मंगलवार, अक्तूबर 21, 2008

अपनी उदासी तोड़ो वत्स!

खामोशी से खतरनाक है उदासी !
कई गुना ज्यादा खतरनाक
क्योंकि ये चुप्पी के हर उस सिरे को सिलती हुई अंदर दाखिल होती है
जहां से बोल फूटने की संभावना होती है.
खामोशी हमेशा एक उम्मीद से भरी हुई होती है
उपर से चुप, लेकिन अपने अंदर संवाद करती हुई.
हर एक्ट पर रियेक्ट करती हुई
बुलबुलों से भरी हुई एक जिंदा चीज है खामोशी.
फर्क करना सीखो वत्स!
उदासी वो वो सुई है जो समाते ही हर बुलबुले को शून्य बना डालती है.
निकाल देती है विचार के बुलबुलों की प्राण-वायु.
रोक लो वत्स, अपनी खामोशी को उस हद तक मत जाने दो
जो तुले हुए हैं तुम्हें उस हद तक ले जाने पर
उन्हें कामयाब मत होने दो
वर्ना वो ऐसा जश्न मनाएंगे
कि तुम्हारी खामोशी खुदकुशी करने को मजबूर होगी.


ये अधजगी नींद का वो सपना है, जिसकी आखिरी लाइन से मैं हिल गया. कुर्सी पर एक झटके में अलर्ट हो कर बैठ गया. आंखें भारी थी, लेकिन मैं जैसे पूरी तरह चैतन्य हो गया था.

नाइट ड्यूटी चल रही है. न्यूज रूम में घुसा तो सुबह के लिए कॉपियां तैयार थी. खबरों की लिस्ट थमा दी गई थीं, बस अब अपना काम शुरू करना था. अपने हिस्से की लिस्ट के साथ अपनी डेस्क पर बैठा मैं ऊंघने लगा था, स्टोरी किसके विजुअल से शुरू करें, मनसे के कार्यकर्ताओं की पिटाई में घायल बेचारे उत्तर भारतीय छात्रों के शॉट्स से, कि राज ठाकरे के आग उगलते भाषण से, कि सियासी बैठक से, कि राज ठाकरे की गिरफ्तारी की मांग के रुप में नेताओं की एक्टिंग से, कि गिरफ्तारी का ढोंग रच रही पुलिस से या, लालू नितिश और शरद टाइप उत्तर भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया से.
हर विजुअल का अपना मतलब है, जैसे सबकी अपनी सियासत का मतलब है.

ओपेनिंग विजुअल स्टोरी का हीरो होता है, और फार्मूले के मुताबिक वो हीरो ही होता है जो स्टोरी की शक्ल तय करता है. ऐसे में सवाल ये बड़ा अहम होता है कि अपनी स्टोरी का हीरो कौन हो, जो स्क्रिप्ट में ऐसा एक्शन कर दिखाए, जिससे कुछ तो ‘उखड़े’ लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता, खबर चल जाती है, लेकिन उखड़ना तो दूर बाल भी बांका नहीं होता. धमाके यूं ही रोज होते हैं, रो रोकर हम चाहें जितने ही जख्म गिना लें, दर्द भरी कहानियां सुना लें, आतंकियों का मन नहीं पिघलता. ‘पूरा देश एक है’ की दुहाई चाहे जितनी दे लें, राज ठाकरे आग लगाना बंद नहीं करता, उसके गुंडे हर बात में तोड़ फोड़ का बहाना निकालते हैं. जो लोग विरोध करते हैं, वो मीडिया को बाइट दे कर घर में घुस जाते हैं, कुछ दिनों गर्मा-गर्मी रहती है फिर जुट जाते हैं सियासत के लिए नया मसला गढ़ने में.

आजकल तो एल-18 से बढ़िया जगह क्या हो सकती है. सुनने से तो यही लगता है कि इन्हें कुछ पता नहीं, कोई सबूत हाथ में नहीं लेकिन जुबान पर एक ही नारा है- इनक्वायरी होनी चाहिए. हैरत तो इस बात पर होती है, कि ये वो लोग भी कह रहे हैं, जिनके हाथ में देश की बागडोर है, लेकिन सियासत के आगे उन्हें भी नहीं खयाल अपने शासन के मनोबल का, पुलिस के मोराल का. क्या होगा, जब बिना किसी आधार के यूं ही सवाल उठने लगेंगे. पुलिस को अथॉरिटी सरकार ने दी है, सरकार को तो कम से कम अपनी भाषा दुरूस्त रखनी चाहिए. लेकिन सियासत ने सरकार का भी बयान बदल दिया है, इस बात की परवाह किये बगैर कि इस तरह एक्शन की गारंटी अधर में लटक जाएगी.

