंदर खुद को तलाश रहा है. कैसा 'इमोशनल अत्याचार' कर रहे हैं लोग उसके साथ. दर्जनों फिल्में बनी देवदास पर, लेकिन किरदार को नहीं समझ पाए लोग, जबकि ये फिल्म जिस दौर में भी बनी, देवदास के बहाने हमेशा उस दौर का 'अंडर करंट पेन' सामने आया. क्यों नहीं समझते लोग देवदास अपने अंदर गुम हो चुके एक किरदार का नाम है, जो हमेशा बदलते समाज के सीकचों के सहारे सामने आता है.


जिन्हें देव डी में विकृत सेक्स दिखता है उन्हें ये समझना चाहिए कि किसी भी दौर में देह देवदास की चाहत नहीं रही है, जबकि पारो उसके लिए अपने देह के समान है, उसका अपना चरित्र है, जब भी पारो उसे ठेस पहुंचाती है, अपने साथ वो उसे भी दुख दे रहा होता है- उसके मन में अपना दर्द बिठाना चाहता है। पारो की भी अदा हमेशा खुद को देवदास के हवाले कर देने की रही है. जिन लोगों को ईख के खेत में गद्दा ले जाने की बात खटक रही है,जिन्हें औरत की आजाद हरकत रास नहीं आ रही, वो पारो की बोल्डनेस से ज्यादा समर्पण है, वो अपने लिये कहां गई थी? वो तो अपने देव का मन रखने गई थी. वो अपने 'देह के भूखे आशिक' से उसके कमरे की चाबी भी मांग रही थी देव के लिए. अगर उसके अंदर 'सेक्स की विकृति' होती तो वो उसी आशिक के साथ खुश हो लेती, जो सरेराह उसकी 'देह' उसके 'जुनून' का ढिंढोरा पिट रहा होता है. देव को भी ये सब सुनकर फर्क नहीं पड़ता. वो पारो को 'छिनाल' करार देने वाले के सिर बोतल नहीं फोड़ता, वो फिर भी ईख के खेत में छाती पर लोट रही पारो से पहले अपनी हवस मिटाता. फिर कहता- तू तो सच्ची मजेदार है रे, गांव के लड़के ठीक ही कहते हैं!


लेकिन ऐसा कहां होता है, देव छिछोरा नहीं है और कहानी भी ये नहीं कि 'जब मांगा तब पारो ने क्यों नहीं दिया'। काश, पारो के जोर-जोर से हैंडपंप चलाने वाले सीन में आशिक की रुसवाई को उसी नजर से देख पाते, जिस इशारे से डाइरेक्टर उसकी तड़प को उजागर किया है, तो शर्तिया उन्हें योनउन्माद नहीं लगता. देव-डी को पोर्न फिल्म नहीं कहते. वो समझ पाते दो दिलों के बीच झूलते देह के दर्द को. इस दर्द में देव शराब पीता है, ड्रग्स लेता है, रंडी के कोठे पर जाता है, लेकिन कितनी बार सेक्स करता है? बल्कि वो तो इतनी बेखुदी में भी इतना बचा हुआ है कि उसे रंडी का भी दुख दिख जाता है. ये कौन सी विकृति है भाई.


अगर विकृति ये है कि चंदा फोन पर लोगों से गंदी-गंदी बाते करती है, तो सुबह-सुबह आप खुद अपने अखबार मे देख लीजिए- कितने पते छपे होते हैं, कितने नंबर आपको मिल जाएंगे, जो आपको विचलित कर देने के लिए काफी है। लेकिन आप विचलित तब होते हैं, जब अपने समाज का सच सिनेमा के पर्दे पर देखते हैं. अरे चंदा में तो इतनी हुनर बाकी है, कि वो खुद को बरबाद करने पर तुले देव को आईना दिखा सके- कह सके- तुम किसी को प्यार नहीं कर सकते, तुम इसके काबिल ही नहीं हो. रंडी का किरदार है चंदा का, लेकिन शाब्दिक अर्थ में उसे रंडी मान लेना सिनेमा के साथ अत्याचार है बंधु. ध्यान से सुनो तो चंदा भी कुछ कहती है. वो रंडी के कोठे पर कैसे आई, ये सच क्यों नहीं विचलित करता आपको?


