गुरुवार, दिसंबर 31, 2009

न्यू इयर का पॉजिटिव विश!



31 दिसंबर
साल के कैलेंडर की इस आखिरी तारीख का एहसास गजब का होता. वक्त के सिलसिले का ऐसा मोड़ जहां खोने और पाने का एहसास एक साथ होता है. लेकिन...इस बार वक्त की परतों में गुम होने वाला है एक पूरा दशक...

मेरा माजी मुझसे बिछड़कर
ना जाने किस हाल में हो
ऐसा भी हो सकता है
मेरी तरह वो भी तनहा हो


उम्र का एक और साल माजी बनने के कगार पर है. नए साल की आहट एक और साल को तन्हा करने वाली है. लेकिन ये तो दुनिया है, राजी-खुशी, या शिकवा शिकायतों के बावजूद साल दर साल यही सिलसिला चलता है...

न पाने से किसी के है
न कुछ खोने से मतलब है
ये दुनिया है इसे तो
कुछ न कुछ होने से मतलब है


साल के इस मोड़ पर जाने क्यों ऐसा लगता है, बंदा पीछे मुड़कर देखता है- जो हुआ, वो न होता तो क्या होता, जो नहीं हुआ, वो हुआ होता तो क्या होता...

तुम नजर से नजर मिलाते तो
बात करते न, मुस्कराते तो
चांदनी रात सिसकियां भरतीं
तुम जरा अपनी छत पर आते तो
दोस्ती में अना नहीं होती
खुद न आते, कभी बुलाते तो
आ भी जाओ, कि हम बुलाते हैं
तुम बुलाते, जो हम न आते तो


इसी पसोपेश है दिल, हमारा, आपका सबका दिल, गुजारिश है भूल जाइए कड़वी यादें...जिससे जलता है दिल. सजा लीजिए आंखों में कुछ नए सपने, बात किताबी है, लेकिन ऐसी हसरतों से बहलता है दिल.

आप सबको साल 2010 मुबारक!

गुरुवार, दिसंबर 24, 2009

न हंसे होते, न फंसे होते...



हंसी तो फंसी...
इसे मनचलों का मुहावरा कहिए या फेवरेट फार्मूला, जुमला लागू हो रहा है 'छेड़खानीपसंद' पूर्व डीजीपी एस एस राठौर पर पर. साहब की '4 इंच की मुस्कान' बन गई गले की फांस...

राठौर के चेहरे पर बेपरवाह और बेशर्म सी मुस्कान देखकर ही लगता है, 1990 में 14 साल की टेनिस खिलाड़ी रुचिका गिरहौत को छेड़ने के बाद पिछले 19 सालों में(माफी-लाइन में डीजीपी का डेटा कुछ ज्यादा हो गया) ऐसे ही हंसते रहे होंगे डीजीपी...

जब जब डाला होगा केस की सुनवाई में अडंगा-
केस को अंबाला से पटियाला,पटियाला से चंडीगढ़ ट्रांसफर करने की मांग,तो सुनवाई की वीडियो रिकार्डिंग करने की दलील.
जब जब लटकाई होगी सीबीआई की जांच
जब जब दबाई होगी 'कार्रवाई' की फाइल,
हर कामयाबी पर इसी तरह फूटी होगी ये बेशर्म मुस्कान.


लेकिन, 19 साल बाद जब सीबीआई कोर्ट ने 'लंबी सुनवाई और आरोपी की ज्यादा उम्र' की दलील देते हुए 6 महीने की सजा सुनाई तो हद ही हो गई
विजयी ठहाके के साथ 2 से 4 इंच की हो गई राठौर की मुस्कान, वो भी कैमरे पर...

आज की पीढी तो पूरा मामला भी भूल चुकी थी, लेकिन एक मुस्कान पूरी कहानी बता गई-

जाते जाते जो मुड़ के देख लिया
और उलझा दिया खयालों को
एक हल्की सी मुस्कराहट से
उसने हल कर दिया सवालों को


इस सिचुएशन पर बड़ा ही दिलदार शेर दे मारा 'केएसएच' (क्या सीन है) के कॉलमनिस्ट बैताल बेअदब ने. मोबाइल पर मैसेज मिला, तो मैं समझ नहीं पाया, आखिर मिलने पर शेर का मजमून बड़े विस्तार से समझाया-

मियां को एक मुस्कुराहट मार गई, जो मीडिया, जो महिला आयोग पिछले 19 साल से चुप थे, अचानक एक मुस्कराहट से जाग गए. मीडिया ने मुस्कान को हाईलाइट किया, तो महिला आयोग भी जाग गई. पूरे दशक में कभी कोई ऐसा मौका याद नहीं आता, जब मामले में महिला आयोग ने कोई आवाज उठाई हो. आज दोबारा जांच की मांग कर रही है महिला आयोग, लेकिन सीबीआई की आधी अधूरी जांच पर 19 साल तक चुप क्यों रही?

इस बार भी बच जाते डीजीपी, लेकिन, आयोग की तर्ज पर अपनी नींद सोई मीडिया को 'खेलने' का शानदार विजुअल मिल गया- भई, ये तो गजब है, गनुहगार ठहराए जाने पर कोई ऐसे कैसे हंस सकता है. राठौर की इस ऐतिहासिक हंसी ने सजा का सवाल भी खड़ा कर दिया-

अब सीबीआई को भी लग रहा है सजा कम हुई है(आने वाले दिनों में शायद अपील हो) हरियाणा के पूर्व गृह सचिव को भी लग रहा है- केस को दबाने में रसूख का इस्तेमाल हुआ. वर्ना, हरियाणा पुलिस महकमे ने तो राठौर के खिलाफ 1990 में ही कार्रवाई की सिफारिश कर दी थी

बताइए भला, एक मुस्कान ने क्या से क्या कर दिया, बैताल बेअदब ने ठीक ही कहा था- न हंसे होते न फंसे होते राठौर

रविवार, नवंबर 29, 2009

लो, अब झेलो 'बैताल बे-अदब'* को...




जब से हुए हैं जिल्ल-ए-सुब्हानी मेरे खिलाफ
मुंसिफ मेरे खिलाफ, गवाही मेरे खिलाफ
मेरी तो एक बात भी पहुंची न उसके पास
उसने तो जो सुना, सुना ही मेरे खिलाफ
इस बार आसमां वाले भी मेरे खिलाफ हैं
ये शहरवाले तो पहले से ही थे खिलाफ


हमारी लेखनी तो आपके लिए लिजलिजी ही साबित हुई, लीजिए, अब झेलिए इस बेकाबू बैताल को.

भाई जान, दोस्त बन गए हैं, दफ्तर में बगल की सीट पर बैठते बैठते. तुलसी रजनीगंधा खाने वाली 'बुर्जुआ जमात' से ताल्लुक बताते हैं. लीकर नहीं, कभी कभार बीयर पी लेते हैं. सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाते, खैनी कभी कभार दाब लेते हैं.

लखनऊ के रहने वाले हैं, इससे ज्यादा मैं उनके बारे में बताऊ, ये उनको गवारा नहीं. सो परिचय इतने ही तक. एक खासियत है, जो मैं आपको खासतौर पर बताना चाहुंगा- मियां बात-बात में ऐसा वजनदार शेर मारते हैं, कि हिलाकर रख देते हैं. सुनकर दिल इतना बाग बाग हो जाता है कि मैं कई बार कह बैठता हूं-
'मियां, जिस दिन अकबर जैसी हैसियत हुई, आपको दरबार का रत्न बना कर रख लेंगे.

ऐसे 'रिटर्न्स' पर भाई की घनी मूछों के बीच से फू'ता ठहाका क्या नवाबी होता है. अक्सर 'शराफत की चुप्पी' ओढे रहते हैं, लेकिन खबर की मार पर इतने भद्दे तरीके से बिलबिलाते हैं, कि पूरा चोला गंदा कर देते हैं- बड़ा करारा करंट(सवाल) मारता है भाई- मुंबई हमले की बरसी पर तो जैसे हमलावर ही हो गए-

जरा मुजाहिरा किजिए...

'कुमार साहब, मैं तो 'हमला' हो गया, हमला देखते देखते 12 महीने के पेट से हो गया....'दफ्तर से निकलते ही भाईजान फट पड़े. लग गया, बेटा आज तो चाय की दुकान पर बवाल हुआ. मैंने पहले ही संभालने की कोशिश की-

26 नवंबर पर कई चीजें अच्छी हुईं. बहादुरों को टीवी के जरिए देश ने सलाम किया. एक साल बाद के फर्क का अंदाजा हुआ....

लेकिन भाई जान तो अलग ही मूड में थे-
लेकिन जो भी हुआ वो टीवी पर ही हुआ. वो भी हमले को बेशर्मी से बेचने की होड़ के साथ....

इतना कहने के साथ ही भाई साहब 'हेडर' और 'प्वाइंटर' के साथ 'चीर फाड़' करने लगे

ये बेचने की होड़ नहीं तो क्या थी?
जो तारीख(26/11) से तीन दिन पहले ही हमले का 'रीक्रियेशन' दिखने लगा, और तारीख आने तक हमला इतनी बार रिपीट हुआ कि आंखे एक साल पहले हमले के खून से भर गईं.
तारीख के मुताबिक हमला आज भी जारी था, कल भी और परसों भी जारी रहने वाला है, लेकिन तारीख खत्म होते होते हाथी के पेट में गुम हो गया जज्बा.

ये टीवी का हव्वा नहीं तो क्या था?
किसी ने फिल्म बनाई, तो किसी ने डॉक्यूमेंट्री तो किसी ने 'स्पेशल'. किसी ने एलबम बेचा, तो किसी ने शॉर्ट फिल्म बेच डाली(एक घंटे की फिल्म 10 ब्रेक के साथ) अगर ये मौका इतना ही बड़ा था देश के लिए, तो प्रधानमंत्री ने पहली बरसी को इतना सीरियसली क्यों नहीं लिया? ऐसा होता तो वो अमेरिका में दावत उड़ा रहे होते? ऐसा नहीं कि उनका दौरा अचानक हुआ होगा. महीने भर पहले तो प्लान हुआ ही होगा. फिर इतने बड़े मौके पर विदेश क्यों गए. इस पर मीडिया की मौन समहति देखिए. अपनी धुन में किसी को उनका देश में न होना खटका तक नहीं. मनमोहन पर इतना मोहित है मीडिया कि कोई अंजान दंपति घुसा ओबामा की दावत में और देश में हेडलाइन बनी- पीएम की सुरक्षा में चूक!

भला ऐसी भी देशभक्ति होती है, भला ऐसा भी कहीं 'एहतियात' होता है?
कल तक लाचार थीं खुफिया एजेंसियां, सुरक्षा एजेंसियां भी निहत्थी थीं कल तक, सियासतदां निठल्ले थे, एक दिन में इतने 'जज्बेदार' कहां से हो गए
ये आतंकवाद के खिलाफ एकजुट दिखने की औपचारिकता नहीं थी तो क्या थी?
जो हमले की विभत्स तस्वीरो को हू-ब-हू दिखाने की होड़ में बुनियादी बातें 'खूनी कालीन' के नीचे दबा दी गईं. नकली किरदारों और 'फर्जी फायरिंग' के शोर में गुम हो गया वो जज्बा....

मैंने बीच में रोका, भाई बात बड़ा बवाली कर रहे हो, चुप रहो, हिंदी से अंग्रेस तक कहीं जगह नहीं मिलेगी. चुप करो. इस पर वो आहिस्ता तो हुए लेकिन शोर भुनभुनाहट में बदल गया.

अब यार, साले लोग, कमीशन के चक्कर में पीड़ितों का मुआवजा तक रोके हुए हैं, और हम उनके घड़ियाली आंसू दिखाने को मजबूर हैं. वो पाटील बार बार गृहमंत्री बन जाता है, सियासत की सौदेबाजी पर ढंग से एक सवाल भी नहीं खड़ा कर पाते.
संसद में सवाल उठा भी तो, खबरों में सदन में दो मिनट की चुप्पी दिखाई गई. दाब दी गई वो खबर, कि आज तक कितनों को मुआवजा मिला और कितनों का दाब दिया गया. ऐसा लग रहा हो, मुंबई पर हमला हमला नहीं, मुफ्त का एडवेंचरस माल हो, जितना चाहो जिस एंगल से चाहो, दिखाते रहो. ये खबर अभियान बनने लायक थी...एक आध अंग्रेजी चैनलों पर दिखा भी, तो कुछ उखड़ा नहीं....

अरे ठीक है, रीढ़ की हड्डी सीधी नहीं, सिर्फ इमोशनल-इमोशनल ही खेलना है, तो ढंग से खेलो. दिन भर कसाब कसाब चिल्लाते रहते हो, कुछ पता भी है, कसाब के 9 साथी कहां हैं, उनका क्या हुआ. ससूरों की लाश अब तक सड़ रही है. केमिकल के साथ जली भुनी लाश कितने तक बची रहती. अस्पताल की मोर्चरी में सड़ रही है. सालों को दो गज जमीन नसीब नहीं हो रही है. देश के मुसलमानों ने कह दिया है, अपने वतन की धरती पर दुश्मनों के लिए कोई जगह नहीं. कोई अपने इलाके के कब्रिस्तान में उन्हें जगह देने को तैयार नहीं. कोर्ट से आदेश निकल चुका है. लेकिन नहीं. ये कितनी बड़ी बात है कौमी एकता और एकजुटता के लिए. लेकिन हमें तो भैया कसाब को बोलता दिखाना है.

उफफफफफफफफफ...ये आदमी बेचैन कर देता है यार...

* भई जी हल्के में मत लीजिएगा स्टार को, ट्रेड मार्क है. अब बैताल बे-अदब नाम से मेरे ब्लॉग पर कॉलम लिखा करेंगे.

रविवार, नवंबर 22, 2009

क्यों नहीं कर दिया जाए ठाकरे को बैन?



अगर लोकतांत्रिक सिद्धांतो की कसौटी पर देखा जाए बहुत ओछी बात है. लेकिन सवाल है, कि क्या उस शख्स को लोकतंत्र की परवाह है? जो खुद अपनी तर्जनी को तमाम कायदे कानूनों से ऊपर मानता हो, और जब चाहे, जिस पर चाहे, चाहे जो भी उसके 'हितो' के खिलाफ खड़ा हो, उस पर हमला कर दे, बयान छोड़ो, सामना का कोई अंक उठाकर देख लो- हर वाक्य में असंसदीय शब्द गुंथे पड़े है. ठाकरे की भाषा में गढ़ा गया हर मुहावरा एक गाली की तरह है. उस शख्स को इतना भाव क्यों?


ऐसी भावना ठाकरे के 'हमलों' से आहत हर दिल की होगी. लेकिन सुबह कैब में सच के जिस अंदाज से सामना हुआ, उसने मुझे आप लोगों से कुछ कहने को मजबूर कर दिया. वर्ना बात तो दो दिन पुरानी हो चुकी है.

कैब में बैठा वो शख्स ओबी वैन(जिसके जरिए खबरें लाइव दिखाई जाती है) का ड्राईवर है. पड़ोस में ही रहता है, और अक्सर मुझसे पहले कैब में बैठा हुआ होता है. कैब मेरे पिक अप प्वाइंट पर पहुंची, तो मैंने कार में कुछ शोर गुल सुना. बैठा तो देखा- वैन के ड्राइवर का चेहरा तमतमाया हुआ था. बात छिड़ी थी चैनल पर ठाकरे के गुंडों के हमले की. बाल ठाकरे के समर्थन वाले बयान की, 'सामना' में हमले को जायज ठहराने की. मेरे आने पर आवाज थोड़ी नीची हुई, लेकिन मैं महसूस कर सकता था उसका गुस्सा-

'ये क्या हो रहा है सर, बताइए, एक आदमी सरेआम हमला करवाता है, और अगले दिन उसे अखबार में लिखकर जायज ठहराता है, और हम उसे राष्ट्रीय खबर बनाते हैं, बकायदा उसके नफरत भरे शब्दों को ग्राफिक्स बनवा कर दिखाते हैं. आपको नहीं लगता ठाकरे हमारे हथियार से हमीं पर हमला करता है.'

मैने सुबह की सर्दी में हाथ मलते अनमने से जवाब दिया- क्या हो गया भाई, आज सुबह सुबह गरम हो रहो, आज क्या कर दिया ठाकरे ने?

'कुछ हुआ नहीं, मैं आप सब सीनियर्स से सवाल पूछ रहा हूं- हम तो ओवी वैन चलाने वाले ठहरे, जहां कहोगे वहीं गाड़ी लगा देंगे, वहां से चाहे तुम जो दिखाओ, लेकिन हमारा भी कुछ मन करता है. आप सच्ची बताइए, क्या ठाकरे को सिर चढ़ाने वाले हमीं नहीं? '

मैं उसके इस 'कनक्लूजन' से हिल गया- ऐसा कैसे कह सकते हो...

'अरे सर, चुनावों में कई बार साबित हो चुका है ठाकरे का सच, फिर भी हम उसे मराठा छत्रप की तरह पेश करते हैं. मराठी को लेकर जो भी बोल दे, जो भी कह दे- बिना सोचे समझे दिन भर ताने रहते हैं- ठाकरे ने ये बोल दिया, बड़ा संकट आ गया. अरे काहे का संकट- उसके बोलने से खुद महाराष्ट्र में फर्क पडता है क्या? अगर पड़ता तो महाराष्ट्र कब का देश से अलग हो गया होता...

