शनिवार, अगस्त 09, 2008

सुन लो 8 से डरने वालों


बात ऐसी भी नहीं, कि उसका जिक्र किया जाए, लेकिन बात वैसी भी नहीं, कि 'विचार ग्रंथि' को टच किए बगैर निकल जाएं.बड़े शहरों की खासियत है, छोटी छोटी बातें यहां भी बड़ी रेफरेंस वाली होती हैं.
एक वाकया देखिए- सावन की काली घटा से मस्त हो रखा है मौसम. दफ्तर से थोड़ी जल्दी छुट्टी हुई तो लगा, कितना अच्छा सौभाग्य है. हालांकि सड़क पर जाम ही जाम था, लेकिन पानी उतर चुका था, कीचड़ धुल चुके थे, शहर ऑटोमेटिकली साफ दिख रहा था. मार्केट से गुजरते हुए हलवाई की दुकानों से आ रही सोंधी खुशबू नथुनों में चढ़ रही थी..

घर से पांच मिनट की दूरी पे होउंगा, तो फोन आया, पत्नी बोली-
'क्या बात है, आज फोन नहीं किया, बारिश में गरम पकौड़े नहीं खाने क्या...कब आ रहे हो?
'नहीं, आज पकौड़े के साथ जलेबी खाने का मन है...बोलो खाना है क्या, पकौड़े तुम्हारे, जलेबी मेरी...
पत्नी को मजाक सूझा, जैसे जलेबी को मिठाई नहीं, लड़की हो-
'ये जलेबी आपकी कहां से हो गई...कि उसके नाम पर आपकी जुबान इतनी गीली हो रही है...
''पता नहीं, आज क्या हो रहा है यार, जलेबी ही नहीं, पूरी दुनिया ही अपनी लग रही है...
''...अच्छा...!, तब तो जलेबी को घर लेते ही आईए, दुनिया की भीड़ से जलेबी ही अच्छी है, मैं पकौड़े बना रही हूं...'
गाड़ी रोक कर मैं दुकान के पास गया, अब नाम मत पूछिए, कि वो दूकान अग्रवाल स्वीट की थी, या कोई ठेले वाला, आप सिर्फ जलेबी पर कॉन्सेनट्रेट कीजिए...
हां, तो मैं जलेबी की दुकान का जिक्र कर रहा था, वहां पहुंचा तो देखा, अभी तैयारी जल रही है, चूल्हा जला चुका है, लेकिन काम अभी शुरू नहीं हुआ. मैने पूछा- कितनी देर लगेगी भैया...?हलवाई भी जल्दी में था, बोला- बस सर, तेल गरम हो रहा है...10 मिनट में तैयार होगी
मैं हाथ बांधे चुप चाप कड़ाही पूरी तरह गरम होने का इंतजार करने लगा...पांच मिनट में तेल गर्म हो गया, और काम शुरू...मैं उसकी सफाई का सेंस, उसका चीजों के प्रति कंसर्न, और आगे होने वाले कामों की प्री-प्लानिंग देखकर दंग था- अच्चा लग रहा था उसकी सटीक सक्रियता देख कर।हलवाई ने आंख बंद कर पहली जलेबी कड़ाही में डाली...उसे अच्छी तरह लाल कर पकाना शुरू किया...
ये कोई नई बात नहीं थी, मेरे लिए, बहुत पहले भी मां जब रोटियां बनाती थी, तो पहले छोटी रोटी बनाती थी, तवे पर डालकर उसे अच्छी तरह पकाती थी, और उसे किसी को खाने नहीं देती थी, वो सुबह गाय को खिला देती थी...

जब जलेबी पूरी तरह लाल हो गई, तो हलवाई ने उसे कडाही से निकाला, और चूल्हे की आग में उसे रख दिया...जलेबी धू धू कर जलने लगी, फिर उसने हाथ में पानी लेकर उसपर आचमन मारा और "गोड़ लागा* और काम में नए सिरे से जुट गया...

एक दो तीन या चार 8 क्या उसने जलेबी की शक्ल में कई 8 बना डाले, पूरी कड़ाही 8 की शक्ल से भर गई. लेकिन....गौर फरमाईए बंधु,

गजब का विश्वास है बंधु, गजब का भरोसा- कि अग्नि को पहला निवाला देने के बाद आगे जो भी होगा खैरियत के लिए होगा...शनि कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा. टीवी पर 8 के अंधविश्वास का मारा मैं हलवाई के विश्वास से जाने क्यों राहत महसूस कर रहा था...

