बुधवार, दिसंबर 31, 2008

आठ की याद

कभी फुरसत में होगी 'गए गुजरे' की बात
उम्मीदों से भरे लम्हें हैं
हथेली में भर लीजिए
चूम लीजिए ऐसे कि कुछ दिन रहे याद!
आप सबको मुबारक हो नया साल!!

अभी के लिए कुछ तस्वीरें, 21 वीं सदी के 8 वें साल की 8 निशानियां...
(सौ.-REUTERS)




मान गई मोहतरमा!
नई नवेली दुल्हन के साथ मैक्सिको के मैनुअल यूरीब


मैं भी बाइकर!
थाइलैंड का फैशनपरस्त पालतू मेंढक

१६०० सिंगार!
गहनों से बिंधी स्कॉटलैंड की महिला (मोस्ट पीयर्स्ड वूमन)



ईश्वरीय दोष!
नोयडा में पैदा हुई दो सिर वाली बच्ची

पाषाण युग की परछाई!इंडोनेशिया की एक जनजाति के बहाने...






परंपरा की लीपापोती!
हांगकांग में बुरी आत्माओं से बचने का एक तरीका





नौलखा नकाब!
बहरीन के एक फैशन शो में गहनों से लदी मॉडल




गुबार में सूखता पसीना!
काबुल के आटा मिल के बाहर मजदूर


रविवार, दिसंबर 07, 2008

ए बी सी डी से सीखो!


अंग्रेजी हम सबने पढ़ी है, लेकिन कभी सोचा है-
अंग्रेजी के शुरुआती चार अक्षर A, B, C, D का इस्तेमाल 1-99 तक की स्पेलिंग में कहीं नहीं होता!
D- का इस्तेमाल पहली बार Hundred में होता है
A- का इस्तेमाल पहली बार Thousand में होता है
B- का इस्तेमाल पहली बार Billion में होता है
C- का इस्तेमाल पहली बार Crore में होता है

मतलब...
इन अक्षरों की तरह आदमियों में भी इतनी सब्र हो, कि वो शांति से अपनी बारी का इंतजार करे। ये जरूरी है

इस क्रांतिकारी खोज का उल्लेख अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग http://bigb.bigadda.com/ पर किया है. इतने सुंदर संदर्भ के साथ कि मैं खुद को उसे चुराने से नहीं रोक सका, आप गौर करेंगे, तो अंग्रेजी वर्णमाला की इस विडंबना का संदर्भ इतना गहरा है कि किसी को भी झकझोर सकता है.
सॉरी बिग बी, जैसे आपके ब्लॉग पर एक क्लिक से मेरे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ, मैं चाहता हूं मेरे ब्लॉग पर आने वाले 'टहलू' भी ऐसे सकारात्मक चोर बनें!

मंगलवार, दिसंबर 02, 2008

बस, यूं ही जलती रहे ये लौ!


मुंबई के आसमान में चांद मुस्करा रहा है
सचिन, संजु, आमिर, शाहरुख, बिग बी, सोनम, सोनू जैसे सारे सितारे उबल रहे हैं
नीचे जमीन पर मोमबत्तियों की लौ हर लम्हा तेज हो रही है
हर आखं में समा रही है झिलमिलाती हुई मोमबत्ती की सीधी सुंदर लौ
बुझती हुई सी आंखों में चौड़ी होती दिख रही है रौशनी
बस इतना ही चाहिए था!

शहीद बेटे के पिता के सीने में कुलांचे मार रही है बेटे सी हिम्मत
वो दिखा रहा है सीएम तक को दरवाजे से बाहर का रास्ता
‘जा चला जा, बड़ा आया है हमदर्द बनने, मुझे नहीं चाहिए तेरी छपट भरी सहानुभूति’
शहीद की बेवा बैरंग लौटा रही है सरकार की रुपयों से तोली हुई दया
बेटे के कंधे से गिर रहा ‘घड़े का पानी’ तर कर रहा है ‘कमीनों का पायजामा’
ताल ठोक कर कह रहा है बंधक-मैं तो फिर भी आउंगा ताज में,ओबेराय में
बस यही तो चाहिए था!

