गुरुवार, जनवरी 29, 2009

अपना-अपना हिन्दुस्तान!

यकीन मानिये, दिल्ली में रहते हुए ‘न्यूज देखना’, और दिल्ली से बाहर जाकर ‘समाचार देखने’ में काफी फर्क होता है.

‘पत्रकार’ आप फिर भी कहे जाते हैं, लेकिन इस बार लगा कि पत्रकार ‘कहे जाने’ और ‘समझे जाने’ में भी काफी फर्क आ चुका है. भोला काका की बातों से तो ऐसा ही लगता है. इस बार खैरियत से पहले पूछ बैठे- बबुआ, पाकिस्तान से कहिया अइला हा...? (पाकिस्तान से कब आए...)

एकबारगी तो मुझे लगा काका मुझसे नहीं, किसी और से पूछ रहे हो. भला मैं पाकिस्तान क्या करने जाने लगा. भरी मंदी में न्यूजरुम से निकल कर चाय पीने में चार बार सोचना पड़ता है डेस्कवालों को, ये पाकिस्तान जाने की खबर कहां से लग गई इन्हें.

चकाचक सफेद लूंगी-गंजी और नीलहा गमछाधारी काका गांव के ‘चतुर कटाक्षी जीव’ माने जाते हैं. सवाल के मुताबिक चेहरे पर असली लाने में इतने सिद्धहस्त कि फिल्मदेखवा पीढ़ी उन्हें ‘सुपरस्टार काका’ कहकर बुलाती है. लेकिन मुझ परदेसी के साथ भी वही फार्मूला अपनाएंगे, ये मैं पहले झटके में नहीं सोच सका. लेकिन बात कुछ वैसी ही थी.

‘हमको लगा, ‘सरहद पर सरगर्मी’ इतनी बनी हुई है, ‘ओसामा की तलाश में ओबामा’ जुट गए हैं,‘आतंक पर लगाम’ कसने तुम भी पहुंचे होगे,

मुझे समझते देर नहीं, काका मेरी टांग खीच रहे हैं- ओह, तो काका आप...

‘अरे नहीं बबुआ...हम मजाक नहीं कर रहे, अब तो अपने गांव में भी केबल आ गया है, हम भी ‘दिल्ली की खबरें’ खूब देखते हैं, लेकिन पाकिस्तान के बारे में इतनी ‘पक्की पक्की जानकारी’ देखकर लगा, कोई न कोई तो गया ही होगा,

मैं तो बस काका को एकटक देख रहा था- वो इसलिए भी कि न उनके चेहरे पर, न उनकी घनी मूंछों में मुस्कान की एक हल्की रेखा तक नहीं थी, जो आमतौर पर उनके मजकिया लहजे को बड़ी बारीकी से जाहिर करती है, लेकिन आज जरा सी भी नहीं थी.

‘वो कोई बवेजा नाम की महिला हैं, वो गई थीं न, कसबवा के गांव में, उसी वक्त हम भी देखे थे ‘पाकिस्तान का काला चेहरा.’ वो न गई होतीं, तो भला ये दिखता? उसी के बाद हमको लगा कि ये अकेली महिला का पर्दाफाश नहीं, जिस तरह ‘जवाब दो पाकिस्तान’ ‘अब क्या करोगे पाकिस्तान’ ‘होश में आओ पाकिस्तान’ जैसे ‘डायरेक्ट नैरेशन में डायलॉग’ हो रहा है, मुझे लगा कई और लोग गए होंगे खबर लेने, और उसमें तुम भी हो...’

पहली बार मेरी हंसी छूटी थी. मैंने पूछा- काका, लेकिन आप ने तो पक्के तरीके से ही पूछ लिया- कब आए पाकिस्तान से?

