रविवार, सितंबर 28, 2008

सुलगती हुई शाम के कोलाहल में...


शाम का पान बेहद रुहानी होता है, ढलती शाम के साथ चढते रंग वाला, यूं कहें कि टपकते हुए सूरज की लाली बंदे की जुबां पर पसर जाती है...और ये मौका जब फुरसत के दिन मिले तो जैसे बरसों की मुराद पूरी हो जाती है.
फुरसत के इस जिक्र से खयाल आता है, वो लम्हें तब कितने गर्मजोश हुआ करते थे, गुलजार का वो गीत उन चांदनी रातों में साकार हो उठता था-


जाड़ों की नर्म धूप और आंगन में लेटकर
आंखों पे खिंच कर तेरे दामन के साये को
औंधे पड़े रहे कभी करवट लिए हुए
बर्फिली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर
वादी में गूंजती हुई, खामोशियां सुने
आंखों में भींगे भींगे से लम्हें लिए हुए
बैठे रहे तस्व्वुर-ए-जाना किए हुए...

जी हां, दिल ढूंढता है फुरसत के वही रात दिन. यूं कहें कि पान एक निशानी है, ढलती शाम से बढ़ते उन चांदनी रात के इंतजार की. पगडंडी पर मुंह में पान चबाते, बाजार से अगली सुबह की मस्त उम्मीद में घर लौटते हुए...जब रात का सन्नाटा बढ़ता था, तो गांव का बेखौफ कोलाहल कानों में संगीत की तरह गूंजता था. धुली हुई चांदनी में नहाया हुआ कोलाहल...

पान उसी कोलाहल का साथी है, शाम का मन होता है, तो बुला लेती है आगोश में...फुरसत होती है, तो मैं भी गर्मजोशी दिखाता हूं...निकल पड़ता हूं...अब तो खैर पांवों में थकान होती है, जमाना ऐसा हो चला है कि अगले कदमों का भरोसा नहीं मिलता. उठेंगे या नहीं. लेकिन पान की खुशबू में बसा वो कोलाहल खींच ही लेता है- फुरसत के लम्हों को ढलती शाम की सरगर्म आगोश में...
पान की दुकान, ये हर मोहल्ले की वो जगह है जिसके खोखे पर पूरे मोहल्ले का नक्शा चस्पा होता है. पान की दुकान पर होने वाली चहल-पहल बता देती है कि मोहल्ला कितना खुशहाल है.

बम धमाकों की बात कहता हूं, आप मोहल्ले के पान की दुकान पर आते ही समझ जाते सोसायटी वालों की जेहनी हालत वैसी नहीं है, वो बस आते हैं, पैसे बढ़ाते हैं, और वैसे ही गुमसुम मुंह में पान दबाए, सिगरेट की डिबिया उठाये, मुंह लटकाए चल देते हैं. पानवाला भी लगता है, अपने आप में बिजी है, उसके चेहरे से साफ पता चलता है, उसके अंदर उधम मची हुई है- अपने ग्राहकों के उन संवादों का, जो दुकान से दस कदम दूर रहते हुए उसके कानों में गूंज उठते थे, आज उसमें धमाकों के बाद पसरा हुआ सन्नाटा सांय सांय कर रहा है.
कुछ सूझता नहीं बंधु, इसीलिए उन लहुलहान लम्हों में आपसे मुखातिब नहीं हुआ, क्या करें, जिसकी रूह जख्मों के तसव्वुर से ही कांप जाती हों, वो जख्मों को रोज जिंदा देखें, उसकी रुहानी हालत क्या होगी. कई बार सन्नाटा इतना घना हो जाता है कि वो शोर करने की बजाय शब्दहीन हो जाता है. वो फूट नहीं पाता, वो यूं ही घुटता रहता है. पता नहीं, उन दरिंदों की क्या नीयत है. इंसानी रिश्ते अब और धमाके नहीं झेल सकते...कितना झेलें, विश्वास की डोर कितनी देर अक्षत रहे, वो अमन के दुश्मन जान गए हैं, चोट कहां करना है- इन्हीं कमजोर नसों पर जो कमजोर पड़ गई हैं. उन्हें मजहब से क्या, दीन से क्या, धर्म से क्या, वो तो बस इंसान को इंसान नहीं रहने देना चाहते-एक दूसरे के लिए हैवान बना देना चाहते हैं. बिगाड़ देना चाहते हैं वो संतुलन जिससे दुनिया टिकी है.


