शनिवार, जनवरी 24, 2009

सुन लो स्लमवालों !


वाह जी वाह, अंग्रेज लूट गया बाजार! लूटा भी क्या खूब, हमारा जूता हमारे ही सिर पर मार गया। बांधे रहो आंख पर पट्टी, चिल्लाते रहो, बाजार में बेच रहा है हमारी गरीबी. वो गरीबी जिससे आपको बड़ी प्रॉबल्म होती है, जिस स्लम पर नाक बंद कर मुंह फेरते हो, उस स्लम के क्या शॉट्स बना गया अंग्रेज। वो शॉट, जिसे कभी गलती से आपके कैमरामैन बना भी लेते हैं, सिनेमा की छोड़िए, खबर के लिहाज से शूट कर लेते हैं- तो 'डाउन मार्केट' कह कर फाइव स्टार कूड़े में डाल देते हैं. बहुत घिन आती है न चॉल से, फिर क्यों बखान कर रहे हो 'स्लम' की

अंगरेज दोगले कह रहे हैं यार, लंदन के एक अखबार में एक अंग्रेज ने कर ही दी ऐसी तैसी अमिताभ की, स्लमडॉग पर अपना ब्लॉग क्या चमकाया, अंग्रेज पाठक ने बिग बी की बखिया उधेड़ दी- ये कह कर कि खुद तो अपनी जमीन की हकीकत दिखती नहीं, काम करते हैं करण जौहरों, यश चोपड़ाओं और रामगोपाल वर्माओं की फैंटसी फिल्मों में, मुंह फेरते हैं अपने ही लोगों की दीनता से, होता क्या है अमिताभ शाहरुख या आमिर खान की फिल्मों में? नाचने गाने, महंगे सेट लगाने और स्विटजरलैंड की वादियों में शूट करने के अलावा क्या करते हैं बॉलीवुड के सितारे। फिर भी बने हुए हैं- कोई बादशाह, तो कोई शहंशाह, तो कोई मिस्टर परफेक्शनिस्ट। गजब बेशर्मी है, चार लोग नॉमिनेट हो गए, तो लगे लगातार पीछे पीछे तालियां पीटने, स्लमडॉग देखकर तो आपका सिर शर्म से उठना नहीं चाहिए था।

फेंटसी दिखाकर पैसे कमाते चलो और..., चलो, यहां तक भी सही मान लेते हैं, लेकिन आपके सामाजिक सरोकार हैं क्या? शाहरुख ने 400 करोड़ एक फिल्म से कमाए, आमिर ने 200 करोड़ दो सप्ताह में कमाए, बिग-बी भी 'तीन जने' मिलकर कम नहीं कमाए होंगे, 'घटा बढ़ा कर' 30 परसेंट टैक्स जमा करने के अलावा और किसे क्या दिया। दो या न दो, अपनी बला से, हम कोई नक्सलाइट नहीं हैं, जो आपकी जायदाद पर क्रांतिकारी नजर डाल रहे हैं. आपकी कमाई है, आप खुद खाओ, खुद उड़ाओ, लेकिन गरीबी के नाम पर कमेंट तो मत करो, देश के गरीबों से को अपना समझने का एहसास तो मत कराओ. यार, '...' सुलगने लगती है.

काश, आप लोगों को पता होता, स्लम में पैदा होने का मतलब क्या होता है, हर सांस पर जिंदगी उसी तरह दांव पर लगी होती है, जैसे करोड़पति के गेम में हर सवाल पर बाहर का दरवाजा सामने दिख रहा होता है। जब होस्ट कंप्यूटर जी के पर्दे पर सवाल फेंकता है- नाटकीय अपनेपन के साथ पूछता है- जंजीर के हीरो का क्या नाम था- तो हॉट सीट वाले गरीब को वो वाकया याद आ जाता है, वो पल, जब वो संडास में शौच से निपट रहा था, तो उसी अमिताभ का हेलीकॉप्टर उसके स्लम के ऊपर से गुजर रहा था, जिसका वो दीवाना कच्ची उम्र से ही बन गया था। जंजीर फिल्म में गुंडो को पीटता अमिताभ, गरीबों के लिए लड़ता अमिताभ असल हीरो लगता था, दीवाना ऐसा हो गया था कि हेलीकॉप्टर की हवा से, कि जाने कहां से उसकी तस्वीर उड़ने लगी. वो संडास में हगना भूल गया. दौड़ पड़ा अपने हीरो की तस्वीर को कीचड़ में गिरने से बचाने को. लेकिन खुद कीचड़ में गिर पड़ा. कीचड़ में सना वो बच्चा उसी अमिताभ से ऑटोग्राफ की भीख मांगता है, लेकिन कहां- उसके नसीब में 'बड़ों' की भीख कहां?