अबकी बारी काका थी, वो फुस्की सी एक हंसी के साथ पूछ बैठे-
‘हं..हं..अच्छा, तो नहीं गए थे? चलो, कोई बात नहीं, लेकिन ये ससुरा पाकिस्तान घुटने कब टेकेगा हो, हमको तो पते नहीं चलता, सरकार अपनी हमला करेगी नहीं, ऊ साला जरदरिया टेरोरिस्ट सब को सौंपेगा है नहीं, ये चैनल वाले कब तक ऐसे ही चिल्लाते रहेंगे? अच्छा बताओ, ये ओबामा से उम्मीद बन रही है क्या, कि ये भी ‘बुश की टू कॉपी’ है?’

काका का एनालिसिस देखकर मैं दंग था. पता नहीं, इस बार तो जैसे मेरा इंतजार खासतौर पर कर रहे थे. चेयर खिसका कर जम गए

’26 नवंबर को हुआ था न मुंबई पर हमला, लो, आज ही दो महीने हो रहे हैं, हिसाब जोड़ो तो 60 घंटे के बदले 60 दिन गुजर गए, और पाक का पैंतरा जस का तस है, हम को तो लगता है, पीएम की बीमारी इसी चिंता में ज्यादा बढ़ गई. चुनाव सिर पर है, जनता पूछेगी तो क्या जवाब देंगे, ये सोचकर ही दिल बैठ गया होगा बेचारे का...

काका बीच बीच में मेरी तरफ देखकर ‘रियेक्शन शॉट’ भी लेते जा रहे थे- ‘क्यों, गलत कह रहा हूं क्या, भई टीवी पर जो दिख रहा है, और जिन खबरों के बीच उनकी तबियत खराब होने की खबर आई, हमको तो यही लगा.’

‘एक पीएम की बीमारी की खबर ही थी, जो पाकिस्तान पर भारी पड़ी, वरना 8 बजे से लेकर रात 10 बजे तक, कोई कोई चैनल तो 12 बजे तक पाक-पाक-पाक ही चिल्लाता रहता है’

काका अपनी रौ में थे, अच्छा हुआ अंधेरा हो चला था, अब न वो मेरा चेहरा पढ़ सकते थे, न मैं उनका. मैंने पूछा- काका अब 12 बजे तक टीवी देखते हो.

‘क्या करे बबुआ, एक तो अभी नई नई आई है टीवी, और दूसरे लाइट भी 8-9 बजे के बाद ही आती है,सो रिमोट लेकर हम भी जुट जाते हैं पाक के खिलाफ जंग में. लेकिन सच कहूं, आधे एक घंटे में हमारे जवानों के हाथ बंदूक की तरह रिमोट भी नाकारा हो जाता है. जहां जाओ वही पाक-पाक-पाक, तो क्या बैटरी बरबाद करना, तकिये के किनारे दबा कर बैठ जाते हैं रिमोट को. जो चैनल पहले लग जाए- वहीं हम भी करने लगते हैं पाक-पाक-पाक’

काका के साथ मैं भी पाक-पाक-पाक पर हंस रहा था, लेकिन सुनाई सिर्फ साउंड ही दे रहा था- एक दूसरे को ‘ओवरलैप’ करता हुआ.

‘अरे मजाक नहीं बबुआ, देश का सवाल है देखें न तो क्या करें, लेकिन कब तक, साला, पहले ‘साढे सात’ और ‘साढे आठ’ की खबर देख लेते थे, तो देश प्रदेश दुनिया सबकी खबर मिल जाती थी, लेकिन अभी तो बस पाक-पाक-पाक. जैसे सारे चोर, बदमाश, गुंडे, घोटालेबाज, बाहुबली और दलाल सब ‘पाक साफ’ हो गए हैं, मुंबई हमले के बाद सबने राष्ट्रधर्म कुबूल कर लिया है’

काका तैश में थे, ये मैं अंधेरे में भी साफ देख सकता था

‘अभी कल ही पढ़ रहा था- ‘मनसे के गुंडो’ ने भोजपुरी के कार्यक्रम में हंगामा किया, बेचारे पुरबिया श्रदांजलि तो मराठी (करकरे) को ही दे रहे थे न, ससुरों ने अपनी हौंक में उसकी शहादत भी भूल गए. वो सिर्फ महाराष्ट्र के लिए थोड़े मरा था, पूरे देश के लिए जान दी थी, लेकिन बुरा मत मानना, उस दिन तुम्हारे चैनल पर ये ‘पाक’ के नीच दब गया. वैसे तो उनकी राजनीति पहले चड्ढी तक नंगी है, उस दिन तो वो फटी चिटी चड्ढी भी उतर गई थी, ससुरों ने जुनून में करकरे की फोटो मंच से नीचे गिरा दी. बताते मराठी मानुषों को, कि देख लीजिए इनका ‘अपनापन’