इनके खिलाफ दुनिया का कोई हथियार काम नहीं आ सकता. क्योंकि ये हर वो जगह हैं, जहां आपका अंदेशा तक नहीं है. दांए सतर्क होते हो दो ये बाएं विस्फोट करते हैं. आप आगे सतर्क होते हो, तो ये पीछे वार करते हैं. ये दरअसल विचारों के लिजलिजे विषाणु हैं, जिसे सिर्फ आपकी इच्छाशक्ति ही मार सकती है, ये परमाणु बम से भी नहीं मर सकते लिजलिजे. आप बस ठान लीजिए, कि मुझे निजी तौर पर दहशतगर्दों का साथ नहीं देना, इनसे जुड़ी कोई सूचना कोई खबर नहीं छुपाना, इनसे कोई मोह नहीं रखना, ये किसी के नहीं होते है. हर आदमी अपने तमाम दुखों के बावजूद ये ठान ले तो, मुश्किल नही इन्हें मात देना. ये बेमौत मारे जाएंगे.

पान की दुकान से बात देखिए कितनी आगे बढ़ गई, अभी पान की दुकान पर मैं तो पहुंचा भी नहीं, लीजिए बस चंद कदम दूर है दुकान, मैं पान खाता तो हूं, लेकिन मीठा मसाले वाला. पान के बारे में एक बार बाबा ने कहा था, कि खैनी जर्दा सब तो खाते ही हो, तो खाओ, लेकिन पान के साथ मिलाकर इसका धर्म क्यों बिगाड़ते हो. अरे पान मुंह में जाएं, तो इसका मादक नशा पूरे तन बदन में छा जाना चाहिए, इतर गुलकंद, लॉन्ग इलायजी सौंफ, सुपारी ये सब एक साथ चीजें मुंह में जाएं, तो सोचो, क्या स्वर्ग का एहसास होगा.

जाते ही पान वाले ने टोका- आईए आईए भाई साहब, कहीं आउट स्टेशन चले गए थे क्या, दो तीन दिन बाद दर्शन हो रहे हैं...बोलिए क्या खाइएगा, वही 'सिंगल सींक'

मैंने टोका- क्यों, आज जल्दी में क्यों हो...

पानवाले की सांस लंबी होती चली गई-तीन दिन में बहुत कुछ बदल गया भाई साहब, अब कौन निकलता है घर से पान खाने, अब हम भी 9 बजे तक निकल जाते हैं, अब वो 12 बजे वाली मौज नहीं, लोग खाना खाकर टहलने निकलते थे, और हंसी खुशी मुंह में पान दबाकर जाते थे.

पानवाले की बात सुनकर लगा, किसी ने पान की पीठ में छूरा भोंक दिया है, और बूंद बूंद कर खून टपक रहा है. कुछ देर तक मैं इस बात पर खामोश रहा, लेकिन रहा नहीं गया-

'आप दुकान बंद करो भाई साहब, लेकिन ये अंत नहीं हैं, कम से कम उस कहानी का तो कतई नहीं, जो अभी आपने सुनाई...आदमी कैसे समा सकता है अपनी खाल के इतना भीतर, नहीं नहीं, ये अंत नहीं हो सकता. लोग निकलेंगे पान खाने, वो भी अब समझने लगेंगे, और ज्य़ादा भागे, तो ये अमन के दुश्मन हमारी खाल में घुसकर मारेंगे'
क्यों, गलत कह रहा हूं? नहीं, तो आईए, आप भी पान खाईए...!