'अच्छा ये राज ठाकरे को देखो ना, ये जो 13 सीटें मिली हैं उसी मीडिया वालों ने ही दिलवाई हैं. पुरबियों पर हमले कर कर पहले तो टीवी पर छा गया, नफरत के नये सरदार के रूप में ही सही, टीवी ने उसे हीरो बना दिया. क्या जरूरत थी ऐसे निगेटिव हीरो का एजेंडा दिखाने की? चैनल वाले किस मुंह से उसका इंटरव्यू दिखा रहे थे, क्या हिंदी, क्या अंग्रेजी सब चैनल वाले खास बातचीत और एक्सक्लूसिव का बैंड लगाकर राज ठाकरे का इंटरव्यू चला रहे थे- क्या मकसद था भैया? सर, आप मानो या न मानो, ठाकरों को सर हमीं चढ़ा रहे हैं...


सर जी, आप सर्वे कराकर देख लो- आज मेरे जैसा अनपढ़ भी कहेगा- मीडिया के इसी लोकतांत्रिक तरीके का तो फायदा उठा रहे हैं ये ठाकरे. जरा इनकी राजनीति देखिए- एक ठाकरे अमिताभ पर हमला करता है, तो दूसरा चुप रहता है, दूसरा सचिन पर हमला करता है, तो पहला चुप रहता है. एक बीएमसी को निशाना बनाता है, तो दूसरा बैंको को मराठी में वेबसाइट निकालने की धमकी देता है...ये अपना घर चलाने की राजनीति नहीं तो क्या है? दोनों का राग एक है, लेकिन कभी किसी मसले पर एकराग में बोलते हुए देखा है?

इतनी बात होते होते दफ्तर आ चुका था- लेकिन मेरे मन में सवाल बहुत गंभीरता से गूंज रहा था- क्यों नहीं इन ठाकरों को बैन कर दिया जाए- चैनल पर इनसे जुड़ी कोई खबर न दिखाई जाए, इनके किसी भी बयान को न उठाया जाय?

शनिवार, नवंबर 14, 2009

'ठाकरों' की गाल पर सचिन का 'सिक्सर'- वाह सचिन वाह!



क्रिकेट के मैदान पर सचिन ने जाने कितनों को दिन में तारे दिखाए, राजनीति और विवादों पर वो अक्सर चुप ही रहते हैं, लेकिन जब जुबान खोली तो एक शॉट में मराठी राजनीति की बखिया उधेड़ दी.
वाह सचिन वाह, 'सच की पिच' पर 'नफरत की गेंद' को ऐसा उड़या कि गेंद बाउन्ड्री से बाहर और बस मुंह ताकते रह गया ठाकरे घराना.

अब तक ये क्रिकेट के मैदान पर होता दिखा था- सचिन के बल्ले से गेद निकली, फील्डर के पास कोई चांस नहीं, सिर के पीछे हाथ रखे और होंठ भींचे गेंद को बॉन्ड्री से बाहर जाते हुए देखने के सिवा कोई चारा नहीं. सचिन ने ये हाथ मैदान के बाहर भी दिखा दिया. ठाकरे परिवार भी शेन वॉर्न की तरह बगलें झांक रहा है. मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही, हिम्मत नहीं हो रही कि झूठी ही सही कोई अपील करें.

जो बात खुद को बड़ा से बड़ा मराठी 'सेक्युलर दिग्गज' कहने वाला नहीं कह सका, वो बात सचिन बोलते-बोलते बोल गए- मुंबई पूरे भारत की है, इस पर जितना हक मराठी का है, उतना ही हक हर भारतवासी को है. इससे आगे सचिन ने अपनी शराफत का ख्याल किया, वर्ना राज ठाकरे और बाल ठाकरे की जुबान में बोलते यही कहते- मुंबई किसी की बपौती नहीं, और जो ऐसा मानते हैं वो अपने बाप को गाली देते हैं, और इस बहाने अपनी मां की नीयत पर सवाल उठाते हैं....ठाकरों की जुबान में ऐसी गंदी भाषा का कोई अंत नहीं...क्या मुंह लगना...

मुंबई पूरे देश की है- ये बात सचिन की जगह कोई और बोलता तो उसका मुंह नोच लेते ठाकरे. लेकिन मुंह तो बंद ही है, 'मुखपत्र' भी खामोश है. कहीं कोई कुछ नहीं बोल रहा. वो जानते हैं कि क्रिकेट के इस भगवान पर उंगली उठाई, मराठी सपूत पर सवाल उठाए, तो बिहार यूपी वालों को तो छोड़ो, मराठी ही मुंह नोच लेंगे- अबे, अपनी राजनीतिक रोटी के लिए औरों के मुंह का निवाला छीनने वाले, मराठी धरती को देश की ताकत से अलग आंकने वाले, दुनिया में देश का नाम बदनाम करने वाले- तू होता कौन है अपने मास्टर को आंख दिखाने वाला...

ये सचिन की ताकत है, और सच की इस ताकत का पूरा अंदाजा है सचिन को. इस सच को कोई नकार नहीं सकता. 'ठाकरों' की बोलती भरसक बंद है, बेचारे हाथ में चूड़ी पहने 'कुर्बान' की करीना के पीछे पड़े हैं. पोस्टर पर नंगी पीठ को साड़ी पहना रहे हैं...छी छी छी...अब यही काम रह गया है

गुरुवार, नवंबर 12, 2009

उन कच्चे बरतनों की पक्की याद...


ये तस्वीर देखते रहिए, नाराज है तो भी, इस तस्वीर में कितना कुछ है समझने को, कितना कुछ अन-समझा छोड़ देने को...

तब तक...
मैं 3 महीने से हो रही गले में खराश को 'खखार' लेता हूं...

बोलना खटकता है, चुप रहना सालता है, 'मंच' पर आकर सिर्फ मुंह ताकते रहने कितना अपमानजनक लगता है.
आंधी आई, बारिश हुई, तूफान आया (आते आते गुजर गया) कुछ भी तो नहीं बोला-
सेंसेक्स चढ़ा, सचिन सत्रह हजारी हुए, राज ठाकरे का उदय हुआ, सड़क की गुंडागर्दी सदन में समा गई- मैं 'निकम्मा' कुछ नहीं बोला...

आतंक का खतरा पैदा हुआ, 2012 में दुनिया के अंत की तारीख पक्की हो गई....
ये सब सुनते देखते प्रभाष जी चले गए...
फिर भी कुछ नहीं बोला...
दिल में ही रह गई उस मुलाकात की याद...1999 की बात है- 'सुबह सवेरे' के स्टूडियो में 'कंधे पर हाथ रखते हुए बड़ी आत्मीयता' से कहा-
बच्चा, (मैं पंडित नहीं) गांव से आए हो, जम के काम करो. जब तक गांव याद रहेगा, आगे बढ़ते रहोगे...(मुकेश कुमार जी गवाह हैं)

मौत की खबर पाकर मेरा भी मन हुआ जनसत्ता अपार्टमेंट जाऊं. लेकिन अगले ही पल एक झिझक ने घेर लिया.
कहां उनसे पहचान और साथ वक्त बिताने वाले बड़े बड़े संपादक और लिक्खाड़ और कहां मैं...
जाऊंगा तो सोचेंगे मीडिया में टीआरपी बढ़ाने का मुंह लेकर आया है...बड़े पत्रकारों की जमात में खुद को जबरन शामिल कराने आया है
सदमे पर हावी हो गई झिझक, मातम में नहीं गया, चुपचाप उनकी मौत के बाद छपे औरों के संस्मरण पढ़ता रहा...
अपनी चुप्पी में औरों संस्मरणों में उठाए गए सवाल के जवाब ढूंढता रहा- अब वैसे कागद कारे कौन करेगा? हिंदी पत्रकारिता का कौन होगा स्तंभपुरुष? (इस सवाल के आगे बड़े संपादक भी लाचार है!)

और कमाल देखिए, कि ये बात कहने में भी हफ्ता लग गया...

चुप्पी टूटी इस तस्वीर से... ऐसे ही कहीं नेट पर मिल गई थी...
तस्वीर देखते ही याद आ गया गांव...
वो कुम्हारिन जो प्राइमरी स्कूल के पीछे रहती थी. स्कूल की खिड़की से बाहर बरतन बनाने में हर रोज लीन...जितने रूखे उसके हाथ उतने ही चिकने कच्ची मिट्टी के वो बरतन...

मां के साथ कई बार उसके पास जाता था- अक्सर छुट्टी की घंटी बजने के बाद. स्कूल के बाद मां बरतन के लिए कहने जाती, मैं उनके पीछे कच्चे बरतनों को निहारने में जुट जाता...
कई कच्चे दीये, ढकने और मटकी मेरी इस हरकत की वजह से टेढे मेढ़े हो गए, लेकिन मां से आत्मीयता की वजह से कभी उसने कुछ कहा नहीं...बल्कि हाथ में एक दो दीये और थमा देती थी...
तस्वीर देखी, तो उसकी याद आ गई. पता नहीं वो किस हाल में होगी. क्या कर रहे होंगे उसके बेटे. घर फोन कर पूछा तो पता चला- उसका क्रांतिकारी विचार वाला पति पिछले 5 साल से घर नहीं लौटा...
बरतन से अब पेट नहीं भरता, सो बेटे गांव छोड़ कर चले गए हैं...
पिछली दीवाली पर मिट्टी के कुछ दीये और बरतन लेकर घर लेकर आई थी...मां ने अनाज के साथ कुछ खाने को दिया तो रोने लगी...
आंसुओं में बहकर बोझ कुछ हल्का हुआ तो मेरे बारे में पूछा...इस बार मां उसके आंसूओं में बह गई...

शुक्रवार, अक्तूबर 09, 2009

गर ये 'नशा' नहीं होता, ये 'नशेमन' नहीं होता...



नशा को मैंने 'नशेमन' शब्द से समझा था.

जी, बात हंसने लायक है, लेकिन बहुत पुरानी है, और आज ये 'नशीला' जिक्र इसलिए छिड़ गया, क्योंकि आज कोई नशे को नए रूप में परिभाषित कर गया

'पियक्कड़ों' (जो हर हाल में पहले पीने का जुगाड़ करते हैं) के रहते भला 'नशे' का मतलब कौन नहीं जानेगा समझेगा. मैं भी समझता था, लेकिन नशे का असर नहीं समझता था- कैसा होता है, क्या होता है, पीने के बाद क्या गुल खिलाता होगा. मतलब नशे का मीनिंग साफ था, लेकिन कोई तस्वीर नहीं बनी थी. वो बनी गुलजार के 'नशेमन' से.

पता नहीं, 'नशेमन' शब्द का इस्तेमाल कितने गानों, कितनी गजलों में हुआ होगा, एक फिल्म में तो शायर ने यहां तक कह दिया- अगर नशा नाम की कोई चीज होती तो शराब की बोतल नाचने लगती. मतलब अगर बोतल नहीं नाचती, तो समझिए- शराब में नशा नहीं, क्योंकि अगर होती तो बोतल भी नाचती. लेकिन फिल्म 'आंधी' के इस गाने में गजब का असर था-
पत्थर की हवेली को
शीशे के घरोंदों में
तिनके के नशेमन तक
इस मोड़ से जाते हैं...
इस मोड़ से जाते हैं
कुछ सुस्त कदम रस्ते
कुछ तेज कदम राहें...


इस गाने को हर बार सुनते हुए मन- 'नशेमन' पर रुकता था. 'नशा' शब्द की एक इमेज हर बार उभरती. बाकी शब्दों के मतलब और मायने समझे में आ गए, नशेमन का मतलब ये बना नशे में घुला मन. बड़ी शायराना सी तस्वीर उभरी 'नशे की'- आदमी नशे में भी कितना होश में होता है कि ऐसी सूफियाना से अहसास से गुजरता है- उसे अपनी जुबां से बयां करता है.

बाद में 'नशे' का मतलब (असर समेत) भी समझा और नशेमन का भी. लेकिन ये नशा एक बार फिर उलझा रहा है-
एक हमप्याला बंधू की दलील दी- बातचीत शराब पीने की तलब पर चल रही थी- कब होती है, क्यों होती है, होती ही क्यों है ऐसे मसलों पर.

अलग अलग दलीलें थी- हमारी उनकी (जैसे बहुतों की होती है, अपने अपने संदर्भ के मुताबिक). बातचीत उनके जुमले से खत्म हुई...
'भई ऐसा है, ये ऐसी शय है, जिसे पीने वाले खुशी में भी पीते हैं, मातम में भी पीते है, कुछ लोग इसे सच्चा साथी कहते हैं। लोग शराब की बात तो करते हैं, लेकिन नशे को भूल जाते हैं.
मैं पहली बार शराब और नशे पर अलग बयान सुन रहा था- इंटरेस्टिंग...

'भई, ये जो नशा फैक्टर है- वही पियक्कड़ और पीने वाले के बीच का फर्क है. जिन्हें टेस्ट से प्यार हो जाता है, दाल चावल की तरह मुंह लग जाता है, उनकी तो छुड़ानी मुश्किल. और जो थोड़ा- 'खुशनशा' करने के लिए पीते हैं, वो काबू करना जानते हैं' (गुलाबी खुमार, सफेद सुरूर और सुर्ख लाल नशा- भाई के मुताबिक नशे की ये तीन कैटिगरी होती है)
इसलिए 'टेस्ट' को मुंह न लगने दीजिए, और अगर करते हैं, तो हमेशा 'नशे की पहले कैटिगरी' पर बने रहिए. मैं ऐसा ही जीव हूं- जो चीज अगर शराब जितनी कड़वी और और उसे मुझे मेरा 'खुशनशा' नहीं मिलेगा, उसे मैं मुंह भी न लगाऊं!


इसी 'खुशनशा' के लिए दुनिया में शराब बनाई गई होगी, जहर मिलाने और चोरी छिपे बेचने और पीकर लड़खड़ाने और दूसरे की इज्जत पर हाथ डालने के लिए नहीं. नशें में (और से) खुश नहीं तो कुछ नहीं।

बात तार्किक थी- मैंने सोचा, क्यों न आपसे शेयर करूं...

शनिवार, अगस्त 22, 2009

अब डॉगी को चाहिए दुल्हनिया



कब तक रहूंगा मुंह मारने के लिए मजबूर?
मैं भी रचाने जा रहा हूं शादी!
मुझे चाहिए एक प्यारी कुतिया!
रंग-रूप, जाति धर्म का बंधन नहीं!
मुझे चाहिए एक केयरिंग कुतिया!!

 
हैरान मत होइए, मौका देखकर मुंह मारने के लिए बदनाम इस जानवर को इंसानी लब्ज में फरमाइश करते सुनकर, शादी के मामले इंसान की राह पर चल पड़े हैं कुत्ते भी.शादी के सपने जाने कब से संजोते रहे होंगे, लेकिन अब इनके ख्वाब पूरे होने लगे हैं, कुत्तों की शादी का ख्वाब पूरा करने में इनके मालदार मालिक भी खूब इंट्रेस्ट ले रहे हैं, अपने प्यारे कुत्तों के लिए देने लगे हैं शादी का विज्ञापन  
 
फिल्मों में तो जाने कितनी बार परोसा गया है कुत्तों का रोमांस, हीरो हीरोइन के मिलन के साथ मिलाई जाती है इनकी भी जोड़ी, इसका अंदाज भले ही कॉमिक होता है, लेकिन जनाब अब ये हंसने की बात नहीं, बल्कि रीयल लाइफ में भी होने लगी है कुत्तों की शादी. 
जरा गौर कीजिए इस विज्ञापन पर..
"स्वस्थ सुंदर और व्यावहार कुशल कुत्ते के लिए चाहिए एक केयरिंग कुतिया"
ये विज्ञापन तो किसी कुत्ता मालिक ने दिया है, लेकिन कई मालिक तो शादी के विज्ञापनों में सीधे कुत्तों को ही आगे कर देते हैं.
"शादी के लिए मुझे चाहिए एक ऐसी प्यारी कुतिया, जो मुझे प्यार करे, मैं जीवन भर उसका गुलाम रहूंगा"
 
बेशक, शादी उन कुत्तों के नसीब में नहीं, जिनका कोई मालिक नहीं, लेकिन जिन कुत्तों के मालिक हैं, जो कुत्ते बड़े बंग्ले, बड़ी कार और मोटी आमदनी वाले मालदार मालिक के साथ घूमते हैं, उनकी शादी का सपना तो सच होने ही लगा है...आखिर इंसानों से किस मामले में कम हैं कुत्ते-
बड़ी कार, अलग कमरा, और नौकर चाकर होते हैं कुत्तों के
इम्पोर्टेड फूड आइटम्स मिलते हैं खाने में
कुत्तों के लिए खुल चुके हैं फाइव स्टार होटल
कुत्तों के लिए शुरू हो चुकी है विमान सेवा
देश भर में है पेट शॉप की भरमार
योगा की तर्ज पर कुत्तों के लिए है डोगा गुरू

इस हाई स्टैंडर्ड लाइफ में तो बस एक ही कमी खटकती है- कमी सिर्फ एक दुल्हन की. अब भला कुत्ते क्यों नहीं चाहें, उनकी भी जिंदगी शादी के बाद इंसानों की तरह बदल जाए. ये माना कि कुत्ते बोल नहीं सकते, लेकिन मालिक तो समझते हैं- बेचारे कब तक मुंह मारने के लिए अभिशप्त रहेंगे.