मैंने काका को ये कहते हुए रोका कि काका दिखाया तो था, लेकिन काका का ऐंगल ही कुछ और था-

‘नहीं बच्चा, वो खबर भी पाक-पाक-पाक के राग में चिल्लाने वाली थी, उन्होंने क्या किया, इससे ज्यादा बड़ी खबर है, वो क्या करना चाहते हैं. इसी तरह वो बैंगलोर के पब जो नई सेना का अवतार हुआ है, वो भी खतरनाक खबर है, एक जगह अंग्रेजी चैनल पर देख रहा था- कुछ मालेगांव बम ब्लास्ट से जोड़कर बता रहा था. अब इतनी अंग्रेजी तो आती नहीं, कि समझे, लेकिन हमको भी कुछ ऐसा ही लगा, ये साले वही जात हैं- साध्वी के साथी संगी, तब तो तुम दिल्ली में ही होगे, कोई फर्क है- तालिबानों और पब पर हमले में...?

काका ठीक कह रहे थे- दोनों खबरें तकरीबन एक ही साथ आई थीं. लेकिन बनीं थीं अलग-अलग.

‘बाबू, बड़ी कठिन समय है रे, एक ‘आतंक की दो-दो जात’ से पाला एक साथ पड़ा है.
सो दोनों के खिलाफ सुर भी एक ही रखना पड़ेगा, आवाज में जरा सी ऊंच नीच से भी बड़ा फर्क आ जाता है. आपका ‘कंसर्न’ समझ में आने लगता है…

काका की डिक्शनरी देखिए जनाब, क्या लाजवाब है.

कंसर्न से मेरा मतलब है... कैसे बताऊं तुम्हें...हां, ये पाक-पाक-पाक को ही लो, जिस तरह हम सब एक ताल पर बोल रहे हैं, कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं, उसी कंसर्न के साथ देश के भीतर छुपे दुश्मनों से निपटना चाहिए. जैसे स्लमडॉग पर बवाल कटा है, बेशर्मों ने स्लम छोड़ दिया डॉग को उठा लिया. कहते फिर रहे हैं स्लम वालों को डॉग कह रहा है अंग्रेज. तुम्हारे हिंदी चैनल में इतनी अंग्रेजी जानने वाले तो बहुतेरे होंगे कि भैया स्लमडॉग का लेना देना स्लम से तो है, कुत्ते से कतई नहीं. ये अंग्रेजी के अंडरडॉग (जुझारु) के समानांतर एक नया शब्द है. उन्हें ये बताना चाहिए कि अंडरडॉग का मतलब अंदर का कुत्ता नहीं होता.

भाई साहब, आपको हैरानी होगी, काका आज के बीए-एमए नहीं, 1966 के नॉन-मैट्रिक हैं

‘लेकिन नहीं, तुम्हारे भोंभें (गनमाइक) के सामने आकर बक जाते हैं, स्लमडॉग का मतलब स्लम का कुत्ता बता जाते हैं, और तुम हू ब हू दिखा देते हो, अब ठीक है, लोकतंत्र में सबको अपना पक्ष रखने की आजादी होती है, लेकिन ऐसा बुड़बक पक्ष उजागर कर तो अपनी नाक कटवाने जैसा है. ये नेताओं वाले करम तुम लोग क्यों कर रहे हो...’

नेताओं वाले करम? मैं समझा नहीं.