मंगलवार, सितंबर 09, 2008

क्या विनोद जी, मरवा के ही दम लेंगे!

स्केच-जेनेवा का 'काला छेद'

'अरे सुनिए सुनिए, दफ्तर तो रोज जाना होता है, कभी हमसे भी दो चार हो लीजिए, आप लोग तो मरवा के ही दम लीजिएगा. काल को तो महाकाल बना ही दिए हैं आप, अब तो लगता है न हम बचेंगे, न कपाल. माजरा क्या है भैये, डेलिंग-पेलिंग के काम में मराते मराते तो वैसे भी थक चुके हैं, क्या वाकई मरने की बारी आ गई है, सच सच बताईएगा...ये देखो, डर के मारे पसीने तक नही छूट रहे...कहीं 'काले छेद' ने 24 घंटे पहले ही तो सोखना शुरू नहीं कर दिया ?'

माफ कीजिएगा, सोसाइटी का प्रॉपर्टी डीलर है, जब भी सामने पड़ जाता है, दुनिया जहान के मसलों पर ऐसे ही बात करता है, आप उसे चुंकि पहली बार सुन रहे हैं, इसलिए भद्दा लग रहा होगा, वर्ना उसे सुनकर तो यही लगता है- उसे हर 'चुतियापे' का पूरा पता है. और एक बार जो वो शुरू हो जाए तो आप उसे चलता नहीं कर सकते हैं, आपके गले में हाथ डालकर वो सब पूछ लेता है. मैंने भी सोचा, शर्ट क्या गंदा करवाना है, चलिय़े झेल ही लेते हैं...

''विनोद जी, वैसे तो साइंस हमने भी कम नहीं पढ़ा, बस एमएससी का फाइनल एक्जाम नहीं दिया, वर्ना हम भी कम विज्ञानबाज नहीं होते थे, लेकिन विज्ञान से ऐसा पाला कभी नहीं पड़ा. टीवी देखदेख कर अक्ल खराब हो गई है, सबसे पहले तो यही नहीं समझ में आता कि ये महामशीन जब 14 साल से बन रही थी, तो इस पर अभी क्यों हाय तौबा मचा. अगर प्रलय की तैयारी इतने दिनों से हो रही थी, तब...अच्छा...अच्छा, तब तो खैर 'आप लोगों' का जन्म भी नहीं हुआ था, लेकिन ये भी क्या खूब है, जनाब, पैदा होते ही आपलोग इतने बड़े हो गए कि नोबेल प्राइज विनर साइंटिस्ट्स को भी डंडा करने लगे.'

मेरे पास खींसे निपोरने के सिवा और कोई चारा बचता था क्या, आप ही बताइए...मैंने फिर भी ढीठई की- लेकिन उससे पहले ही एक सवाल और...
'विनोद जी आपको पता है, हमारे आसमान में कितने ब्लैक होल हैं, और कितने बड़े हैं, और हमारी धरती से सबसे नजदीकी ब्लैक होल कितनी दूर है? कल ही कही नेट पर सर्च मारा था, तो पाया कि 2600 प्रकाश वर्ष दूर है पृथ्वी के सबसे नजदीक वाला काला छेद, और साइज? साइज है सूर्य से हजार गुना बड़ा. और ये करोड़ो वर्षों से हैं, अगर आप लोगों की कसौटी पर ही कसें, तो इस धरती को कब का उस ब्लैक होल में समा जाना चाहिए था, लेकिन ये तो आज भी डोल रही है...'