देव डी के फोकस में अगर देह है भी तो ये प्रतीक है आज के 'उपभोगी इंसान' का, जो पहले से कहीं ज्यादा तवज्जो देता है अपने आप को, अपनी देह को। कितनी बार इशारा करे डाइरेक्टर देव डी को आइने के सामने खड़ा कर, आईने के सामने कई बार जाहिर हुई है उसकी आत्म-मुग्धता. संवादों के जरिए भी मुखर हुई है- जब तक अपने आप से इस कदर प्यार करते रहोगे, तुम किसी और से प्यार कर ही नहीं सकते. इमोशनल अत्याचार वाले गीत में अपनी विद्रुप शैली में 'ट्विलाइट प्लेयर्स' यही तो कह रहे हैं- आत्महंता के साथ ऐसा अत्याचार! कहानी बहुत इमोशनल है बंधु!

शुक्रवार, फ़रवरी 13, 2009

ऐसा 'क्लीयर कन्फ्यूजन' !



कौन से सीन का जिक्र पहले करें- अनुराग ने किसी भी सीन को सीन रहने ही नही दिया।(सीखो बॉलीवुड वालों) उन्होंने हर सीन को कड़ी बना दी है- जो बड़ी बेबाकी से मिलती है अगली कड़ी से और मिलकर एक बिंदास कहानी (अनअपॉलोजेटिक) को जन्म देती है. देवदास को नए सिरे से पैदा करती है. बेहद सटीक जुमला गढ़ा है आज के देवदास के लिए- तेरा इमोशनल अत्याचार. प्यार में अत्याचार और अत्याचार में भी प्यार के बने रहने का कन्फ्यूजन बड़ा दिलचस्प बयां किया है. गजब की क्लियारिटी है जिंदगी के इस कन्फ्यूजन में. तभी तो अनुराग का देवदास शरतचंद्र के देवदास की तरह मरता नहीं, बल्कि मौत के कगार से लौट आता है- वापस मुहब्बत की गोद में. पारो का प्यार नहीं मिला, तो क्या हुआ?

ये 21 वीं सदी का दर्शन है, भोग के दौर की आत्ममुग्धता(देवदास की पहचान), जो आज भी औरों को देखे बिना अपने अंदर खुद के होने की तलाश करती है। इस तलाश में वो अब भी एडिक्ट होता है. लेकिन वजह दिल की ठेस नही बनती अब, देह का जूठा होना बन जाता है जिंदगी के लिए जहर. प्यार यहां मन नाम के किसी अदृश्य अंग में नहीं हिचखोले खाता, देह में उतरकर बवाल मचाता है. दिल-विल का कोई चक्कर नहीं. पेट के चार अंगुल नीचे जब आग सुलगती है, तो प्यार रूह से रास्ता नहीं मांगता, बल्कि देह से सीधे डिमांड करता है- 'कब दोगी' या फिर 'चाहिए नहीं क्या?' जब चाहिए तो 'प्लैटॉनिक पाखंड' कैसा?

क्लीयर फंडा है देव-डी का- 'जिंदगी के मीठे से बुखार का।' आप सोच रहे होंगे कि में फिल्म की बात कर रहा हूं या जिंदगी की? तो अनुराग की तरह मैं भी क्लीयरली कन्फ्यूज्ड हूं. इसी कन्फ्यूजन में उन्होंने फिल्म में जिंदगी उड़ेल दी है, तो मैं भी सिनेमा से पहले जिंदगी की बात करने लगा. मैं कोई फिल्म क्रिटिक नहीं हूं, और न ही अनुराग ने मुझे अपनी फिल्म की तारीफ करने के लिए 'कॉन्टैक्ट' किया था. बल्कि मैं तो अनुराग की पहली फिल्म देख रहा था- ब्लैक फ्राइडे जरूर घर में डीवीडी मंगाकर देखी थी, उस फिल्म ने बस इतना किया था कि अनुराग नाम के डाइरेक्टर का नाम दिमाग के लिस्ट में डाल दिया था. बस इतना ही परिचय है-जो पूरी तरह एकतरफा है.