‘अब तक तो ये अपने नेता लोग ही करते आए हैं, बड़े मुद्दे छिपाने के लिए छोटे-छोटे
कारनामे करते रहते हैं, जनता के जेहन से पिछले घोटाले की याद हटाने के लिए कभी नया शिगूफा छोड़ते हैं, कभी उससे भी बड़ा घोटाला कर बैठते हैं. बस इसी अगले पिछले में उनकी गाड़ी चलती रहती है. लेकिन तुम लोग इस जाल में क्यों फंसते दिख रहे हैं. रोड पर कोई भी ऐरू-गैरू तमाशा दिखाने लगता है, तुम लोग जनता के जमीनी मसले छोड़ उसी के पीछे 24 घंटे काट देते हो. ये तो नेताओं के पाप में भागीदार बनने वाली बात हुई...बोलो, हुई कि नहीं.

पता नहीं इस बार काका मेरी चुप्पी का साथ क्यों देते नजर आए...

‘अरे हम तो गांव में पैदा हुए, गांव में ही मर जाएंगे बबुआ, लेकिन इस देश का क्या होगा. ‘चार चीजों’ के चक्कर में ‘हजार चीजें’ छूट रही हैं. गिनाने लगूं तो बोरी भर कर समस्याएं मिल जाएंगी, जो हैं तो लोकल, लेकिन नेशनल लेबल से जुड़ी हैं, लेकिन न हम खबर के लायक हैं, न खबरे हमारे लायक हैं. कई बार इसी चिंता में भोर से पहले ही नींद खुल जाती है. समझ नहीं आता कि वो कौन सी चीज है जो बीच में कहीं टूट रही है...

काका, सीधे जम्प मार कर वहां पहुंच चुके थे, जहां वो शुरु में ही पहुंचना चाहते थे, यानी कि ये आखिरी पैरा वाली बात वो शुरू में ही कहना चाहते थे, लेकिन सवाल ये था कि मुझसे सीधे क्यों कहते, सो भूमिका बनाते हुए कही. वैसे रात भी काफी हो चली थी, रात भी अमावस की थी, कुत्तों के भौंकने की आवाज जल्दी आने लगी थी.

‘चलते हैं बबुआ, अभी तो हो ना, फिर कभी बात होगी...’

काका अभी कुर्सी से उठे ही थे, कि लाइट आ गई. बिजली को देखकर मेरी जान में जान आई, नींद को मजबूर होकर 9 बजे ही रजाई में दुबकना नहीं पड़ेगा, उधर काका भी सुकून के साथ घर का रास्ता नाप रहे थे- कि चलो आज ठेस नहीं लगेगी.

थोड़ी ही देर में मैं टीवी के सामने बैठा था- एक चैनल पलटा, दूसरा पलटा, तीसरा पलटा...पलटते गया, पलटते गया- शुरू में तो ये देखने कि आज की बड़ी खबरे क्या क्या हैं- लेकिन हर जगह एक ही खबर- ओबामा ने अल-अरबिया चैनल को इंटरव्यू दिया है. मूल खबर ये कि ओबामा ने मुस्लिम कंट्रीज को संदेश दिया है कि अमेरिका उनका दुश्मन नहीं, बल्कि ओसामा उनका सबसे बड़ा दुश्मन है, क्योंकि उसने उन्हें तबाह करने के लिए कुछ नहीं किया है. अब करेगा भी नहीं क्योंकि वो ‘मेंटली बैंकरप्ट हो चुका है’ लेकिन हर चैनल पर इस संदेश की भूमिका अलग थी- पाक पर डॉलर बम गिरेगा, ओबामा के पांच कदम से मर जाएगा ओसामा, आदि आदि ढंग से पूरे 9 से 11 का शो इसी कहानी के नाम बुक था- हिंदी चैनलों पर खासतौर पर.

मैंने टीवी को म्यूट कर देखा, रात 11 बजे कहीं कोई दूसरा टीवी नहीं चल रहा था. मैं ही था जो कुत्तों के मुंह लगे सन्नाटे को नुचता हुआ देख रहा था.
काका शायद इसी जख्मी सन्नाटे की तरफ इशारा कर रहे थे.

शनिवार, जनवरी 24, 2009

सुन लो स्लमवालों !