क्या आपने नहीं देखे- सूरदास, कबीर के भजन गाते हुए सड़क पर अंधे लंगड़े लोगों को भीख मांगते- दर्शन दो घनश्याम....? खबरें नहीं देखीं, किस तरह लोगों को अंधा लंगड़ा बनाया जाता है, हाथ पांव काट कर उन्हें भीख मांगने लायक बनाया जाता है। टीवी पर 'कसाई डॉक्टर' नाम से पर्दाफाश भी देख चुके हैं, फिर भी आप अंजान बनते हैं इन बेचारों को कबीर और सूरदास के भजन कौन और कैसे याद कराता है। भूखे पेट भजन नहीं होता, ये कहावत आप ही गढ़ते हैं, लेकिन भिखमंगे के मुंह से भजन सुनकर भी आपको अंदाजा नहीं होता, कि ये किसके इशारे पर भजन गा रहा है, तभी तो स्लमडॉग में ये देख कर आपको लगता है- कि ये साला अंग्रेज कौन होता है, हमारी कालीन में छिपी कालिख को उजागर करने वाला. ये कौन होता है हमारी जात को जूते मारने वाला.

क्या आपने अखबारों में नहीं पढ़ा- करोड़पति गेम में बार बार फोन करने पर भी अपनी अपनी बारी न आने पर लोगों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मुझे नहीं पता सुनवाई कहां तक पहुंची या उन याचिकाओं का क्या हुआ, लेकिन आरोप तो लगे ही न? स्लमडॉग वाला होस्ट भी तो ऐसा ही करता है। वो बार बार उस गरीब बच्चे को चायवाला कहता है। उसके अनुभवों बनावटी ठहाके लगाता है. वो शायद स्लमडॉग की आंखों में भरे गुस्से को पहचानता है, तभी उससे जलता है और उसे गेम से बाहर करने की कोशिश करता है. लेकिन आज वो बच्चा समझ चुका है होस्ट का खेल- आखिरी से पहले वाले सवाल का इशारा होस्ट से मिलने के बाद भी वो उसका जवाब नहीं चुनता- बल्कि ठीक उसके उल्टा जवाब लॉक करने को कहता है.

और कितनी सीधी गाली दे अंग्रेज, उसने तो बहुत सफाई बरती स्लम की गंदगी में भी। छोड़िये ना, यथार्थ और जमीनी हकीकत को गोली मारिये, चलिए सिनेमा के लिहाज से सोचते है, आप होते तो स्लमडॉग की कहानी पर कैसी फिल्म बनाते, क्योंकि लिखा तो भारतीय विकास स्वरूप ने ही है न. यकीनन, कहानी को 'बिकने लायक' बनाने के लिए दो चार बेड सीन और 10 बलात्कार के सीन डालते, और खुद को पश्चिम की तरह बोल्ड बताते हुए ढोल बजाते, मधुर भंडारकर की चांदनी और यूं कह लें शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन स्टाइल में. लेकिन डैनी ने तो एक चुम्मी भी किसी को नहीं लेने दी. जबकि उसकी कहानी में जावेद जैसे ठेकेदार हैं, जो हीरोइन को रखैल बना कर रखा हुआ है, लेकिन डाइरेक्टर ने हाथ लगाने तक का मौका नहीं दिया. आप ये मौका चूकते?

सच कहूं, तो मुझे भी नहीं पता, इस पूरे 'मास्ट्रबेशन' में आप, तुम, यार जैसे संबोधन किसके लिये यूज कर रहा था. शायद इन सबकी जगह मैं ही खड़ा था.

2 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

धाँसू लिखा है आपने -फिल्म वास्तवमें चर्चा का गहन विषय है ! कुछ मैंने भी टिपियाया है चाहे तो देख लें

Raag ने कहा…

Good One!