*हंसिए मत, पत्रकारिता के मानदंड (आदमी कुत्ते को काटता है, तो खबर होती है) के मुताबिक खबर है कुत्तों की शादी की फरमाइश. हां, मुझे कोस जरूर सकते हैं, कि न्यूज चैनल्स की तरह 'कुत्तों की आड़ में' मैं भी 'असली मुद्दों को दाब' रहा हूं. लेकिन सब कुछ खुलेगा अगली पोस्ट में...

बुधवार, अगस्त 12, 2009

स्वाइन फ्लू का पॉजिटिव पैकेज

टीवी खबरों की रौ में ज्यादा मत बहिए, 21 या 29 इंच के फ्रेम में इलाज के मारामारी देखकर घबराइए नहीं, हिम्मत रखिए, यहां तो शॉट्स ही वही सेलेक्ट किये जाते हैं, जिनमें मारामारी हो, अफरातफरी हो, बाइट भी डराने वाली हो, लेकिन आप ये देखकर डरिए नहीं, स्वाइन फ्लू के कुछ ऐसे सच हैं, जो दिल से डर निकालने के लिए जानना जरूरी है।
जी हां,
वाइरस से खतरनाक है खौफ
स्वाइन फ्लू से डरिए नहीं
वाइरस का मुकाबला कीजिए.
स्वाइन फ्लू से डरना मना है


जितना डरेंगे, आपके ऊपर उतना ही हावी होगा स्वाइन फ्लू का वायरस. ये माना कि छुआछूत से फैलने की वजह से पूरी दुनिया में इसे महामारी का दर्जा मिला हुआ है, लेकिन ये कोई डरने की वजह नहीं
सबसे पहले गौर कीजिए इसके लक्षण पर, आखिर स्वाइन फ्लू के लक्षणों में ऐसा कुछ नहीं, जो आम फ्लू से ज्यादा खतरनाक हो. आम वाइरल इन्फेक्शन में भी सर्दी जुकाम के साथ हल्का बुखार, नाक बहने और गले में खराश की शिकायत होती है, यही स्वाइन फ्लू में भी होता है, ज्यादा गंभीर होने पर उल्टी की शिकायत होती है,लेकिन इतने भर से जानलेवा कैसे हो सकती है बीमारी. हां, आपके अंदर का खौफ वायरस को ताकतवर जरूर बना सकता है

अगर ताकत के लिहाज से भी देंखें, तो पहले से मौजूद वायरस की तुलना में H1N1 वायरस बेहद कमजोर है अगर दूसरे वायरल इन्फेक्शन 4 से पांच दिन में ठीक होते हैं, स्वाइन फ्लू का इलाज ज्यादा से ज्यादा 7 दिन में पूरा हो जाता है. इससे ज्यादा खतरनाक तो मलेरिया और टायफायड जैसी बीमारियों के वायरस हैं, जिनकी चपेट में आने के बाद महीने दो महीने तक नहीं उतरता बुखार. अगर मलेरिया, टायफायड से लड़ सकते हैं तो स्वाइन फ्लू से क्यों नहीं।

साफ है, स्वाइन फ्लू की चपेट में आने के बाद आपको सिर्फ 7 दिन तक इसके वायरस से मुकाबला करना है. एक बार बुखार उतर जाए, तो पूरी तरह रिकवरी हो जाती है स्वाइन फ्लू में। न कोई दाग रहता है, न बीमारी का कोई और निशान. कुछ दिन तक कमजोरी जरूर रहती है, लेकिन खान पान सुधरने और कुछ दिन के आराम के बाद ये धीरे धीरे नॉर्मल हो जाती है. अव्वल तो ये, एक बार इलाज पूरा होने के बाद आपका शरीर H1N1 से लड़ने में पूरी तरह सक्षम हो जाता है

अगर अब भी स्वाइन फ्लू से आपका डर नहीं गया, आप अब भी ये समझते हैं कि स्वाइन फ्लू की चपेट में आने का मतलब मौत को गले लगाना है, तो जरा इन आंकड़ों पर गौर कीजिए पुरी दुनिया में स्वाइन फ्लू के 2 लाख मरीज बताए जाते हैं, इनमें अब तक 1900 की मौत हुई है. आप खुद कैलकुलेट कीजिए, स्वाइन फ्लू में मृत्युदर 1 फीसदी से भी कम है. जबकी टीबी में 3.5 फीसदी, और चेस्ट इन्फेक्शन की दूसरी बीमारियों में मृत्यु दर 11 फीसदी तक है.

क्या अब भी आपके पास स्वाइन फ्लू से डरने की वजह है? दुनिया भर में जो भी मौते हुई हैं, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक बुनियादी स्तर पर लापरवाही वजह की वजह से हुई है. एहतियात के साथ वक्त पर जांच, और जांच के मुताबिक पूरा इलाज, यही है स्वाइन फ्लू से बचने का उम्दा उपाय. आप तमाम खतरनाक बीमारियों का सामना पहले ही कर चुके हैं, फिर स्वाइन फ्लू से क्या डरना.

सोमवार, अगस्त 10, 2009

कुत्ते की आदमियत

कहानी में सिर्फ दो किरदार हैं- एक आदमी और एक कुत्ता. ये दास्तां है दो दरिंदों की (ग्रामर जाए भांड में, अनुप्रास देखिए) लेकिन कहानी का नैरेशन कैसे बने- कौन बने कुत्ता और कौन आदमी। कायदे से आदमी हूं, मुझे आदमी ही रहना चाहिए, दिखता तो आदमी ही हूं, जान बूझकर कुत्ता क्यों बनूं। कुत्ते तो वैसे भी राह चलते मिल जाएंगे। उसी को कहीं से उठा लेते हैं। कहानी से पहले इतनी सफाई इसलिए कि आदमी बनने के बाद अगर किरदार में 'कुत्तापन' नजर आए, तो प्लीज बुरा न मानिएगा. कहानी में सिचुएशन को समझिएगा- बिलकुल सच्ची-मुच्ची समझकर

अजीब सी उमस थी उस शाम...
वैसे तो पसीने से तर बतर शरीर को सूखाड़ की हवा से ढंडक मिलती है, लेकिन इस बार बारिश न होने का एहसास इतना कड़वा है, कि बाजार में 'भाव' सुनकर पसीने में चुनचुनी पैदा होने लगती है। जी हां, आपने ठीक समझा, मैं उस उमस भरी शाम को, बाजार गया था। दफ्तर में दिन में भर का थका हारा(चुसा हुआ कह लीजिए) रोजमर्रा की जरूरत का सामान लेने के बहाने 'चुनचुनी' को सहलाने गया था। सोचा कि बाहर की हवा में कुछ राहत मिले।

सेक्टर के मार्केट में रोज की तरह खूब चहल पहल। मार्केट में हर दुकान का फुटपाथ पर एक्सटेंशन है- मदर डेरी के साथ- ब्रेड अंडे, किराना दुकान के साथ पनीर वाला, कन्फेक्शनरी शॉप के साथ जलेबी, समोसे और ब्रेड पकौड़े वाला, मेडिकल शॉप वाला अपने आगे मोमो और रोल वाले को बिठाता है, उधर कोने में तंदूरी चिकन और कबाब वाला। आग और धुएं में पकते मांस के छोटे टुकड़ों की खुशबू गजब की सोंधी होती है। ऐसा, कि बंद नाक में भी घुस जाए। इसी खुशबू (वेज लोगों के लिए बदबू) की वजह से बेचारे की ठेली के इर्द गिर्द दर्जनों कुत्ते नाक बाए बैठे रहते हैं।

बच्चों की छोटी मोटी (मगर महंगी) चीजें खरीदने के बाद मुझे भी कबाब वाले कोने की तरफ से गुजरना था। उसी कोने में फलवाला बैठता है। लेकिन फल की ठेली से पहले ऐसा हवा का झोंका चला, कि धुंए के साथ मेरी नाक में वो सोंधी महक बुरी तरह चढ़ गई। गंध में यही तो खास बात होती है, उसका अहसास आपने जिन जिन क्षणों में किया है, उस गंध के साथ तमाम लम्हे ताजा हो उठते हैं। हम उन लम्हों के डिटेल में नहीं जाएंगे, वर्ना कहानी का रुख बदल जाएगा। गंध का असर इतना हुआ कि मेरे अंदर का जानवर राल टपकाने लगा था। एहसास इतना तीव्र की, जेब की परवाह नहीं की, फौरन एक जोड़ी लेग पीस का आर्डर दे दिया।ऑर्डर के साथ पेमेंट भी कर दिया कि कहीं बाद में इरादा न बदल जाए।

कुत्तों के साथ मैं भी मांस को पकते हुए देखने लगा। कभीपांच मिनट में पक गया मेरा ऑर्डर। लेकिन अब खाएं कहां? भरे बाजार में अकेले खाना? इसका तो मैंने खयाल ही नहीं किया. वैसे कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन मुझे तो आदत ही नहीं. एक पल में आइडिया आया चलो पार्क में बैठ जाएंगे, ताजी हवा में बैठ लेंगे, खा भी लेंगे. कबाब वाला प्लेट में प्याज और चटनी के साथ लेग पीस सजा चुका था. मैं उसे दूसरी प्लेट से ढंक कर पार्क की तरफ चल दिया.

नोचने खाने की तीव्र इच्छा के साथ तेज चलते हुए अभी आधे रास्ते ही पहुंचा था कि एक कुत्ता भोंक पड़ा। पिछली टांगों के बीच दुम दबाए और दंत निपोरे कुत्ता लगातार मेरी तरफ बढ़ रहा था। मैंने दुत्कारा, फिर भी ढीठ बना रहा. मैंने खुद को निहारा, यार भेष भूषा तो ठीक ही ठाक है, फिर मुझे देखकर क्यों भौंकने लगा. मैंने फिर दुत्कारा, वो हड़का, लेकिन पैंतरा बदल कर तकरीबन पास आ गया. तब मेरा ध्यान हाथ में चिकन पीस पर गया. तो अच्छा, जनाब की नाक में भी सोंधी खुशबू भर गई है. तब तक झपटने को तैयार हो गया कुत्ता. लेकिन ऐन वक्त पर मेरे अंदर का जानवर भी जाग गया. पलक झपकते ही पत्थर उठाया, और दे मारा, पहली रोड़ी लगी नहीं, लेकिन कुत्ता डर गया, फिर भी बाज नहीं आया. वो फिर झपटा, अब तक मेरे अंदर का जानवर भी हिंसक हो गया. दूसरी रोड़ी भाई के सिर पर लगी, तो पता चला, कि इस आदमी से मांस का टुकड़ा छिनना आसान नहीं.

हालांकि कुत्ते का उग्र रूप देखकर मेरे रोएं खड़े हो गए थे, लेकिन वो कुत्ता ही क्या जो तरस खा जाए, हार मान जाए। मैने मुकाबले का इरादा छोड़ दिया था। क्योंकि उसके समर्थन में कई कुत्ते जमा हो गए थे। कुत्तों के बीच अकेले आदमी के हाथ मांस का टुकड़ा...सरासर नाइंसाफी है. लेकिन मांस पर मेरे अंदर का जानवर भी कम लोभित नहीं था, वो क्यों फेंके औरों को अपना निवाला. लेकिन कुत्तों को इससे क्या, बाजार में आदमियों की भीड़ में उनकी हिम्मत तो होती नहीं अकेले क्यों छोड़ दें. मांस पर पहला हक तो उन्हीं का बनता है. उन्हें इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि टुकड़े आपने इतनी कड़क महंगाई में कितने कठोर दिल से खरीदा है. मेरे कदम पीछे पड़ने लगे. मैं बाजार की तरफ लौटने लगा. लेकिन कुत्तों ने पीछा नहीं छोड़ा. वो अब भी जीभ लपकाए मेरी तरफ बढ़ रहे थे.

मैं धीरे धीरे फिर से आदमियों के बीच आ गय़ा. और कुत्ते...ये देखकर संतोष हुआ कि कुत्तों का झुंड मेरा पीछा छोड़ चुका था. बाकी तो मुंह घुमाए वापस जा रहे थे, लेकिन पहला हमलावर आदमियों की भीड़ के बीच मुझे घुसते हुए देख जैसे हंस रहा था. देखने में तो वो दो पांव पर खड़ा और जीभ निकाले हंस रहा था, लेकिन मुझे लगा- वो हंस रहा था, जा बेटा जा, बख्श दिया तुझे. आदमी के बीच 'कुत्तों का कर्म करने' में शर्म आ रही थी तुझे, लेकिन हमारे बीच आकर भी तुम्हें हमारा धर्म नहीं समझ आया. जा आदमी के बच्चे, भीड़ में रहकर भी तू नहीं समझ पाएगा, हम कुत्ते कैसे मिल बांट कर खाते हैं. इतनी आदमियत तुममें नहीं.

सोमवार, जुलाई 13, 2009

'कपिल' के 'मतलबी चौके' का मीनिंग

कपिल नाम सुनकर असमंजस में मत पड़िए, इस चौके का का संदर्भ मीडिया से है, और जो बैट्समैन इनवॉटेड कॉमा में बंद है, वो अपने देश के एचआरडी मिनिस्टर है- मिस्टर कपिल सिब्बल। अब माना कि मंत्री जी अपने 'हरियाणा हरिकेन' की तरह चौका जड़ने में सिद्धहस्त हैं, सियासत में इतनी मौकापरस्ती तो है ही, कि मौका देखकर चौका उड़ा सकें। ढीली गेंद डालोगे भैया, तो नौसिखिया भी यही करेगा, वर्ना क्या ऐसे वैसों की क्या औकात।

आज धुली हुई चकाचक शर्ट के साथ साफ सुथरी इमेज लेकर चलते हैं, वो सिब्बल इसी मीडिया की देन हैं, चाहे एक कार्यकर्ता के रूप में वो पार्टी का काम हो, या मंत्री के रूप में सूझ बूझ दिखाते हैं, मीडिया न बताए, तो सिब्बल साहब 'एक बड़ी टोकरी का छोटा आइटम होते'. पिछले दिनों इसी मीडिया को आंख दिखा गए सिब्बल साहब, 'छापिए और दिखाईए, जो दिखाना है छापना है, हमे कोई फर्क नहीं पड़ता। ये बाते भीं उन्होंने वहां कही, जहां 'पत्रकारिता की फ्रंटलाइन मौजूद थी, बड़े बड़े नाम गिरामी चेहरे कोई जवाब नहीं दे पाए.

क्यों?कहीं न कहीं हमें अपने पेशे के ढीले पेच का पता है, एहसास है, कि हमने खुद को जोकर की तरह पेंट कर लिया है, और खबरों के सेलक्शन में व्यावहार भी जोकर की तरह करते हैं। हमने अपने आपको हास्यास्पद बना लिया है, सिब्बल के उसी बयान पर मैंने कहीं कुरबान अली को पढा था- आज मीडिया का हाल ये है कि जनता जूते उतार कर तैयार है, वो मीडिया वालों की गिरेबान पकड़ कर पूछने के लिए कमर कस चुकी है- ये शनि, मंगल का अंधविश्वास कब बढ़ाना बंद करोगे, 'आइटम गर्ल' जैसी भैंस का भाव बढ़ाना कब बंद करोगे, प्राइम टाइम में पेल देते हो, हमारी नस्ल खराब करनी है, भूत प्रेत और तीसरी दुनिया के चक्कर में तुम लालगढ़ और 'शराब की फैक्ट्री में काम करते सियासतदानों' को कब तक अनदेखा करते रहोगे.

कुरबान अली का इशारा साफ था, उन्हें रंज तो है कपिल के बयान का, लेकिन मीडिया की दशा से भी सुकून नहीं. अव्वल तो ये है कि साल दर साल हालत और गंभीर होती जा रही है. आपको मजाक लगेगा. मैं सबूत देता हूं. आज 13 जुलाई है. पिछले साल ठीक इसी दिन को एक पोस्ट लिखा था नाम था- पांच दिनों की प्यास, जिसमें ये बात जाहिर है कि कैसे एक लाइन को बढ़ाकर टीवी पर आधे घंटे का प्रोग्राम बनाया जाता है. किस तरह का बड़बोलापन, किस तरह का एग्जेजरेशन आ गया है मीडिया के नैरेशन में. सनसनी फैलानी की कोशिश इस तरह से हो रही है, कि सिब्बल तो सिब्बल, स्कूल कॉलेज के बच्चे, कॉलसेंटर और कारखानों में काम करने वाले 'मशीन मानव' भी भाषा का भाव हमसे बेहतर समझने लगे हैं, जरा देखिए कैसा शो-ओपेन बनाया है भाइयों ने...
पांच दिन
सिर्फ पांच दिन...
जी हां, सिर्फ पांच दिन बाकी हैं
सावन शुरू होने वाला है
उसने कसम खाई है
इस बार नहीं तोड़ेगा कसम
सावन में शराब पीने की कसम
वो कर रहा है रोज प्रैक्टिस
संयम रखने की प्रैक्टिस
हफ्ते भर से हाथ तक नहीं लगाया
न ग्लास को, न बोतल को
लेकिन,एक रात
जब वो अकेला था
मचल गया जब वो तन्हा था
पानी भर आया उसके मुंह में
उसने आव देखा न ताव
फ्रिज से निकाला पानी
फ्रीजर से बर्फ के कुछ टुकड़े
फिर उठाई ली उसने बोतल
और खोल दी ढक्कन
उड़ेल दी ग्लास में
और बुझा ली उसने
पांच दिनों की प्यास

हाल बिलकुल नहीं बदला, बल्कि इतना बिगड़ा कि सिब्बल जैसे लोग भी लतिया कर चल दे रहे हैं, बॉस लोगों कुछ सोचो...कुछ सोचो, ये काम आप ही लोगों का है।

शनिवार, जुलाई 11, 2009

लो जनाब, हम तो फिर 'न्यूयॉर्क' हो आए!