हलवाई के चेहरे पर गजब का सुकून था. मैने तय कर लिया, ये बात पत्नी से जरूर बताऊंगा

* 'गोड़ लागना' भोजपुरी की एक क्रिया है, जिसका हिंदी में मतलब होता है- गोड़ यानी पांव, लागना मतलब छूना- पांव छूना...। इस क्रिया से जुड़ा एक वाकया आपको जरूर बताना चाहूंगा- किस्सा गांव का है. एक गुरू जी थे, बिलकुल फिक्स टाइम पर रोज सायकिल से स्कूल जाते थे, बारहो मास नहा धोकर, टीका लगा कर और गेरुआ चोंगा पहन कर. उनकी सायकिल के बारे में मशहूर था- ये आवाज नहीं करती. गुरूजी उसे मैंटेन ही इतना करते थे. खैर, किस्सा ये है कि लोग उनको चिढ़ाते थे. उनको खास तौर पर चिढ थी, अपभ्रंस भोजपुरी के शब्दों से. वो चाहते थे कि पढ़े लिखों की बोली में ठेठ भाषा का इस्तेमाल अच्चा नहीं लगता. एक तरफ तो आप हिंदी में बात करते हो, और जहां अटकते हो, वहां ठेठ शब्दों का सहारा लेते हो. और जब तक ऐसा बंद नहीं करोगे, तब तक आप शुद्ध हिंदी नहीं सिखोगे. क्योंकि भोजपुरी हिंदी परिवार की भाषा है. इसलिए मिक्स अप से बचना चाहिए. लेकिन लोग उनकी इस दलील से सहमत नहीं थे, क्योंकि वो इस बात पर मौके के हिसाब से बड़ी बुरी तरह झिडकते थे. लोग उनसे डरते तो जरूर थे, क्योंकि वो विद्धान और रौबदार थे, लेकिन चिढ़ाते भी खूब थे. खासकर बच्चे, जो उन्हें 'गोड़ लाग तानी गुरूजी...' कह कर भाग जाते थे,एक दिन लड़को के झूंड ने इसी अंदाज में अभिवादन किया- गोड़ लागअ तानीजा गुरू जी...(सबने एक स्वर में कहा)इतनी सारे लड़को और पीछे आ रहे लड़कों के दूसरे झूंड को देखकर गुरू जी के पास चुप रहने के सिवा कोई चारा नहीं था. लेकिन गुस्सा तो उनके अंदर छटपटा रहा था...सायकिल रोककर उसे शांत करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नहीं रहा, निकल ही पड़ा..-गोड़ लागला तक त ठीक बा, लेकिन एक बात बताव जा, हाथे कहिया लगबअ जा...गुरू जी के जवाब के बाद लड़कों के पास मुंह बंद कर हंसने के सिवा कोई चारा नहीं था.

मंगलवार, अगस्त 05, 2008

एक बार फिर मरी आरुषि!


एक बार फिर से पूछ रहे हैं बच्चे- क्या हुआ आरुषि का, पापा...?
इशारा तो आप समझ ही गए होंगे, बच्चे क्यों पूछ रहे हैं ये सवाल. लेकिन बड़े क्या जवाब दें- एक बार फिर क्यों मरी आरुषि, ये तो गहरी विवेचना का विषय है कि दोबारा क्यों मार दी गई आरुषि, लेकिन एक सवाल का जवाब मिलते ही माजरा कुछ हद तक साफ हो जाता है- कैसे दोबारा मरी आरुषि- आप सबने देखा- एक बार उसे आसमान पर उठाया, देर तक झुलाया...और फिर अचानक, आसमान से पटक दिया. पटका भी ऐसा कि हकीकत के धरातल पर उसकी खबर क्या, सरगर्मी तक नहीं बाकी.

जब दिखाया/छपा तो क्या खूब दिखाया/छापा, जो नहीं दिखाना/छापना था वो भी दिखाया/छापा. हर खबर के साथ बेचारी को नई मौत के साथ मारा. अंधेरे में तीर मार मार कर कई सारी थ्योरियां निकाली, लेकिन सब गुड़ गोबर...सब सड़ी हुई. चैनलों को टीआरपी अच्छी हासिल हुई, तो अखबारों को, खासकर दिल्ली के दो टेबलायड्स का सर्कुलेशन 'हाइट' पर पहुंच गया, लोग सच जानना चाहते थे, इसलिए देखते/पढ़ते थे- आरुषि को वाकई किसने मारा, क्या हुआ था उस रात उसके साथ, लेकिन ये सवाल आज तक अधर में है, अब जबकि आरुषि की आत्मा को मीडिया की सबसे ज्यादा जरुरत है, उसे नहीं लगता आरुषि के इंसाफ से कोई वास्ता रह गया है. .

लगता तो यही है, सारे मसाले चूस चुके मीडिया वाले- मर्डर, मिस्ट्री, सेक्स,एक्सट्रा-मेरिटल अफेयर, रेप... आपको याद होगी- मासूम के निहायत ही निजी मैसेज को भी क्या मिर्च मसाला लगाकर परोसा, ऐसी थी आरुषि, वैसी थी आरुषि...बकायदा री-क्रियेशन कर दिखाया गया, ऐसे हुआ कत्ल, ऐसे हुआ रेप...एक अभियान छेड़ रखा था, लेकिन अब क्या...?

अब तो सीएफएसएल से तमाम रिपोर्ट भी आ गई होगी, सीबीआई के तमाम दावों की सच्चाई सामने आ चुकी होगी, उसने किन सबूतों और किस बिना पर किसको बरी किया, किसको गुनहगार ठहराया, कैसे उन्हें कोर्ट में दोषी ठहराएगी, दो महीने तक आखिर उसने क्या किया. ये सारे सवाल अहम है. लेकिन इसका जिक्र न तो सिंगल कॉलम/न टिकर कहीं नहीं हैं. जाने उस मासूम के सहारे समाज का कौन सा सच दिखाना चाहता था मीडिया, जिसके पर्दाफाश से पहले ही उसने चुप्पी साध ली. जेल से छूटने के बाद पिता सुकून से घर में बैठे हैं, सीबीआई सुस्ता रही है, और आरोपी (कृष्णा, राजकुमार, और विजय) जेल में अपने निर्दोष होने का राग अलाप रहे हैं. कहानी अभी खत्म नहीं हुई है,

माफ कीजिएगा, मैं भी अपनी बात कुछ सवालों के साथ ही खत्म कर रहा हूं- जवाब मेरे पास नहीं, एक अपील जरूर है- एक बार फिर पीछे पड़ो बंधुओं, टीआरपी नहीं, इस बार आरुषि के इंसाफ के लिए- दिन में 10 मिनट के लिए ही सही. आपकी चुप्पी की वजह से आरुषि के गुनहागार सुकून की सांस ले रहे हैं

इतना तो हक बनता ही है- उस दुलारी का, जो खबरों की जान बन गई थी.