हैरानी इस बात पर भी कम नहीं होती कि अमर भैया की भाषा में ऐसी बाइट वो लोग भी दे रहे हैं, जो राज ठाकरे को ‘मेंटल केस’ बताते हैं, राज ठाकरे के खिलाफ ‘देश बांटने’ का आरोप लगाते हैं, उसके खिलाफ ‘ताजिराते हिंद की सभी दफाओं’ के तहत कार्रवाई की मांग करते हैं. ‘पूरा देश सबके लिए खुला है’ का नारा बुलंद करते हैं, लेकिन अपनी बारी पर चिंता सिर्फ अपना वोट बैंक बनाने या बचाए रखने की खातिर दिखाते हैं, उन्हें जरा भी देर नहीं लगती देश पर मर मिटने वाले एक जवान की मौत पर सवाल उठाने में. जनता की मांग की आड़ में अपना ‘माइक्रोवेव ओवन’ (गौर कीजिए, रोटियां सेंकने वाले युग से कितना आगे बढ़ गए है हमारे छलिया) ऑन करने में.


एक्शन क्या खाक होगा. ये तो एक दिन की बात है, जो किसी को भी उदास कर देने के लिए काफी है. यहां तो रोज यही होता है. खबरों की लिस्ट मिलते ही नींद कई दिन, सच कहें तो कई हफ्तों आने लगी थी. शिफ्ट का एजेंडा तय होने के बाद ‘कोई फायदा नहीं’ के लक्षण वाला अवसाद घेर लेता था. ये खयाल जाने न चाहते हुए भी घर करने लगता था कि ‘साले कर क्या रहे हैं, और हम दिखा क्या रहे हैं, पेट साला, जाने क्या क्या कराएगा’ इसी ‘करना पड़ेगा’ की नियति और ’नहीं करूंगा’ की खोखली जिद की रस्साकशी में कुछ देर के लिए शून्य हो जाता है चेतन-अवचेतन. चेतना जगाए रखती है, तो अवचेतन नींद को निमंत्रित करती है. ठीक नीम बेहोशी वाली हालत पैदा करती है अधजगी नींद

शायद ये वही नींद है, जहां से खामोशी उदासी में बदलना शुरू करती है. हालांकि खामोशी अब भी जद्दोजहद करती है,लेकिन यहां पूरी संभावना रहती है उसके उदासी में बदल जाने की. और ये बहुत ही स्वाभाविक चीज है. विज्ञान भी कहता है कि जब तक किसी बल से ठोस, द्रव्य, या वायू के स्थान में परिवर्तन नहीं होता, उसे कार्य नहीं कहा जा सकता. यानी बिना बदलाव के आपका एक्शन पूरा नहीं होता. वो एक्शन किसी काम का नहीं, जिसका लौकिक असर न हो. खबरों की दुनिया में ऐसा हो तो कब से रहा है, लेकिन पिछले महीने भर की विडंबना अवसाद से ग्रस्त कर देने वाली है.
(शायद आपने भी नोट किया होगा, पिछले 28 सितंबर के बाद से मैंने किसी एक्शन पर रियेक्ट नहीं किया. उदास होने तक खामोश रहा)

लेकिन उस रात की अधजगी नींद का अधपका सपना मुझे नींद से झिंझोड़ गया. ऐसा लगा मेरी ही शक्ल का कोई देवदूत बंद आंखो के पीछे इंद्रधनुष बना रहा है. मास्टर जी जैसे ब्लैकबोर्ड पर हर वाक्य के साथ बोल कर समझाते हैं, वो देवदूत भी इंद्रधनुष में हर रंग की स्थापना के साथ कुछ कह रहा है, मुझसे संवाद कर रहा है, मेरी खामोशी को उदासी की नींद से जगा रहा है. वो मुझे सावधान कर रहा है.