मैसेज तो पहली 'विजिट' में ही क्लीयर था, लेकिन इस बार 'रिपीट' करने गया था. पहले 'दौरे' के बाद बड़ी खामोशी से 'रेसपॉन्स' को ऑबजॉर्ब कर रहा था, देख रहा था कि जो चीज मुझे कनविंसिंग लगी, वो कितने औरों को लगती है, लेकिन मैं कह सकता हूं तादाद अच्छी है, तीसरे हफ्ते में हाउस फुल...

जो शहरी युवा 'फॉरेन माल' को इनज्वाय करने थियेटर में जाता था, जो मेट्रो फेमिली 'डीडीएलजे' और 'आरएनबीडीजे' की 'पैकेज्ड लव स्टोरी' को देख देख कर सुपर डुपर हिट बना देती थी, वो न्यूयार्क के मैसेज पर माथापच्ची करती दिख रही है। कबीर जी, अपने जमाने को अच्छा सिला दिया है, आपने अपने हुनर का।

अब तो घर में भी 'हॉन्ट' कर रहे हैं फिल्म के प्रोमोज. शीशा चकनाचूर होने जैसे साउंड इफेक्ट के साथ शुरू होता है सीक्वेंस, जॉन अब्राहम की चंद सेकेंट चीख हिलाकर रख देती है, कैटरीना की बात- ही डज नॉट नो इंगलिश, नील नीति की उदास खामोशी खास हो जाती है 30 सेकेन्ड के प्रोमो में. ठिठकने पर मजबूर कर देता है इरफान खान का डायलॉग- 'मुसलमानों के दामन पर जो भी दाग लगे हैं, उसे दूर करने के लिए खुद मुसलमानों को आगे आना होगा.'

कितना 'करेंट' है ये डायलॉग, जो उस डाइरेक्टर की कलम से निकला है जो खुद एक मुसलमान है, लेकिन फिल्म में साबित कितनी खूबी से साबित किया इस्लाम सिर्फ उसका मजहब है, ईमान है इंसानियत, और इंसानियत जब खतरे में घिर जाए, आत्महंता बनना पड़ना पता है। इस 'थॉट लाइन' के साथ अपनी बुराई को अपने अंदर ही खत्म करने की वकालत करते हैं कबीर खान। वो बुराई चाहे टेरोरिज्म की हो, या एफबीआई जैसी पुलिसिंग की.

जाने आपलोगों में से कितनों को पता होगा कि एफबीआई के जिस फेर में जॉन और नील नितिन मुकेश पड़े दिखाए जाते हैं, उसी तरह के फेर में खुद कबीर भी पड़े थे। फिल्म की तरह असल में भी सिर्फ मुसलमान होने के नाते. 9/11 के 15 दिन बाद न्यूयार्क से वाशिंग्टन जा रहे थे. विमान में अपने दोस्तों के साथ ये हिंदी में बात कर रहे थे, जिस पर किसी अंग्रेज मुसाफिर ने कंप्लेन कर दिया कि ये बंदे किसी 'सस्पेक्टेड लैंगवेज' में बात कर रह हैं. नाम पूछा तो टाइटिल भी खान निकला. पत्नी मिनी माथुर जरूर साथ थी, लेकिन जमाने का सवाल देखिए, 'माथुर' का पति 'खान' कैसे हो सकता है? फिर क्या था, एफबीआई ने डिटेन कर लिया. और 2 घंटे टेढे मेढ़े, चुभने वाले सवालों की बौछार, कड़ी पूछताछ और गहन जांच के बाद खुशनसीब थे कबीर की चंगुल से छुट गए. मौके की गंभीरता को उन्हें ये बात छुपानी पड़ी कि वो अफगानिस्तान जा चुके हैं. (एक बार डॉक्यूमेट्री के सिलसिले में, और दूसरी बार फिल्म काबुल एक्सप्रेस की शूटिंग के लिए) अगर ये बात बता देते तो शायद आप 'न्यूयार्क' नाम की फिल्म पर्दे पर नहीं देखते.

आप सोचिए, जिस शख्स का अनुभव इतना कड़वा रहा हो, उसने अगर इतने 'अबजेक्टिव ताने-बाने' में अपने जमाने की बात कहने की कोशिश करे, तो उसे दाद दो कदम आगे बढ़कर देनी चाहिए। जिस कंडीशन में कबीर फंसे थे, उसी कंडीशन में उन्होंने दो पात्रों को फंसाया है (क्योंकि किसी भी मसले के हमेशा दो पहलू होते हैं) जॉन जो प्रताड़ना से इतना बौखला जाता है कि मरने मारने पर उतारु हो जाता है, कैटरीना जो सब जानती है, लेकिन अपना मौन समर्थन देती है, और नील नितिन मुकेश जो प्रताड़ना से तंग आकर दोस्त की मुखबिरी करना मुनासिब समझता है, ताकि उसे गलत रास्ते से हटा पाए. ये दो विचार हैं, जो बेहद खूबसूरती से एक दूसरे भिड़ाए गए हैं. इस टकराव में जो मैसेज पैदा हुआ है, उसे कहीं न हीं दुनिया में 'मोस्ट पॉपुलर अमेरिकी' ओबामा भी मानने लगे हैं.

अच्छा मौका है, जब इस यूनिवर्सल मैसेज के साथ इस बार हम 'ऑस्कर्स' में दस्तक दें. बढ़िया विकल्प मिला है ऑस्कर का ख्वाब पूरा करने का. फिल्म में जहां इंडियन मिजाज के मुताबिक मेलोड्रामा है, तो तकनीकि लिहाज से भी फिल्म नीट एंड क्लीन, पेसी और परफेक्ट बनी है. कोई अंग्रेज ये नहीं कह सकता कोई सीन जबरन ठूंसा हुआ है, ऑस्कर की चाहत रखने वालों, आओ ईमानदारी से 'न्यूयार्क' के लिए मिशन ऑस्कर पर एक होते हैं.

गुरुवार, जुलाई 09, 2009

जाओ, जैक्सन जाओ!


जैक्सन, अच्छा किए,
तुम अलविदा कह गए
अब तुमसे दिल न बहलाती दहशत की मारी दुनिया
बे-दिमाग का जुनून कहती तुम्हारे ब्रेक डांस को
पागलपन कहती तुम्हारी अबाधित अदायगी को
नामुमकिन कहती तुम्हारी लय और ताल को
शहंशाही समझती अपने दम से दुनिया बसाने की हसरत को
बाहर बिठा देती तुम्हारे अंदर के जानवर को निकालकर

तुम अलविदा कह गए, बहुत अच्छा किए
एक ऐसे वक्त में...

जब हर जान, बेजान चीजों को दिखने लायक बनने की दरकार है
जब हर चेहरे पर आतंक, हर कदम पर खतरे का निशान है
इराक और अफगानिस्तान जैसे देश बरबादी के निशान हैं
मजहब और सरहदों के स्वार्थ में एक और जंग के आसार है
खतरा है परमाणु बम का, आसमान से ओजोन खत्म हो जाने का
गोरे-सफेद के बीच ओबामा जैसी शख्सियत का गुणगान है

एक ऐसे वक्त में जब
दुनिया में मंदी है, मंदी के मारे हैं
रामालिंगा जैसे भरोसे के हत्यारे हैं
कड़क जेब है, मगर दिल में ढेर सारे नरम अरमान हैं
गांव फिर भी गांव है, ग्लोबलाइजेशन में भी शहर से दरकिनार है
झोंपड़ी और अट्टालिका में फर्क का दीदार और भी साफ है
एक तरफ मोदी का गुजरात है, बगल में बुद्धदेव का नंदीग्राम है
मुंबई पर आतंकी हमला है, लालबाग में नक्सली मुठभेड़ है

ऐसे वक्त में जब
आधुनिकता की आन में तने हुए इंसानी रिश्ते हैं
मर्द से सटती मर्द की सांठ और औरत से बंधती औरत की गांठ है
तुम्हारे जैसी बुलंदी की कितनी दुखद दास्तान है
सब लौट पड़े हैं धर्म और अध्यात्म की तरफ
मगर देखो, बापुओं, और योगियों की कितनी बहार है...

अच्छा किए, तुम अलविदा कह गए
अच्छा है, अब हम तुम्हें याद किया करेंगे!

सोमवार, जुलाई 06, 2009

जब बेटा लाएगा 'दामाद' और बेटी लाएगी 'बहू' !

(-अल्लाह-ईश्वर के कहर से ऐसे तबाह हुए शहर 'सोडोम और गोमरा')

ये जुमला मेरा नहीं, 'दो नंबर' के खबरिया चैनल का है। जिसमें और कुछ हो या न हो चौंकाने वाला तत्व तो है ही. आप समझ ही गए होंगे ये जुमला जुड़ा है समलैंगिकता पर तेज हुई बहस से. नजर पड़ते ही मुझे भी समझते देर न लगी, कि क्या कहना चाहता है जुमला. डर तो नहीं कहूंगा, हां, अजीब जरूर लगा इस जुमले का मतलब समझकर-

जिस तरह से बहस चल रही है-मर्द से मर्द और औरत से औरत का कनेक्शन जोड़ने की, कल को मान लीजिए आपका-हमारा (किसी का भी) बेटा जिद कर बैठे- मैं तो मोहल्ले के टिंगू-मिंगू-चिंगू के साथ शादी करूंगा। शादी करने का मतलब साथ रहूंगा, बेटी कहने लगे- मैं तो रिंकी-पिंकी-चिंकी के साथ हाथ पीले करूंगी- तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी. आप बोलेंगे नहीं, बेटा, शादी के लिए ये 'च्वाइस' ठीक नहीं, तो वो तपाक से 100 सेलिब्रिटियों का नाम गिना देगा- फिल्म स्टार्स, फैशन डिजाइनर्स, पेंटर्स, म्यूजिशियन्स, मॉड्सल इतने गुड लुकिंग लोग इसमें पक्ष में, तो आप जैसे जिंदगी भर पत्रकारिता की 'सड़ी-गली नौकरी' करने वाले, 'जब जैसा, तब जिधर' टाइप से हिचखोले खाने वाले इंसान की कौन सुने. पापा ये 21 वीं सदी है, आपके पास नए जमाने न अनुभव है, संस्कार।
आ कहेंगे आप, औरों के लिए कह देना कि- ठीक है, अगर किसी को 'पतली गली' पसंद है, तो आपको क्या ऐतराज है, भई, ह्यूमन राइट्स का जमाना है, जिसे जो पसंद हो, उसे पाने का अधिकार है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो 'कर्म' वैज्ञानिक मानदंडों पर खरा नहीं उतरता, प्राकृतिक रूप से सृष्टि की रचना की खिलाफत करता हो. संबंधों के समीकरण में एक नया उलझन पैदा करता हो, जिंदगी भर सेक्स की कामना को अतृप्त रखता हो (ये विश्लेषण डॉक्टरों का है- कि पेनिस और वजाइना का निर्माण ढांचागत स्तर पर एक दूसरे के पूरक के रूप हुआ है, 'पॉटी का दरवाजा' तो इंटरकौस के लिए है ही नहीं- न ढांचे के लिहाज से, न साफ सफाई यानी हाइजीन के लिहाज से, बिलकुल गंदा रास्ता है)

ऐसे में 'इन राहों पर अपने कायदे कानून से गुजरना सेक्सुअल असंतुष्टि के सिवा कुछ और नहीं देगा, जो आपको निश्चित तौर पर मानसिक रूप से बीमार कर सकता है। और तो और, मनोवैज्ञानिक रूप से भी "उल्टी नाव पर सवारी करना" सोसायटी और खुद आपके लिए घातक हो सकता है. कोई विरोध करे या न करे, भले ही कोई कोर्ट आपको संबंध बनाने की मजूरी दे दे, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता. जो धारा के खिलाफ है, उसका हश्र आप किसी भी नदी के किनारे बैठकर देख सकते हैं.

और तो और, बाइबिल और कुरान जैसे ग्रन्थों में दो शहरों का जिक्र है- सोडोम (जिससे सोडोमी शब्द बना है) और गोमरा, इनका हश्र पढ़ लीजिए. मृत सागर के किनारे बसे ये दोनों शहर अपने उल्टे सेक्सुअल प्रिफरेंसेज और व्याभिचारी संस्कृति के चलते अल्लाह-ईश्वर की नजरों में चढ़ गए. शहर का मुआयना करने जब आए तो अल्लाह-ईश्वर को एक बंदा नहीं मिला दोनों शहरों में जो सेक्स विकृति से परे हो. आखिर अल्लाह-ईश्वर को इन दोनों शहरों को बरबाद करना पड़ा. खुदा के इस कहर का हवाला देते हुए एक शख्स ने मेरे मेल पर समलैंगिकता के पक्ष में उदगार भेजे हैं, जरा देखिए, जनाब कितनी कुंठाओं से भरे हैं-
We are ‘gays’ and ‘lesbians’, People think we are worst of all; Look at the politicians of the country, Before them you will find us quite small। To deprecate our perversion, You are quoting culture and creed; Against these blood-sucking leaders, What silences the people of your breed। We may be morally wrong, Sometimes our heart also says; You address dirty legislators with respect, While call us with the impious word ‘gays’। If our opponents believe in God, Our actions will invoke His wrath and rage; Like the city of ‘ Sodom ’, our end will come, And you will be free from this filthy political cage।

भाई जी का नाम नहीं लूंगा, अभी 'हवा' इतनी नहीं चली कि बेचारे सीना ठोक कर कहेंगे- हम 'प्लस+Plus और माइनस+Minus' कनेक्शन वाले हैं, इन्हें बंदे के साथ रहने की आजादी इसलिए चाहिए कि जब इस देश में गंदे नेता सम्मान के रह सकते हैं तो इनके जैसे मोहतरम और मोहतरमा लुक छिप के 'गंदा काम' क्यों करें (ध्यान से पढिए, अपने कर्म को गंदा इन्होंने खुद कहा है) इन्हें भी नेताओं की तरह 'गंदा काम' करने की खुली छूट, वो भी ससम्मान चाहिए। जनाब ये भी कहते हैं- कि अगर हम गंदे हैं, तो अल्लाह-ईश्वर का क्रोध जागने तक आप भले इंसानों शांत रहिए- सोडोम और गोमरा की तरह हमें वो नष्ट कर देंगे.

लेकिन भाई जान, ये दुनिया इस नियम से नहीं चलती कि फ्लाने का काम लूट से भी चल जाता है, तो मैं भी डाका डालूं, फ्लानी देह बेचकर काम चला सकती है, तो मैं भी बाजार में बैठक पसार दूं। आपको अंदाजा नहीं, अगर ऐसी छूट मिल जाए, तो कैसी दशा बन जाएगी दुनिया की. बिन बुलाए कयामत आ जाएगी.
तो आईए, जो गंदा है, उसे मिल कर गंदा कहते हैं, वर्ना अगली पोस्ट और भी निर्लज्ज होगी. एक अदना पत्रकार इससे ज्यादा और क्या धमकी दे सकता है, सुधर जाइए, और अपनी प्राथमिकता प्रकृति के अनुरूप कीजिए. दुनिया खूबसूरत है, तरीके से मजा लीजिए- 'माऊंट एवरेस्ट' पर बैठकर 'मैरियाना ट्रैंच' का ख्वाब देखिए, और 'मैरियाना ट्रंच' वालियों के दिल में 'माउंट ऐवरेस्ट' की चाहत पैदा होने दीजिए, आदत मत बिगाड़िए.

बुधवार, जुलाई 01, 2009

नुक्ताचीनी 'न्यूयार्क' के बहाने


शरीफों के लिए इशारा काफी होता है. इस मुहावरे के मुताबिक आप शरीफ हैं, तो बस दिल थामकर इशारे समझते जाइए, हम आपको एक शरीफ-ए-अजीम की दास्तां सुनाने जा रहे हैं, जैसा कि ऊपर इशारा साफ है- एक फिल्म के बहाने
कबीर...
यही नाम है उनका। पूरा नाम कबीर खान

शक्ल सूरत के बारे में बताने की जरूरत नहीं, आने टीवी पर उन्हें इंटरव्यू देते देखा होगा। लंबे छरहरे, गोरे-चिट्टे, तीखे नाक-नक्श और फूले हुए गाल, मुंह के दोनों सिरों तक करीनेदार पतली काली मूंछ, माशाअल्लाह, क्या गजब ढाती है पर्सनालिटी.