वाह जी वाह, अंग्रेज लूट गया बाजार! लूटा भी क्या खूब, हमारा जूता हमारे ही सिर पर मार गया। बांधे रहो आंख पर पट्टी, चिल्लाते रहो, बाजार में बेच रहा है हमारी गरीबी. वो गरीबी जिससे आपको बड़ी प्रॉबल्म होती है, जिस स्लम पर नाक बंद कर मुंह फेरते हो, उस स्लम के क्या शॉट्स बना गया अंग्रेज। वो शॉट, जिसे कभी गलती से आपके कैमरामैन बना भी लेते हैं, सिनेमा की छोड़िए, खबर के लिहाज से शूट कर लेते हैं- तो 'डाउन मार्केट' कह कर फाइव स्टार कूड़े में डाल देते हैं. बहुत घिन आती है न चॉल से, फिर क्यों बखान कर रहे हो 'स्लम' की

अंगरेज दोगले कह रहे हैं यार, लंदन के एक अखबार में एक अंग्रेज ने कर ही दी ऐसी तैसी अमिताभ की, स्लमडॉग पर अपना ब्लॉग क्या चमकाया, अंग्रेज पाठक ने बिग बी की बखिया उधेड़ दी- ये कह कर कि खुद तो अपनी जमीन की हकीकत दिखती नहीं, काम करते हैं करण जौहरों, यश चोपड़ाओं और रामगोपाल वर्माओं की फैंटसी फिल्मों में, मुंह फेरते हैं अपने ही लोगों की दीनता से, होता क्या है अमिताभ शाहरुख या आमिर खान की फिल्मों में? नाचने गाने, महंगे सेट लगाने और स्विटजरलैंड की वादियों में शूट करने के अलावा क्या करते हैं बॉलीवुड के सितारे। फिर भी बने हुए हैं- कोई बादशाह, तो कोई शहंशाह, तो कोई मिस्टर परफेक्शनिस्ट। गजब बेशर्मी है, चार लोग नॉमिनेट हो गए, तो लगे लगातार पीछे पीछे तालियां पीटने, स्लमडॉग देखकर तो आपका सिर शर्म से उठना नहीं चाहिए था।

फेंटसी दिखाकर पैसे कमाते चलो और..., चलो, यहां तक भी सही मान लेते हैं, लेकिन आपके सामाजिक सरोकार हैं क्या? शाहरुख ने 400 करोड़ एक फिल्म से कमाए, आमिर ने 200 करोड़ दो सप्ताह में कमाए, बिग-बी भी 'तीन जने' मिलकर कम नहीं कमाए होंगे, 'घटा बढ़ा कर' 30 परसेंट टैक्स जमा करने के अलावा और किसे क्या दिया। दो या न दो, अपनी बला से, हम कोई नक्सलाइट नहीं हैं, जो आपकी जायदाद पर क्रांतिकारी नजर डाल रहे हैं. आपकी कमाई है, आप खुद खाओ, खुद उड़ाओ, लेकिन गरीबी के नाम पर कमेंट तो मत करो, देश के गरीबों से को अपना समझने का एहसास तो मत कराओ. यार, '...' सुलगने लगती है.

काश, आप लोगों को पता होता, स्लम में पैदा होने का मतलब क्या होता है, हर सांस पर जिंदगी उसी तरह दांव पर लगी होती है, जैसे करोड़पति के गेम में हर सवाल पर बाहर का दरवाजा सामने दिख रहा होता है। जब होस्ट कंप्यूटर जी के पर्दे पर सवाल फेंकता है- नाटकीय अपनेपन के साथ पूछता है- जंजीर के हीरो का क्या नाम था- तो हॉट सीट वाले गरीब को वो वाकया याद आ जाता है, वो पल, जब वो संडास में शौच से निपट रहा था, तो उसी अमिताभ का हेलीकॉप्टर उसके स्लम के ऊपर से गुजर रहा था, जिसका वो दीवाना कच्ची उम्र से ही बन गया था। जंजीर फिल्म में गुंडो को पीटता अमिताभ, गरीबों के लिए लड़ता अमिताभ असल हीरो लगता था, दीवाना ऐसा हो गया था कि हेलीकॉप्टर की हवा से, कि जाने कहां से उसकी तस्वीर उड़ने लगी. वो संडास में हगना भूल गया. दौड़ पड़ा अपने हीरो की तस्वीर को कीचड़ में गिरने से बचाने को. लेकिन खुद कीचड़ में गिर पड़ा. कीचड़ में सना वो बच्चा उसी अमिताभ से ऑटोग्राफ की भीख मांगता है, लेकिन कहां- उसके नसीब में 'बड़ों' की भीख कहां?