'.... .... ...'
'आप लोग तो चार इंच के ब्लैक होल में पूरी दुनिया के समाने की बातें कर रहे हो. क्या आपने नहीं पढ़ा है- सूरज की उमर 5 करोड़ साल है, इसके बाद जब इसका ईंधन खत्म हो जाएगा, इसका आकार बढ़ेगा और ये बुझना शुरू होगा, लेकिन ब्लैक होल बनने की औकात इसमें भी नहीं, ये ज्यादा से ज्यादा सुपरनोवा बन सकता है, तो फिर 27 मील वाले इस लार्ज हेड्रोन कोलाइडर की क्या औकात? मान लीजिए, 10-10 फीट के एक हजार ब्लैक होल बन ही गए, और आपस में मिलकर बड़े भी हो गए, तो वो कितने बड़े हो जाएंगे कि दो सेकेंड में धरती, दो मिनट में चांद और 8 मिनट में सूर्य को निगल लेगा'

मैंने कहा- ऐसा होना तो नहीं चाहिए...

'तो फिर काहे गला फाड़ कर चिल्ला रहे हैं आप लोग, वैज्ञानिक बच्चे हैं क्या, अरे ठीक है, पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं, एक प्रोजेक्ट पर इतन खर्च कर रहे हैं, कि उसमें पूरी दुनिया की गरीबी मिट जाए, हर देश का इंफ्रास्ट्रक्चर दुरूस्त हो जाए, अव्वल तो ये, कि आप लोगों के खबर का एंगिल ये होना चाहिए. अच्छा मौका था, जब बहस शुरू होती, कि आखिर क्यों हम जाने धरती की पैदाइश का रहस्य, जब ग्लोबल वार्मिंग और दूसरी वजहों से इसका भविष्य ही खतरे में हैं. लेकिन आप लोगों ने फायदे तो एक नहीं बताए, लगे खिंचाई करने. अब समझ में आ रहा है- जब कॉपरनिकस ने कहा होगा- कि सूरज हमारी धरती की नहीं, हमारी धरती सूरज की परिक्रमा करती है, तब लोगों ने कैसा शो-ओपेन बनाया होगा, जब न्यूटन ने चीजों के ऊपर से नीचे गिरने का रहस्य बताया होगा, हमारे वजन का राज खोला होगा, तो मठाधीशों ने कैसा उत्पात मचाया होगा, बुरा मत मानियेगा- आप लोग कुछ वही कर रहे हो.

'वैसे, हम आपको बता दें, कि आज के लोग उतने चूतिये नहीं, जितने आप समझ रहे हैं, बड़ों की छोड़िए, बच्चे भी हंस रहे हैं...पता है आज ही की बात है, बेटे की डायरी जब चेक की, तो उसमें 11 को स्कूल में पेंटिग कंपटीशन का जिक्र था. मैने कहा- बेटा कलर और ड्राइंग पेपर चाहिए तो बोल दो, अच्छे से तैयारी करना...बेटा हंसने लगा. मुझे समझ में नहीं आया, फिर वो खुलखुलाते हुए बोला, छोड़ो पापा, 11 को हम बचेंगे ही नहीं, तो पेंटिंग कौन बनाएगा.'

हंसने को तो मैं भी उसके साथ जबरदस्ती हंस रहा था, लेकिन दरअसल में उससे पीछा छुड़ा रहा था. मैं अपनी भद्द और पिटवाना नहीं चाह रहा था. शुक्र है उसने भी पड़ोसी होने का फर्ज निभाया, मुझे बख्श दिया. लेकिन मुझे पता है, उसके सवाल अभी पूरे नहीं हुए, वो मुझे कभी भी दबोच सकता है.

बुधवार, सितंबर 03, 2008

'महुआ' का मतलब

आपने ठीक ही समझा है, मेरा इशारा एक उस नए चैनल की तरफ है, आज घर घर में दिख रहा है. लेकिन असल में ये चैनल तो एक बहाना है- ‘महुआ’ का मतलब समझने का. कोई भी ठीक ठीक नहीं कह सकता, इस ‘केबल एज’ में कितनों को पता होगा महुआ का मतलब. क्या है महुआ, आज अगर ये एक भाषा का बिम्ब बनने में कामयाब हुआ है तो इसकी विडंबना क्या है.