उनके कॉलेजिया दोस्तों के मुंह से एक बार उनका बखान सुना था- कॉलेज में हर 'दिलवाली' लड़की के दिल का अरमान हुआ करते थे कबीर खान.
इंशाअल्लाह, आज भी होंगे,
लेकिन कभी इस बात का गुमां उनके चेहरे पर झलकता तक नहीं. उसी तरह जैसे उनके अंदर आतंकवाद को लेकर इतनी गहरी हलचल थी, इसकी आहट तक नहीं मिलती उनके चेहरे से. पूछो तो बस यूं ही बता देते हैं, मगर देखो, तो अंदर से हिला देते हैं- खूबी ये कि यहां भी उनकी वही शराफत दिखती है
तब भी जब सैम की पूरी कहानी बयां करने के बाद आखिर में उसके किरदार को मौत के घाट उतार देते हैं, ये जानते हुए कि वो बेगुनाह है। सिर्फ इसलिए कि उसका रास्ता गलत है, उसे एफबीआई को गोलियों से भुनवा देते हैं। ये कहते हुए कि टेरोरिज्म को किसी भी रूप में जस्टीफाई नहीं किया जा सकता. इस क्रम में वो सैम की माशूका पर भी तरस नहीं खाते, सैम के साथ माया को भी शहीद कर डालते हैं.

लेकिन इशारा समझिए, दोनों को बेरहमी से मौत के घाट उतारने के बाद कितनी शराफत से दुनिया वालों (अमेरिका) से पूछते हैं-
सैम को मारकर भी क्या हासिल कर लिया. क्या उखाड़ लिया आतंकवाद का, 12,00 को डिटेन किया, 9 महीने तक इन्हें जानवरो से भी बदतर हालत में रखा, एक समीर को मारा, जाने कितने जरार शाह, जाने कितने लखवी, जाने कितने फजलुल्लाह पैदा हुए, और हर शहर में जाने कितने 'कसाब' पैदा कर रहे हैं. पूरी दुनिया में फैल गई है इनकी पौध. 1200 की तादाद इतनी बढ़ जाएगी, काश सैम को मारने से पहले एक बार भी सोचा होता.

जो तुम्हारे तुम्हारे टॉर्चर की वजह से अपनी नजरों में डूब कर मर गया- उसे मौका मिलेगा तो कुछ भी कर गुजरेगा, किसी को भी मौत के घाट उतार सकता है। ये समीर से सीखिए, वो तो फिर भी इतना दिल रखता है कि अपनी माशूका के लिए अपना मिशन मुल्तवी कर देता है. वो जानता है- अगले पल मुझे मरना है, तो जैसे बाहें हवा में लहरा कर पूरा आसमान समेट लेता है. चुप रहकर भी कह जाता है- देख लो दुनिया वालो, हम तो हंसते खेलते, अमन के ख्वाब बुनते बुनते ही मारे गए.

इतना कहने की हिम्मत बहुतों ने नहीं बटोरी, लेकिन कबीर ने न सिर्फ हिम्मत दिखाई, बल्कि इसके लिए बेमिसाल तानाबाना भी तैयार किया।

उमर नाम का लड़का जाता है अमेरिका पढ़ने, वो डिटेन कर लिया जाता है. उमर का कसूर इतना है कि वो सैम नाम के सस्पेक्ट का साथी रह चुका है. एफबीआई ने धोखे से उसकी गाड़ी में हथियार और विस्फोटक रखा, और न्यूयार्क में बड़ी ड्रामेबाजी के साथ उसे सरेआम पकड़ा. हमला ऐसे जैसे चींटी पर एके-47 लेकर दौड़े हों एफबीआई वाले. मकसद, उमर के जरिए सैम तक पहुंच सके एफबीआई. उमर जिस हालत में पकड़ा गया, उससे मुसलमान ही नहीं, किसी भी कौम के रोंगटे खड़े हो जाएं. उमर के भी हुए, वो एफबीआई से बार बार कहता रहा- मैं सैम का दोस्त था, मगर सात साल से संपर्क में नहीं. लेकिन इंटरोगेटर इरफान मानने को तैयार नहीं. वो पूरी कहानी सुनता है- अमेरिका में एंट्री से लेकर आखिर तक. सैम न चाहते हुए भी बताते जाता है.
पहले दिन कितना नर्वस था जब न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी में दाखिल हुआ था. किस तरह उसे माया नाम की हसीना मिली थी. समीर नाम का दिलेर मिला था. वो दौड़ में गोरे को पछाड़कर अमेरिका का झंडा बुलंद करता है. वो माया की आंखों में अपनी दुनिया बसाने का ख्वाब बुन रहा था. माया से उमर को भी प्यार हो गया- धोखे से. वो नहीं जानता था माया सैम पर मर-मिट चुकी है. जब ये पता चलता है तो उमर का दिल टूट जाता है. इसी के साथ हवाई हमले में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर ढह जाता है.
फिर क्या था, जैसे कयामत आ गई, एक पल में दुनिया बदल गई।


उमर सैम-माया की दुनिया से चला गया। इधर सैम न्यूयॉर्क से वाशिंग्टन जाते हुए डिटेन कर लिया जाता है. आरोप ये कि हमले से कुछ दिन पहले उसने ट्रेड सेंटर की तस्वीरें ली थी, वो तस्वीरें किसके लिए खींची थी उसने? इस बात का जवाब न सैम के पास था, न एफबीआई के पास उसके लिए कोई सहानुभूति. सैम पर 9 महीने तक टॉर्चर कैंप में जुल्म होता रहा. वो बेकसूर था इसी बल पर 9 महीने तक नहीं टूटा. आखिर वो रिहा कर दिया गया, लेकिन अपने देश की सुरक्षा एजेंसी के खिलाफ नफरत से भर उठता है सैम.

वो एफबीआई को सबक सिखाने के लिए गैंग और प्लान तैयार कर चुका होता है. इसी मोड़ पर उमर डिटेन किया जाता है। इंटरोगेटर इरफान उसे किसी तरह राजी कर लेता है सैम की दुनिया में दाखिल होने के लिए- उसका दोस्त बनकर उसके प्लान की जानकारी देने के लिए. उमर आता है और माया-सैम की जिंदगी में फिर से घुल मिल जाता है. वो आया था सैम को सही रास्ते पर लाने- अगर गलत रास्ते पर होगा तो, लेकिन सैम उसे अपने प्लान को अंदाजा तक नहीं होने देता. ये सारी सूचनाएं देने के बाद भी एफबीआई को यकीन नहीं होता. उमर को भी यकीन नहीं होता- जब पहली बार उसे सैम के प्लान के बारे में पता चलता है, लेकिन जब तक वो माया के साथ मिलकर एफबीआई से उसे न मारने की गारंटी लेता, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. सैम ने एफबीआई हेडक्वार्टर में बम लगा रखा है.
बेशक सैम का रास्ता गलत है, लेकिन एफबीआई ने जो किया वो भी कुछ सही नहीं था। ब्लास्ट का खतरा टल जाने के बाद भी उसे पकड़ा नही जाता, गोलियों से भून दिया जाता है।


कबीर सैम को उसके किये की सजा तो देते हैं, लेकिन एफबीआई के सामने बड़ी खामोशी से सवाल भी खड़ा करते हैं- मार कर क्या खाक किया?

इस ताने बाने का टेक्निकल साइड भी उतना ही टाइट है- रीयल लोकेशन, असली एंबियंस, झकझोर देने वला कैमरा वर्क, हर शॉट बोलता हुआ। हर सीन का दूसरे से इमोशनल अटैचमेंट लगता है। मसलन, जेल की प्रताड़ना और माशूका से मोहब्बत के बीच, वतनफरोशी और नफरत के बीच, दोस्ती और मुखबिरी के बीच गजब का 'टच' है। आप बंध जाते हैं. हर सीन में संवाद जैसे उबलते हैं, खामोशी भी है अगर तो वो सुलगती हुई दिखाई देती है.

बंधु, 100 रुपये में न्यूयार्क घूम आने का मौका है, 3 घंटे का टाइम निकालिए और सैर कर आईए न्यूयार्क का. जाइए देख आइए बॉलीवुड की पहली इंटरनेशनल हिंदी फिल्म. ऐसी कैटरीना कभी देखी न होगी, ऐसा नील कभी दिखा न होगा, जॉन तो खैर जॉन है ही.

रविवार, मई 24, 2009

अब ठाकरे खोदेंगे उत्तर भारतीयों की कब्र!

खुद बाल ठाकरे की कब्र (सियासी) खुद चुकी है, लेकिन जुबान से जहर नहीं उतरा। चुनावी नतीजों के बाद निजी तौर पर मैं ये मानकर चल रहा था कि ठाकरे घराने को होश आ चुका होगा, कि मराठी लोग इतने भोले नहीं, जितना उन्होंने समझ रखा है ( या बार बार उत्तर भारतीयों के खिलाफ बयान देकर बना रखा है)। आम मराठी लोगों को उन्हें शौक नहीं इतना निर्लज्ज होने का...बिना किसी जनाधार के पूरे महाराष्ट्र को पूरे देश से अलग करने का. लेकिन ठाकरे ने फिर साबित किया कि उन्हें छोड़कर बाकी सब नफरत की राजनीति के कच्चे खिलाड़ी हैं.

हमें इस बात से नहीं मतलब कि उन्होंने उत्तर भारतीयों के कांग्रेसी नेताओं को उन्होंने सांप कहा कि नाग (जैसा कि 'सामना' में कृपाशंकर सिंह को सांप और संजय निरुपम को नाग कहा है) मतलब इस बात से है कि लोकतंत्र में जनाधार के पैमाने पर औकात पता चलने के बाद भी बाज नहीं आ रहे बाल ठाकरे। ठाकरे की मराठी राजनीति को महाराष्ट्र की जनता का समर्थन नहीं करती, ये बात साफ हो चुका है फिर भी बाल ठाकरे का बयान सुनिए- ''उत्तर भारतीय नेता कह रहे हैं हमे मुंबई में आने से कोई नहीं रोक सकता, लेकिन उन्हें पता होना चाहिए मराठियों ने औरंगजेब की कब्र खोदी थी, ज्यादा बोलेंगे तो मराठी उनकी भी कब्र खोद देंगे।

इस बयान में कुछ नया नहीं है, ऐसे ही बयानों पर सिंकती रही है ठाकरे परिवार की रोटी, पलता है ठाकरे परिवार का पेट, हार के बाद मराठी लोगों को नए तर्क के साथ जगाने में जुट गए हैं बाल ठाकरे, जब जय महाराष्ट्र के नारे से काम नहीं चला तो इसमें दिल्ली, पंजाब और राजस्थान जैसे पश्चिमी राज्यों को भी जोड़ लिया."दिल्ली वाले हमेशा डरते रहे हैं कि मराठी एक दिन शासक बनेंगे। महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान को छोड़ कर किसी भी राज्य ने योद्धा पैदा नहीं किया। पूरे उत्तर भारत में या तो गुलाम पैदा हुए या फिर मुगलों और अग्रेजों के चमचे. मराठी लोग 500 साल से लड़ रहे हैं, लड़ना इनके खून में है, हमेशा से मराठियों की शान तलवार रही है, और जब तक ये तलवार मजबूत है तब तक मराठियों की तरफ कोई आंख उठा कर नहीं देख सकता"

देखिए कैसे ललकार रहे हैं ठाकरे। अब बताइए भला, कौन आंख उठाकर देख रहा है मराठियों की तरफ? कौन उन्हें दोयम दर्जे का बता रहा है, यही कह रहा है न जैसे देश के बाकी शहर, वैसे बाकी देश के लिए मुंबई। यही बात तो मराठी जनता भी कह रही है, अगर नहीं कहती तो ठाकरे की पार्टिय(यों) के आगे महाराष्ट्र में कोई नहीं टिकता. लेकिन ठाकरे की ढीठई देखिए-''शिवसेना के बाजुओं में अब भी इतनी ताकत है कि उन लोगों के हाथ काट दे, जो मुबंई को महाराष्ट्र से अलग करना चाहते हैं। "

चलिए, किसी और को नहीं, तो कम से कम मराठी लोग समझ गए हैं ठाकरे परिवार को मालदार मुंबई से इतना प्यार क्यों है.

शनिवार, मई 23, 2009

मनमोहनी 'शपथ' का पॉलिटिकल पैकेज

दूरदर्शन में भी बड़ा दम है, कई बार नहीं चाहते हुए भी ऐसा सच दिखा जाता है कि हैरानी होती है। अब तक आपने दूरदर्शन पर शपथ समारोह तो कई देखें होंगे, जिसका फल्सफा यही होता है- हार हो या जीत, सियासत का शिष्टाचार इतना हो कि अपनी दलगत-दूरियां समेटते हुए इसमें सब शामिल हो. दिल में शिकवे-शिकयतें चाहे जितनी हो, जुबां पर मुस्कराहट कम चौड़ी नहीं होनी चाहिए...

मनमोहन मंत्रिमंडल के शपथ-ग्रहण समारोह में आडवाणी इसी परंपरा निर्वाह के तहत आए थे थोड़ा लेट ही सही, हाथ जोड़े हंसते-मुस्कराते पहुंचे मंत्रिमंडल के सम्मान में...लेकिन उनके सम्मान में सियासी शिष्टाचार तक नहीं दिखा...ये देखकर वाकई हैरानी हुई

विपक्ष के सबसे बड़े नेता के लिए बैठने की जगह तक फिक्स नहीं थी, उम्र के लिहाज से भी कइयों से सीनियर हैं आडवाणी लेकिन किसी बैठने का इशारा करना भी मुनासिब नहीं समझा। आडवाणी चलते चलते अगली पंक्ति के करीब पहुंच चुके थे...रास्ते में दिग्विजय सिंह मिले, शीला दीक्षित मिलीं...सबने हाथ मिलाया लेकिन बैठने का इशारा नहीं किया। राहुल गांधी मिले तो उन्होंने गर्मजोशी जरूर दिखाई, मुस्कराहट के साथ उनका स्वागत किया लेकिन कुर्सी नहीं बताई...

सीट मिलने से पहले आडवाणी से चिदंबरम भी मिले, ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मिले...लेकिन ये भी राहुल के नक्शे कदम पर हाथ मिलाकर आगे बढ़ गए...ये पूरा नजारा बगल की कुर्सी पर बैठे श्रीप्रकाश जायसवाल देख रहे थे, लेकिन न खुद कुर्सी से उठे न अपने किसी जूनियर को उठने के लिए कहा
श्रीप्रकाश की अगली कतार में सीट खाली थी, लेकिन इशारा नहीं किया...आडवाणी को खड़े देखकर शरद पवार जरूर दौड़े आए...लेकिन इससे पहले कि उस खाली सीट पर आडवाणी को बिठाते- राम विलास पासवान लपक कर विराजमान हो गए...शरद पवार की पहल पर आडवाणी के लिए कुर्सी का इंतजाम तो हुआ...लेकिन सीट कहां मिली...भैरो सिंह शेखावत के बगल में, जो पार्टी में रहते हुए आडवाणी की पीएम पद की दावेदारी को चुनौती दे चुके थे, इसकी खुन्नस साफ दिखी। आडवाणी ने मुंह तक फेर कर नहीं देखा शेखावत की तरफ

बैठने की सीट तो अगली कतार में मिल गई, लेकिन आडवाणी से कोई मिलने तक नहीं आया...न सोनिया न मनमोहन...अगली कतार में अनदेखे से बैठे रहे विपक्ष के सबसे बड़े नेता...जैसे सोच में डूबे आडवाणी को याद आ रहा था वो जमाना, जब विपक्ष के नेता की अगुवानी सत्ता पक्ष के बड़े नेता किया करते थे, ज्यादा दूर नहीं, 2004 के शपथ समारोह में ही जब मनमोहन सिंह पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे- अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवानी में खुद आए थे...लेकिन इस बार वो शिष्टाचार कहीं नहीं था।

इस मामले में आडवाणी की कंजूसी भी साफ दिख रही थी, शपथ तो वही मनमोहन ले रहे थे, लेकिन 'जाने किस वजह से' इतने दुखी थे पीएम इन वेटिंग कि ताली पर भी हाथ नहीं हिले। यही हाल लालू मुलायम पासवान अमर के चौथे मोर्चे का दिखा. सीट तो हंसते हंसते ली थी, लेकिन ताली के नाम पर सिर झुकाने के सिवा और कुछ नहीं किया. समर्थन दिया बिना शर्त, लेकिन समारोह में गए तो किसी ने पूछा तक नहीं. खासकर रामविलास की हालत तो और भी मुश्किल दिखी, लालू के साथ यूपीए से अलग क्या हुए जीत के रिकार्डधारी दामन पर हार का दाग लगवा बैठे...पार्टी का सुपड़ा साफ हुआ सो अलग...अब दाग छिपाएं भी तो कैसे?