दिल से कहूं तो देव-डी देखने मैं देवदास की वजह से गया था- आज के जमाने में उस लाजवाब किरदार का नया इंटरप्रेटेशन देखने- क्या पता था, ढाई घंटे में एक नया देवदास ही रच डालेगा डाइरेक्टर। गजब! लास्ट फ्रेम तक को नहीं बख्शा है भाई ने 'सीन को पलटने' से. सच कहें तो 'देव डी' का क्रेडिट लाइन जैसे ही उल्टे से सीधा होता है, कहानी एक और मोड़ लेती है. कहानी वहां से शुरू होती है जहां जिंदगी की जड़े साफ दिखाई देती है. इन्हीं जड़ों के साथ पैदा होती है देव और पारो की मोहब्बत. पारो चुंकि लड़की थी, इन्हीं जड़ों से सिमटी रह गई, देव बड़े बाप का बेटा था, तालीम के लिए इंग्लैंड चला गया. देव लौटा तो जिंदगी बदल चुकी थी. पारो जवान हो चुकी थी. मुहब्बत के मायने बदल चुके थे. लंबे प्रवास के दौरान अपने आप पर बुरी तरह मोहित हो चुका देव पहली बार किसी दूसरे के मोहपाश में बंधता है- क्लीयर नहीं कि ये देह की आरजू थी या मन की.

इसी देह और मन के कन्फ्यूजन में कहानी छिपी है देव की, जो ये बताने वाले के सिर पर शराब की बोतल फोड़ देता है, कि बिस्तर में क्या मजा देती है पारो। देह तोड़ कर रख देती है पारो. देव ने भी ऐसी पारो की देह की ऐसी तपिश देखी थी. जब वो प्यार करती थी तो वाकई काट खाती थी. यहां देव के मन पर भारी पड़ता है देह. लेकिन मन भी कुछ कम नहीं. उसके गहरे कोने में बैठ जाता है- अरे, पारो तो देह की भूखी है.

इसी कन्फ्यूजन में बरबाद होता है देव और अपने देह से बेलाग हो जाता है, लेकिन मन से भुला नहीं पाता पारो का प्यार। इसे भुलाने के लिए वो नशा करता है, कॉल गर्ल के कोठे पर जाकर देह की डिमांड करता है, लेकिन देह को भोग नहीं पाता। चंद्रमुखी आज पैसे पर बिकती है, लेकिन उसे पता चल जाता है, चंदा देह तो वो खरीद चुका है, उसके मन का क्या करेगा, जो कमरे में होते हुए भी अगले कस्टमर के बारे में सोच रहा है. मन बिना देह किस काम का, वो तो अछूत ही रहेगा. अगर बिना मन की ही देह चाहिए थी, तो पारो क्या कम थी?
लेकिन पारो वाकई कम नहीं थी। वो देव के इंकार के बाद शादी कर चुकी थी, लेकिन देव के बुलावे पर आने में जरा भी देर नहीं करती. वो आती है, देव का अस्त व्यस्त कमरा ठीक करती है, बिस्तर लगाती है, उस पर सोती भी है, लेकिन देव की देह तो कब का साथ छोड चुकी थी. वो 'उफान' पर चढ़ने से पहले ही 'उतर' जाता है. एक मिनट में देव की देह को औकात दिखा जाती है पारो.

अब भला देव का कहां ठिकाना हो- वो तो अच्छा था कि चंदा का दर्द उसके दिल को छू गया। स्कूल में एमएमएस कांड के बाद जिस तरह उसे हर जगह से दुत्कार मिली- देह की वजह से, जबकि उसे मालूम भी नहीं थी देह की कीमत. उसके लिए इच्छा ज्यादा नहीं थी देह. जब हर तरफ से दुत्कार पड़ी निकल पड़ी इसी देह को बेचने. गजब का दर्द है न- बिलकुल सटीक गीत रचा है देव डी के लिए- 'ये कैसी आंख मिचौली खेले जिंदगी...' ' चली गई है साली खुशी, कहां चली गई है साली खुशी...'

ये वाकी जिंदगी की बातें है, जो रबर की तरह खिंचती चली जा रही है, सिनेमा के लिहाज से देव-डी की चर्चा अगली पोस्ट में

शुक्रवार, फ़रवरी 06, 2009

सच कहा 'सीनमैन' !

बड़ा दमदार है ये नया 'सीन वाला', दिल छू गईं जनाब की बातें, इससे पहले कि आप इन्हें पढ़ें, इनका परिचय देने का गौरव खुद अपने पास ही रखना चाहता हूं- नाम है मयंक सक्सेना, जी न्यूज में काम करते हैं। उन्हें ये कुबूल करने में जरा भी हिचक नहीं कि वो बेहद छोटे पद पर काम करते हैं, लेकिन इतना हौसला भी रखते हैं- बोलने का लोकतांत्रिक हक मेरा भी है। मीडिया बहस पर पढिए मयंक की 'हीरे-मोती' जड़ा बयान। नीचे लिंक दिया है, कृपया क्लिक करें
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