महुआ एक मटमैली भाषा का वो मुरझाया हुआ फल है, जो अपने ही रस में भस्म होने को मजबूर है. शहद जैसी होती है मिठास, तभी इसे मधु के समानांतर महु शब्द मिला, उत्पति के लिहाज से एक साउंड है. इस साउंड में एक पूरी संस्कृति का मादक शोरगुल छिपा है. मादकता महुआ का एक कैरेक्टर है, इसकी मिठास में गजब की मादकता है, वो मादकता जिससे एक पूरे मौसम की पहचान बनती है. वो मादकता, जिसकी वजह से फाल्गुन की मस्ती छाती है.

इस लिहाज से महुआ एक शुरूआत का बीज है. फाल्गुन महीने में जब पेड़ों पर नए पत्ते लगते हैं, महुए का पेड़ कोचियाता है, छोटे छोटे पीले फलों से पूरा पेड़ गदरा जाता है. ये फल दिन में कभी नहीं टपकता, पूरी रात ये मलय पर्वत की मादक हवाओं में अठखेलियां करता है, रंगरेलिया करता है, और सुहब ब्रह्म मुहूर्त में झड़ना शुरू होता है. सुबह सुबह आप महुए के पेड़ के नीचे आप जाईए, छोटे छोटे पीले फलों की बरसात हुई रहती है. नथुनों में दूर से ही इसकी धमक मिल जाती है, आज महुआ खूब ‘चूआ’ है.

फल इतने रसदार होते हैं कि छूने भर से रस टपकने लगे. इसे चुनने की जिम्मेदारी पारंपरिक रूप से दादियों और पोतों की रही है. दादी अपने पोते पोतियों को जगाती है और उनके नन्हे ङाथों में छोटी छोटी मौनियां (बुनी हुई डलिया) देकर निकल पड़ती है अपने दादा परदादा के लगाए हुए पेड़ के पास. बच्चे कूद कूद कर महुआ चुनते हैं. मोनियों का महुआ से भर जाना उनके लिए जिंदगी की पहली उपलब्धि होती है, सबसे पहले अपनी डलिया भरने की कोशिश में जिंदगी की पहली प्रतियोगिता से गुजरते हैं

देखते ही देखते खांचिया भर जाती है महुए के फलों से. घर ले जाकर दादियां महुआ को बड़ी जतन से धूप में सुखाती है, सूख जाने के बाद महुआ किसमिस की तरह हो जाता है. लेकिन महुआ की किस्मत किसमिस जैसी कहां.

दादी इसे संजोकर जरूर रखती है. कभी कभार इसके रेशे जैसे बीज साफकर दूध में फूलाकर कर छांछ बनाती है, कहती है इसके खाने जवानी लौट आती है. खासकर महिलाओं के लिए वरदान है महिला. बांझ औरतों के लिए महुए के पेड़ के गुदे (छिलके) को दूब की घास और कुछ दूसरी जड़ियों के साथ औंट कर (गाढ़ा उबाल कर) सीरप बनाती है. आपको जानकर हैरानी होगी इस काढ़े के सेवन से कई घरों में किलकारियां गूंज गईं. 35-40 साल की औरत का भी रूप ऐसे निखर जाता है, जैसे वो 20-22 की हो. इसका इस्तेमाल भैंसों के दाना पानी में भी होता है, जो भैंस 5-7 बरस की हो जाने पर बच्चे पैदा नहीं करती उसे आषाढ के महीने में महुआ खिलाने से कार्तिक महीने तक वो उम्मीद से हो जाती है.

लेकिन आज तक किसी ने महुआ को समझने की कोशिश नहीं की, इसके औषधिय गुणओं को परखने की कोशिश की गई, क्या पता ये पूरब का किसमिस हो बन जाता, हां देसी शराब का श्रोत जरूर बना दिया गया, क्योंकि इसकी मादकता पहनी नजर में ही नशे का एहसास कराती है. और एक बार महुआ नशे की कड़ाही में चढ़ा, तो फिर निठल्लों का साजो सामान बन गया, सभ्यता से कोसों दूर खिसकता गया, पढ़े लिखों को इसकी आमद से ही चिढ़ होने लगी...आज शायद ही किसी मध्यवर्गीय घर में आपको महुआ का दर्शन हो.