पासवान की तरह लालू जी भी यहीं सोचते दिखे कि - मुझसे तो मीरा कुमार ही भली हैं, पूरे साल कोई नहीं जानता-सुनता इनके बारे में लेकिन कांग्रेस मंत्रिमंडल में बर्थ हर बार पक्की होती है...मेरा तो मिनिस्टर स्टेटस गया ही, दुलारी रेल का खेल भी बिगड़ गया

अमर-मुलायम ने भी बड़ा दम लगाकर बनाया था यूपीए को अपना सियासी हमदम, लेकिन महफिल में आकर पता चला अब न कोई हमदम रहा न को दोस्त...एक पल तो ऐसा आया कि अजनबी सी महफिल में बड़े भैया मुलायम भी बिछड़ गए...तब देखते बन रही थी छोटे भैया की अमर बेचैनी- लेकिन हालत ऐसी कि बताना भी मुश्किल और छिपाना भी मुश्किल...बेचारे अकेले गए थे अकेले ही लौटे, अमर और मुलायम जब समारोह के बाद लौट रहे थे, तब बेहद दार्शनिक हो गया था दृश्य का अंदाज...दोनों को सियासत की सीढ़ियां नीचे उतार रही थीं...न कोई काफिला, न कोई हुजूम॥बस अकेले अकेले

ये सियासी शिष्टाचार पर मंथन है या किसी और बात का अफसोस- इसे हर कोई अपने-अपने नजरिए से देख रहा है. आप भी टिप्पणी करें, लेकिन हमारी तरफ से इतना तो साफ दिखता है सियासी शिष्टाचार के मामले में नेताओं की अभिनय क्षमता कम हुई है

गुरुवार, मई 21, 2009

बस एक घूंट












नीले थे तमाम कतरे खून के
कतई नीला था रगों में दौड़ता हुआ लहू


जैसे मारे खौफ के
स्याह साबित हो रहा हो खून का वजूद


जैसे तैयार हो गया हो तरल
किसी की छत पर गिरे आसमान का


जैसे हर नब्ज के साथ
सौ उम्मीदों को एक उदासी ने डंसा हो

जैसे तुम्हारी यादों की बनी स्याही
पीली पड़ी हथेलियों पर उतरी हो

जैसे अमावस की रात का अंधेरा
नीली जोश के सात रात पर मर मिट गया हो

वाकई,
चटख नीला था रगों में आवारा फिरता खून
तब तक,
जब तक तुम मुझे नहीं मिले थे

अब तक,
हमारी सफेद आंखों का नीला पानी
एक दूसरे की आंखों में मिल चुका है
रोष के मारे
लाल हो चुकी हैं हमारी आंखें
कि भला-
कोई ऐसा भी बे-वफा होता है
जैसी ये जिंदगी है?

अब जबकि
दोनों की आंखों में
बह रहा है ये सुर्ख लाल पानी
रगों में उतरने लगा है
आंसू जैसी उमाड़ वाला बेकाबू पानी

आओ,
पी लेते हैं सिर्फ एक घूंट
अपना नीलापन बहा चुके इस लाल पानी की

सोमवार, मई 18, 2009

सौ 'सोनार' की, एक 'लोहार' की

लोकतंत्र में ये बताने की जरूरत नहीं है सोनार कौन है लोहार कौन है- 15वीं लोक सभा के नतीजे सामने हैं तब तो और भी नहीं...
गजब का है मुहावरा- 100 सोनार की एक लोहार की- जो सामाजिक ढांचे के विपरीत लोहार को सोनार से ज्यादा असरदार साबित करता है, ये भी बताता है सोनार (चमकती दमकती देह और वजन से हल्का लेकिन से गद्दी से मालदार) की आदत होती है चोट करते रहने की, अपनी मर्जी (हित) के मुताबिक चीजों को आकार देने की। लेकिन लोहार (काला कलूटा, धीर गंभीर मगर स्थूल और लाचार) की स्थूल देह जब हरकत में आती है, चोट करने की उसकी बारी आती है चीजों को जड़ से हिलाकर रख देता है।

अब इस कहावत को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में फिट कर देखते हैं- सोनार मतलब नेता और लोहार मतलब जनता समझे तो तस्वीर कुछ तरह बनती है...

नतीजे बता रहे हैं देश के जिन 'सोनारों' ने पांच साल तक अपने फायदे के लिए राजनीति को आकार देना चाहा उन्हें 'लोहारों' ने तहस नहस कर दिया। 'मुसलमानों के हाथ काटने वाले' बयान को 'हवा देने वाले' या फिर 'खुल कर निंदा न करने वालों' को बता दिया की लोहार की चोट क्या होती है. दामन में दंगे का दाग छुपाकर चुनावी रैलियों में 'विकास बड़ी बड़ी बातें' कहने वालों को दिखा दिया कि बार बार चोट करने की अपनी आदत से बाज आओ.

लोहार इतने भी स्थूल नहीं होते जो झांसे में आ जाए। वो अपनी जगह पर स्थूल होते हुए भी समझते हैं- काले धन की वापसी की बात अब क्यों हो रही है, अपनी सरकार के दौरान तो आप भी औरों की तरह कुंडली मारकर बैठेगे- और लाओगे तो भी क्या करोगे- उसमें लोहारों का क्या फायदा- लूटेंगे तो सोनार ही. 'सबको साथ लेकर चलने' का सच इतना नंगा है कि डर गए लोहार. पता नहीं कब कौन सा फायरब्रांड बनने की कोशिश करेगा और कटुआ कह कर काटने लगेगा. और सारे दलील भी यही देंगे 15 वीं शताब्दी में हमारे साथ जो हुआ उसी का तो बदला ले रहे हैं. ये हमारा राष्ट्रधर्म है और इस धर्म का प्रचार पूरे देश में रथ यात्राएं कर होने लगेगा.

पता नहीं, इतना सीनियर होते हुए भी आडवाणी जी ये क्यों नहीं समझ पाए। पता नहीं, समझे भी हों तो साथियों ने अमल नहीं किया हो, और वो ताउम्र के लिए पीएम इन वेटिंग रह गए. लेकिन जिन्होंने समझी ये बात- उनका भला ही हुआ- उड़ीसा का उदाहरण पहले से ही था, इस बार बंगाल में ममता और बिहार में नीतिश कुमार ने साबित कर दिया कि 'सबको साथ लेकर चलने' का नारा देने से पहले जमीन किस तरह से तैयार करनी पड़ती है.

नेताओं को लोकतंत्र का सोनार कह देने से ऐसा नहीं है कि उनकी जाति सिर्फ एक होती है, इनकी एक उपजाति लालू-पासवान जैसी होती है। ये गजब के सोनार हैं- अपनी चोट पर इन्हें औरों से ज्यादा खुद घमंड होता है. चोट करते हैं तो माइक लगाकर ढिंढोरा पीटते हैं- देखो- मैंने क्या शॉट मारा. यूपीए की मलाई को चुपके चुपके खाई, लेकिन अलग हुए तो खूब ढिंढोरा पीटा. लेकिन लोहार समझ गए- चारा खाने वाले पांच साल तक मलाई खाकर अब कोई और 'आइटम' खाने की जुगाड़ में है, वर्ना जिस मुलायम से वर्षों तक कठोर तनातनी रही, वो अचानक दोस्त बन गए. लोहारों ने पंचतंत्र की गदहे और सियार की दोस्ती वाली कहानी पढ़ी है, सो समझ गए अमर के जुगाड़ पर अचानक हुई दोस्ती का मतलब. पासवान के पास तो खैर बोलने के लिए मुंह ही नहीं रहा, लालू और अमर की जुबान खुली भी तो लग गया 'मलाई' से पेट भरा नहीं है अभी, बिन बुलाए समर्थन की थाली लेकर फिर से हाजिर है.

लाल सोना पीटने वालों की तो पूछिए मत, 60 साल पहले ही हो चुके हैं- अपना एजेंडा नहीं समझा पाए- ये वर्ग हित की बात करते हैं, कि राष्ट्रहित की या फिर '...हित' की, लोहारों को इनकी न 'साथ आने की बात' समझ आई न 'दूर जाने की'। न्यूक्लियर डील को देशहित के खिलाफ कहकर हट तो गए शक्ल सूरत से समझदार दिखने वाले करात साहब, लेकिन जनआंदोलन नहीं बना पाए मुद्दे को- अगर ये राष्ट्रहित से जुड़ा इतना ही बड़ा मुद्दा था तो. बल्कि उल्टे लाल गुट ने कांग्रेस के साथ दोबारा आने पर भी कन्फ्यूजन बनाए रखा- न चुनाव के दौरान न चुनाव बाद. लोहार समझ गए- ये 'लाल लोग' सत्ता की सफेद मलाई फिर से खाने की तैयारी में हैं.

अब मिलिए सियासत के मोटे सोनारों से- बाहुबलियों से। हर पार्टी ने इनकी हकीकत जानते हुए भी जनता के सामने उतारा था अपनी 'साख' बढ़ाने के लिए, वो भी देश के कानून का हवाला देते हुए- मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी,अरुण कुमार शुक्ला 'अन्ना', अतीक अहमद, अक्षय प्रताप सिंह, मुन्ना शुक्ला, डी पी यादव। पप्पू यादव, आनंद मोहन और शहाबुद्दीन को तो कोर्ट ने पहले ही किनारा कर दिया था लेकिन इन्होंने अपनी बीवियों रंजीता रंजन, लवली आनंद और हेना साहिब को मैदान में उतारा था. इनकी पार्टियों को जिक्र इसलिए जरूरी नहीं, क्योंकि जिसने भी इन्हें उतारा बाहुबलियों पर इनकी नजर कहीं न कही एक है- एक घाट पर पानी पीने वाले. लेकिन लोहारों ने बता दिया- अगर घाट गंदा हो, तो आपको तय करना पड़ेगा, प्यासे मर जाएं, यहां पानी नहीं पीना है, वर्ना चोट ऐसी पड़ेगी कि बाहु का बल और बंदूक की नाल धरी की धरी रह जाएगी.

हारने वाली पार्टियों के समर्थकों, अगर आपने यहां तक पढ़ने की जहमत उठाई है तो मेरी बात का बुरा न मानना, अब तक मैने जो कहने की कोशिश की है, उसका अंडरकरंट लब्बोलुआब ये है कि लोकतंत्र में लोहार से सीधे जुड़े मुद्दे के बिना बात नहीं बनती. समझ लीजिए इस मामले में पूरे देश के लोहार एक होते हैं, वर्ना महाराष्ट्र के लोहारों को लुभाने के लिए राज ठाकरे और शिवसेना ने कुछ कम किया था- नतीजा क्या हुआ, याद नहीं तो इलेक्शन कमीशन की साइट पर जाकर देख लीजिए।
अब समझ लीजिए- लौहपुरुष कहलाने और कमजोर प्रधानमंत्री करार दिए जाने में क्या फर्क है. राहुल और वरुण गांधी में क्या फर्क है. ये भी जान लीजिए, लोहारों को वंशवाद और विदेशी मूल की बातें 21 वीं सदी में नहीं सुहाती. घटिया मुद्दों के बहाने लोहारों के पेट की अनदेखी होगी, तो वो लात मारेगा ही. दिल की बात कीजिए, लोहार आपके भी होंगे।

रविवार, मई 10, 2009

मां नहीं हूं फिर भी...

मां नहीं हूं फिर भी, एक बेटी का पिता हूं इसलिए भी, समझ सकता हूं कि मां का मतलब औलाद के लिए क्या होता है। किसी की जिंदगी में मां के होने का मतलब क्या होता है. तपते बदन पर मां के हाथ फेरने का असर क्या होता है. मां औरत होती है, लेकिन मैं मर्द होते हुए भी इस औरत को समझना चाहता हूं, उसके दिए हुए शरीर में उसकी भावनाएं उड़ेलना चाहता हूं.

मेरे अंदर इस भावना के बीज पापा ने बोए थे। पापा कहा करते थे हर मर्द में कुछ हिस्सा औरत का होता है, क्योंकि औरत किसी देह का नाम नहीं, बल्कि कुछ गुणों का नाम है, पांच गुण गिनाते थे पापा जो स्त्री की संरचना में होती है- प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति, और समर्पण। इन्हीं भावनाओं की प्रबलता से बनती है औरत, जितनी मजबूत होती है ये भावनाएं उतनी ही मजबूत और बेमिसाल होती है औरत.

पापा अक्सर सीता का उदाहरण दिया करते थे- धर्म के लिहाज से नहीं, व्यावहार के लिहाज से, कि अपनी जगह पर सीता कितनी कट्टर औरत थी। मर्द के इशारे पर हर तरह का इम्तहान दिया, लेकिन हर इम्तहान को अपना कर्तब्य समझा। राजा की बेटी झाड़-फूस में रही लेकिन मर्द से शिकायत के नाम पर अपनी ममता को कमजोर नहीं पड़ने दिया. ये सीता के अंदर मौजूद इन पांच भावनाओं की प्रबलता का नतीजा था.

सीता तो औरत थीं, लेकिन इस औरत को समझने के लिए पापा राम का उदाहरण भी देते थे। कहते थे- कि जो पांच भावनाएं औरत को पूजनीय बनाती हैं, उनका अनुपात अगर मर्द में औसत से ज्यादा हो जाए तो वो पुरुषोत्तम बन जाता है। वो प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति और समर्पण की साक्षात मूर्ति बन जाता है.

मदर्स डे पर मुझे एक ऐसी ही कहानी से रूबरू हुआ- मिस इंडिया वर्ल्ड-2009 पूजा चोपड़ा की कहानी सुनकर मुझे उसकी मां पर गर्व हुआ। इंटरव्यू में जैसा पूजा चोपड़ा ने बताया- उसकी पैदाइश के साथ मां ने लगातार दूसरी बेटी को जन्म दिया। जबकि उसके पिता और घरवाले बेटा चाहते थे. उनकी ये ख्वाहिश इतनी मुखर थी कि पूजा की पैदाइश पर मातम पसर गया. उसकी मां को कोसा जाने लगा. विवाद इतना बढ़ा कि पूजा की मां को पति का घर छोड़ना पड़ा. कोई आसरा नहीं, जीने का कोई सहारा नहीं, लेकिन पूजा और उसकी बड़ी बहन शुभ्रा को लेकर उनकी मां निकल गई घर से. कुछ दिन बच्चों को ननिहाल छोड़ा और खुद नौकरी में जुट गई. अपने बुते पर न सिर्फ बेटियों को पाला-पोसा, पढ़ाया लिखाया, बल्कि उनके अंदर इतनी पॉजिटिव सोच भरी कि वो मिस इंडिया जैसे मॉडर्न कॉन्टेस्ट में हिस्सा ले सके...आज वो इस बात पर खुशनसीबी जाहिर कर रही है कि वो अपनी बेटी के नाम से जानी जा रही है...

ये शायद मेरे अंदर रचा बसा पापा का वो पाठ था कि पूजा की कहानी से मैं सिहर गया। मां के संधर्ष के आगे मेरा सिर श्रद्धा से झुक गया। शायद इसलिए भी इतने गहरे उतरी वो भावना कि मैं भी एक बेटी का पिता हूं- मुझे याद है जब वो पैदा हुई थी तो किस तरह मेरा लड़कपन एक झटके में मुरझा गया था. जब पहली बार गोद में आई थी तो किस तरह मेरे कंधे चौड़े हुए थे- एक लंबी सांस ने किस तरह सीने में कितने सपने भर दिए थे. गांव में बेटियों का हश्र मैने देखा था. आप चाहे बेटी से जितना प्यार करते हो- उस ढर्रे को ज्यादा नहीं बदल सकते. बेटी बड़ी होने के साथ मेरे अंदर ये एहसास भी बड़ा होता गया कि इस ढर्रे पर बिटिया को नहीं जाने दूंगा. कुछ करूंगा.

मैं आज समझ सकता हूं- कुछ करने की ये भावना पापा के उन्हीं पाठ की वजह से इतनी बलवती हुई, जो उन्होंने राम और सीता का उदाहरण देकर समझाया था. उन्हीं भावनाओं के साथ आज अपनी जमीन छोड़कर, शहर में बंजारा बनकर बेटी के सपने को आकार दे रहा हूं. कुछ कर जाए तो मेरे अंदर की औरत को सुकून मिले.

शुक्रवार, मई 08, 2009

चु.आ. जी, क्या अपना जरनैल पप्पू है?

लो जी, चु.आ. जी आप पप्पू पप्पू चिल्लाते रहे, उसने ठोक कर कह दिया- जा नहीं डालते वोट. किसी पर ठप्पा नहीं लगाऊंगा, सारे के सारे एक जैसे हैं, नागनाथ और सांपनाथ में कोई फर्क नहीं होता. शिकार के लिए जाल डालते हैं तो दोनों एक जैसे फन को छुपा लेते हैं, जब खाने की बारी आती है तो सीधे निगल लेते हैं. जा, नहीं करता समर्थन- न उल्टे का, न सीधे का, तुम्हारे कहने से क्या पप्पू हो जाऊंगा?

सच कहूं चु.जी. तो आपके पप्पू की परिभाषा भी कुछ क्लीयर नहीं है, वर्ना हम ये भी बताते चलते कि आप जरनैल को पप्पू क्यों नहीं कहेंगे? आपने तो पप्पू का प्रोमोशन कर कर ये इस्टैबलिश कर दिया कि पप्पू वो है जो वोट नहीं डालता, इमेज कुछ ऐसे बनाई कि वो कोई गोल-मटोल, थोड़ा अक्ल से मंद, राजा बेटा टाइप का पार्टी-पसंद इंसान है, लेकिन वो पप्पू ही क्यों, वो चिंटू, मिंटू, संटू, मंटू कोई भी हो सकता है? आखिर पप्पू का कैरेक्टर क्या है? सिर्फ वोट नहीं डालने की आदत से भला किसी का कैरेक्टर तैयार होता है?