खबरों के बीच से गायब हो रही है ‘कॉमेडी’ की ‘गुदगुदी’
स्वर्ग-पाताल की चौहद्दी नापने वाले एंकरों की बदल रही है भाषा
रिपोर्टरों की पीटूसी में साफ झलक रहा है एकजुट आक्रोश
‘विनोद जी’ फिर से पीछे पड़ गए हैं बुलेटप्रुफ जैकेटों में दलाली खाने वाले,
देश की पीठ में छूरा भोंक मोर्चे पर जवानों को आगे करने वाले मतलबपरस्तों के
लग तो यही रहा है अपनी पोजीशन पर वापस लौट रहा है लोकतंत्र का चौथा खंभा
अब और क्या चाहिए!

अब छोड़िए गोली मारिये, भले ही कुछ प्रोड्यूसर अब भी इस मानसिकता वाले रह गए है जो मानते हैं कि ‘कब्रिस्तान में आतंकियों को दफनाने के लिए जमीन नहीं देने की खबर’ का वाइस ओवर कोई लड़की नहीं कर सकती, या लड़की की आवाज में ‘शहीदों की वीरगाथा’ का पैकेज अच्छा नहीं लगेगा.(लता जी, सुन रही है न, ये भूल गए कि आपकी आवाज में- ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...” सुनकर नेहरु जी जैसे व्यावहारिक नेता की आंखों से आंसू छलक पड़े थे.) ऐसे लोगों पर तरस खाईए और आगे बढ़ जाईए, ऐसों वैसों की तो वो सोच भी खोखली साबित हुई कि ‘कि दर्शक अगर देश की चिंता वाली खबर देखता, तो अपने टीवी पर डीडी न्यूज चैनल फिक्स कर लेता. छोड़िए जाने दीजिए, टीआरपी की टांग पर चलने वाले ये लोग विचार के स्तर पर अल्पसंख्यक है, बिलकुल ‘बीजेपी के क्रियेटिव लीडर’ मुख्तार अब्बास नकवी की तरह, जिन्हें मोमबत्तियों की लौ के साथ गूंजती आवाज नहीं सुनाई देती, नीम रौशनी में भी नजर लिपिस्टिक पर चिपकती है. अगर हाथ मारें तो नकवी साहब रामू से कम बड़े फिल्ममेकर नहीं होंगे, जिन्हें खून से सने मातम में भी कोई ‘सीन’ दिखाई देता है.

बस इन्हीं चीजों की कमी खटक रही थी, अब जो लोग अपनी हदों से बाहर निकले है, एक दूसरे की चिंता के लिए दो पल का वक्त निकाल रहे हैं, अपने मतलब से बाइट देने वाले औरों की खातिर माइक पर रहे हैं, दुआ करो ऐ मेरे वतन के लोगों, कि अबकी जो आंख खुली है, ये जो नई रौशनी दिखी है, ये बुझने न पाए. बार बार नहीं आती ऐसी पॉजिटिविटी. इस चिराग को हमें मिल जुल कर उस मुकाम तक रौशन करना है, जब सारे चाराखोर,ताबूतखोर, कफनचोर, बंदूकबाज, कबूतरबाज आदि-आदि टाइप के ‘लोगों’ की औकात साफ साफ दिखने लग जाए. आखिर इन्हीं ‘त्रियम दर्जे’ के लोगों की खातिर चुनाव आयोग ने वोटरो को पप्पू तक कह डाला, आइए, इसी लौ में मिलकर कहते हैं-
“हमें पप्पू नहीं बनना ‘आयोग महोदय’, आपको शायद पप्पू का मतलब नहीं पता, पप्पू मर्दों के पायजामे के भीतर चड्ढी में दुबके किसी और ‘चीज’ को कहते हैं”