यहीं से महुआ बिम्ब बनता है उस पुरबिया भाषा का, जिसकी लय में मोहब्बत की मिठास है. जिसकी डिक्शनरी एक से एक मादक शब्दों से भरी पड़ी है, लेकिन उसका विकास ध्वनि से ज्यादा स्तर तक नहीं हुआ. महुआ की तरह भोजपुरी से भी वही खिलवाड़ हुआ. चेतना के होते हुए भी राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव औऱ इसके चलते बढ़ते निठल्लेपन ने भोजपुरी को निहत्था कर दिया, रंडियों की भाषा बन गई भोजपुरी, सीडी और वीसीडी कल्चर के साथ इसमें चोली और पेटीकोट के पीछे छिपे शब्द मुखर हो गए. भाषा के साथ जुड़े संस्कार और आदि भावनाएं गर्त में समाती गई और भोजपुरी एक अश्लील भाषा में तब्दील होती गई,

ये तो समस्या का एक सिरा है, इसके बाद बाद जब ग्लोबल कल्चर में पहचान की बात आई तो भाषा के साथ पूरे पुरबिया इलाके के सामने शर्मिंदगी की स्थिति सामने है. आधुनिक समाज में इसके अल्हढ़ टोन की हंसी उड़ाई जाने लगी. इसे बुड़बक समाज का प्रतीक करार दे दिया गया. कभी कोशिश ही नहीं हुई इस प्रतीक से मुक्ति दिलाने की. दिल में कसक सबके है, लेकिन एकजुटता की कमी हर कोशिश नाकाम कर गई

इस भाषा का पहला चैनल होने के नाते ‘महुआ’ स्वाभाविक तौर पर एक आस जगाता है, आस इसलिए, क्योंकि चेतना पर पड़ी राख अब चिंगारी के आगे हवा हो रही है, आंख खोलकर देखिए, अपनी भाषा में चीजें कितनी अच्छी लगती हैं, स्वाभाविक दिखती है. अब कोशिश ये होनी चाहिए कि ये चिंगारी ज्वाला बन जाए, नहीं तो ये आग अगर बुझ गई, तो फिर हमेशा हमेशा के लिए लुप्त हो जाएगा महुआ का संस्कार.

सोमवार, सितंबर 01, 2008

टीज मी, डोंट टीज मी, डोंट टीज मी शोणिए...

बेचारा शनि आजकल फिल्मी गीत गा रहा है- बिलकुल कैट्स के स्टाइल में. इस खुशी में नहीं कि छोटे परदे पर इस छल्लेदार ग्रह को कोई इंसानी शक्ल मिल गई है, बल्कि बेचारा दर्द में कराह रहा है.

अब कराहने का संबंध इतनी प्यार भरी भाषा से कैसे हो सकता है, आप यही सोच रहे होंगे कि जितनी जानी पहचानी है, उतनी ही मीठी लाइन है- ‘टीज नहीं करने’ के आग्रह से ही साफ पता चलता है. तो इसका किसी के दर्द के वास्ता...

अब भाषा की परिभाषा के मुताबिक तो यही मतलब निकलता है कि जब खुददरे शब्द बहुत दिन तक घिसते हैं, भाषा के साथ भावनाओं की चक्की में पिसते हैं तो चिकने हो जाते हैं. इस सिद्धांत के मुताबिक अब जरा सोचिए कि शनि की भाषा इतनी चिकनी हो गई है, तो पहले खुरदरी कितनी होगी. वो क्या कहता होगा और किस अंदाज में कहता होगा.

