सोमवार, सितंबर 01, 2008

टीज मी, डोंट टीज मी, डोंट टीज मी शोणिए...

बेचारा शनि आजकल फिल्मी गीत गा रहा है- बिलकुल कैट्स के स्टाइल में. इस खुशी में नहीं कि छोटे परदे पर इस छल्लेदार ग्रह को कोई इंसानी शक्ल मिल गई है, बल्कि बेचारा दर्द में कराह रहा है.

अब कराहने का संबंध इतनी प्यार भरी भाषा से कैसे हो सकता है, आप यही सोच रहे होंगे कि जितनी जानी पहचानी है, उतनी ही मीठी लाइन है- ‘टीज नहीं करने’ के आग्रह से ही साफ पता चलता है. तो इसका किसी के दर्द के वास्ता...

अब भाषा की परिभाषा के मुताबिक तो यही मतलब निकलता है कि जब खुददरे शब्द बहुत दिन तक घिसते हैं, भाषा के साथ भावनाओं की चक्की में पिसते हैं तो चिकने हो जाते हैं. इस सिद्धांत के मुताबिक अब जरा सोचिए कि शनि की भाषा इतनी चिकनी हो गई है, तो पहले खुरदरी कितनी होगी. वो क्या कहता होगा और किस अंदाज में कहता होगा.

बेचारा बहुत दिन से चिल्ला रहा था, गला फाड़कर गरज रहा था- अरे मेरे बाप की औलादों, क्या मजाक कर रहे हो मेरे साथ, क्यों इस काली कलूटी जान की लेनी किए हुए हो, बख्श दो मेरे बाप की सौतेली औलादों, क्यों दिन रात अंगुली करने पर तुले हुए हो, बाज आओ मेरे जीजा के सालों, क्यों मेरी इज्जत से खेल रहे हो, मैं तो खुद ही अपनी इज्जत बचाता फिर रहा हूं, मैं तुम्हारा क्या उखाड़ सकता हूं.

मैं विनाशी नहीं, मैं सर्वनाशी नहीं, मैं उत्पाती नहीं, लाखों मील दूर मेरी ढेले भर की औकात नहीं, मैं तो ससुरे सूरज का खुद ही शिकार हूं, रौशनी के बिना लंबे दिन रातों और युग जैसे वर्षों में कलपते रहता हूं. मैं तो ठीक से बोल पाने में अक्षम हूं, मैं क्या न्याय करूंगा, दौलत बरसाना तो छोडो, मैं तो पसीना बहाने के भी कंडीशन में नहीं हूं

क्यों निकाल रहे हो, मेरे आंख नाक कान दांत, मुझे क्यों बना रहे हो विलन. मेरे छल्ले की कसम, ‘जान’वरों, बस भी करो, पीछे दर्द होने लगा है, तुम्हारी उंगलियों की आवाजाही से, लहुलूहान हो गया है पूरा का पूरा...

बेचारा शनि, एक साल में ऐसी हालत हो गई कि घिसते घिसते उसकी भाषा में दर्द पैदा हो गया, शायर की तरह तड़प पैदा हो गई, लेकिन उसे क्या मालूम था उसकी तड़प इतनी बिकेगी, जितनी बिकेगी उतनी उंगलियां उसकी तरफ और बढ़ेंगीं. और वो चाहे किसी का सत्यानाश करे या नहीं, उसका सत्यानाश जरूर हो जाएगा. भाइलोगों ने पूरा प्लान बनाकर बांस किया, एक ही टाइम स्लॉट पर अलग अलग बांस से बांस किया, बांस करने का बहाना चाहिए, पहले तो दिन के उजाले में करते थे, काली घनी रात में उससे भी ज्यादा करते हैं. प्राइम टाइम में फाड़कर रख देते हैं. ससुरी झूठ होती है महानगरों की अमावस, अंधेरे में भी इज्जत नहीं बचती.

अब बताइए भला, अमावस में शनि की क्या गलती, ये तो सूरज चंद्रमा और धरती का खेल है, इनकी लुका छिपी का खेल है, इससे शनि का क्या लेना देना, लेकिन नहीं, भाइयों ने फिर भी बांस किया, बेचारे को बिना वजह विलेन बना दिया. वो बेचारा तो खुद ही कनफर्म कर रहा है कि वो देवता नहीं, लेकिन एक बार बेटा बहुरिया घर से निकल गई, तो फिर समझो कि या तो बहुरिया जाने या फिर ऊपरवाला. इसी तरह शनि भी ऊंगली वालों को मजा दे गया तो दे गया, अब फिर कहां बचना,

बेचारा थक हार कर शनि जमीन पर लेट गया, लो भाइयों, जितनी मारनी है मार लो, अब तो आह भी नहीं किया जाता. फिर बेचारे को अकल आई, अरे यार, इनसे संपर्क साधने के लिए इन्हीं की भाषा में बोलना पड़ेगा, बिलकुल इन्हीं लटके झटकों में...

अगले ही दिन से शनि की भाषा बदल गई, चाल में कैटरीना सी लचक पैदा हो गई, और करीना सा उसका दिल डांस मारने लगा- टिज मी, डोंट टिज मी, डोंट टिज मी शोणिए...चालाक हसीना की तरह शरारत पर उतर आया है शनि,

अब देखना है इस अदा पर कितने दिन तक बचता है शनि...

1 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

छोटे परदे पर नौ में सब से जियादा कमाई का सौदा है, शनि।