‘आयोग महोदय’ आपको पता भी है,पप्पू क्या से क्या कर सकता है? औकात पर आ जाए तो ‘चड्ढी’ फाड़ सकता है, अपनी खोल में समा जाए, तो फिर कोई परवाह नहीं, सरकार जाए तो जाए, जब आपको नहीं परवाह हर सीट पर दो चार दागी बिठाते हुए, झूठ बोलकर हलफनाफा थमाने वाले उम्मीदवारों को खड़ा करते हुए, तो आपके शब्दों में ‘पप्पू को खड़ा होने’ की क्या जरूरत?


‘खड़ा करने’ से पहले ‘ठप्पा मारने’ का विकल्प तो दो, पब्लिक इस बार यूं ही नहीं ठप्पा मारेगी

सोमवार, दिसंबर 01, 2008

लो, तुम्हें बेदखल किया...!


मुंबई में मौत का तांडव मचाने वाले
मायानगरी में दहशत फैलाने वाले
सरेआम बेकसूरों का खून बहाने वाले
तुम कैसे हो सकते हो अल्लाह के बंदे
तुम्हें अगर नफरत है इंसानियत के नाम से
तो हम तुम्हें बेदखल करते हैं इस्लाम से


ये फरमान है मुंबई के मुस्लिम काउंसिल ट्रस्ट का...आतंकियों के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है ट्रस्ट के मेंबरान ने। मौलानाओं ने ऐलान किया है कि हंसते खेलते शहर में मौत का कहर बरपाने वाले आतंकियों को दफनाने की जगह नहीं दी जाएगी, क्योंकि कब्र में ऐसे काफिरों के लिए कोई जगह नहीं होती.

मुंबई में जो कुछ हुआ, आतंकियों की वजह से शहर दहशत के साये में रहा, इस पूरे वाकये से बेहद आहत है मुंबई का मुस्लिम समुदाय। आतंकियों के सफाये के बाद जब शहर में अमन कायम हुआ, ट्रस्ट ने एक आपात बैठक बुलाई, जिसमें मौलानाओं ने आम सहमति से मुंबई में मारे गए उन 9 आतंकियों को काफिर करार दे दिया, जिन्होंने पूरे 59 घंटे तक मुंबई को दहलाया, सरे राह चलते बेकसूरों का खून बहाया.

ट्रस्ट के अध्यक्ष इब्राहिम तई ने मीडिया के सामने ये फरमान जारी किया कि जिस मजहब में खड़ी हरी फसल को काटने की मनाही है, वो इस कदर जेहाद के नाम पर बेकसूरों का खून बहाते फिर रहे है, ये इंसानियत का कत्ल तो है ही, पैगम्बर मोहम्मद के उसूलों का भी खून है। ऐसे दहशतगर्दों को मुसलमान कहना इस्लाम का अपमान है.

मुस्लिम काउंसिल ने अपने इस फैसले की इत्तिला मुंबई पुलिस को दे दी है. आमतौर पर पुलिस मजहब के लिहाज से अपराधियों को भी मुंबई के बड़ा कब्रिस्तान में दफ्नाती आई थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा. अब बोलो, कहां जाओगे दहशतगर्दों, तुम्हें तो दफ्न होने के लिए दो इंच जमीन भी नसीब नहीं होगी.

शैतानों, तुमने तो अपने करम से अपने वालिदों का वो हक भी छीन लिया, जो तुम्हें कंधा देकर कब्रिस्तान ले जाते, और तुम्हारी रूह के साथ अपने लिए भी दुआ करते-
सलाम हो तुम्हें ऐ कब्रवालों
अल्हाह मगफरत फरमाए हमारी और तुम्हारी
तुम हमसे पहले यहां आए
हम तुम्हारे पीछे आने वाले हैं!