चु.आ. जी, आप भी गजब करते हैं- अपना जरनैल किस लिहाज से पप्पू टाइप का दिखता है? जरनैल के गुस्से की झलक तो आप पहले ही देख चुके हो, जिसके जूते ने 15वीं लोकसभा के चुनाव को ऐतिहासिक बना दिया, जिसने विरोध जताने के हथियार का अविष्कार कर दिया, हिंसक अविष्कार के बावजूद जिसने अपने आचरण से बता दिया कि उसका मकसद किसी व्यक्ति का अपमान करना नहीं था, वो न दलगत राजनीति से प्रेरित था, उसका गुस्सा भी क्षणिक नहीं था, बल्कि वो सिस्टम से खफा था। उसके वोट नहीं डालने से यही जाहिर होता है, फिर भी क्या आप उसे पप्पू कहेंगे?

क्यों भैया क्यों? वोट न देकर अपना विरोध जताने वाले के लिए पप्पू जैसी द्विअर्थी संज्ञा का इस्तेमाल क्यों? किसी भी हिंदीभाषी क्षेत्र में चले जाइए- पूछने पर पप्पू का पता मर्दों के पजामे के अंदर ही मिलेगा, फिर या किसी बाहुबली या नेता टाइप के अड्डे पर सेवा के लिए रखे गए लौंडों के रूप में. पप्पू नाम के साथ मर्द मसखरी करते हैं- उसके अजीबोगरीब कैरेक्टर पर, जो 'रस की उल्टी-धारा' में बहता है, उसे ही पप्पू कहते हैं.

ऐसे पप्पू दो चार या दस तो हो सकते हैं, बिहार में 64 परसेंट, यूपी में 60 परसेंट, जम्मू-कश्मीर में 76 परसेंट और दिल्ली में पूरे के पूरे 50 परसेंट पप्पू कैसे हो सकते हैं?
चु.आ. जी, कहीं जानबूझकर आप गाली तो नहीं दे रहे वोट नहीं देने वालो को?


सोच लीजिए, मामला मानहानी का बनता है, आपको क्या लगता है- नाकामी आपकी और पप्पू कहलाना कबूल करें हम? जब आप ही के कानून पर खरा उतर रहा है आपका सिस्टम तो वोटरों से कैसी उम्मीद, जिनका काम है बस एक ठप्पा लगाना?

आपकी कृपा से खूब दागी खड़े हैं मैदान में, हलफनामें में एक से बढ़कर एक झूठ बोला, जो कभी पैदल नहीं चलते वो भी कहते हैं मैं बे-कार हूं. करोड़ों के फ्लैट और प्लॉट को हजारों लाखों का बताया. चुनाव में उतरे तो लिमिट के बावजूद भोंपू भी खूब बजे, पोस्टर, पर्चे और नोट के खर्चे भी खूब दिखे, नामांकन से लेकर प्रचार तक नेताओं के काफिले लंबे चौड़े ही होते दिखे, गाली गलौज भी खूब हो रहा है. किसी का कुछ हुआ?

क्यों नहीं हुआ कुछ चु.आ जी? संवैधानिक अधिकार में आप हमसे बड़े हैं, वर्ना एक झटके में आप ही को पप्पू कह डालते. इज्जत करते हैं इसलिए नहीं कह रहे. बताईए भला ठप्पा लगाने का विकल्प भी ठीक से दिया है? कई सीटों पर आगे खाई और पीछे कुआं जैसा समीकरण बना हुआ है- आपकी अंखमुंदी अदा के चलते. अगर पप्पू की परिभाषा आपने इस आधार पर गढ़ी है कि लोकतंत्र में जो गैर-जिम्मेवार है वो पप्पू है, तो खुद आंख खोलकर देखो- पप्पू कौन है. अपना जरनैल तो शर्तिया नही है।

गुरुवार, मई 07, 2009

मोहब्बत का मीट- दो पीस

मीट और मोहब्बत का...ये वेजिटेरियन लोगों को अजीब सा जुमला लगेगा, लेकिन गजब का ये मोहब्बत का नॉनवेज एहसास। मीट की दुकान में तो कई बार गया हूं, लेकिन इस बार कसाई का जुमला जेहन में बैठ गया.

देखने में कितना हिंसक दृश्य होता है मीट शॉप का। हर तरफ मांस ही मांस, हर तरफ लटकती मुर्गों और बकरों की छिली हुई देह, चाकू, दाब और कसाई का हाथ सबकुछ खून और मांस के छीटों से सना हुआ...लेकिन कसाई की भंगिमा ऐसी कि दुनिया के बड़े से दार्शनिक को भी चकित कर दे।

कसाई का चेहरा कतई साथ नहीं देता इस दृश्य का। बिलकुल भावशून्य-सपाट चेहरा, पूरी पर्सनालिटी में जिंदगी और मौत का जरा सा भी अंतर्विरोध नही दिखता. सख्ती से सिले हुए होठ- ठीए पर कसाई के हर प्रहार में गजब का आत्मविश्वास दिखता है- ठीए पर ठक... ठक॥ ठक... इतनी सधी हुई कि इसकी बुलंदी में गुम हो जाती है सबकी आवाज. खुद कसाई भी इस आवाज में इस कदर गुम होता है कि वो बस तोल कर फेंके गए मीट को निवालों में बांटता चला जाता है, इतना सिद्धहस्त कि टुकड़े करने के लिए प्रहार अलग और गंदगी निकालने के लिए प्रहार अलग...

मीट की दुकान में अजीब सी शांति होती है- मछली की दुकान से अलग। ग्राहक चुप, कैश काउंटर पर मैनेजर चुप, फ्रीजर से ठंडा मीट निकाल कर ठीए पर रखने वाला स्पॉटब्वाय चुप- कसाई के दर्शन में सब गुम होते हैं- सामने हाथ बांधे खड़े हुए, मांस को टुकड़ों में कटते देखते हुए, अपनी बारी का इंतजार करते हुए। बेहद संयमित और एक तरह से हतप्रभ. मीट की दुकान में इतनी तहजीब!

'हां जी सर, आपका कितना...'
'2 किलो मटन भैया...
''2 किलो? घर में मेहमान आ रहे हैं क्या सरजी, आप तो...
'हां हां, भैया, जरा ढंग का मीट देना...
''ये लो जी...कट...कट...कट...कट...कट...'
मिनट भर में 2 किलो मीट कट कर तैयार...एक बराबर साफ-सुंदर टुकड़े। तराजू पर फेंका- वजन ठीक
दो किलो। वाह क्या एक्यूरेसी है...!

पैक करते हुए कसाई ने थैले में दो पीस मीट अलग से डाल दिए, मैने पूछा ये कैसा मीट डाल दिया भैया....
'सर जी, ये दो पीस मीट मोहब्बत के हैं- खाईए और खुश रहिए...'

बुधवार, अप्रैल 29, 2009

नीले, पीले दो सवालों के जवाब में


अगर आपके लक्ष्य को दिलरुबा कहूं, जैसे कि गालिब ने कहा है- अपने हर अरमान को अपने महबूब के रूप में बयां किया है, जिंदगी की नाकामियों को लख्त-ए-जिगर की रुसवाई के रूप में इजहार किया है- हर सांस में अपने यार का एहसास किया है, मसलन-
यह न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतजार होता।

गालिब ने यहां शख्स का अक्स परोसा है, वो यहां मर रहा है, दुनिया को अलविदा कह रहा है, लेकिन अफसोस नहीं- कह रहा है- मेरी तो किस्मत में ही नहीं लिखी थी यार से मुलाकात, पूरी उम्र उसका इंतजार करता रहा, वो नहीं आई मिलने, अब जीने में कोई फायदा नहीं, जब तक जीते तब तक इंतजार का दर्द उठाते रहते।

आप इस शख्स की मायूसी को समझ सकती हैं- जिंदगी में मंजिल के होने का एक मतलब ये होता है। मिल गई तो मंजिल, वर्ना रास्ता. अगर मंजिल नहीं तो रास्ता भी नहीं. रास्ता नहीं तो सफर कैसी. सफर नहीं होने का मतलब तो आप समझ सकती हैं-ठहर जाना होता है. और जहां ठहर गए, समझिए वहीं मर गए- जिंदगी से नाता खत्म. उठिए, अपनी आंखे खोलने से पहले एक मंजिल तय कीजिए, और पाने की तमन्ना छोड़ दीजिए.
सफर शुरू कीजिए!

उसे तब तक जुड़ना ही कहते हैं, जब तक दो चीजें एक दूसरे में समा न जाएं. और गांठ इसी जुड़ाव को कहते हैं- जो अक्सर बांधी गई होती है।

जो अपने आप बंध जाए- वो गांठ नहीं- इसी बंधन से तो एकाकार होने का रास्ता शुरू होता है। तब किसी गांठ की दरकार नहीं होती- दो गज (1+1)कपड़े मिलकर एक चादर बन जाते हैं- और फिर एकाकार होकर चांदनी रात की मद्धम लहरों में लहराते हैं.

चाहत तो ऐसी है, लेकिन कहां- वो गांठ कपड़े का मर्म ही नहीं समझता।

सोमवार, अप्रैल 27, 2009

बेबी की तबियत मंदी है!

'ये क्या हो गिया...?'
उसके ये मासूम अलफाज आज मेरी जुबान पर आश्चर्य कर रहे थे। मेरा चेहरा बिलकुल इस अलफाज के वक्त गोल हुए उसके मुंह में समा रहा था।

ये क्या हो गिया? जब वो पूछता है, तो जाने क्यों लगता है2 साल का बच्चा(बेबी कहने पर खुश होने वाला बच्चा) जाने कैसे सब समझ रहा है- पापा को कोई परेशानी हुई है।

उनकी आंखों में आज वो चमक नहीं, जो अक्सर मेरे चेहरे पर रौशन होती है. पापा कितने खिलखिलाते है. जब मैं एक थप्पड़ जड़ता हूं चिक पर, तो कैसा मुंह बनाते हैं. आंखों में बिना पानी आए ऊं...हूं...उं...करके रोते हैं. इतना भी बच्चा नहीं मैं, पापा की नौटंकी समझता हूं, मैं भी उन्हीं की तरह नौटंकी करता हूं- गरम करने के बाद कान जब लाल हो जाते हैं तो मैं भी मुंह बना कर पूछ लेता हूं- पापा, ये क्या हो गिया??? हु...हु,॥हू...

वो बेबी बीमार है, रात से ही बुखार था, नाइट शिफ्ट के बाद सुबह जब घर लौटा तो देखा बेबी- छि-छी-सीट पर बैठा है, बिलकुल मुरझाया हुआ चेहरा, सूखे हुए होठं, बुझी हुई सी आंखें देखकर मेरे मुंह से भी यही निकला- ये क्या हुआ? मेरी कमजोरी है, मैं दर्द को चेहरे पर उतरने से रोक नहीं पाता। लेकिन उसे इस हालत में देखकर मेरा रंग जाने कितना उतर गया कि बेबी होंठ टेढ़ी कर रोने लगा- पापा...आआआआ।

अगले ही पल वो मेरे गोद में आकर चिपक गया। पता चला, सुबह उठने के वक्त तेज बुखार आया, फिर दस्त और...।

अभी रात को ही तो हंसते खेलते सोया था। कूद-कूद कर, भाग-भाग कर खाया था ये क्या हो गया। धौंकनी की तरह चलती उसकी छाती पर फिरती अंगुलियां जैसे ये पता करने की कोशिश कर रही थी। ठीक से बोलता नहीं, वर्ना बता देता। मेरे -क्या हुआ- के जवाब में सिर्फ सिर की तरफ इशारा किया- ये...पापा, ये....। ये इशारा भी बडी मुश्किल से किया था, इतनी पतली आवाज में पापा शब्द सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए. भट्ठी की तरह तपते उसे सिर की आंच में जैसे रात भर की भूख प्यास दिन के 10 बजे जल कर खाक हो गई.

महीने के आखिरी दिन है, अब तक जेबें आमतौर पर उल्टी हो जाती हैं। बेबी की बीमार हालत में इस उल्टी जेब का ख्याल ऐसा कि एक पल को धक से कर गया सीना। कदम अपने आप उठ पड़े अस्पताल की तरफ। उपरवाले तेरा शुक्रिया, दो-तीन घंटे भर के अंदर बेबी के माथे पर पसीने की बूंदे चमक उठीं. बदन की तपिश बूंदो में बह गई. कलेजे को ढंडक पहुंची.

घर आने के बाद कई घंटो तक चिपका रहा सीने से, जैसे मेरी सांसों से उसकी कमजोर धड़कनों को सहारा मिल रहा हो. इस अहसास ने मुझे भी दिन भर तकिए के सहारे लेटाए रखा-दरवाजा खिड़कियां बंद रखे- ताकि उसे शाम होने का एहसास न हो. वर्ना रोज की तरह 'बाइक' लेकर बाहर निकलने की जिद करने लगता. सो कर उठा तो लाइट जला दी, ताकि उसे रात होने का एहसास हो. इसी रौशनी के धोखे में शहर के बच्चे दिन रात से अंजान होते हैं।

बेबी भी अंजान है। इस बात से भी अंजान कि पापा कितने मजबूर हैं. जिनकी गोद में वो सुकून से सो रहा था, वो पापा उसे चुपके से बिस्तर पर लिटाकर ऑफिस चले गए हैं।

रात के 12 बज रहे हैं, वो अब भी सुकून से सो रहा है, पता नहीं जगेगा तो क्या सोचेगा.

गुरुवार, अप्रैल 23, 2009

कहां तक टूं...टूं करे भाई?


बड़ी मजबूरी हैं, भेजा खराब हो जाता है सुन सुन कर- टूं टूं नहीं जी, टूं टूं के पीछे छिपी असली आवाजें सुन सुन कर। कान पक गए हैं 15 लोक सभा चुनाव में। जाने संसद में जुटेंगे तो कौन सी भाषा में बात करेंगे ये टूं...टूं...
पूछिए तो ये सवाल भी बन सकता है- राइटर का एडीटर से, चैनलों का सरकार से- बता दो मेरे मालिक कहां तक टूं टूं करें (हमारे टीवी पर गाली की जगह मशीनी आवाज को लगाने को चलताऊ भाषा में टूं टूं लगाना कहते हैं). जहरीले गांधी के 'कटुआ बयान' को तो टूं टूं कर छंटुआ बना दिया, अब किस किस पर करें, राबड़ी के 'साला-नीच' पर करें कि लालू के 'बुलडोजर-हरामजादा' पर, मुन्नाभाई की 'झप्पी-पप्पी' पर करे कि अखिलेस दास की 'नफासत' से टपकती ठरक पर? बताओ सर, कहां कहां टूं टूं करें...

अब तक तो टूं टूं पर सीधा हक ठाकरे खानदान का ही बनता था, अब तो बलबीर पुंज भी 'सर्कस के शेर' पर अनपार्लियामेन्ट्री चाबुक चलाने लगे हैं। एक के बाद एक लाइन में लग कर खड़े हैं टूं टूं कराने वाले. भैया, हमसे इतनी शराफत की उम्मीद क्यों? ये सारे लोग संसद में जमा होते हैं, कानून बनाते हैं, हम सबको रास्ता दिखाते हैं- लेकिन भरी भीड़ में खुद 'भद्र जुबान' की लेनी कर देते हैं, हमसे इतनी उम्मीद क्यों कि हम टूं टूं करा कर गिने चुने खबरिया आशिकों को बतावें- भइया ना, सुन कर ही समझ लो, इन गंदे लोगों की भाषा सुनने लायक नहीं- तुम्हारे बच्चे बिगड़ जाएंगे.

आप बताइए, क्या ये हमारी जिम्मेवारी बनती है?और ये जो जुबान पर तेल लगा कर चुनावों मंचों से एक दूसरे पर पिले पड़े हैं, इनके लिए कोई लाइन है या नहीं? शायद नहीं, तभी तो, गाली गलौज करने के बदले इन्हें सजा ही क्या मिलती है- ले दे कर एक चुनाव आयोग की नोटिस, जिसका जवाब इन्हें 'कुछ दिनों के भीतर' देना होता है. हम सुनते हैं-आप भी सुनते हैं- इन्हीं 'कुछ दिनों के भीतर' ये दो चार और को गरिया देते हैं।

ये अच्छी तरह जानते हैं चुनाव आयोग को- जो हलफनामे में दिए गए ब्योरे को आखिरी सच मान लेता है. सब जानते हुए भी छुरा-चाकू-गन-बंदूक चलाने वालों के नामांकन पर इजाजत की मुहर लगाता है. ये चुनाव आयोग क्या कर लेगा, जो सब देखकर भी 'दाब कर' बैठा रहता है.इस देश में सबको सब करने की इजाजत है, लेकिन हमें 'टूं..टूं नहीं करने' की इजाजत नहीं, चलो भैया, झेल ही रहे हैं...