क्या आपने नहीं देखे- सूरदास, कबीर के भजन गाते हुए सड़क पर अंधे लंगड़े लोगों को भीख मांगते- दर्शन दो घनश्याम....? खबरें नहीं देखीं, किस तरह लोगों को अंधा लंगड़ा बनाया जाता है, हाथ पांव काट कर उन्हें भीख मांगने लायक बनाया जाता है। टीवी पर 'कसाई डॉक्टर' नाम से पर्दाफाश भी देख चुके हैं, फिर भी आप अंजान बनते हैं इन बेचारों को कबीर और सूरदास के भजन कौन और कैसे याद कराता है। भूखे पेट भजन नहीं होता, ये कहावत आप ही गढ़ते हैं, लेकिन भिखमंगे के मुंह से भजन सुनकर भी आपको अंदाजा नहीं होता, कि ये किसके इशारे पर भजन गा रहा है, तभी तो स्लमडॉग में ये देख कर आपको लगता है- कि ये साला अंग्रेज कौन होता है, हमारी कालीन में छिपी कालिख को उजागर करने वाला. ये कौन होता है हमारी जात को जूते मारने वाला.

क्या आपने अखबारों में नहीं पढ़ा- करोड़पति गेम में बार बार फोन करने पर भी अपनी अपनी बारी न आने पर लोगों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मुझे नहीं पता सुनवाई कहां तक पहुंची या उन याचिकाओं का क्या हुआ, लेकिन आरोप तो लगे ही न? स्लमडॉग वाला होस्ट भी तो ऐसा ही करता है। वो बार बार उस गरीब बच्चे को चायवाला कहता है। उसके अनुभवों बनावटी ठहाके लगाता है. वो शायद स्लमडॉग की आंखों में भरे गुस्से को पहचानता है, तभी उससे जलता है और उसे गेम से बाहर करने की कोशिश करता है. लेकिन आज वो बच्चा समझ चुका है होस्ट का खेल- आखिरी से पहले वाले सवाल का इशारा होस्ट से मिलने के बाद भी वो उसका जवाब नहीं चुनता- बल्कि ठीक उसके उल्टा जवाब लॉक करने को कहता है.

और कितनी सीधी गाली दे अंग्रेज, उसने तो बहुत सफाई बरती स्लम की गंदगी में भी। छोड़िये ना, यथार्थ और जमीनी हकीकत को गोली मारिये, चलिए सिनेमा के लिहाज से सोचते है, आप होते तो स्लमडॉग की कहानी पर कैसी फिल्म बनाते, क्योंकि लिखा तो भारतीय विकास स्वरूप ने ही है न. यकीनन, कहानी को 'बिकने लायक' बनाने के लिए दो चार बेड सीन और 10 बलात्कार के सीन डालते, और खुद को पश्चिम की तरह बोल्ड बताते हुए ढोल बजाते, मधुर भंडारकर की चांदनी और यूं कह लें शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन स्टाइल में. लेकिन डैनी ने तो एक चुम्मी भी किसी को नहीं लेने दी. जबकि उसकी कहानी में जावेद जैसे ठेकेदार हैं, जो हीरोइन को रखैल बना कर रखा हुआ है, लेकिन डाइरेक्टर ने हाथ लगाने तक का मौका नहीं दिया. आप ये मौका चूकते?

सच कहूं, तो मुझे भी नहीं पता, इस पूरे 'मास्ट्रबेशन' में आप, तुम, यार जैसे संबोधन किसके लिये यूज कर रहा था. शायद इन सबकी जगह मैं ही खड़ा था.