बेचारा बहुत दिन से चिल्ला रहा था, गला फाड़कर गरज रहा था- अरे मेरे बाप की औलादों, क्या मजाक कर रहे हो मेरे साथ, क्यों इस काली कलूटी जान की लेनी किए हुए हो, बख्श दो मेरे बाप की सौतेली औलादों, क्यों दिन रात अंगुली करने पर तुले हुए हो, बाज आओ मेरे जीजा के सालों, क्यों मेरी इज्जत से खेल रहे हो, मैं तो खुद ही अपनी इज्जत बचाता फिर रहा हूं, मैं तुम्हारा क्या उखाड़ सकता हूं.

मैं विनाशी नहीं, मैं सर्वनाशी नहीं, मैं उत्पाती नहीं, लाखों मील दूर मेरी ढेले भर की औकात नहीं, मैं तो ससुरे सूरज का खुद ही शिकार हूं, रौशनी के बिना लंबे दिन रातों और युग जैसे वर्षों में कलपते रहता हूं. मैं तो ठीक से बोल पाने में अक्षम हूं, मैं क्या न्याय करूंगा, दौलत बरसाना तो छोडो, मैं तो पसीना बहाने के भी कंडीशन में नहीं हूं

क्यों निकाल रहे हो, मेरे आंख नाक कान दांत, मुझे क्यों बना रहे हो विलन. मेरे छल्ले की कसम, ‘जान’वरों, बस भी करो, पीछे दर्द होने लगा है, तुम्हारी उंगलियों की आवाजाही से, लहुलूहान हो गया है पूरा का पूरा...

बेचारा शनि, एक साल में ऐसी हालत हो गई कि घिसते घिसते उसकी भाषा में दर्द पैदा हो गया, शायर की तरह तड़प पैदा हो गई, लेकिन उसे क्या मालूम था उसकी तड़प इतनी बिकेगी, जितनी बिकेगी उतनी उंगलियां उसकी तरफ और बढ़ेंगीं. और वो चाहे किसी का सत्यानाश करे या नहीं, उसका सत्यानाश जरूर हो जाएगा. भाइलोगों ने पूरा प्लान बनाकर बांस किया, एक ही टाइम स्लॉट पर अलग अलग बांस से बांस किया, बांस करने का बहाना चाहिए, पहले तो दिन के उजाले में करते थे, काली घनी रात में उससे भी ज्यादा करते हैं. प्राइम टाइम में फाड़कर रख देते हैं. ससुरी झूठ होती है महानगरों की अमावस, अंधेरे में भी इज्जत नहीं बचती.

अब बताइए भला, अमावस में शनि की क्या गलती, ये तो सूरज चंद्रमा और धरती का खेल है, इनकी लुका छिपी का खेल है, इससे शनि का क्या लेना देना, लेकिन नहीं, भाइयों ने फिर भी बांस किया, बेचारे को बिना वजह विलेन बना दिया. वो बेचारा तो खुद ही कनफर्म कर रहा है कि वो देवता नहीं, लेकिन एक बार बेटा बहुरिया घर से निकल गई, तो फिर समझो कि या तो बहुरिया जाने या फिर ऊपरवाला. इसी तरह शनि भी ऊंगली वालों को मजा दे गया तो दे गया, अब फिर कहां बचना,

बेचारा थक हार कर शनि जमीन पर लेट गया, लो भाइयों, जितनी मारनी है मार लो, अब तो आह भी नहीं किया जाता. फिर बेचारे को अकल आई, अरे यार, इनसे संपर्क साधने के लिए इन्हीं की भाषा में बोलना पड़ेगा, बिलकुल इन्हीं लटके झटकों में...

अगले ही दिन से शनि की भाषा बदल गई, चाल में कैटरीना सी लचक पैदा हो गई, और करीना सा उसका दिल डांस मारने लगा- टिज मी, डोंट टिज मी, डोंट टिज मी शोणिए...चालाक हसीना की तरह शरारत पर उतर आया है शनि,

अब देखना है इस अदा पर कितने दिन तक बचता है शनि...