शनिवार, अप्रैल 11, 2009

चल निकला जूते का कारोबार


जूते के प्रति आदमी की संवेदनशीलता को देखकर तो यही लगता है कि उत्पत्ति के समय से ही जूता एक एक जरूरी सामान बन गया होगा- आखिर रास्ते के कंकड़ पत्थरों से रक्षा, ठोकरों से राहत जूते के सिवा और कौन दे सकता है। कहना नहीं होगा कि समय के साथ जूते की स्तर भी परिष्कृत होता गया....लेकिन मतलब वही रहा- जूता पड़ जाए... तो समझ लीजिए- पीठ पर पड़े तो धुनाई, सर पर पड़े तो जगहंसाई।

पहनने में शानदार, मारने में मजेदार अपने दोनों मतलब के साथ जूता एक ग्लोबल प्रोडक्ट है, लेकिन इसका बड़ी तीव्र अनुभूति हुई एक विज्ञापन को देखकर, जो एक राष्ट्रीय अखबार के पूरे फ्रंट पेज के खबरों पर अपने आकर्षक डिजाइन में हावी था। कहीं कोई खबर नहीं, सिर्फ जूते ही जूते। ऐसा विज्ञापन कोई पहली बार नहीं छपा, लेकिन जूतों के बीच खबरों का गायब होना- पल भर के लिए हंसी छूट गई. विचारों पर जूते का दूसरा मतलब हावी हो गया. मुंह से बरबस ही निकल पड़ा- ये देखो जूते का कमाल.

यकीनन, इस विज्ञापन को देखकर औरों को भी यही लगा होगा- जरूर याद आई होगी बुश के बाद चिदंबरम और नवीन जिंदल पर पड़े जूते की और यकीनन, विज्ञापन देने वाले ने भी यही सोचा होगा, हालिया घटनाओं के साथ उसकी देशी कंपनी का नाम पढ़ने वालों के जेहन में मल्टीनेशनल ब्रांड की तरह हमेशा के लिए बस जाएगा। और संपादक जी ने भी यही सोचा होगा- जूते की खबर छापने से बढ़िया है- जूते का ऐड छाप दो. चार पैसे मिल जाएंगे- तो मालिक की भी चांदी हो जाएगी. आखिर जूते को कैश करने का इससे बढ़िया मौका क्या हो सकता है?

जूता जब खबरों का प्रायोजक बन जाए, तो पॉपुलरिटी स्टंट का नया फार्मूला अपने आप इजाद हो जाता है। एक ऐसा आइडिया, जो हमेशा के लिए जिंदगी बदल सकता है। ऐसे में ये संभावना ये ज्यादा हो जाती है- कि कल को जूता पड़ने की क्रिया भी प्रायोजित हो जाए. जिसे चाहिए होगी पॉपुलॉरिटी- उठा लेगा भाड़े पर किसी को फेंकने के लिए. कैमरे तैमरे तो होंगे ही, बस अपना 'रियेक्शन टाइट रखने' की जरूरत रहेगी. जूता पड़ने पर मुस्कराना होगा, कूल डाउन...कूल डाउन...टेक इट इजी...जैसे जुमले लाल हुए चेहरे के साथ उछालने होंगे. कैमरे के साथ एक तीर से दो निशाने सधेंगे- जूता फेंकने वाला और खाने वाला दोनों बन जाएंगे महान

इस महानता का बखान करने के लिए- अखबारों में अच्छी हेडिंग, टीवी पर ऐरो, सर्किल और अनुप्रासिक टेक्स्ट मौजूद होंगे ही. अगर एक जूता खाने से इतनी पॉपुलारिटी मिलती हो, तो बुरा क्या है, अगर हैसियत बड़ी है- तो जूता कंपनी भी घटना को प्रायोजित करने को राजी हो जाएगी. आप इसके लिए मुंतदर अल जैदी के फेंके जूते की अरब जगत में बढ़ी बिक्री का आंकड़ा पेश कर सकते हैं. जब अखबार को सर्कुलेशन और टीवी को टीआरपी से विज्ञापन मिल सकते हैं, तो आपको तो इस आंकड़े के बाद अच्छे प्रायोजक मिल जाएंगे. हर लिहाज से सस्ता सुंदर और टिकाऊ फार्मूला लेकर आया है ये जूता.

गुरुवार, अप्रैल 09, 2009

इतना 'गरम जूता',और सीबीआई का 'ढंडा बस्ता'


बेशक जूते को इतना गरम नहीं होना चाहिए, और अगर हो भी तो चिदंबरम जैसे तेज,ईमानदार और शरीफ मंत्री की तरफ नहीं उछलना चाहिए था, फिर भी अगर उछला तो इसकी जितनी निंदा की जाए उतनी कम है- गांधी के अहिंसा धर्म वाले देश में तो और भी। अब जबकि बापू के आदर्शों का इशारा करते हुए जब जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह ने माफी मांग ली हैं, और ये साफ कर दिया है, उनके विचारों में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं, वो बस एक क्षणिक बौखलाहट भर थी। वो बेचैनी जो सीबीआई के ढंडे बस्ते की वजह से पैदा हुई.

टीवी पर आप सब जरनैल सिंह को ये कहते हुए सुन चुके हैं- कि ठीक है, सीबीआई ने टाइटलर को क्लीन चीट दे दिया, लेकिन दोषी कौन है, ये कौन तय करेगा। या तो सरकार तय करे, या फिर सीबीआई बताए। अगर फ्लाने का दामन साफ है, तो 3000 सिखों को जिंदा जलाने के मामले में दोषी कौन है?

बैचैन कर देने वाला सवाल तो है ही, और ये संयोग था कि इस सवाल के सामने चिदंबरम जैसे 'नॉन-पॉलिटिशियन' मिनिस्टर थे, जो इतने डिप्लोमैटिक जरूर हैं कि वो कह सकें- कि मैं न तो जज हूं, कि दोषी और निर्दोष तय करूं, पार्टी इंचार्ज भी नहीं, जो ये तय करूं कि किसे टिकट दें या न दें, लेकिन इस सवाल का जवाव कौन देगा- 25 साल तक जांच किए, और किसी को दोषी ठहराए बिना चल दिए! और कितना साफ कहे जरनैल सिंह- उन्हें इस बात का मलाल नहीं कि टाइटलर को क्लीन चिट क्यों दी, मलाल ये है कि आप तो पल्ला झाड़कर ही चल दिए, और सरकार ने भी हिसाब किताब नहीं किया, भैया, चुनाव में जाना है, जनता पूछेगी तो क्या जवाब देंगे, 84 के दंगे की आग जमीन ने लगाई या आसमान ने?

उस वक्त राजीव गांधी ने बड़ी आसानी से कह दिया था- 'जब बड़ा पेड़ जमीन पर गिरता है, तो धरती पल भर के लिए कांप ही जाती है' अब इतने बड़े फैसले के बाद अगर एक जूता पांव से निकल गया तो इसे क्यों नहीं उसी फार्मूले के तहत देखा जाना चाहिए- जब हजारों लोगों की आस टूटी, तो एक बंदा बौखला गया, तो क्या बड़ी बात हो गई?

देश की सबसे बड़ी एजेंसी का अगर ये हाल है, ललित नारायण मिश्रा मर्डर केस से लेकर आरुषि हत्याकांड तक सीबीआई की विफल जांच की लंबी फेहरिस्त है, निठारी हत्याकांड में जिसे सीबीआई ने क्लीन चिट दिया उसे मौत की सजा हुई, आरुषि हत्याकांड में अब तक सीबीआई के हाथ खाली है, इनकी तो छोड़िए. ललित नारायण मिश्रा (1975) के हत्यारों का आज तक पता नहीं चला, केस अब भी अंडर ट्रायल है. सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री नरबहादुर भंडारी (1984-85) पर भ्रष्टाचार के दो मामलों का क्या हुआ. सेंट किट्स घोटाला (1990) अब भी अंडरट्रायल है. बाबरी मस्जिद ध्वंस (1992) का हाल तो सबको पता है. झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड (1996) में गुरू जी को क्लीन चिट मिल गई (दोषी कौन था नहीं पता चला)। दिल्ली हाउसिंग घोटाला (1996) में पूर्व मंत्री शीला कौल की क्या भूमिका थी नहीं पता चली। जयललिता बर्थ गिफ्ट (1997) में अब भी जांच चल रही है. ब्रह्मदत्त द्विवेदी मर्डर केस (1998)में बड़े नेताओं के नाम आ रहे थे, उसका क्या हुआ? बिहार पुलिस यूनिफॉर्म घोटाला (1975), बिहार चारा घोटाला (1995) धोती साड़ी घोटाला(1997), इंजीनियरिंग एडमिशन घोटाला (1998) बिहार दवा घोटाला (2000) जैसे कई मामलों में या तो जांच चल रही है या मामले अंडरट्रायल हैं. मुलायम, लालू, राबड़ी और मायावती जैसी हस्तियों पर आय से ज्यादा संपत्ति मामलों में सिर्फ तारीखें बंट रही है ये हो क्या रहा है!

कहना नहीं होगा, ये सारे मामले सियासत और सियासी हस्तियों से जुड़े हुए हैं, और इनके नतीजे देशहित में काफी हो सकते थे, लेकिन नहीं, फिर भी सरकारें चाहती हैं इतन सीबीआई के सियासी इस्तेमाल का आरोप नहीं लगे. नीयत पर तो अंगुली उठाना दूर की बात है., कोई है सीबीआई से सवाल पूछने वाला? आप उठाएंगे, तो आपकी नीयत ही सियासी संदेह के घेरे में आ जाएगी, जैसा जरनैल सिंह के साथ हुआ। सबने शुरू में यही समझा ये सिख विद्रोहियों की करतूत है।

जय हो, जय हो, जय हो, इतना गरम जूता और सीबीआई का इतना ढंडा बस्ता! भैया भूगोल का सिद्धांत हैं- हवा जब गर्म होती है तो बवंडर खड़ा होता है। अपनी जगह से उपर उठती है हवा। और फिर किधर बह निकले क्या पता? प्रकृति का नियम है- इसे कौन रोक सकता है, गलत चाहे जितना ठहरा लें

रविवार, अप्रैल 05, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 5


मंदी में मुरझाए मन को अब भी सटीक लगती है ख्वाबों में उतरी ये कविता। भले ही दृश्य पूरी तरह गुम हो चुका है वक्त की सलवटों में...

उस दृश्य में मुझे नहीं आना था।
मैं घुमक्कड़
मैं यायावर
मैं क्या जानूं
कोई ऐसे भी स्थिर हो सकता है।
एक पेड़ था वो
अपनी गिरी हुई पत्तियों के ऊपर जड़वत खड़ा
सूखे किनारे कहते हैं कभी पेड़ के पास बहती थी नदी
अब कोसों दूर जा चुकी थी अपना जल समेटे
पेड़ से दूर छिटकी नदी में डुबकियां लगाता सूरज!
अहा, कितना सुंदर दृश्य!
नंगा नहाता सूरज और
उछल उछल कर नहलती नदी
अहा, कितना सुंदर प्रेम!
मैं मोहित
मैं सम्मोहित
जा बैठा पेड़ के ऊपर
अगले ही पल
मेरी आंखों में डूब गया पूरा
गिर गया जड़वत खड़ा पेड़
जीवन के स्पर्शमात्र
पता नहीं
किसके इंतजार में सूख गया
शायद, मुझे उस दृश्य में नहीं आना था।

मंगलवार, मार्च 31, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 4


लोहे को शीशे में बदलते हुए देखने का इतना पुराना एहसास आज भी दहशत पैदा करता है। पाश का लोहा पढ़ते हुए 'कुछ करने' का मन होता था, इस शीशे को देखकर जख्मी होने का डर सताता है-

कुछ भी हो सकता है
बदल गया है लोहे का रंग रूप
तपते-तपते शीशे में तब्दील हो चुका है लोहा*

शीशा जो चमकता है
चकाचौंध पैदा करता
शीशा जो होड़ पैदा करता है
अपना चेहरा सबसे आगे देखने की

शीशा जो चिपकता नहीं बदन पर
उतर सकता है सीधे आत्मा में
शीशा जो चेहरा दिखाता है
चीर सकता है आपको दो हिस्सों में

शीशे की दुनिया में कुछ भी हो सकता है
आप प्रेम कविताएं लिख सकते हो
और आपके बच्चों को आ सकते हैं
जनसंहार के सपने

हम शीशे के कगार पर खड़े हैं
हम कभी भी निगल सकते हैं शीशा
और भूल सकते हैं लोहे को।


*क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश का लोहा

बुधवार, मार्च 25, 2009

'पीली पड़ चुकी डायरी के पन्ने'- 3


अजीब सी शिकायत दर्ज है डायरी के इस पन्ने में। लहरों की खुशी भी है, और बहने का मलाल भी. आधी रात का वक्त था, सपने की जगह उनींदी रात में बालकनी के बाहर सूने क्षितिज पर उफान रही थी नदी-
मुझे इतनी भी दूर
मत बहा ले जाओ नदी
काफी दूर आ गया हूं
तुम्हारी कोख में हिचकोले खाते
तुम्हारी तहों में गुम होते
काफी दूर आ गया हूं मैं

तुम्हारे साथ चलते-चलते
अब तो मैं पत्थर भी न रहा
घिसा हुआ बदन कुछ और ही दिखता है
जैसे पावन तुम्हारा जल
वैसे पवित्र मेरा चिकना बदन

इससे पहले कि किसी के हाथ लगूं
बना दिया जाऊं किसी मंदिर का देवता
न कुछ देख सकूंगा
न कुछ सुन सकूंगा
न बोल सकूंगा
मैं निष्कर्म हो जाऊंगा

थाम लो अपनी रफ्तार
मुझे वापस लौटना है इसी जन्म में

शनिवार, मार्च 21, 2009

एक दिन कविता के नाम

21 मार्च आज है वर्ल्ड पोएट्री डे। यूनेस्को ने साल 1999 में 21 मार्च को वर्ल्ड पोएट्री डे के तौर पर मनाने का एलान किया था. तमाम कवि हृदय आत्माओं के लिए मेरे दोस्त देवांशु झा का भेजा ये खास उदगार...

सदियों पहले एक परिंदे की दर्द भऱी आवाज में ढल कर तुम किसी की रूह में उतरीं. एक डाकू जिसने उस दर्द को महसूस किया और उस दर्द के पेट से तुम पैदा हुई। डाकू महर्षि बन गया और दर्द कविता. यूं तो अंजान ताकतों की प्रार्थना का रहस्य भी कविता है लेकिन वाल्मीकि ही तुम्हारे पिता थे और फिर मेघ की भाषा में तुम्हें कालिदास ने बात करने की कला सिखलाई. तुम्हें रंगीनियों से संवारा.तुम्हारे अंदर सीता की तकलीफ भवभूति की कलम से उभरी. तुम्हारी रंगीनियों ने पहली बार करुणा और अंधकार की भाषा भवभूति से सीखी.

तुम चलती रही..बहती रही. भास, दण्डी..श्रीहर्ष..और न जाने कितनी ही जुबां से संवरती रही शंकर, कुमारिल ने तुम्हें दर्शन के जेवर पहनाये। तुम्हारी धारा उत्तर से दक्षिण की ओर बहने लगी. सुदूर तमिलनाडु में तुम्हें एक नया कलेवर मिला॥

एक वक्त ऐसा भी आया जब धारा कुछ रुक सी गई। लेकिन फिर अमीर खुसरो॥की जुबां में तुम ताजा हो उठीं॥और राम तुम्हारे हाथों कुछ और संवर से गए तुलसी की कलम से। कृष्ण की शख्सियत को सूर ने तुम्हारे सहारे से एक नई चांदनी से भर दिया. कबीर ने तुम्हें तोड़ना फोड़ना सिखाया. तुम खुद अपनी राह बनाकर चलने की कला उस फकीर से सीख गईं.

नानक की भाषा में तुम कई विरोधों को साथ लेकर चलीं. और जयदेव, चैतन्य, कम्ब और पंपा तुम्हें रोशन करते गए.. सदियां बीतती रही. भाषा बदलती रहीं.. फारसी में बेदिल की कलम से तुम खिल उठी. तो मीर के शेर और नज्म तुम्हें खुदा के करीब ले गए. गालिब की पीड़ा और दर्द में तुम पिघल सी गई और टैगोर ने तुम्हें झरने का प्रवाह दिया. पश्चिम को पूर्व से मिला दिया. बंकिम ने तुम्हें मुक्ति की चाह दी और भारती के स्वरों में तुमने विद्रोह करना सीखा.

प्रसाद के सहारे तुमने इस संस्कृति की धारा में फिर से डुबकी लगाई. निराला के प्रचंड ओज में तुम्हारे बंधन टूट गए तुम परंपरा और आधुनिकता के बीच भिड़ंत करती रहीं।जीवनानंद ने तुम्हें नई छवियां दीं तो मुक्तिबोध ने तुम्हें अंधकार से प्रकाश में जाने की छटपटाहट. नागार्जुन ने तुम्हें भदेस होना सिखलाया और अज्ञेय की भाषा में अभिजात्य हो गईं. अब तुम्हारे स्वर कुछ बदले हुए हैं। तुम्हारी शैली भी बदल गई है. तुम्हारी पहचान मुश्किल है. तुम कविता हो या कुछ और कहना आसां नहीं.

लेकिन जीवन जब भी गम. खुशी,हार-जीत के लम्हों से गुजरता है. तुम सांस लेती हो. जब भी बादल गरजते हैं, झरने बहते हैं..नदियां उफनती हैं, चिड़ियां चहचहाती हैं, किसान खेतों में काम करते हैं.बच्चे जिद करते हैं..मां रोती है..और पिता मुस्कराते हैं. तुम मौजूद रहती हो. और शायद किसी न किसी भाषा, जुबां में इस धरती के जीवित रहने तक तुम भी सांस लेती रहोगी.. क्योंकि जीवन एक कविता ही है.