गुरुवार, जनवरी 22, 2009

कब आएगा ओबामा**?


हर कोई चाहता है ओबामा को!
करिश्मा तो ये कि दुश्मन भी दाद देते हैं उसकी बुलंद आवाज पर, अपनी खामोशी से। वो नफरत में चुप रहकर भी उसे चाह रहे होते हैं। दुश्मन ओबामा के निजी हों या न हों, इनकी लिस्ट अमेरिका के दुश्मनों की फेहरिस्त के हिसाब से काफी लंबी है, लेकिन कितना बेपरवाह दिखता है ये ओबामा।


ये आदमी या जादू- जब कहता है कि ’जिस बाप की मैं औलाद हूं, 60 साल पहले के समाज में किसी रेस्तरां तक में नौकरी की नहीं सोच सकता था, आज राष्ट्रपति पद की शपथ ले रहा हूं.’ तो रोम रोम भर उठता है उम्मीदों से. वो जो भी कहता है जाने क्यों सच लगता है.

ये सबकुछ घट रहा है सात समुंदर पार अमेरिका में, लेकिन भारत में सबके सिर चढ़ कर बोल रहा है ओबामा. अखबारों के कस्बाई एडीशन का भी ‘बैनर हेड’ बन रहा है ओबामा. इंडियन टेलिविजन पर जिस तरह छाया रहा ये शख्स- सेंट जॉर्ज चर्च की प्रार्थना से लेकर व्हाइट हाउस की यात्रा और लिमोजिन कार में बुश के साथ कैपिटॉल हिल के शपथग्रहण समारोहत तक सफर- न्यूज चैनलों से पल भर के लिए नहीं हटा लाइव बैंड. यहां तक ओबामा की शान में अपना हाल भुला बैठे भारतीय चैनल- हर बुलेटिन की हेडलाइन्स समर्पित की गई अमेरिकन प्रेसिडेंट की सेरेमनी को. लग रहा था अमेरिका भी इंडिया का कोई गांव है. कितना अच्छा होता अगर ऐसा होता. ओबामा को हाथ बढ़ा कर छू लेते. टीवी की खबरों से ऐसी आत्मीयता, ऐसी नजदीकी छलक रही थी- लग रहा था- ये तो रहा ओबामा- अपनी प्यारी पत्नी और दुलारी बेटियों के साथ नाचता-गाता-झूमता- ये रहा ओबामा.

हो न हो, हम भारतीयों के अवचेतन में दबी अधूरी इच्छा को हवा दे रहा है ये ओबामा। हमारी अपनी जमीन पर किसी करिश्मे की कल्पना के बीज बो रहा है ओबामा. बिडंबना ये कि इस बीज की लहलहाती फसल देख चुके हैं, हम गांधी को पैदा कर चुके हैं, अंबेदकर को आसमान पर बिठा चुके हैं, इस बीज से महामानवों की कई बेमिसाल मिसालें खड़ी कर चुके हैं, लेकिन आज तरस रहे हैं एक ओबामा को- जो आएगा और जात-पात-छुआ-छूत-दंगा-फसाद-वर्ग-विभेद को मात्र एक अभियान में खत्म कर देगा. मक्कार-धिक्कार नेताओं के चंदा-धंधा-दलाली-घूसखोरी आधारित तोंदबढ़ाऊ बिजनेस को दरकिनार कर देगा. लेकिन इस खयाल पर दूर दूर तक नहीं दिखता कोई ओबामा.



काश, अफ्रीका ने गांधी के बदले हमें दिया होता ओबामा। फिर हम अपनी ही फसल के सपने तो नहीं देख रहे होते- माया, मुलायम, लालू मोदी, ठाकरे, फर्नांडिस, जेटली, सिंह, चौधरी, अंसारी जैसे असंख्य ‘बहुबाचको’ का ‘पछाड़’ ताकने को मजबूर तो नहीं होते


**स्वैहिली भाषा में ओबामा का मतलब होता है-जिसे आशीर्वाद हासिल हो यानी 'ब्लेस्ड'